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क्यों खरीदें ऐसी हिन्दी की किताबें…..


June 25th, 2010 at 05:49 pm | 13 Comments

हिन्दी साहित्य के हिमायती और अंग्रेज़ी को कोसने वाले काफ़ी लोग बहस के लिए कहते हैं कि लोग अपनी भाषा की कद्र नहीं करते, अंग्रेज़ी के उपन्यास आदि 400-500 रूपए में भी ले लेते हैं जबकि हिन्दी उपन्यासों का इतना दाम नहीं देना चाहते। आज रिलायंस टाइम आऊट में जाना हुआ; यह रिलायंस की रिटेल चेन के बुकस्टोर्स का नाम है जहाँ किताबें, संगीत और फिल्मों की सीडी-डीवीडी आदि मिलती हैं। मैं ऐसे ही हिन्दी साहित्य वाले भाग में विचर रहा था कि बाबू देवकीनंदन खत्री के उपन्यास “भूतनाथ” पर नज़र पड़ी। दरिया गंज के इंडिया बुक हाऊस ने यह वाला संस्करण छापा है, लगभग पाँच सौ पन्नों की किताब और कीमत लगभग पाँच सौ रूपए। पाँच सौ रूपए अधिक नहीं हैं लेकिन इस संस्करण के लिए मैं पचास रूपए से अधिक देना नहीं पसंद करूँगा। क्यों? किताब का कलेवर बेकार है, कागज़ कोई बढ़िया नहीं लगा हुआ, छपाई बिलकुल ऐसी है जैसी सड़क की पटरी पर मिलने वाले 20-30 रूपए के उपन्यासों की होती है। तो जब किताब की गुणवत्ता ऐसी है तो क्यों मैं पब्लिक डोमेन में मौजूद कहानी पर छपी किताब के पाँच सौ रूपए दूँ? ऐसा भी नहीं है कि बाबू देवकीनंदन खत्री के उपन्यासों पर कॉपीराइट है और उसकी रॉयल्टी प्रकाशक को अदा करनी पड़ती हो!! पब्लिक डोमेन में मौजूद अंग्रेज़ी के उपन्यास सौ-सौ रूपए में बिकते हैं और उनका कागज़ और छपाई इससे कई गुणा बेहतर होती है!!

बात हिन्दी की भी नहीं है, ऐसी किताब किसी भी भाषा में हो मैं उसका ऐसा मूल्य कदापि चुकाना पसंद नहीं करूँगा!!

 
पुनश्चः - मैं सभी हिन्दी किताबों को ऐसा नहीं बता रहा हूँ, केवल कुछ ऐसी किताबों के बारे में बात कर रहा हूँ जो कि इस तरह खरीददार के उत्साह पर पानी उड़ेल देती हैं। अन्य भाषाई किताबों की भांति हिन्दी किताबें भी एक से अधिक प्रकाशक छापते हैं और ये हर प्रकार के कलेवर आदि में आती हैं। उनमें से कुछेक ऐसी होती हैं जिनका दाम तो ऊँचा होता है लेकिन कलेवर बदमज़ा और कागज़ तथा छपाई रद्दी होती है।


बाघ-चीते बचाने, अर्थ ऑवर मनाने का बेतुकापन…..


March 29th, 2010 at 07:07 am | 22 Comments

देश का राष्ट्रीय पशु, बाघ, लगभग विलुप्त होने को है, सिर्फ़ 1411 बाघ बचे हैं देश में। क्या यह आपको जाना पहचाना लग रहा है? यदि हाँ तो वह इसलिए कि मोबाइल सेवा प्रदाता एयरसेल (aircell) ने मुहीम चलाई हुई है सबको इस विषय में अवगत कराने की। भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान कैप्टेन कूल धोनी, जो कि एयरसेल के ब्रैंड एम्बैसेडर हैं, भी टीवी के विज्ञापन में चिंता जतलाते दिख जाते हैं। एक नेक मुहीम है, बाघ की वाकई रक्षा होनी चाहिए, सिर्फ़ इसलिए नहीं कि वह राष्ट्रीय पशु है परन्तु इसलिए कि वह प्रकृति की धरोहरों में से एक है और हम मनुष्यों के कारण विलुप्त होने की कगार पर है!! परन्तु जिस तरह यह अभियान चलाया जा रहा है उससे बाघ बच जाएँगे क्या? एक विज्ञापन में फिल्म अभिनेता कबीर बेदी कहते हैं कि आईये ब्लॉग लिखें चिंता जतलाएँ। मैं ब्लॉगों और सोशल मीडिया की शक्ति को नहीं नकार रहा हूँ लेकिन मैं यह सोच रहा हूँ कि क्या ब्लॉग लिखने से बाघों का कत्ल-ए-आम थम जाएगा? जो शिकारी स्मगलर आदि बाघों का शिकार कर रहे हैं वे ब्लॉग पढ़ते हैं क्या? या उनको कोई फर्क पड़ता है कि ब्लॉगों आदि पर क्या लिखा है?


इसलिए मुझे इस विषय में संशय है क्योंकि या तो यह अभियान बिना अधिक सोच के चलाया जा रहा है या फिर जनहित की मुहीम की आड़ में प्रमोशन का एक तरीका मात्र है। जनहित अभियान के ज़रिए अपना लाभ करना कोई बुरा कार्य नहीं, प्राइवेट कंपनी है और मुनाफ़ा चाहिए तभी आगे भी ऐसे अभियान जारी रह सकेंगे। लेकिन अभियान की कोई सेन्स तो बननी चाहिए!! बेतुके अभियान से क्या जनहित होगा? क्या यह जस्ट फॉर द सेक ऑफ़ इट किया जा रहा है?

अब बात करें अर्थ ऑवर (Earth Hour) की। अर्थ ऑवर के पीछे मामला यह है कि प्रत्येक वर्ष एक दिन एक घंटा शाम के समय लोगों से अपने घरों आदि की बिजली बंद करने को कहा जाता है, विश्व भर के शहरों में स्थानीय समय अनुसार। काहे ऐसा किया जाता है? अब इस शगूफ़े के पीछे फिलॉसोफ़ी यह है कि एक घंटा यदि हर व्यक्ति अपने-२ घर की बिजली बंद कर दे तो इससे बिजली की बचत होगी, कार्बन फुटप्रिंट कम होगा। अपन कदाचित्‌ मूढ़ हैं क्योंकि अपने को यह चीज़ कम से कम भारत जैसे देश में बेतुकी और हास्यप्रद लगती है। परसों अर्थ ऑवर वाले दिन रवि जी ने इस पर एक पहलू के मद्देनज़र अपने विचार रखे, इधर कल दीप (अंग्रेज़ी लिंक) ने भी अपने ब्लॉग पर बतलाया कि क्यों इस तरह के अभियान भारत में बेतुके हैं। दरअसल हम भेड़ों की तरह आँख मूँद किसी भी चीज़ को मानने के लती (जी हाँ लत ही तो लग गई है) हो गए हैं। परसों अपनी ट्विट्टर स्ट्रीम में देखा किसी ने कुछ ऐसा कहा:

भारत में एक घंटा बिजली बंद कर बिजली बचाने को कहना ऐसा है जैसे किसी कुपोषण के शिकार को यह कहना कि वह एक समय का भोजन न करे क्योंकि अमेरिकी खा-खा कर मोटापे का शिकार हो रहे हैं

अब यह किसने कहा यह मुझे याद नहीं, खोजने की कोशिश करी लेकिन यह ट्वीट नहीं मिली। बहरहाल, ट्वीट चोट करती हुई है और अर्थ ऑवर की भांति सेन्सलेस नहीं है।

परसों शाम मैं नज़दीक ही मौजूद मामा जी के घर गया तो वहाँ ऐसे ही ज़िक्र आया और मामी जी ने कहा कि साढ़े आठ बज रहे हैं बिजली बंद कर देनी है। मुझे पता था लेकिन फिर भी मैंने पूछा कि क्यों करनी है तो वे बोलीं कि अर्थ ऑवर है। मैंने पूछा कि उससे क्या होगा तो मामा जी ने कहा कि बिजली बचेगी और कार्बन फुटप्रिंट कम होगा। इस पर मैंने फिर उत्तर दिया कि हमारे या पूरे इलाके के या पूरी दिल्ली के बिजली बंद कर देने से पॉवर स्टेशन बिजली बनानी बंद नहीं करेंगे, तो कार्बन फुटप्रिंट में ऐसी कोई कमी नहीं आएगी। यहाँ (भारत में) तो वैसे ही जितनी बिजली पैदा होती है वह पूरी नहीं पड़ती, बहुत सी जगहों पर कई-२ घंटों तक रोज़ाना अर्थ ऑवर मनाया जाता है।

दूसरी बात यह कि यदि बिजली प्रयोग नहीं की जाती तो वह भी नुकसान है क्योंकि बिजली को संजो के नहीं रखा जा सकता, जितनी बनती है उतनी प्रयोग होनी आवश्यक है अन्यथा बर्बाद जाएगी, और कार्बन फुटप्रिंट तो फिर भी उतना ही बढ़ेगा। यह पानी या अनाज आदि नहीं है कि यदि सरप्लस है तो उसको स्टोर करके रख लिया बाद में काम आ जाएगा!! और ऐसा भी नहीं है कि यदि बिजली कम प्रयोग हो रही है तो एकदम से पॉवर स्टेशन बिजली बनानी कम कर देंगे। वे ऐसे रियल टाइम एडजस्टमेंट पर नहीं चलते, एक निश्चित सीमा होती है और उतनी ही बिजली प्रति मिनट घंटे दर घंटे उत्पन्न की जाती है। और ऐसा भी नहीं है कि यदि एक इलाके के लोग एक घंटे के लिए बिजली बंद कर देंगे तो वह बिजली दूसरे इलाके में पहुँच जाएगी जहाँ लोड शेडिंग की जा रही है। इसलिए यह सब चोंचले अमेरिका और योरोप आदि में उचित लगते हैं जहाँ चौबीसों घंटे बिना रुकावट बिजली आती है और नाराज़ होकर जाती नहीं है!! भारत जैसी जगहों पर यह आडम्बर एक वाहियात मज़ाक ही है और कुछ नहीं।

और यदि बिजली बचानी ही है और अपना बिल भी कम करना है तो उसके लिए बिजली व्यर्थ न की जाए। साल में एक दिन एक घंटा बिजली बंद कर बचाने की सोचना वैसे ही है जैसे नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली का हज को जाना!! बिजली बचाओ, अपने प्रतिदिन के जीवन में यह आचरण लाओ कि जहाँ व्यर्थ बिजली का प्रयोग हो रहा है उसको रोको। यदि किसी कमरे में बैठे हो और रोशनी की आवश्यकता नहीं है तो ट्यूब आदि बंद कर दो, किसी कमरे में यदि कोई नहीं है तो वहाँ ट्यूब पंखे आदि बंद कर दो, कंप्यूटर पर काम नहीं है तो उसको बंद कर दो और यदि नहीं कर सकते तो कम से कम स्क्रीन को बंद कर दो। इस तरह की आदत को नित्य जीवन में ढालने से बहुत फर्क पड़ता है, बिजली बचेगी और महीने का बिजली का बिल आने पर भी फर्क नज़र आएगा।

 
 
चीते की फोटो साभार law_keven और अर्थ ऑवर की फोटो साभार aussiegall, क्रिएटिव कॉमन्स लाइसेन्स (Creative Commons License) के अंतर्गत


March 12th, 2010 at 07:07 am | 11 Comments

श्री श्री १००८ परम्‌ पूज्य बाबा अमित जी महाराज का नवीन डिप्लोमैटिक जीवन मंत्र

देखो सुनो सोचो विचारो, ज़रूरत हो तो ही कुछ उच्चारो


पाकिस्तानी टीम की सुरक्षा माकूल नहीं…..


March 1st, 2010 at 07:07 am | 6 Comments
Posted In: Sports, खेल

पाकिस्तानी हॉकी टीम के कोच शाहिद अली खान साहब चिंतित हैं कि नई दिल्ली में हो रहे हॉकी विश्वकप में उनकी टीम को संतोषजनक सुरक्षा नहीं दी जा रही है (यहाँ पढ़िए)। मन में ऐसा आता है कि पूछें कि जनाब आपको सुरक्षा की काहे आवश्यकता, अब अल-कायदा या आपके कोई अन्य बंधु बम वगैरह फोड़ेंगे तो आपको तो पहले से इत्तला कर देंगे, आपको थोड़े ही न टेन्शन लेने की आवश्यकता है!! :roll:

फिर मन में आता है कि नहीं ऐसा सोचना उचित नहीं होगा, अब सभी पाकिस्तानी थोड़े ही आतंकवादी हैं, उधर भी बम वगैरह फटते हैं, आतंकवादी पुलिस चौकियों आदि पर कब्ज़ा कर लेते हैं, तो ऐसा कहना तो ज़्यादती होगी। फिर मन में ख्याल आता है कि पूछ लें कि जनाब क्या आपको वैसी सुरक्षा दी जाए जैसी बेचारी श्रीलंका की क्रिकेट टीम को दी गई थी, क्या वह आपके हिसाब से माकूल रहेगी?! :roll: ऐसा क्यों? इसलिए क्योंकि खान साहेब तुलना कर रहे थे कि जैसी सुरक्षा उनको दी जा रही है वैसी टंटपुंजियों वाली सुरक्षा तो पाकिस्तान में भी देते हैं। मेरे ख्याल से खान साहेब सुरक्षा या अन्य किसी विषय पर अहमकाना टिप्पणी करने के स्थान पर अपनी टीम और उसके खेल पर ध्यान दें तो बेहतर होगा, देखा नहीं भारतीय टीम ने कैसे पहले मैच में कल उनको धोया, ऐसे तो धोबी भी कपड़े नहीं धोता!! :D

 
 
फोटो साभार CORE-Materials, क्रिएटिव कॉमन्स लाइसेन्स (Creative Commons License) के अंतर्गत


पसंदीदा लेखों की सूचि


February 17th, 2010 at 07:07 am | 8 Comments

एक अरसा हुआ, रवि जी ने कहा था कि मैं अपने पसंदीदा लेखों की सूचि सार्वजनिक करूँ ताकि वे भी देख सकें कि मैं क्या पढ़ता हूँ। उस समय मैं ब्लॉगलाइन्स (bloglines) का प्रयोग करता था और अभी तक करता आ रहा था, उसमें लेख पसंद कर उनकी फीड आदि सार्वजनिक करने का कोई जुगाड़ नहीं है इसलिए रवि जी के कहे अनुसार करना संभव न था। ब्लॉगलाइन्स की काफ़ी समय से आदत पड़ी हुई थी, वही प्रयोग करता आ रहा था इसलिए गूगल रीडर पर पलायन करने को मन न मानता था। कुछेक सुविधाएँ दोनों में ही एक्सक्लूसिव सी हैं; जिस प्रकार गूगल रीडर की भांति ब्लॉगलाइन्स में पसंदीदा लेखों की फीड को साझा नहीं किया जा सकता उसी प्रकार गूगल रीडर में ब्लॉगलाइन्स की भांति किसी लेख को सेव करने का जुगाड़ नहीं है। वैसे मैं आशा कर रहा हूँ कि गूगल रीडर में किसी भी लेख को स्टॉर करने का जो विकल्प है वह अमुक लेख को रीडर में ही रखता होगा चाहे लेख कितना ही पुराना क्यों न हो, जैसे कि ब्लॉगलाइन्स में किसी भी लेख को पिन करने का विकल्प होता है।

बहरहाल, पिछले लगभग दो वर्ष से ब्लॉगलाइन्स के बीटा संस्करण का प्रयोग करता आ रहा हूँ, यह पिछले दो वर्ष से बीटा में है और पता नहीं इस पर आज भी काम हो रहा है या फिर काम रुका हुआ है क्योंकि यह गाहे-बगाहे डाऊन रहता है, सर्वर में एरर आ जाता है या लोड नहीं होता, सर्वर से संबन्ध नहीं हो पाता, यानि कुल मिलाकर बीटा के पूरे अर्थ को सार्थक करता है। इसी से आखिरकार तंग आकर गूगल रीडर पर पलायन करने का मन बनाया और अब पिछले दो दिन से वहीं ब्लॉग आदि पढ़े जा रहे हैं। अब जब गूगल रीडर पर आना हो गया है तो ज़ाहिर है कि पसंदीदा लेखों की सूचि भी साझा की जा सकती है। ;) बस इसी नेक मनसूबे के तहत जीतू भाई के ब्लॉग से आईडिया उठा के अपने यहाँ एक पन्ना इसी के लिए बना लिया है जहाँ पसंदीदा लेखों की सूचि विराजमान रहे। :cool:

यह पन्ना यहाँ उपलब्ध है, मौजूदा सूचि अपने आप अपडेट होती रहेगी जैसे-२ मैं अन्य पसंदीदा लेखों के लिंक साझा करता जाऊँगा, पढ़ने के लिए आप कभी भी यहाँ पधार सकते हैं। :tup:


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