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February 9th, 2010 at 07:16 am | No Comments
Posted In: कतरन

नक्काशीदार छत….. कला और कौशल का सुन्दर नमूना


February 1st, 2010 at 07:16 am | No Comments
Posted In: कतरन

मैंगो सालमन मूस मैजिक….. आम का एक लज़्ज़तदार पकवान


हिपोक्रिट से सेल्फ़ राईटियस


January 21st, 2010 at 07:07 am | 4 Comments

व्यक्ति कोई भी हो, पुरुष हो या स्त्री, हर मनुष्य में हिपोक्रिटिक (hypocritic) भावना मिल ही जाती है। अब मेरे एक मित्र का मानना है यदि व्यक्ति संपन्न पारिवारिक पृष्ठभूमि से नहीं आया हो (आयी भी हो सकती है लेकिन फॉर द सेक ऑफ़ पोस्ट, एक कॉमन लिंग लेकर “आया” ही प्रयोग करते हैं) तो उसका बर्ताव अधिकतर समय सेल्फ़ राईटियस (self righteous) की रेखा पार करता है। अब यदि व्यक्ति सेल्फ़ राईटियस की सीमा पार करता है तो हिपोक्रिट (hypocrite) भी काफ़ी हो जाता है, सूडो (pseudo) हो जाए तो भी कोई बड़ी बात नहीं। लेकिन अपने मित्र से मैं इस बात पर सहमत नहीं कि यह मामला उनके साथ अधिक होता है जिनकी संपन्न पारिवारिक पृष्ठभूमि नहीं। मैंने संपन्न पारिवारिक पृष्ठभूमि से आए लोगों में भी ऐसी भावनाएँ देखी हैं, इसलिए मैं स्वयं कम से कम इस तरह जनरलाइज़ (generalize) नहीं कर सकता क्योंकि मैं समझता हूँ कि इस मनोविज्ञान को समझने जितनी जानकारी और समझ फिलहाल मुझमें नहीं है।

काफ़ी समय हो गया, एक मिड्डल एज की मोहतरमा की बातें कान में पड़ी थी। कोई समारोह था या शादी-विवाह का अवसर था यह नहीं याद। वह मोहतरमा न केवल सेल्फ़ राईटियस जान पड़ीं बल्कि फीमेल शोवनिस्ट (female chauvinist) भी जान पड़ीं। बात-२ में वे अपने साथ खड़ी अन्य महिलाओं पर यह इंप्रेस (impress) करना न भूलतीं कि वे कितनी पढ़ी लिखी हैं, स्नातक के बाद स्नातकोत्तर भी किया हुआ था। मानो कितना बड़ा क़िला फतह किया हो!! :roll: खैर, तो वो बता रहीं थी कि कैसे उन्होंने पड़ोसी के घर में अपनी पड़ोसन के लड़के को पॉर्न फिल्म (porn film) देखते हुए पकड़ा और उसके बाद उन्होंने अपनी राय दी कि सभी लड़के ऐसे कमीने होते हैं कि नंगी तस्वीरों में ही घुसे रहते हैं, मतलब लड़कों/पुरुषों की जात ही ऐसी है!! फिर वे जब वापस स्व प्रशंसात्मक ढर्रे पर लौटीं तो व्यक्त करने लगीं कि कैसे उनकी पढ़ने की राह में रोड़े थे, भाई इत्यादि कहते कि लड़की है अधिक पढ़ नहीं पाएगी, स्कूल कॉलेज में ऐसा होता था इत्यादि।

यह सब सुन मैं इस सोच में पड़ गया कि कभी यह मोहतरमा मेल शोवनिस्म (male chauvinism) से घृणा करतीं थी, उसकी शिकार थीं और आज ये स्वयं एक हिपोक्रिट और शोवनिस्ट बन गई हैं – जीवन वाकई एक चक्र है!! उनका मत था कि लड़कियाँ सीधी-साधी होती हैं और लड़के पैदायशी कमीने और बदमाश होते हैं। मैं यह सोच रहा था कि उनको यदि कुछ लड़कियों के बारे में बता देता और जैसी बातें और आचरण वे खुले आम करती थीं वह बता देता तो उन मोहतरमा के दिल को कदाचित्‌ धड़का लग जाता। ठीक है माना कि मोहतरमा उस ज़माने से और उस परिवेश से नहीं आईं थी कि जहाँ लड़कियों को अधिक पढ़ाने पर ज़ोर दिया जाता था और उन्होंने काफ़ी संघर्ष किया था लेकिन यह कोई कारण नहीं शोवनिस्म का और जनरलाइज़ कर पूरे पुल्लिंग समुदाय को कमीना समझने का!! यह प्रश्न उनके पढ़े लिखे दिमाग में न आया कि जिन पॉर्न फिल्मों और नंगी तस्वीरों आदि को देखने के कारण वे लड़कों को कमीना बतला रहीं थी उन फिल्मों और तस्वीरों में मुख्य किरदार किसका होता है, लड़के का या लड़की का?!! ज़माना कहाँ निकल गया है और वह मोहतरमा पता नहीं कौन से ज़माने की सोच-विचारों को लिए जी रही थीं कि लड़कियाँ तो सीधी होती हैं लड़के ही कमीने होते हैं!!

उस समय से आज तक कई लोगों से मिलना हुआ है, कई को हैलो हाय से थोड़ा अधिक जानने का अवसर मिला है और उनमें से कई शोवनिस्ट मिले हैं – स्त्री भी और पुरुष भी। मज़ेदार बात यह है कि उनकी सोच, उनके विचार एक शोवनिस्ट के ही हैं लेकिन उनमें से कोई भी अपने को सेक्सिस्ट (sexist) नहीं मानता/मानती क्योंकि उनका सेल्फ़ राईटियस दिमाग उनको समझाता है कि वे एक आम आदमी/स्त्री हैं जो कि सेक्सिस्म (sexism) जैसी टुच्ची भावनाओं से परे है। ऐसे लोग सूडो (pseudo) होते हैं, अपने को समझते और दिखाते कुछ हैं लेकिन होते कुछ और ही हैं। और ऐसे लोगों की सबसे बड़ी कमज़ोरी यह होती है कि ये इस गफ़लत में जीते हैं कि ये सबसे ज़्यादा स्याने हैं और लोगों को मूर्ख बना रहे हैं – लेकिन फिर वह कहावत है ना सेर को सवा सेर मिलने वाली!!


January 11th, 2010 at 07:16 am | 2 Comments
Posted In: कतरन

फूल के रंग….. पीले हरे गुलाबी लुभावने रंग


2009 की आखिरी दो ब्लॉगर भेंटवार्ताएँ …..


January 4th, 2010 at 07:17 am | 12 Comments
Posted In: Blogger Meetups

पिछले वर्ष 19 दिसंबर वाले सप्ताहांत पर अहमदाबाद से बेंगाणी बंधु दिल्ली आए हुए थे। अहमदाबाद से निकलने से पहले पंकज ने बता दिया था कि दोनों भाई दिल्ली आ रहे हैं किसी पुरस्कार समारोह के लिए तो मैंने तुरंत कह दिया था कि भई फोन नंबर तो तुम्हारे पास है ही तो जब भी समय हो बता देना अपन मिलने आ जाएँगे। अब यह नहीं पता था कि रवि जी भी होंगे साथ में, तो यह बढ़िया संयोग रहा। इधर मज़ेदार बात यह रही कि जीतू भाई भी दो-तीन दिन पहले ही भारत आए थे और बता दिए थे कि भई आ गए हैं मिलने का बनाएँगे मामला। तो इधर मैंने उनको भी खबर कर दी कि मामला बनता दिख रहा है अच्छा खासा। तो 19 दिसंबर को हौज़ खास में उसी ऑडीटोरियम में मिलने का प्रोग्राम बना जिसमें पुरस्कार समारोह आयोजित था। उससे पिछली रात को श्रीश से बात हो रही थी तो यह बात निकल गई कि कल मिलने का प्रोग्राम है इतनी बड़ी हस्तियों से, तो वह भड़क गया कि उसे काहे नहीं न्यौता दिया गया। तो मैंने कहा कि अगले दिन स्कूल की छुट्टी मार, सुबह बस में चढ़ और दोपहर तक पहुँच जाएगा यहाँ दिल्ली, तो वह भी राज़ी हो गया।

तो यूँ हुआ मामला सैट इस ब्लॉगर मीट का। निम्न कुछ फोटो उसी मीट से हैं, फोटो कुछ और भी ली थीं लेकिन वह अच्छी न आईं।


बाएँ से दाएँ:  रवि रतलामी, संजय बेंगाणी



बाएँ से दाएँ:  पंकज बेंगाणी, श्रीश



बाएँ से दाएँ:  पंकज बेंगाणी, डॉ. विपुल जैन (चिट्ठाजगत वाले), श्रीश, रवि रतलामी, संजय बेंगाणी, जीतेन्द्र चौधरी (मेरा पन्ना वाले)



यह पुरस्कार समारोह के बाद का फोटो है, इसमें रवि जी और संजय भाई अपने-२ पुरस्कार की ट्रॉफ़ी पकड़े हुए हैं


तो यह था मामला इन महान हस्तियों से सुसज्जित ब्लॉगर मीट का। अब इससे निपटे थे कि 29 सितंबर की रात मिश्रा जी का फुनवा आ गया कि अगले दिन दिल्ली पहुँच रहे हैं, रात को अमरीका के लिए उड़ेंगे तो उससे पहले मिलने का प्रोग्राम बन जाए तो बढ़िया रहेगा। तो मामला लंच का तय हुआ, जीतू भाई को भी आना था। लेकिन अगले दिन जीतू भाई धोखा देकर पतली गली से निकल लिए, बोले बोत काम हैं खामखा तुम पर वेस्ट करने को टैम नहीं है!! :D उधर मिश्रा जी की इलाहाबाद से गड्डी लेट हो गई। ज्ञान जी नोट कीजिए, माल गाड़ियाँ सरपट भगाने का खमियाज़ा पैसेन्जर ट्रेन से न भरवाईये। :D लंच का समय निकल गया और मिश्रा जी निकल गए अपने एक मित्र के साथ, लंच रीस्केड्यूल (re-schedule) होकर डिनर का प्रोग्राम बना। तो शाम को अपन पहुँचे क्नॉट प्लेस और निर्धारित कैफ़े कॉफ़ी डे में पहुँच विराज गए। समय व्यतीत करने के लिए अपन अपने एस९ (S9) पर गाने सुन रहे थे और एक उपन्यास पढ़ रहे थे। मिश्रा जी अपने को आसानी से दिख जाएँ इसलिए मैं नीचे बैठा था (न कि ऊपरी मंज़िल पर) और शीशे के पार पूरी सड़क नज़र आ रही थी, उधर मिश्रा जी शीशे के पार एकदम सामने खड़े होकर मुझे फोन लगाते हैं कि भई कहाँ हो!! :D तो यूँ मिले मिश्रा जी से और उनके साथ आए उनके मित्र माधवेन्द्र शुक्ला से जो कि दिल्ली विश्वविद्यालय से कोई घणी हाई फाई चीज़ पढ़ रहे हैं अपने को तो समझ भी न आया कि क्या होता है।


मिश्रा जी के मित्र, श्री माधवेन्द्र शुक्ला



मिश्रा जी


कॉफ़ी के बाद हम लोग रात्रि भोज के लिए निकले, मिश्रा जी को चीनी, जापानी, थाई, मेक्सिकन, अमेरिकी, गुजराती, उत्तर भारतीय, दक्षिण भारतीय आदि सभी विकल्प गिनवा दिए और उन्होंने दक्षिण भारतीय खाने को तरजीह दी, सो हम लोगों ने सरवण भवन में मामला निपटाया।

संजय भाई नोट कर लें, उनका कैमिकल नमस्ते हमने मिश्रा जी को दे दिया था। :D


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