आज की शाम मैंने पहली बार दिल्ली ब्लॉगर्स की मासिक भेंटवार्ता में भाग लिया। और शायद आज मौसम भी कुछ अधिक ही कृपालु था कि सुबह से ही बरसने को तैयार था। जैसे ही मैं सवा छह बजे निकलने को हुआ, अचानक बारिश चालू हो गई। कुछ देर बाद जब आकाश ने बरसना बंद किया तो मैंने शुक्र मनाया और कनॉट प्लेस की ओर निकल पड़ा। रास्ते में दो-तीन बार हल्की बौछार तो पड़ी लेकिन मैं ढृढ़ निश्चय के साथ आगे बढ़ता रहा। दिमाग मेरा तब खराब हो गया जब लक्ष्मी-नारायण मंदिर की ओर मुड़ते ही जैसे आसमान फ़ट पड़ा और तेज़ बारिश शुरु हो गई, जय हो लक्ष्मी-नारायण!! फ़िर भी मैं निर्विकार आगे बढ़ता रहा और गोल मार्किट, बंगला साहिब होता हुआ कनॉट प्लेस पहुँचा। चूँकि मुझे ज्ञात नहीं था कि “बरिस्ता” कहाँ है, मैं बाहरी परिधि की परिक्रमा करने लगा। रूबी ट्यूसडे के बाद आया फ़ेडरल बैंक और उसके बाद मुझे आखिरकार दिखाई पड़ा “बरिस्ता”!!
आख़िरकार मैं पहुँच ही गया, तब तक बारिश भी थम चुकी थी, पर मैं पूरा भीग चुका था और मेरी पतलून थोड़ी गंदी भी हो चुकी थी। ख़ैर, मैंने अपनी मोटरसाईकिल पार्किंग में खड़ी की, और सीट के नीचे से एक सूखा कपड़ा निकाल कर अपना बैग और हैलमेट और अपने कपड़ों को पोंछा(लगता है कि मुझे एक गाड़ी लेनी ही पड़ेगी)। मैं एक घंटा देरी से पहुँचा था, तो इसलिए बिना अधिक विलम्ब किए मैं “बरिस्ता” की ओर लपका।
अंदर द्वार के निकट ही दो टेबलों को जोड़ कर एक झुंड बैठा था, मुझे लगा कि शायद ये ही वे लोग हैं, तो मैंने एक से पूछा कि क्या वे दिल्ली ब्लॉगर्स भेंटवार्ता के लिए आए हैं। उत्तर हाँ में मिला तो मुझे थोड़ी राहत महसूस हुई(कि मुझे इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा)। जिन महोदय से मैंने प्रश्न किया था वे और कोई नहीं बल्कि आज शाम के मेज़बान शिवम विज थे। और शिवम ने फ़िर मेरा परिचय अन्य लोगों से कराया परन्तु मेरा ध्यान एक लम्बे बालों वाले व्यक्ति की ओर गया और मुझे यह जानकर थोड़ा आश्चर्य हुआ कि वे शाम के ख़ास मेहमान, इंडिया अनकट ख़्याति प्राप्त ब्लॉगर अमित वर्मा हैं। पहली छाप ही बड़ी कूल थी, और बातों से तो अमित और भी समझदार लगे!!
फ़िर मेरा ध्यान एक और “कूल” से दिखने वाले शख्स की ओर गया और परिचय के बाद पता चला कि वे हैं तरूण जो कि टीटीजी(TTG) के उपनाम से जाने जाते हैं। और भी ब्लॉगर बिरादरी के मेंम्बरान से परिचय हुआ जिनमें थी ऐश्वर्या तथा दो और लड़कियाँ जिनके नाम मैं पकड़ नहीं पाया। तत्पश्चात मुलाकात हुई साकेत से और कुछ अन्य ब्लॉगर बंधुओं से।
मैंने अपनी मनपसन्द मिंट चॉकलेट का मग लिया और बैठ गया शिवम और अमित के साथ बातें करने(और किसलिए इकठ्ठा हुए थे हम)!! मुझे यह सुनकर कोई आश्चार्य नहीं हुआ जब शिवम ने बताया कि वह सोचे बैठे थे कि चूँकि डिजिट ब्लॉग का एक ब्लॉगर हूँ, मैं डिजिट पत्रिका की ओर से आया हूँ। फ़िर हम दोनों के बीच एक लघु विवाद आरम्भ हुआ कि हमें यह बात पाठकों पर ज़ाहिर कर देनी चाहिए कि हम डिजिट पत्रिका से कोई वास्ता नहीं रखते हैं, तो मैंने साफ़ कर दिया कि हमने ऐसा अपने बारे में लिख रख़ा है और एक अस्वीकरण भी लगा रख़ा है जिनकी कड़ियाँ ब्लॉग के हर पन्ने पर सबसे ऊपर विराजमान हैं। अब कोई उन्हे पढ़ने का कष्ट नहीं करता तो इसमें हमारा कोई दोष नहीं है!!
तत्पश्चात शिवम ने डिजिट पत्रिका के ट्रेडमार्क उल्लंघन का मुद्दा उठाया क्योंकि हमने अपने ब्लॉग का नाम “डिजिट ब्लॉग” रखा हुआ है। तो मैंने ख़ुलासा करते हुए कहा कि हम यह कहीं नहीं कह रहे कि हम किसी भी रूप में डिजिट पत्रिका या जसुभाई डिजिटल मीडिया या उनकी किसी भी कंपनी से जुड़े हुए हैं। साथ ही, “डिजिट” एक आम शब्द है और इसे कोई भी प्रयोग कर सकता है, इसको कोई अपना ट्रेडमार्क नहीं बना सकता। और फ़िर यदि कोई ट्रेडमार्क का उल्लंघन कर भी रहा है तो वह डिजिट पत्रिका वाले हो सकते हैं क्योंकि “डिजिट” नाम से एक पत्रिका तो युनाईटेड किंगडम में भी प्रकाशित होती है।
मेरे इस तर्क के सामने शिवम निरूत्तर थे। तरूण के साथ भी कुछ इधर उधर की बातें हुई और मैंने अपनी भीगी हुई जॉकेट को अपनी कुर्सी पर पीछे सूखने के लिए टाँग दिया(बरिस्ता के लगभग सभी “आउटलेट” वातानुलूलित होते हैं इसलिए अंदर तापमान गर्म था)। बातें चलती रही, तरूण के मेलबार्न जाने से लेकर अमित के पाकिस्तान जाने तक और वहाँ के क्रिकेट के मैदानों और प्रैसबाक्सों की सुविधा तक। अमित, अंग्रेज़ों के अंग्रेज़ी अख़बार गार्जियन की ओर से पाकिस्तान में होने वाली भारत और पाकिस्तान के टेस्ट मुकाबलों पर पत्रकारिता करेंगे और अपनी कलम(यानि कि अपने कीबोर्ड) का जादू दिखाएँगे। अमित के बारे में मेरी पहली छाप यही रही कि वे एक सुलझे हुए “फ़ंडू” प्रकार के व्यक्ति हैं जिनके साथ बात करते हुए समय की ओर से लापरवाह हो जाना कोई बड़ी बात नहीं है।
लेकिन समय तो अपनी गति से व्यतीत होता ही है। जल्द ही तरूण ने विदा ली। मैंने एक फ़ोटो के लिए कहा लेकिन तरूण ने शिष्टतापूर्वक इंकार कर दिया। इंस्टापंडित से लेकर देसीपंडित तक बातें चलती रही और फ़िर जब हम कुछ ही लोग रह गए थे(“बरिस्ता” ख़ाली हो चुका था), तब जिक्र आया हिन्दी के ब्लॉगों का। किसी ने पूछा कि वहाँ उपस्थित बिरादरी में कोई हिन्दी में ब्लॉग करता है, तो मैंने बेशर्मी से स्वीकार किया कि मैं ऐसा करता हूँ!!
फ़िर कुछ बातें चली हिन्दी चिट्ठाविश्व की और इस बार के इन्डिब्लॉगीज़ और निर्णायकों की। अमित ने कहा कि देबाशिश कुछ हिन्दी ब्लॉगों पर शुरु करने को कह रहे थे और क्या मैं उन्हे जानता हूँ। मैंने कहा कि मैं इस बार के इन्डिब्लॉगीज़ पुरस्कारों के स्पॉनसरों में से एक हूँ तो अमित ने निर्णय लिया कि मैं देबाशिश से वाकिफ़ हूँ। इससे पहले कि मैं कहता कि देबाशिश से मेरी पहचान हाल ही की है और हम दोनों ने सिर्फ़ दो-तीन ही ईमेल अदल बदल की हैं, बातों का रूख़ कहीं और मुड़ गया और मेरा स्पष्टीकरण मेरे मुख़ में ही रह गया। अब मैं तो यह भी भूल गया कि अमित ने किस बारे में देबाशिश से संपर्क करने का जिक्र किया था, शायद मुझे अमित को ईमेल करके पूछना पड़ेगा।
सभी अमित को मुख़्य अतिथि होने के कारण एक भाषण देने को कह रहे थे, पर अमित ने किसी तरह उस बात को टाल दिया। उपस्थित सभी ब्लॉगरों में अमित को मिला कर अधिकतर पत्रकार थे। वह लगभग 14-15 लोगों का जमाव था। समय बीतता रहा और साढ़े नौ बजे सभी उठ खड़े हुए, अब जाने का समय आ गया था। मैंने अमित से यादगार के तौर पर एक फ़ोटो के लिए कहा, तो अमित इस शर्त पर मंजूरी दी कि मैं यह फ़ोटो ईन्टर्नेट पर नहीं डालूँगा। मैंने शर्त स्वीकार की तो एक बंधु ने अमित और साकेत के साथ मेरी तस्वीर उतारी, फ़िर मैंने शिवम को भी इसी शर्त पर तैयार किया और अमित ने मेरी शिवम और साकेत के साथ तस्वीर ख़ींची। चूँकि मैंने ईन्टर्नेट पर तस्वीरें न डालने का वायदा किया था, इसलिए मैं उस पर अमल करूँगा और वे तस्वीरें ईन्टर्नेट की चमक-धमक कभी नहीं देख़ेंगी।
फ़िर अमित ने विदा ली, शिवम तथा कुछ और लोग रात्रि भोजन के लिए पास के किसी रेस्त्रां में जा रहे थे, मैंने उनके निमन्त्रण को शिष्टतापूर्वक अस्वीकार किया और पार्किंग की ओर बढ़ गया। रास्ते भर मैं इस बात का शुक्र मनाता आया कि सड़कों पर बहुत कम यातायात था और सबसे अहम बात कि बारिश नहीं हुई, और मैं 40 मिनट में बिना भीगे घर पहुँच गया।
आज की शाम यकीनन उम्मीद से अच्छी बीती, और मैं अगले मास की भेंट का बेसब्री से इन्तज़ार कर रहा हूँ, जिसमें अमित वर्मा और साकेत(और तरूण) तो नहीं होंगे, लेकिन फ़िर भी शाम मज़ेदार रहेगी ऐसी पूरी आशा है!!



5 Comments
अनूप शुक्ला
विवरण पढ़ना अच्छा लगा। फोटो भी होते तो और मजा आता। रेस्तरां के ही डाल देते वो तो नहीं मना करता है।
Amit
क्या करें अनूप, अमित वर्मा ने मेरे साथ फ़ोटो सिर्फ़ इसी शर्त पर खिंचवाई कि मैं वे फ़ोटो ईन्टर्नेट पर नहीं डालूँगा, तो इसलिए वायदा नहीं तोड़ सकता, आखिर एक इन्सान की कीमत उसकी ज़ुबान से ही है!!
और विश्वास करो, बरिस्ता की बाहर से तस्वीर लेने का विचार मेरे मन में तभी से था जब मैं वहाँ पहुँचा था, परन्तु वहाँ से निकलने के बाद वह बात दिमाग से ही निकल गई, और जब मैं अपनी बाईक साफ़ कर रहा था, तब मुझे याद आया, पर तब मैंने सोचा “भाड़ में जाए तस्वीर” और मैं अपने रास्ते हो लिया!!
Tarun
Koi baat nahi barista kahin bhaga to nahi ja reha, next time jab us gali se gujro tabhi sahi. (mai woh Tarun nahi jinse aap mile)
Canned !! — my Atropine
Bloggers’ Evening Out!!
I’ve been waiting for the evening of January 2nd, 2006, with great anticipation, for the 5th Delhi Bloggers’ Meet was scheduled for half past six in t…
Amit
बिलकुल सही कहा!! अंधेरा होने के बाद ही तस्वीर उतारूँगा, तब वाकई बढ़िया तस्वीर आती है!!
मैं जानता हूँ। आपसे यही कहूँगा कि यदि आपको हिन्दी में टिप्पणी करनी है तो कृपया अंग्रेज़ी की जगह देवनागरी लिपि में लिखें, वह आपके लिए अन्जानी नहीं है!!