मैंने कुछ दिन पहले, वाल्ट डिज़नी द्वारा प्रस्तुत, सी.एस.लुईस के लिखे उपन्यास पर बनी इस फ़िल्म, “द क्रानिकल्स आफ़ नारनिया – द लायन, द विच एण्ड द वार्डरोब“, का ज़िक्र किया था। तब यह फ़िल्म यहाँ भारत में रिलीज़ नहीं हुई थी, और मात्र इसका ट्रेलर देखने के बाद ही मैंने कह दिया था कि यह फ़िल्म वाकई में देखने वाली होगी। पर तब कदाचित् मैं गलत था, यह फ़िल्म बढ़िया नहीं बल्कि बहुत बहुत बढ़िया है। कल इस फ़िल्म को देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, और यह फ़िल्म वाकई अदभुद है, यह कैसी है, वह तो जो इसको देख ले वही जान सकता है, कम से कम मैं तो इसे शब्दों में व्यक्त नहीं कर पा रहा हूँ। लार्ड आफ़ द रिंग्स के बाद यह पहली फ़िल्म है जो कि उतनी ही बढ़िया लगी।
पहले अर्ध भाग में फ़िल्म एक सामान्य फ़िल्म की तरह चलती रहती है, जिसमें पहले तो पीटर, सूसन तो लूसी की बातों पर विश्वास नहीं करते और एडमंड अपने राजा बनने के लालच के कारण(जो उसे जादूगरनी ने दिया था) लूसी को झूठा ठहराता है। लूसी रो देती है और इसी समय फ़िल्म में प्रवेश होता है कहानी के एक महत्वपूर्ण किरदार “प्रोफ़ेसर” का, जो कि पीटर और सूसन को अपनी बहन लूसी पर विश्वास करने की सलाह देते हैं। चारो बच्चे आखिरकार एक साथ अलमारी में प्रवेश कर जाते हैं और इसी के साथ कहानी में नया मोड़ आ जाता है, क्योंकि वे सभी पहुँच जाते हैं नारनिया की जादुई दुनिया में। उनकी मुलाकात होती है बीवर से, परन्तु अपने लालच के हाथों विवश एडमंड उन्हें धोखा देता है और चल देता है जादूगरनी के पास। बीवर बाकी तीन बच्चों को लेकर चल पड़ता है आसलान के पास, मार्ग में भेंट होती है सान्ता क्लाज़ से जो कि उपहार स्वरूप लूसी को कोई भी चोट तुरन्त ठीक कर देने की क्षमता रखने वाला फ़ायरफ़्लावर का रस देते हैं। सूसन को मिलता है एक जादुई कमान और तीरों से भरा तरकश, और एक हॉर्न जिसे फूँकने पर वह कहीं भी हो उसे सहायता अवश्य प्राप्त होगी। पीटर को सान्ता देते हैं एक चमचमाती तलवार और ढाल।
दूसरे अर्ध भाग में फ़िल्म की असली कहानी शुरू होती है, और जो कि बिना पलक झपकाए देखने वाली है। आसलान एडमंड को जादूगरनी के शिकंजे से छुड़वा लेता है, परन्तु इसका मूल्य उसे अपने जीवन से चुकाना पड़ता है। तो क्या आसलान मर जाता है? सोचा तो मैंने भी ऐसा ही था, परन्तु कुछ हो जाता है जिसकी मुझे अपेक्षा नहीं थी। ऐसा क्या होता है, जानने के लिए आपको फ़िल्म देख लेनी चाहिए।
एडमंड का स्वभाव बिलकुल ही बदल जाता है, अब वह बिलकुल ऐसा बर्ताव कर रहा होता है जैसा कि एक आदर्श नायक को करना चाहिए। पीटर जादूगरनी के विरूद्ध सेना का नेतृत्व करता है, एडमंड उसका जादुई दण्ड तोड़ देता है परन्तु जादुगरनी उसे भी मौत के मुँह में ढकेल देती है। पीटर और जादुगरनी का द्वंद्व देखने वाला है, ट्राय में हुए अकिलीस और हेक्टर के द्वंद्व जितना रोचक तो नहीं, परन्तु फ़िर भी देखने योग्य। अंत में जादुगरनी मर जाती है जब वह पीटर को मारने जा रही होती है, परन्तु उसे पीटर या अन्य तीन बच्चों में से कोई नहीं मारता। तो कौन मारता है? यह मैं नहीं बताउँगा!!
लूसी एडमंड को सान्ता द्वारा दिए गए जादुई रस से ठीक कर देती है, और चारों बच्चे चार दिशाओं के राजा और रानी बन जाते हैं, चार सिंहासनों वाले दुर्ग में उनका राज्याभिषेक होता है। समय के साथ बच्चे युवा हो जाते हैं और एक दिन जंगल में क्रीड़ा करते हुए उन्हें अचानक अलमारी में वापस जाने का मार्ग मिल जाता है, वे वापस अपनी दुनिया में पहुँचते हैं, और ठीक उसी समय में पहुँचते हैं जिस समय वे गए थे, यानि के वापस उसी उम्र के बच्चे बन जाते हैं।
यहीं पर उनकी भेंट पुनः होती है “प्रोफ़ेसर” से। “प्रोफ़ेसर” कुछ न कुछ हैं, जितने दिखते हैं उससे अधिक हैं और मैंने ऐसा सुना है कि आगे की कहानी में उनका और सक्रिय किरदार है, क्योंकि कहानी यहीं समाप्त नहीं हो जाती, नारनिया की कहानी ७ उपन्यासों में बन्द है, और यह तो मात्र पहले उपन्यास की ही कहानी थी। तो आशा है कि बाकी के उपन्यासों पर भी फ़िल्में बनेंगी और इतनी ही(या इससे भी अधिक) बढ़िया बनेंगी।
पूरी फ़िल्म में चलचित्रकला बहुत अच्छी है, स्पेशल इफ़ेक्ट बहुत अच्छी तरह से दिए गए हैं। मुझे इसमें लूसी का किरदार बेहद पसन्द आया, और उसकी भूमिका में जार्जी हेनले तथा पीटर की भूमिका में विलियम मोज़ले का अभिनय बहुत अच्छा लगा। स्टार वार्स का पहला एपिसोड और बैटमैन बिगिन्स जिसने देखी है वे निश्चित रूप से आसलान के किरदार की आवाज़ को लिआम नीसन की आवाज़ के रूप में पहचान लेंगे, अफ़सोस इस बात का है कि लिआम नीसन की आवाज़ के अलावा इस फ़िल्म में उनका और कोई किरदार नहीं, उनका अभिनय देखने वाला होता।
ऐन्ड्रियू ऐडमसन ने बहुत अच्छा निर्देशन किया है, कहानी बेशक बहुत अच्छी है, परन्तु यदि उसे चित्रित और निर्देशित करने की समझ और हुनर न हो तो अच्छी खासी कहानी का सत्यानाश हो जाता है, हैरी पॉटर की सभी फ़िल्में इसका बेहतरीन उदाहरण हैं। मुझे बड़ा आश्चर्य होगा यदि इस फ़िल्म का आस्कर पुरस्कारों में नामांकन नहीं आता है। और हैरी पॉटर फ़िल्मों के निर्माताओं को इस फ़िल्म से सीखना चाहिए कि फ़िल्म का बढ़िया होना केवल लोकप्रिय कहानी होने से ही तय नहीं हो जाता। अभी कम से कम तीन फ़िल्में हैरी पॉटर शृंखला में आनी और बाकी हैं, जिनमें से एक तो कदाचित् लगभग बन चुकी है या बननी आरम्भ हो चुकी है, परन्तु फ़िर भी, यदि वे आने वाली अन्य दो फ़िल्मों का भी सत्यानाश पिटने से बचा लेते हैं(जैसी कि मुझे कदापि आशा नहीं है) तो यह अपने आप में एक कीर्तीमान होगा। पाँचवीं फ़िल्म के तो अभी आने में लगभग ११ महीनों का समय है, परन्तु पिछली चार फ़िल्मों को देखते हुए मैं यही कहूँगा कि मुझे कोई आशा नहीं है। इन फ़िल्मों को किसी योग्य व्यक्ति को दोबारा बनाना चाहिए, जो कि निकट भविष्य में मुझे होता नज़र नहीं आ रहा। हैरी पॉटर के प्रति बच्चों में दीवानगी के कारण ही ये फ़िल्में सिनेमाघरों में लगी रहती हैं वरना इन्हें कोई न देखने जाए।
बहरहाल, मैं तो यही कहूँगा कि नारनिया के इतिहास पर बनी यह पहली फ़िल्म वाकई बहुत बहुत अच्छी है, जिसे भी अच्छी फ़िल्में देखना पसन्द है, उसे तो यह अवश्य देखनी चाहिए। और मैं तो चला नारनिया की कहानी के सारे उपन्यास लेने, क्योंकि सस्पेंस मुझसे और बर्दाश्त नहीं हो रहा और मैं जानने के लिए उत्सुक हूँ कि “प्रोफ़ेसर” असलियत में कौन हैं और नारनिया का अंत कैसे होता है। जी हाँ, सातवें और अंतिम उपन्यास में नारनिया का अंत हो जाता है और चारों बच्चों की भी मृत्यु हो जाती है। लेकिन यह कोई कारण नहीं एक अच्छी फ़िल्म और कहानी की प्रशंसा न करने का।
कल, रविवार 29 जनवरी को एक मित्र के साथ दिल्ली के प्रगति मैदान में लगे सत्रहवें विश्व पुस्तक मेले में जाने का कार्यक्रम बनाया था!! घर से सुबह निकलते निकलते देर ऐसी हुई कि ठीक से नाश्ता भी न कर पाया, जो मुँह में आया वो ठूँसा और सरपट निकल लिए!! दिन कुछ अधिक ही अच्छा था, क्योंकि बाहर सड़क पर आते ही पैट्रोल की सुईं पर नज़र पड़ी तो देखा कि टंकी लगभग खाली थी, पिछली रात ध्यान था कि भरवा लूँगा, लेकिन कुछ दोस्तों के साथ अचानक बाहर खाने का कार्यक्रम तय हो गया और उनके साथ ही निकल लिया, लौटने पर पैट्रोल की बात ध्यान से ही निकल गई!! खैर, अब अपनी सड़ी हुई याददाश्त और किस्मत को कोसते हुए मोटरसाईकिल सरपट दौड़ा दी पैट्रोल पंप की ओर, पहले ही देर हो रही थी, अब तो काम और भी बढ़िया हो गया था!!
घड़ी पर निगाह गई तो दिमाग की सुईं घूम गई, बारह बजे का समय दिया था मदन को प्रगति मैदान पर मिलने का, और पौने बारह तो पैट्रोल पंप से निकलते निकलते ही बज गए थे!! अब तो एक ही काम हो सकता था, आव देखा न ताव, ऐक्सीलेटर घुमाया और मोटरसाईकिल दौड़ा दी, कदाचित उसे भी वक्त की नज़ाकत का एहसास हो गया था, तभी तो उसने भी हल्का सा ऐक्सीलेटर घुमाते ही गजब की गति पकड़ी!! लेकिन मोती नगर की पास पहुँचते पहुँचते मुझे यकीन होता जा रहा था कि मैं ठीक मुहूर्त में नहीं निकला था, हर ओर इतना यातायात, और वह भी रविवार को, विश्वास नहीं आ रहा था। लेकिन जब निकल पड़े तो फ़िर रूकना क्या, पूसा रोड, कनॉट प्लेस, मंडी हाउस होते हुए आखिरकार प्रगति मैदान पर रिकार्ड समय पर पहुँच ही गया, लगभग बीस किलोमीटर मात्र पच्चीस मिनट में!! पहुँचने पर पता चला कि मदन बाबू तो अभी तक पहुँचे ही नहीं थे, पक्के हिन्दुस्तानी जो ठहरे, दिल्ली की हवा आखिरकार लग ही गई, बहरहाल मुझे इस बात की तसल्ली थी कि मैं पहले पहुँच गया था!!
खैर, जल्द ही मदन अपने एक मित्र के साथ पहुँच गया और हम लोग अन्दर चल दिए। पहले जिस हॉल में घुसे(अब उसका नंबर याद नहीं), वहाँ अपने मतलब की बहुत सी पुस्तकें थीं, अर्थात टेक्नॉलोजी-प्रोग्रामिंग आदि पर, बीपीबी और प्रेन्टिस हॉल आफ़ इंडिया के स्टॉल इसी हॉल में थे, और सभी विदेशी प्रकाशनों के स्टॉल भी यहीं लगे हुए थे। पाकिस्तान से कई प्रकाशन आए हुए थे, एकाध सऊदी-अरब से भी था, और दो-तीन ईरान से थे, फ़्रान्स से तो मुझे केवल एक ही प्रकाशन दिखा और जर्मनी से भी। पर इन जगहों पर कोई अधिक भीड़ नहीं थी, ज़ाहिर सी बात है कि इन भाषाओं का ज्ञान रखने वालों का ही यहाँ कोई आकर्षण हो सकता था। हाँ, ईरानी प्रकाशकों के पास कुछ अच्छी खासी भीड़ थी, अन्यथा अंग्रेज़ी प्रकाशन के स्टॉल पर ही भीड़ देखी जा सकती थी।
बीपीबी की पुस्तकों के आसपास लोगों का खासा जमाव था, भई आखिर पूरी दुकान टेक्नॉलोजी और कंप्यूटर संबंधी किताबों से जो अटी पड़ी थी। पर जैसी कि मुझे आशा थी, सारा का सारा स्टॉक पुराना था, कोई नई किताब नहीं, बस अधिकतर पुराने शीर्षकों के नए संस्करण थे। लम्बे अरसे से मैं यही देखता आ रहा हूँ, बीपीबी कंप्यूटर आदि की किताबें छापने के योग्य नहीं है, एक तो दूसरे दर्जे की किताबें होती हैं, और वह भी पुरानी ही पुनर्चक्रण हो दोबारा आती रहती हैं, जैसे कंप्यूटर की किताबें न हों वरन् साहित्य आदि की हों जो कि कभी पुरानी नहीं होती!! लोग बाग मूर्खता दिखाते हुए खरीद भी लेते हैं, क्या करें, बिलकुल नहीं से “कुछ” ही सही। परन्तु अधिकतर मैंने इन लोगों में छात्र या शुरूआती अथवा वक्ती उपयोगकर्त्ता ही देखें हैं, हमारे जैसे पेशेवर लोग नहीं मिलेंगे इन किताबों को खरीदते हुए। मदन के साथ आए उसके मित्र को एकाध किताब पसन्द आ ही गई, परन्तु जब किताबों की कीमत पर छूट की बात आई, तो काउंटर पर बैठे व्यक्ति ने कहा कि वे केवल दस प्रतिशत छूट ही दे रहें हैं। मैंने मित्र से कहा कि यदि अति आवश्यक है तो लो अन्यथा छोड़ दो, क्योंकि पच्चीस प्रतिशत छूट तो हमारा लोकल पुस्तक वाला ही दे देता है, और इतना ही नई सड़क(चांदनी चौक) पर भी मिल जाता है। और ये तो स्वयं प्रकाशक हो कर भी केवल दस प्रतिशत ही दे रहे हैं। मैं सदैव यही करता हूँ, पुस्तक मेले में कभी वे पुस्तकें नहीं खरीदता जो बाज़ार में आसानी से मिल जाती हैं, क्योंकि यहाँ पुस्तकें महंगी ही मिलती हैं, बाज़ार के भाव से महंगी। तो इसलिए यहाँ केवल वही किताबें खरीदनी चाहिए जो कि बाज़ार में नहीं मिलती, जैसे किसी विदेशी प्रकाशक की पुस्तकें या फ़िर कुछ सीमित प्रकाशन वाली किताबें।
विदेशी पर्यटकों की भी कमी नहीं थी, भई आखिर विश्व पुस्तक मेला है, तो केवल देसी लोग तो होने से रहे, हर मोड़ मुड़ते ही एकाध सुनहरे बालों वाला किताबों का कोई न कोई विदेशी रसिया मिल ही जाता था। कुछ से थोड़ा ज्यादा समय इस हॉल में बिताने के बाद हमने हॉल #18 की ओर रूख किया, साहित्य वहीं था, और मदन के साथ आए उसके मित्र को ओशो के स्टॉल से कुछ लेना भी था।
सबसे पहले हम घुसे रूपा एण्ड कंपनी के स्टॉल में, वहाँ इतनी भीड़ थी कि बस पूछो ही मत, पाँव तक रखने की जगह नहीं थी, पूरा स्टॉल खचाखच भरा हुआ था, किसी तरह हम लोग अंदर घुसे और किताबें देखने लगे।
अपने मतलब की वहाँ मुझे कोई किताब नहीं लगी, सिडनी शेलडन के उपन्यास पढ़े काफ़ी समय हो गया था(लगभग दो साल), इस बीच आए नए शीर्षक मुझे दिखाई दे रहे थे, परन्तु चूँकि मेरे पास पढ़ने का समय नहीं है, इसलिए मैंने दोबारा उधर देखा ही नहीं। जॉन ग्रिशम मुझे कभी पसंद ही नहीं आया, और केन फ़ॉलेट में मेरी कभी रूचि ही नहीं रही। भाषा ज्ञान की पुस्तकों ने मुझे आकर्षित किया और मैंने गेल ग्राहम के “टीच युअरसेल्फ़ फ़्रैन्च” कोर्स को उठा लिया। भुगतान करने के लिए क्रेडिट कार्ड दिया तो वह अस्वीकृत हो गया, प्रकाशक की प्रक्रमण मशीन पुरानी थी और मेरा मिनी कार्ड अस्वीकृत कर रही थी, अक्ल पर मेरी पत्थर पड़ गया था, दूसरे कार्ड के पास में होने का ध्यान नहीं रहा और अपने करारे हज़ार के नोट से(जिसे मैंने कई महीनों से सहेज कर रखा था) बिछुड़ना पड़ा, क्योंकि जैसा कि मैंने पहले कहा, दिन खराब था और बटुए में अन्य नकदी केवल दो तीन सौ रूपये ही थे!!
खैर, और दुकानों में घूमते घामते पहुँचे ओशो के स्टॉल पर जहाँ मदन का मित्र तो हो लिया अंदर और हम दोनो बाहर ही जरा साँस लेने को रूक गए। हम पहली मंज़िल पर खड़े थे और वहाँ से नीचे का नज़ारा करने लगे, सभी स्टॉल एक बड़े से हॉल में अलग अलग क्यूबिकल थे जो कि देखने में अच्छे लग रहे थे।
मदन का मित्र आशा के विपरीत, कुछ जल्दी ही वापस आ गया, पूछने पर पता चला कि जो वह ढ़ूँढ़ रहा था वह उसे नहीं मिला। यह तो मुझे भी कहना पड़ेगा कि जो मैं ढ़ूँढ़ रहा था वह मुझे भी नहीं मिला, मैं ढ़ूँढ़ रहा था रॉबर्ट लडलम के कुछ उपन्यास जो मुझे बाज़ार में नहीं मिले। वापस लौटने के लिए नीचे आए तो नज़र गई और नीचे जाते हुए रास्ते पर जहाँ कुछ और स्टॉल थे जो हमने नहीं देखे थे। मदन के हाल अब बुरे हो रहे थे चलने से, थक तो थोड़ा मैं भी गया था, पर पुस्तक प्रेम कहो या सनक, सोच लिया था कि नीचे के स्टॉल देखे बिना नहीं जाना तो नहीं जाना। पेन्गुईन के स्टॉल मे गए तो वहाँ ऐसी पुस्तकें थी कि जिनको देख तो सकते थे पर पढ़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। वास्तु पर एक किताब दिखी जो कि ठीक ठाक सी लग रही थी, सो घर फ़ोन मिला के मम्मी से पूछा कि पढ़नी है क्या, उत्तर मिला कि ले आओ तो मैंने पुस्तक उठा ली। पैसे देने में फ़िर पंगा होने वाला था, क्योंकि यहाँ भी प्रक्रमण मशीन पुरानी थी और मेरा मिनी कार्ड अस्वीकृत कर दिया, लेकिन मुझे ध्यान आ गया कि डेबिट कार्ड भी पास में है, तो उससे भुगतान किया, वरना एक और हज़ार के करारे नोट से हाथ धोना पड़ता!!
वापसी में स्कोलॉस्टिक का स्टॉल देखा, यह भी काफ़ी अच्छा सजा रखा था, स्टॉल के बाहर लगा कार्टून का बोर्ड मुझे बेहद पसन्द आया। ये छायाचित्र उसी के एक हिस्से का है।
आखिरकार हम बाहर आ गए, तो मदन तो कुछ राहत मिली। थोड़ी देर बैठ कर थकान उतारने की कोशिश की, फ़िर कुछ पेट पूजा के पश्चात अपने अपने रास्ते हो लिए। वापसी मेरी कनॉट प्लेस से ही होनी थी, और ब्लॉगर भेंटवार्ता का समय भी हो चुका था(सायं के पाँच बज चुके थे), पर जब मैं कॉफ़ी कैफ़े डे पर पहुँचा तो मुझे कोई नज़र न आया। क्योंकि मैं किसी को जानता नहीं था, इसलिए मैं कम से कम तीन-चार लोगों के समूह को देख रहा था, पर ऐसा वहाँ कोई नहीं था, काऊंटर पर पूछा कि कोई ऐसा समूह तो नहीं था वहाँ, तो वहाँ पर मौजूद महाशय ने बताया कि कुछ लोगों का समूह करीब चार बजे से बैठा तो था, परन्तु अभी पाँच-दस मिनट पहले सभी बाहर चले गए थे। तो वहाँ रूकने का मुझे कोई औचित्य न लगा और मैंने घर की राह पकड़ी जहाँ आधे घंटे बाद पहुँचकर मैंने चैन की साँस ली। घूमना फ़िरना बहुत हो गया था और मुझे मेरे प्यारे कंप्यूटर की याद भी आ रही थी!!
अब भई, अल्का ने मुझे टैग कर अपना शिकार बनाया है तो हर्जाने के रूप में मुझे भी उनके विषय “निपुण प्रेमी”(perfect lover) पर अपनी राय व्यक्त करनी है कि मेरे अनुसार मेरी निपुण अथवा अद्वितीय प्रेमिका कैसी हो, अथवा यूँ कहें कि मेरे मन में क्या छवि है एक आदर्श प्रेमिका की। इस खेल के कुछ नियम हैं जो मुझे अल्का द्वारा ही पता चले, और वे हैं:
हाँ तो विषय पर दोबारा आते हुए, मैं यही कहूँगा कि आज तक मैंने कभी इस पर विचार नहीं किया, मतलब कि कभी एकाध बार विचार अवश्य किया लेकिन अधिक तवज्जो न दी इस विषय पर क्योंकि इससे अधिक महत्वपूर्ण बहुत सी बातें रहीं हैं ध्यान देने के लिए, प्यार-मोहब्बत-इश्क आदि की ओर इसलिए कभी ध्यान ही नहीं दिया, और वैसे भी, अभी कौन सा बुढ़ापा आ गया है, अभी तो मात्र बाईस बसंत देखे हैं, सारी उम्र पड़ी है चोंच लड़ाने के लिए!!
बहरहाल, अल्का ने कदाचित सोचा कि वे मुझे फ़ांस लेंगी इस विषय पर, परन्तु शायद वे यह नहीं जानती कि मेरी कल्पनाशक्ति की उड़ान अत्यधिक तीव्र है जिसकी पराकाष्ठा का स्वयं मुझे ज्ञान नहीं है, इसलिए मैं बहुत कुछ सोच सकता हूँ, अब क्या कहूँ(अधिक “अपने मुँह मिया-मिट्ठु” तो नहीं बन सकता न)। परन्तु हिन्दी से कई वर्ष परे रहने का दुष्परिणाम यह है कि मुझे अंग्रेज़ी में तो शब्द ज्ञात हैं परन्तु उनके समानार्थ शब्द हिन्दी में नहीं मिल रहे(लगता है अंग्रेज़ी से हिन्दी शब्दकोष लेना ही पड़ेगा)। खैर, तो ज्यादा बकवास न करके, शुरू करते हैं अपनी कल्पना की उड़ान!! मेरा प्रयत्न होगा कि अपनी आशाओं को यथार्थवादी ही रखूँ, उन्हें कल्पना की चोटियों तक न उड़ने दूँ कि वे विश्वसनीयता की सीमाओं को ही लांघ जाएँ!!
तो मेरी प्रेमिका स्त्रीलिंग होगी, क्योंकि नवाबी शौक तो भई मैं रखता नहीं!!
तो किसी विशेष क्रम में नहीं, मेरे अनुसार, मेरी प्रेमिका में निम्न विशेषताएँ होनी चाहिए:
मेरा अनुमान है कि अब कुछ अति ही हो गई है, आठ की जगह ग्यारह बातें बता दीं, परन्तु मेरा मानना है कि “परफ़ैक्ट” जैसी कोई चीज़ नहीं होती, कहीं न कहीं कोई कमी रह ही जाती है। कमियों को सुधारना ही जीवन लक्ष्य होना चाहिए!! इसलिए ये न सोचें कि मैंने “परफ़ैक्ट” अनुमोदन करते हुए अपनी आशाएँ व्यक्त की हैं, मैंने अपनी अपेक्षाओं को इस मामले में बहुत ही सरल रखने का प्रयत्न किया है ताकि ये यथार्थवादी ही रहें, जोकि सार्थक हो सकें। यदि इनमें से आधी से ज्यादा अपेक्षाएँ पूर्ण हो जाएँ, तो मैं यकीनन अपने को धन्य मानूँगा(तो कोई है?)!!
और अब समय है अपनी हिट लिस्ट को व्यक्त करने का!! तो (किसी क्रम में नहीं)वे (दुर्)भाग्यशाली व्यक्ति हैं:
तौबा, इस हिट लिस्ट को बनाना बड़ा ही दुष्कर सिद्ध हुआ, अपनी आदर्श प्रेमिका के बारे में लिखने से भी अधिक दुष्कर!! अब इतने सारे व्यक्ति हैं, किसको अपना निशाना बनाउँ, किसको बक्श दूँ, समझ नहीं आ रहा था!! पर आखिरकार इस बाधा को भी सफ़लतापूर्वक पार कर ही लिया!!
अब प्रतीक्षा है अपने शिकारों की प्रतिक्रिया का!!
जिसे ढ़ूँढ़ता हूँ मैं हर कहीं, जो मिली थी मुझे एक बार कहीं, जिसके प्यार पर है मुझे यकीन, वो लड़की है कहाँ??
नहीं, यह मैं अपने लिए नहीं कह रहा, इसलिए किसी भ्रम में न पड़ें!!
बात तो यह है कि ऐसा यकीनन सोच रहे होंगे कनाडा के मार्क ला चांस जो गए तो थे क्यूबा में छुट्टियाँ मनाने, पर दिल दे बैठे बेल्जियम की सैबाइन को। साथ साथ घूमते हुए छुट्टियाँ तो समाप्त हो गई पर शर्मीले मार्क सैबाइन का पता या फ़ोन नंबर पूछना भूल गए। अब बेल्जियम की टेलीफ़ोन डायरेक्टरी में दर्ज हर सैबाइन नाम की लड़की को चिठ्ठी लिखने वाले हैं कि ताकि उनकी प्रेमिका उन्हें मिल जाए। (स्रोत)
यकीनन आपका कहने का मन करेगा कि “वाह, क्या आशिक है”, परन्तु मैं यह कहने के बजाय मैं यह सोच रहा हूँ कि यदि सैबाइन के घर में लगा फ़ोन उसके नाम से न हुआ तो? भारतीय आशिक ऐसी हरकत करने की गलती नहीं करेंगे क्योंकि यहाँ अमूमन लड़कियाँ अपने घर-परिवार के साथ रहती हैं और फ़ोन उनके नाम से नहीं लगे होते, तो ज़ाहिर है कि टेलीफ़ोन डायरेक्टरी में उसका नाम नहीं होगा। तो यदि मार्क को इस तरह सैबाइन नहीं मिली तो वे क्या करेंगे? घर घर जा कर पता करेंगे?
बहरहाल मैं आशा करता हूँ कि ऐसी नौबत नहीं आएगी और मार्क को उनकी प्रेमिका मिल जाएगी!!
अमेरिका आखिर अपने को समझता क्या है? कहता है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम के खिलाफ़ वोट दो वरना भारत-अमेरिका के परमाणु समझौते को नमस्ते कह लो!! (स्रोत) मतलब कि भईये यह तो सीधी सीधी धमकी है, कल को कहेंगे कि फ़लां देश पर हमला करना है, ब्रिटेन की तरह हमारे चमचे बन जाओ वरना तुम्हारी फ़लां स्वीकृति पर रोक लगवा देंगे, या कुछ और कर देंगे!! यानि कि यह तो खुलम-खुला दादागिरी है। साथ ही अमेरिका कहता है कि भारत ने अपने सैन्य और असैन्य परमाणु प्रतिष्ठानों में जो अंतर बताएँ हैं वे विश्वसनीय नहीं हैं।
एक भारतीय दिल से पूछा जाए तो वह कहेगा कि भारतीय प्रधानमंत्री को अमेरिका को साफ़ कर देना चाहिए कि चाहे भारत ईरान के खिलाफ़ ही वोट दे पर यह भारत का अपना स्वतंत्र निर्णय होगा क्योंकि भारत एक स्वतंत्र देश है, अमेरिका भारत को ब्रिटेन समझने की भूल न करे जो उसकी हर जायज़-नाजायज़ बात को स्वीकार लेगा, इसलिए अमेरिका भारत को धमकी देने की भूल न करे। और भारत अपने यहाँ जो भी करता है, वह उसका निजी मामला है। अमेरिका कितने हथियार बनाता है, उसकी सैन्य और असैन्य परमाणु शक्ति कैसी और कितनी है, वह यह सबको नहीं बताता फ़िरता, तो इसलिए अपने काम से मतलब रखे और खाली-पीली दूसरों को डंडा देना छोड़ दे। यदि वह भारत-अमेरिका के परमाणु समझौते को तोड़ना चाहता है तो बेशक तोड़ दे, भारत अपने आप कार्य करने में भी सक्षम है और भारतीय रक्षा प्रणाली ने अमेरिकी उच्च तकनीक के हथियारों की पाकिस्तान के साथ हुई 1971 की लड़ाई में खूब धज्जियाँ उड़ाई हैं, क्योंकि बेहतर हथियार कभी कोई लड़ाई नहीं जीतते, लड़ाई जीती जाती है बढ़िया रणकौशल, तेज़ दिमाग और जीतने के बुलंद हौसले द्वारा।
पर यदि इस बात पर एक दिमाग से सलाह ली जाए, तो वह कहता है कि भारत को अमेरिका की बात मान लेनी चाहिए। ईरान भारत का कोई खास हमदर्द भी नहीं है और वहाँ जिन ईस्लामी कट्टरपंथियों की हुकूमत है वे भारत के समर्थन में तो नहीं, विरोध में अवश्य खड़े हो सकते हैं। और वैसे भी इस समय भारत को अपने लाभ की सोच कर अमेरिका का साथ देना चाहिए। जब भारत अमेरिका से अपना मतलब निकाल समर्थ हो जाए, तो तब भारत को उसके आगे झुकने से मना कर देना चाहिए। क्योंकि दिमाग ही कहता है कि
“अपना मतलब निकालने के लिए यदि गधे को भी बाप बनाना पड़े तो बना लेना चाहिए”
और जहाँ तक मैंने पढ़ा है, समझा है और जहाँ तक मेरी बुद्धि कहती है यह सही भी है, और इसी को आजकल दुनियादारी भी कहते हैं। इतिहास इसके उदाहरणों से भरा पड़ा है।
तो अब सोचने वाली बात है कि हमारे प्रधानमंत्री महोदय क्या उत्तर देते हैं!!