मैं प्रायः टेलीविज़न नहीं देखता हूँ, कभी यदि कोई दिलचस्प चीज़ दिखाई जा रही हो या कोई फिल्म आ रही हो जो अपने पास न हो तो देख लेता हूँ। अभी एकाध दिन पहले यूटीवी मूवीज़ (UTV Movies) पर अमिताभ बच्चन और शशि कपूर की फिल्म “नमकहलाल” आ रही थी। यह मेरी पसंदीदा फिल्मों में है तो देखने बैठ गया। फिल्म के दौरान विज्ञापन अपने को पसंद नहीं लेकिन टीवी चैनल पर तो आते ही हैं इसलिए झेलने पड़ते हैं, परन्तु कई विज्ञापन तो ऐसे वाहियात होते हैं कि उनको झेलना टॉर्चर लगता है।
एक विज्ञापन कई बार आया, मैक्स न्यू यॉर्क लाइफ़ इंश्योरेन्स का। विज्ञापन यूँ है कि एक लाडले को माता-पिता ट्रेन में छोड़ने आते हैं, सामान वगैरह रखवा देते हैं, लाडले की तरह उससे व्यवहार किया जा रहा है। उसके बाद पीछे से वाचक द्वारा बतलाया जाता है कि जब अपने दूर हो जाते हैं तो उनकी फ़िक्र बढ़ जाती है, इसलिए मैक्स न्यू यॉर्क प्रस्तुत करते हैं जीवन बीमा पॉलिसियाँ ताकि आप अपनों के हमेशा साथ रहें। अब मुझे यह समझ नहीं आया कि दूर जाने की चिंता का जीवन बीमा पॉलिसी से क्या मतलब है? जीवन बीमा तो मरने के बाद मिलता है, क्या चिंता उससे दूर हो जाएगी??!! किसी सामान का बीमा नहीं हो रहा है कि वह टूट फूट जाए तो बीमे की रकम से नया सामान खरीद लिया जाएगा!!
और यदि आर्थिक सुरक्षा का भी प्रश्न है तो यहाँ कैसे फिट बैठता है यह समझ नहीं आता, कमाऊ पिता लाडले (और कदाचित् फिलहाल बेरोज़गार) बेटे को छोड़ने आया है (ज़ाहिर है कि चिंता माता पिता को ही हो रही है, बेटा तो इस खामखा के लाड़ से असहज लग रहा है एक सहयात्री लड़की के सामने), उसकी बेटे के दूर जाने की चिन्ता जीवन बीमा से कैसे दूर होगी? और उसके बाद एक और अहमकाना हरकत, पिता बेटे को केले देता है और माँ कहती है कि खा लेना पेट साफ़ रहेगा। क्या इस विज्ञापन की पटकथा लिखने वाले को यह नहीं ज्ञात कि केले कब्ज़ करते हैं, दस्त लगे हों तो उसमें केले खाने से लाभ होता है, पेट साफ़ करने के लिए केले नहीं खाए जाते!!
ऐसे ही थकेले विज्ञापन मुझे बीएसएनएल के लगते हैं दीपिका पादुकोण वाले। एक लूज़र से दिखने वाले बंदे को उसकी खूबसूरत बीवी उलाहने देती है कि कभी फिल्म नहीं दिखाते, दफ़्तर में उसके बॉस उससे खफ़ा रहते हैं। ऐसे में वो अपना दुखी थोबड़ा लेकर दीपिका पादुकोण के पास जाता है जो उसको बीएसएनएल का मोबाइल देती है और वो बंदा लूज़र से हीरो बन जाता है। घर में बीवी खुश हो जाती है कि पति मोबाइल पर फिल्म दिखा रहा है, दफ़्तर में बॉस खुश हो जाते हैं कि बंदा समय पर काम करता है। वाह! टोटली फालतू विज्ञापन!! क्या फालतू है इसमे यह बताना ही समय की बर्बादी है।

ऐसे ही न जाने कितने विज्ञापन आते हैं जो कि टोटली ऊपरी माले के दीवालिएपन को दर्शाते हैं। मुझे यह समझ नहीं आता कि हमारे यहाँ की विज्ञापन कंपनियों में आईडियों की कंगाली का दौर क्यों आ गया है। इन्हीं कंपनियों ने भूतकाल में एक से बढ़कर एक बढ़िया विज्ञापन बनाए हैं, कई कंपनियाँ आज भी बनाती हैं लेकिन अधिकतर वहीं सड़े गले बेतुके विज्ञापन बना रही हैं। क्या इन विज्ञापनों के क्रिएटिव डॉयरेक्टर और स्क्रिप्ट लिखने वाले यह भूल जाते हैं कि विज्ञापन का उद्देश्य उत्पाद की बिक्री है न कि कोई फैली हुई फैन्सी कहानी दिखाना। उत्पाद को बढ़िया तरीके से पेश करना होता है लेकिन इस तरह कि वो दर्शक को वास्तविक तो लगे ही पर अहमकाना न लगे!!
एयरटेल के विज्ञापन काफ़ी अच्छे होते हैं, एकाध अपवाद को छोड़ दें तो वे बढ़िया बने हुए होते हैं और उत्पाद को अच्छे से दिखलाते हैं। बीएसएनएल का जो अकबर बीरबल वाला विज्ञापन है वह भी अच्छा है, वह बिलकुल सीधे और सरल तरीके से दर्शक को संदेश देता है कि बीएसएनएल का नेटवर्क बढ़िया है और नेटवर्क प्रॉबलम नहीं आती, यानि कि अपने माल को वह सही तरीके से दर्शक को बेच रहा है।
कदाचित् यह बात सही है कि दुर्गन्ध में ही सुगन्ध की औकात पता चलती है, बेकार विज्ञापनों में ही बढ़िया विज्ञापन को एप्रीशिएट किया जा सकता है!!
अभी कुछ दिन पहले मैंने आमतौर पर समझने जाने वाले कॉन्टीनेन्टल नाश्ते और असली कॉन्टीनेन्टल ब्रेकफास्ट के फ़र्क को बताते हुए पोस्ट ठेली थी, साथ ही फुल इंग्लिश ब्रेकफास्ट, स्कॉटिश ब्रेकफास्ट, आदि के बारे में भी बताया कि इनमें किन आईटमों की मौजूदगी रहती है। तो हुआ यूँ कि एक साहब ने इस ब्लॉग पर मौजूद संपर्क करने वाले फॉर्म का प्रयोग कर मुझे एक ईमेल लिखा। ईमेल की भाषा कड़क थी, क्या लिखा वह तो नहीं छाप रहा पर मोटे तौर पर उस संदेश का आशय मुझ पर लानत फलानत भेजना था कि अपने देश के नाश्ते मुझे पसंद नहीं आते और मैं शान से अपने को भारतीय कहते हुए फिरंगियों के नाश्ते करता हूँ और अपनी शेखी अपने ब्लॉग पर बखारता हूँ। किसने ऐसा लिखा उसको छोड़िए, नाम फर्ज़ी था, अपने को जानने की इच्छा भी नहीं कौन साहब हैं, यहाँ तो बात सिर्फ़ आशय की करते हैं।
तो यदि बताए गए नाश्तों की बात करें तो मैंने कॉन्टीनेन्टल ब्रेकफास्ट और फुल इंग्लिश ब्रेकफास्ट (बिना ब्लैक पुडिंग) को आज़माया हुआ है। तो क्या उससे मेरी भारतीयता कम हो जाती है? या यह साबित हो जाता है कि मुझे ये पसंद हैं? और पसंद से भारतीयता कम होती है? खैर इस पर बाद में आएँगे, पहले भारतीय नाश्तों और खानों की बात करें।
उत्तर भारतीय नाश्ते की आईटमों की बात की जाए तो जो परंपरागत नाश्ते की आईटमें हैं जैसे की समोसे, कचौरी, अपने को बहुत पसंद हैं, लेकिन सुबह के नाश्ते के लिए मुफ़ीद आईटम नहीं हैं। ये चीज़ें प्रायः शाम के समय ही चाय आदि के साथ ली जाती हैं।


मेरी बात की जाए तो मैं सुबह के समय नाश्ते में कोई एक निश्चित आईटम नहीं लेता हूँ, चीज़ों में बदलाव होता रहता है जैसे कि आलू/प्याज़ के परांठे, पोहा, चीज़ टोस्ट विद टोमैटो, नूडल्स, मैक्रोनी, कॉर्न फ्लेक्स, दलिया आदि। आमतौर पर मैं नाश्ते वाला जीव नहीं हूँ यदि घर पर होता हूँ तो। मैं बारह-एक बजे सीधे ही भोजन करने में यकीन रखता हूँ या कुछ लोग उसको ब्रंच (brunch) भी कह सकते हैं।


यदि अपने मित्र संतोष या किसी अन्य मित्र के साथ सुबह सवेरे कहीं घूमने या फोटोग्राफ़ी करने जाना होता है और वापसी में कर्नाटका भवन की ओर से आ रहे होते हैं तो नाश्ता वहीं पर इडली, वड़ा, सांबर और ताज़े जूस का होता है।


खाने में देखा जाए तो मुझे सबसे अधिक उत्तर भारतीय खाना बेहद पसंद है। गुजराती और दक्षिण भारतीय खाना भी बेहद पसंद वाली श्रेणी में ही आता है। पर साथ ही मुझे चीनी और थाई खाना भी काफ़ी पसंद है। योरोपियन खाने से इतना कोई लगाव नहीं है; पिछले वर्ष हंगरी जाना हुआ था तो वहाँ की पाककला के कुछ नमूनों से परिचय हुआ था, खाना अच्छा था लेकिन ऐसा कोई खास नहीं कि अपनी पसंदीदा वाली लिस्ट में उसको शामिल किया जाए। हाँ, वहाँ की सोपरोनी बीयर और व्हाईट वाइन (तोकाए आस्ज़ू – tokaji aszu) अपने को बेहद पसंद आई।
इसके अतिरिक्त योरोपीय खानों में कुछ अंग्रेज़ी और कुछ इतालवी खानों से थोड़ा तवारुफ़ हुआ है अन्यथा अभी फ्रेन्च, जर्मन, डैनिश आदि पाककलाओं से अनजान ही हैं।
खैर, यह तो बात हुई नाश्तों और खानों की, अब बात यदि आशय की करी जाए, और वह भी ऐसे वैसे आशय की नहीं वरन् उस आशय की करते हैं जो भारतीयता के उस गुमनाम ठेकेदार का मेरे विषय में था। कोई मुझे बताए कि किसी विदेशी पाककला की ओर रुझान होने से व्यक्ति देशद्रोही, स्व सभ्यता द्रोही हो जाता है क्या??!! हालांकि मेरा ऐसा रुझान नहीं है लेकिन एक पल को मान लिया जाए तो क्या भारतीयता की कमी आ जाएगी क्या मुझमें या किसी अन्य व्यक्ति में?! क्या किसी व्यक्ति की भारतीयता का पैमाना उसका खान-पान है?
ये जो ठेकेदार साहब हैं, मेरा अनुमान है कि ये अपने दफ़्तर धोती-कुर्ता पहन और गमछा टाँग कर तो नहीं जाते होंगे!! बाबुओं की भांति पैंट कमीज़ सूट बूट पहन जाते होंगे। तो क्या उस योरोपीय परिधान में उनकी भारतीयता कुंदन समान दमक उठती है? ऐसे लोगों की अक्ल पर तरस भी नहीं आता, बिना अक्ल और फटी हुई किस्मत के रोगी होते हैं ये, एक बार तो मन में यही आया कि “ब्लडी लूज़र” कह बात ही खत्म की जाए क्योंकि ऐसे दुखियाए लोगों के मानसिक दीवालिएपन का पूरा सार इन दो शब्दों में समा जाता है।

आपका क्या विचार है?
समोसे की फोटो साभार Kirti Poddar, कचौरी की फोटो साभार mynameisharsha, पोहे की फोटो साभार ampersandyslexia, मैक्रोनी की फोटो साभार Salihan.com, इडली की फोटो साभार SearchYogi, वड़े की फोटो साभार Pabo76, कुकुर का कार्टून साभार Anirudh Koul – सातों फोटो क्रिएटिव कॉमन्स लाइसेन्स (Creative Commons License) के अंतर्गत

कल दीपावली है, दीपों का त्यौहार है। अब इस पर अधिक क्या कहना, बहुत लोग पहले ही बहुत कुछ कह चुके हैं, किताबों में पहले ही छप चुका है। पर इस दिन पर दो तरह के लोग मिल जाते हैं – एक वो जो आतिशबाज़ी के सख्त खिलाफ़ होते हैं और दूसरे वो जो हद से अधिक आतिशबाज़ी के पक्ष में होते हैं। और जब दोनों तरह के लोग अपना प्रोपोगेन्डा (propaganda) मेरे को पढ़ाते हैं तो मैं दोनों ही तरह के लोगों को कहता हूँ कि भाड़ में जाओ।
काहे? क्योंकि दोनों ही एक्सट्रीम एंड (extreme end) वाले केस होते हैं, या तो बिलकुल ही आतिशबाज़ी न करो और यदि करो तो बस करते ही रहो। यह क्या बात हुई? अमां अति हर चीज़ की बुरी होती है, जो भी करो कंट्रोल में रहकर करो जी!!
ऐसे मामले पर कुछ स्टाईलिश स्नॉब टाइप लोग भी मिल जाते हैं अपनी स्नॉबरी करते हुए। एक नॉन रेजीडेन्ट इंडियन साहब को सुना, बोले भारतीय आतिशबाज़ी से दिवाली का सत्यानाश कर देते हैं और इसी कारण वे दिवाली पर भारत नहीं आते। तो अमां मत आओ न, किसी पर एहसान कर रहे हो क्या? हू केयर्स? आपके न आने पर दिवाली नहीं मनाई जाती क्या? आप रहो जहाँ हो, वहाँ जब किसी उत्सव में आतिशबाज़ी हो तो जाना देखने और फोटो खींचने, वही आपको अच्छी लगेगी।

लेकिन हमारे यहाँ भी तो लोग कम नहीं, पिले रहते हैं पटाखे चलाते हुए। मेरे मोहल्ले में ही बहुतेरे हैं ऐसे, रात एक-दो बजे तक भी लगे रहेंगे। उनका वश नहीं चलता या यूँ कह लो कि इतना ज्ञान नहीं अन्यथा वे तो कैफ़ीन (caffeine) की गोलियाँ खाकर रात भर जागें और बिना थके सारी रात पटाखे चलाते रहें!!
ठीक है माना बहुत कंसर्न (concern) हैं पर्यावरण इत्यादि को लेकर भी लेकिन किसी भी समस्या का हल एक्सट्रीम एंड पर जाकर नहीं हो सकता। लोग यदि अपने को काबू में रखें, थोड़े ही पटाखे चलाएँ, थोड़ी ही आतिशबाज़ी करें तो इससे पर्यावरण को पहुँचने वाली क्षति भी कम होगी और लोगों की दीपावली भी मन जाएगी।
अब अपन दीपावली पर न ही पटाखे चलाते हैं न ही आतिशबाज़ी छोड़ते हैं, पिछले कई वर्षों से नहीं की है (स्कूल के समय में ही छोड़ दिया था मोह) और आगे भी फिलहाल करने का कोई इरादा नहीं है, लेकिन यह मेरा अपना चुनाव है न कि किसी की जबरन पिलाई घुट्टी। दीपावली कौन कैसे मनाता है यह उस पर निर्भर है, हम तो सिर्फ़ अनुरोध ही कर सकते हैं कि मॉडरेशन रखी जाए, अति न की जाए।

आप सभी को मंगलमयी शुभ दीपावली।
आतिशबाज़ी की फोटो साभार eyesplash Mikul, पटाखे की फोटो साभार Dilip Muralidaran तथा दीपों की फोटो साभार m4r00n3d – तीनो फोटो क्रिएटिव कॉमन्स लाइसेन्स (Creative Commons License) के अंतर्गत
कुछ अरसा पहले मैंने अपने घर के नज़दीक स्थित ज्ञानी के अड्डे पर हुआ चॉकलेट आईस्क्रीम और नए मुल्लाओं का वाकया बयान किया था (यदि आपने नहीं पढ़ा है तो एक बार अवश्य पढ़ लें, मौज की मौज और कंटेक्सचुअल अर्थ भी समझ आएगा)। उसके अंत में मैंने ज़िक्र एक साहब और कॉन्टीनेन्टल खाने का किया था, आज मन में आया कि वो किस्सा भी बाँच दिया जाए।

कुछ अरसा पहले की बात है, मैं एक बरिस्ता में बैठा एक मित्र की प्रतीक्षा कर रहा था। पास ही की टेबल पर दो संभ्रांत दिखने वाले परिवार बैठे थे। वे लोग क्या बातचीत कर रहे थे यह याद नहीं लेकिन उनमें एक फैशनेबल अंकल अपनी ही उम्र के लगने वाले दूसरे अंकल से वार्तालाप के दौरान बोले कि उनको तो सुबह का नाश्ता कॉन्टीनेन्टल स्टाईल ही पसंद है यानि कि मक्खन लगे टोस्ट, दो अंडों का ऑमलेट और चाय। प्रायः आप किसी भी रेस्तरां/होटल में जाएँगे तो कॉन्टीनेन्टल नाश्ते के नाम पर यही मिलता है। पाँच सितारा होटलों के अतिरिक्त मैंने कहीं भी असली कॉन्टीनेन्टल नाश्ता मिलते नहीं देखा। हो सकता है कि आपकी उत्सुकता हो कि होता क्या है कॉन्टीनेन्टल ब्रेकफास्ट (continental breakfast)। जो नहीं जानते हैं उनके लिए बता देना बेहतर समझता हूँ कि कॉन्टीनेन्टल का अभिप्राय यहाँ पश्चिमी योरोप (ब्रितानिया के अतिरिक्त, मेनलैन्ड योरोप) है। अब मैं उन फैशनेबल अंकल की अक्ल पर तरस इसलिए खा रहा था कि उनको रत्तीभर भी ज्ञान नहीं कि टिपिकल (typical) कॉन्टीनेन्टल ब्रेकफास्ट क्या होता है।
दरअसल कॉन्टीनेन्टल ब्रेकफास्ट हल्का नाश्ता होता है (यदि फुल इंग्लिश/ऑयरिश/स्कॉटिश नाश्ते से तुलना की जाए) – इसमें कॉफ़ी (प्रायः काली), जूस, और क्रॉसौं (croissants) या पेस्ट्री (pastries) होते हैं। यह इंग्लिश ब्रेकफास्ट (english breakfast), ऑयरिश ब्रेकफास्ट (irish breakfast), स्कॉटिश ब्रेकफास्ट (scottish breakfast) अथवा अमेरिकी ब्रेकफास्ट (north american breakfast) जितना फुल नहीं होता।
ऐसे ही लोगों को अंग्रेज़ी नाश्ते के बारे में भी बहुत गलतफहमी रहती है, चाय और टोस्ट को ही अंग्रेज़ी नाश्ता समझते हैं। एक पारम्परिक फुल इंग्लिश ब्रेकफास्ट में निम्न आईटम होती हैं:

वैसे साथ में ब्लैक पुडिंग (खून में पकाया मांस) भी होती है लेकिन यह निश्चित आईटम नहीं होती, जगह-२ पर निर्भर करता है, इंग्लैंड के कुछ भागों में इंग्लिश ब्रेकफास्ट में यह शामिल होती है। इसी तरह साथ में पिसे हुए उबले आलू (mashed potatoes) भी हो सकते हैं।
अब यदि स्कॉटिश ब्रेकफास्ट की बात की जाए तो परंपरागत नाश्ता तो दलिया (porridge) है लेकिन फुल स्कॉटिश ब्रेकफास्ट में अंडे, बेकन, सॉसेज, स्कॉटिश स्टाइल ब्लैक पुडिंग, हैग्गीस (haggis) और पोटैटो स्कोन्स (potato scones) भी आ जाते हैं।
इसी प्रकार अमेरिकी नाश्ते में प्रायः टोस्ट, बेकन, अंडे, हैश ब्राऊन्स (hash browns), और जूस अथवा कॉफी होते हैं। मेरी जानकारी अनुसार इसमें परम्परागत या फुल का कोई चक्कर नहीं होता।
अब इसी कारण मुझे ऐसे होटल वालों पर कोफ़्त होती है कि लिखते कुछ हैं मेनू में और परोसते कुछ और ही हैं।
और उन फैशनेबल अंकल जैसे लोगों की अक्ल पर तरस आता है जो सिर्फ़ नेम ड्रॉपिंग करना ही जानते हैं, जबकि वास्तव में पता धेले का नहीं होता कि क्या कह रहे हैं। न जाने क्यों लोग अपनी अक्ल की सीमा से अधिक शो ऑफ़ (show off) करते हैं। ऐसा करने से वे अपनी ही बेवकूफ़ी ज़ाहिर करने का खतरा मोल लेते हैं, क्योंकि जिसके सामने शो ऑफ़ कर रहे हैं यदि वह जानकार व्यक्ति हुआ तो क्या इज़्ज़त रह जाएगी शो ऑफ़ करने वाले व्यक्ति की?
अब ऐसे ही ज्ञान जी आईसक्रीम वाली पोस्ट पर अपने साथी अफ़सर की कॉफ़ी वाला किस्सा बताए थे, खामखा उनके साथी अफ़सर की किरकिरी हुई!!
क्रॉसौं की फोटो साभार roboppy तथा इंग्लिश ब्रेकफास्ट की फोटो साभार peasap – दोनों फोटो क्रिएटिव कॉमन्स लाइसेन्स (Creative Commons License) के अंतर्गत