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थकेले विज्ञापनों का टॉर्चर…..


November 2nd, 2009 at 07:07 am | 12 Comments

मैं प्रायः टेलीविज़न नहीं देखता हूँ, कभी यदि कोई दिलचस्प चीज़ दिखाई जा रही हो या कोई फिल्म आ रही हो जो अपने पास न हो तो देख लेता हूँ। अभी एकाध दिन पहले यूटीवी मूवीज़ (UTV Movies) पर अमिताभ बच्चन और शशि कपूर की फिल्म “नमकहलाल” आ रही थी। यह मेरी पसंदीदा फिल्मों में है तो देखने बैठ गया। फिल्म के दौरान विज्ञापन अपने को पसंद नहीं लेकिन टीवी चैनल पर तो आते ही हैं इसलिए झेलने पड़ते हैं, परन्तु कई विज्ञापन तो ऐसे वाहियात होते हैं कि उनको झेलना टॉर्चर लगता है।

एक विज्ञापन कई बार आया, मैक्स न्यू यॉर्क लाइफ़ इंश्योरेन्स का। विज्ञापन यूँ है कि एक लाडले को माता-पिता ट्रेन में छोड़ने आते हैं, सामान वगैरह रखवा देते हैं, लाडले की तरह उससे व्यवहार किया जा रहा है। उसके बाद पीछे से वाचक द्वारा बतलाया जाता है कि जब अपने दूर हो जाते हैं तो उनकी फ़िक्र बढ़ जाती है, इसलिए मैक्स न्यू यॉर्क प्रस्तुत करते हैं जीवन बीमा पॉलिसियाँ ताकि आप अपनों के हमेशा साथ रहें। अब मुझे यह समझ नहीं आया कि दूर जाने की चिंता का जीवन बीमा पॉलिसी से क्या मतलब है? जीवन बीमा तो मरने के बाद मिलता है, क्या चिंता उससे दूर हो जाएगी??!! किसी सामान का बीमा नहीं हो रहा है कि वह टूट फूट जाए तो बीमे की रकम से नया सामान खरीद लिया जाएगा!! :roll: और यदि आर्थिक सुरक्षा का भी प्रश्न है तो यहाँ कैसे फिट बैठता है यह समझ नहीं आता, कमाऊ पिता लाडले (और कदाचित्‌ फिलहाल बेरोज़गार) बेटे को छोड़ने आया है (ज़ाहिर है कि चिंता माता पिता को ही हो रही है, बेटा तो इस खामखा के लाड़ से असहज लग रहा है एक सहयात्री लड़की के सामने), उसकी बेटे के दूर जाने की चिन्ता जीवन बीमा से कैसे दूर होगी? और उसके बाद एक और अहमकाना हरकत, पिता बेटे को केले देता है और माँ कहती है कि खा लेना पेट साफ़ रहेगा। क्या इस विज्ञापन की पटकथा लिखने वाले को यह नहीं ज्ञात कि केले कब्ज़ करते हैं, दस्त लगे हों तो उसमें केले खाने से लाभ होता है, पेट साफ़ करने के लिए केले नहीं खाए जाते!! :roll:

ऐसे ही थकेले विज्ञापन मुझे बीएसएनएल के लगते हैं दीपिका पादुकोण वाले। एक लूज़र से दिखने वाले बंदे को उसकी खूबसूरत बीवी उलाहने देती है कि कभी फिल्म नहीं दिखाते, दफ़्तर में उसके बॉस उससे खफ़ा रहते हैं। ऐसे में वो अपना दुखी थोबड़ा लेकर दीपिका पादुकोण के पास जाता है जो उसको बीएसएनएल का मोबाइल देती है और वो बंदा लूज़र से हीरो बन जाता है। घर में बीवी खुश हो जाती है कि पति मोबाइल पर फिल्म दिखा रहा है, दफ़्तर में बॉस खुश हो जाते हैं कि बंदा समय पर काम करता है। वाह! टोटली फालतू विज्ञापन!! क्या फालतू है इसमे यह बताना ही समय की बर्बादी है।

ऐसे ही न जाने कितने विज्ञापन आते हैं जो कि टोटली ऊपरी माले के दीवालिएपन को दर्शाते हैं। मुझे यह समझ नहीं आता कि हमारे यहाँ की विज्ञापन कंपनियों में आईडियों की कंगाली का दौर क्यों आ गया है। इन्हीं कंपनियों ने भूतकाल में एक से बढ़कर एक बढ़िया विज्ञापन बनाए हैं, कई कंपनियाँ आज भी बनाती हैं लेकिन अधिकतर वहीं सड़े गले बेतुके विज्ञापन बना रही हैं। क्या इन विज्ञापनों के क्रिएटिव डॉयरेक्टर और स्क्रिप्ट लिखने वाले यह भूल जाते हैं कि विज्ञापन का उद्देश्य उत्पाद की बिक्री है न कि कोई फैली हुई फैन्सी कहानी दिखाना। उत्पाद को बढ़िया तरीके से पेश करना होता है लेकिन इस तरह कि वो दर्शक को वास्तविक तो लगे ही पर अहमकाना न लगे!!

एयरटेल के विज्ञापन काफ़ी अच्छे होते हैं, एकाध अपवाद को छोड़ दें तो वे बढ़िया बने हुए होते हैं और उत्पाद को अच्छे से दिखलाते हैं। बीएसएनएल का जो अकबर बीरबल वाला विज्ञापन है वह भी अच्छा है, वह बिलकुल सीधे और सरल तरीके से दर्शक को संदेश देता है कि बीएसएनएल का नेटवर्क बढ़िया है और नेटवर्क प्रॉबलम नहीं आती, यानि कि अपने माल को वह सही तरीके से दर्शक को बेच रहा है।

कदाचित्‌ यह बात सही है कि दुर्गन्ध में ही सुगन्ध की औकात पता चलती है, बेकार विज्ञापनों में ही बढ़िया विज्ञापन को एप्रीशिएट किया जा सकता है!!


October 26th, 2009 at 07:16 am | 4 Comments
Posted In: कतरन

भारतीयता नहीं है आपमें…..


October 22nd, 2009 at 07:07 am | 9 Comments

दिवाली की आतिशबाज़ी…..


October 16th, 2009 at 07:07 am | 7 Comments

द कॉन्टीनेन्टल ब्रेकफास्ट…..


October 7th, 2009 at 07:07 am | 10 Comments

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