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	<title>Comments on: हिन्दी? बाप रे..</title>
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	<description>the world from my eyes in my language - दुनिया मेरी नज़र से मेरी भाषा में</description>
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		<title>By: अनुराग श्रीवास्तव</title>
		<link>http://hindi.amitgupta.in/2005/12/11/hindi-oh-dear/#comment-23</link>
		<dc:creator>अनुराग श्रीवास्तव</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 17 Nov 2006 08:41:14 +0000</pubDate>
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		<description>अमित अच्छा लगा सुलझे हुये विचार पढ कर. सही कहा कि अंग्रेजी से घृणा हिन्दी प्रेमी होने का प्रमाण नहीं है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अमित अच्छा लगा सुलझे हुये विचार पढ कर. सही कहा कि अंग्रेजी से घृणा हिन्दी प्रेमी होने का प्रमाण नहीं है.</p>
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		<title>By: Amit</title>
		<link>http://hindi.amitgupta.in/2005/12/11/hindi-oh-dear/#comment-22</link>
		<dc:creator>Amit</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 14 Dec 2005 00:57:32 +0000</pubDate>
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		<description>रजनीश, मैंने तो ये कहा ही नहीं कि जो अंग्रेज़ी का प्रयोग करते हैं वे बुरे हैं या हम हिन्दी का &lt;em&gt;भोंपू&lt;/em&gt; बजाने वालों से कम देशभक्त हैं। मैंने जो उपर लिखा है उसे दोबारा पढो, वहाँ मैंने एक ख़ास उदाहरण दिया है। अंग्रेज़ी बोलना कोई बुरी बात नहीं है, मैं भी अंग्रेज़ी बोलता हूँ और मेरा सारा कार्य भी लिखित अंग्रेज़ी में होता है, परन्तु मुझे उन लोगों से चिढ है जो सिर्फ़ बेमतलब के प्रर्दशन और दूसरों पर रौब गाँठने के लिए अंग्रेज़ी का प्रयोग करते हैं और उन हाई-फ़ाई स्कूलों से चिढ है जहाँ अंग्रेज़ी को मातृभाषा के मुकाबले उच्चस्तर का मानकर उसके प्रयोग पर बल दिया जाता है। कोई भी भाषा बुरी नहीं होती, प्रत्येक भाषा का स्तर मान-अपमान की सीमा से ऊँचा होता है, बुराई होती है केवल उसके प्रयोग में। जिस प्रकार बंदूक बुरी नहीं होती यदि वह मानव जीवन या सभ्य समाज की रक्षा के लिए हो, परन्तु जब वही बंदूक मानवाधिकारों के विपरीत प्रयोग की जाती है तो वह बुरी बन जाती है क्योंकि उसका प्रयोग उस रूप में गलत है। :)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>रजनीश, मैंने तो ये कहा ही नहीं कि जो अंग्रेज़ी का प्रयोग करते हैं वे बुरे हैं या हम हिन्दी का <em>भोंपू</em> बजाने वालों से कम देशभक्त हैं। मैंने जो उपर लिखा है उसे दोबारा पढो, वहाँ मैंने एक ख़ास उदाहरण दिया है। अंग्रेज़ी बोलना कोई बुरी बात नहीं है, मैं भी अंग्रेज़ी बोलता हूँ और मेरा सारा कार्य भी लिखित अंग्रेज़ी में होता है, परन्तु मुझे उन लोगों से चिढ है जो सिर्फ़ बेमतलब के प्रर्दशन और दूसरों पर रौब गाँठने के लिए अंग्रेज़ी का प्रयोग करते हैं और उन हाई-फ़ाई स्कूलों से चिढ है जहाँ अंग्रेज़ी को मातृभाषा के मुकाबले उच्चस्तर का मानकर उसके प्रयोग पर बल दिया जाता है। कोई भी भाषा बुरी नहीं होती, प्रत्येक भाषा का स्तर मान-अपमान की सीमा से ऊँचा होता है, बुराई होती है केवल उसके प्रयोग में। जिस प्रकार बंदूक बुरी नहीं होती यदि वह मानव जीवन या सभ्य समाज की रक्षा के लिए हो, परन्तु जब वही बंदूक मानवाधिकारों के विपरीत प्रयोग की जाती है तो वह बुरी बन जाती है क्योंकि उसका प्रयोग उस रूप में गलत है। <img src='http://hindi.amitgupta.in/wp-content/plugins/smilies-themer/ig_cool/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
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	<item>
		<title>By: रजनीश मंगला</title>
		<link>http://hindi.amitgupta.in/2005/12/11/hindi-oh-dear/#comment-21</link>
		<dc:creator>रजनीश मंगला</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 12 Dec 2005 16:23:18 +0000</pubDate>
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		<description>ऐसा भी नहीं कि अंग्रेज़ी बोलने वाले देश के बारे में नहीं सोचते। बल्कि हो सकता है कि देश का उत्थान करने में वे हम हिंदी का भोंपू बजाने वालों से आगे निकल जाएं। निम्नलिखित याहूग्रुप्स में मैंने हिंदी प्रयोग करने का सुझाव दिया था जिसे नकार दिया गया। &lt;a href=&quot;http://groups.yahoo.com/group/bharatudaymission/message/1742&quot; rel=&quot;nofollow&quot;&gt;जवाब यहां देखिए&lt;/a&gt;। लेकिन वे अच्छा काम कर रहे हैं। हो सकता है कुछ वर्षों में वे बहुत प्रबल हो जाएं। मैं ऐसी कामना भी करता हूं।
http://groups.yahoo.com/group/bharatudaymission/
http://groups.yahoo.com/group/missionswades/</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>ऐसा भी नहीं कि अंग्रेज़ी बोलने वाले देश के बारे में नहीं सोचते। बल्कि हो सकता है कि देश का उत्थान करने में वे हम हिंदी का भोंपू बजाने वालों से आगे निकल जाएं। निम्नलिखित याहूग्रुप्स में मैंने हिंदी प्रयोग करने का सुझाव दिया था जिसे नकार दिया गया। <a href="http://groups.yahoo.com/group/bharatudaymission/message/1742" rel="nofollow">जवाब यहां देखिए</a>। लेकिन वे अच्छा काम कर रहे हैं। हो सकता है कुछ वर्षों में वे बहुत प्रबल हो जाएं। मैं ऐसी कामना भी करता हूं।<br />
<a href="http://groups.yahoo.com/group/bharatudaymission/" rel="nofollow">http://groups.yahoo.com/group/bharatudaymission/</a><br />
<a href="http://groups.yahoo.com/group/missionswades/" rel="nofollow">http://groups.yahoo.com/group/missionswades/</a></p>
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		<title>By: Amit</title>
		<link>http://hindi.amitgupta.in/2005/12/11/hindi-oh-dear/#comment-20</link>
		<dc:creator>Amit</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 11 Dec 2005 15:17:37 +0000</pubDate>
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		<description>कनिश्क, अंक की बाबत मैं नहीं जानता कि तुम कहाँ तक सही हो परन्तु मैं यह नहीं मान सकता कि संस्कृत का विकल्प बहुत कम विद्यालयों में होता है, कम से कम राजधानी में तो यह सत्य नहीं है, जहाँ छोटे से छोटे विद्यालय में भी यह पढाई जाती है। और मैं सिर्फ़ दसवीं की ही बात नहीं कर रहा, यदि आमतौर पर देखा जाए तो संस्कृत के अध्यापक अंक देने में उदारता ही दिखाते हैं और मैं ऐसा इसलिए कह सकता हूँ क्योंकि पाँचवीं से आठवीं कक्षा तक मैंने दो विद्यालयों में दो शिक्षकों से संस्कृत पढी है(मैंने नवीं में हिन्दी ली थी) और मेरे एक जिगरी मित्र ने नवीं में संस्कृत ली थी और उस अध्यापिका ने हम में से किसी को भी पहले नहीं पढाया था, तो मुझे दो विद्यालयों में तीन शिक्षकों का अनुभव रहा है!!

रहा प्रश्न अंग्रेज़ी और विश्व मानचित्र पर हमारे स्थान का, तो मेरी अंग्रेज़ी से कोई शत्रुता नहीं है, मुझे सिर्फ़ उन लोगों से चिढ है जो कि अंग्रेज़ी का उपयोग अपने अहं की अग्नि को शांत करने के लिए करते हैं, जैसा कि मैनें उपरलिख़ित अपने वक्तव्य के अंत में कहा(मेरा अनुमान है कि तुमने ध्यान से अंत नहीं पढा)।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>कनिश्क, अंक की बाबत मैं नहीं जानता कि तुम कहाँ तक सही हो परन्तु मैं यह नहीं मान सकता कि संस्कृत का विकल्प बहुत कम विद्यालयों में होता है, कम से कम राजधानी में तो यह सत्य नहीं है, जहाँ छोटे से छोटे विद्यालय में भी यह पढाई जाती है। और मैं सिर्फ़ दसवीं की ही बात नहीं कर रहा, यदि आमतौर पर देखा जाए तो संस्कृत के अध्यापक अंक देने में उदारता ही दिखाते हैं और मैं ऐसा इसलिए कह सकता हूँ क्योंकि पाँचवीं से आठवीं कक्षा तक मैंने दो विद्यालयों में दो शिक्षकों से संस्कृत पढी है(मैंने नवीं में हिन्दी ली थी) और मेरे एक जिगरी मित्र ने नवीं में संस्कृत ली थी और उस अध्यापिका ने हम में से किसी को भी पहले नहीं पढाया था, तो मुझे दो विद्यालयों में तीन शिक्षकों का अनुभव रहा है!!</p>
<p>रहा प्रश्न अंग्रेज़ी और विश्व मानचित्र पर हमारे स्थान का, तो मेरी अंग्रेज़ी से कोई शत्रुता नहीं है, मुझे सिर्फ़ उन लोगों से चिढ है जो कि अंग्रेज़ी का उपयोग अपने अहं की अग्नि को शांत करने के लिए करते हैं, जैसा कि मैनें उपरलिख़ित अपने वक्तव्य के अंत में कहा(मेरा अनुमान है कि तुमने ध्यान से अंत नहीं पढा)।</p>
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	<item>
		<title>By: Kanishk</title>
		<link>http://hindi.amitgupta.in/2005/12/11/hindi-oh-dear/#comment-19</link>
		<dc:creator>Kanishk</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 11 Dec 2005 05:25:28 +0000</pubDate>
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		<description>वैसे यह जो आपने अंक वाली बात कही है, उसका सबसे बड़ा कारण तो यह है की दसवी में हिंदी की अपेक्षा, संस्कृत लेने वाले विद्यार्थी संख्या में और अनुपात में भी कम होते हैं। अतः संस्कृत के शिक्षक भी अंक देने में जरा उदारवादी हो जाते हैं। बहुत ही कम विद्यालयों में संस्कृत का विकल्प होता है। तो उत्तर पुस्तिका जांचने वाले के दिल में भी जरा यह भावना आ जाती है की इस बालक ने संस्कृत तो ली।

रही बात अंग्रेजी की, तो फिर आज हम उसी की वजह से विश्व मानचित्र पर उभर रहे हैं। इसी का लाभ उठाकर हम outsourcing, IT, engineering इत्यादी में आगे बढ रहे हैं। यहाँ ....में प्रोफेसर देसी छात्र लेना पसंद करते हैं क्योंकि हमारी शिक्षा अंग्रेजी माध्यम में हुई होती है और हम अच्छी तरह से बोल सकते हैं। यहीं चीन हमसे मात खा जाता है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>वैसे यह जो आपने अंक वाली बात कही है, उसका सबसे बड़ा कारण तो यह है की दसवी में हिंदी की अपेक्षा, संस्कृत लेने वाले विद्यार्थी संख्या में और अनुपात में भी कम होते हैं। अतः संस्कृत के शिक्षक भी अंक देने में जरा उदारवादी हो जाते हैं। बहुत ही कम विद्यालयों में संस्कृत का विकल्प होता है। तो उत्तर पुस्तिका जांचने वाले के दिल में भी जरा यह भावना आ जाती है की इस बालक ने संस्कृत तो ली।</p>
<p>रही बात अंग्रेजी की, तो फिर आज हम उसी की वजह से विश्व मानचित्र पर उभर रहे हैं। इसी का लाभ उठाकर हम outsourcing, IT, engineering इत्यादी में आगे बढ रहे हैं। यहाँ &#8230;.में प्रोफेसर देसी छात्र लेना पसंद करते हैं क्योंकि हमारी शिक्षा अंग्रेजी माध्यम में हुई होती है और हम अच्छी तरह से बोल सकते हैं। यहीं चीन हमसे मात खा जाता है।</p>
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	<item>
		<title>By: जीतू</title>
		<link>http://hindi.amitgupta.in/2005/12/11/hindi-oh-dear/#comment-18</link>
		<dc:creator>जीतू</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 11 Dec 2005 04:35:41 +0000</pubDate>
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		<description>सही कह रहे हो भाई,
जिन्हे हिन्दी का उत्थान करना था, वे ही उसे पतन की ओर ले जा रहे है।
दरअसल गलती हम सभी की है, हमने हमेशा ही हिन्दी को किनारे रखकर, अंग्रेजी को सर आंखो पर बिठाया, देश के अलग अलग हिस्सों मे बोली जाने वाली भाषा और हिन्दी को एक स्तर पर रखा।अंग्रेजी बोलने वाला तो जैसे हमारे लिये साक्षात ईश्वर का रूप होता है, आप हिन्दी बोलकर भले ही सही बात समझाओ, कोई भाव नही देता, लेकिन अगर कोई फ़िजूल की बात, अंग्रेजी की चाशनी मे लपेटकर बताओ तो लोग तुरन्त समझ लेते है। घर मे ही हिन्दी का अपमान, दोषी हम सभी है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सही कह रहे हो भाई,<br />
जिन्हे हिन्दी का उत्थान करना था, वे ही उसे पतन की ओर ले जा रहे है।<br />
दरअसल गलती हम सभी की है, हमने हमेशा ही हिन्दी को किनारे रखकर, अंग्रेजी को सर आंखो पर बिठाया, देश के अलग अलग हिस्सों मे बोली जाने वाली भाषा और हिन्दी को एक स्तर पर रखा।अंग्रेजी बोलने वाला तो जैसे हमारे लिये साक्षात ईश्वर का रूप होता है, आप हिन्दी बोलकर भले ही सही बात समझाओ, कोई भाव नही देता, लेकिन अगर कोई फ़िजूल की बात, अंग्रेजी की चाशनी मे लपेटकर बताओ तो लोग तुरन्त समझ लेते है। घर मे ही हिन्दी का अपमान, दोषी हम सभी है।</p>
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