तो फ़िर एक नया विवाद खड़ा हो गया है, लगता है कि हमारे यहाँ के राजनीतिक दलों को फ़ालतू के नए-नए विवाद खड़े करने के सिवाय कोई और काम नहीं है, वे बेकार के विवाद खड़े करते रहते हैं ताकि लोग वहीं उलझे रहें और आवश्यक मुद्दों(जैसे कि सरकार कैसे देश का बेड़ागर्क करने में लगी हुई है) की ओर ध्यान दे ही न पाएँ।
अब नया विवाद खड़ा हुआ है, सीपीएम सांसद वृंदा कारत ने प्रसिद्ध योग गुरू स्वामी रामदेव पर आरोप लगाया है कि उनकी हरिद्वार स्थित आयुर्वेदिक फ़ार्मेसी में बनने वाली दवाओं में पशु और मानव हड्डियों के चूर्ण आदि का प्रयोग होता है। जिन नमूनों को उन्होने सरकारी प्रयोगशालाओं को सौंपा है उनमे पशु और मानव हड्डियों के चूर्ण मिले भी हैं। परन्तु इस बात का क्या प्रमाण है कि उन नमूनों के साथ कोई छेड़खानी नहीं की गई? लगता है कि सरकार भी इसी तरह सोच रही है और उन्होने निर्णय लिया है कि वे अब स्वामी रामदेव के दवाखाने से ही नमूने लेकर जाँच करेंगे!!
जो लोग सोच रहे हो, उन्हे मैं स्पष्ट कर देना चाहूँगा कि मैं यहाँ किसी के पक्ष में नहीं हूँ, स्वामी रामदेव का न तो मैं कोई कार्यक्रम देखता हूँ न ही मैं उनका भक्त इत्यादि कुछ हूँ। और सीपीएम से भी मुझे कोई लगाव नहीं है। परन्तु बात यह है कि कल के हिन्दुस्तान टाईम्स में छपे समाचार अनुसार वृंदा कारत ने यह बयान दिया कि स्वामी रामदेव ने पशुओं आदि की हड्डियाँ इत्यादि प्रयोग करके हज़ारों लोगों का विश्वास तोड़ा है और कई शाकाहारियों के हृदयों को ठेस पहुँचाई है!!
इस पर मैं यही कहना चाहूँगा कि ऐसा शुद्ध शाकाहारी कौन है जिसने शाकाहार के अलावा कोई और आहार जीवन में लिया ही न हो? जहाँ तक मैं जानता हूँ, ऐसा मुमकिन ही नहीं है, क्योंकि दूध, घी इत्यादि का प्रयोग सभी करते हैं और ये शाकाहार तो नहीं हैं क्योंकि जहाँ तक मुझे ज्ञात है, दूध अभी भी गाय, भैंस और बकरी का ही प्रयोग होता है और पहाड़ी इलाकों में याक का भी दूध इस्तेमाल में लाया जाता है, और से सभी जीव शाक तो नहीं है, पशु हैं, तो इनका उत्पाद शाकाहारी कैसे हो सकता है? घी, पनीर, मक्खन इत्यादि दूध से ही बनते हैं, तो यकीनन वे भी शाकाहार तो नहीं कहलाए जा सकते!! और तो और, दही तभी जमता है जब बैक्टीरिया नामक जीवाणु गर्म दूध के साथ क्रिया करते हैं, तो ज़ाहिर सी बात है कि दही में बैक्टीरिया होता है जो कि निश्चय ही शाक तो नहीं है, और वह जीवित भी होता है!! साथ ही, अभी हाल ही में ऐसा समाचारों में आया था कि महाराष्ट्र में एक घी बनाने के कारखाने पर छापा पड़ा था जहाँ पर घी पशु चर्बी से बनाया जाता था और देश भर में बेचा जाता था जिसे लोग बिना किसी परेशानी के खाते और पचाते थे। यदि अभी भी बस नहीं तो वृंदा जी को यह जानना चाहिए कि वातावरण में कई प्रकार के जीवित जीवाणु और कीटाणु हैं जो कि हर पल हमारे श्वास के साथ हमारे शरीर के अंदर-बाहर होते रहते हैं और हमारे अंदर भी कई तरह के जीवाणु स्थायी रूप से रहते हैं जो कि हमारा भोजन पचाते हैं। तो शाकाहार को यहाँ मुद्दा बनाकर श्रीमती वृंदा अपनी रोटियाँ सेकने का प्रयत्न न ही करें तो बेहतर होगा।
जब अल्कोहल मिली ख़ाँसी-जुकाम की दवाईयाँ लेकर लोगों को तकलीफ़ नहीं है तो अब क्यों खुजली हो रही है? यदि स्वामी रामदेव की दवाओं से लोगों को लाभ हुआ है तो क्यों इस बात की परवाह की जाए कि उनमें हड्डियों का चूर्ण है या नहीं? यदि कोई बीमार है तो शाकाहार उसे ठीक करेगा या दवाई?
मैं यह नहीं कहता कि हड्डियों आदि का होना ठीक है या नहीं, यदि यह कानून के खिलाफ़ है तो फ़िर इसके ऊपर कार्यवाही होनी चाहिए, लेकिन असल मुद्दे को घुमा फ़िरा के कोई और रंग चढ़ा देना, यह तो हमारे राजनीतिज्ञों की पहचान है जो कि बहुत ही गिरी हुई हरकत है!!



4 Comments
Pratik Pandey
अमित जी, मैं आपकी बातों से पूर्णत: सहमत हूँ। जहाँ तक औषधियों की जाँच का सवाल है, केन्द्रिय स्वास्थ्य मन्त्री रामदौस द्वारा यह स्पष्ट कर दिया गया है कि वे दवाईयाँ ‘दिव्य फ़ार्मेसी’ की थीं। जबकि स्वामी रामदेव की फ़ार्मेसी का नाम ‘दिव्य योग फ़ार्मेसी’ है। इससे पहले भी उत्तरांचल सरकार ‘दिव्य योग फ़ार्मेसी’ द्वारा निर्मित दवाइयों की जाँच करवा चुकी है, जिसमें उन्हें मानकों के अनुरूप और किसी भी प्रकार की हड्डी से रहित घोषित किया गया था। वृन्दा करात जी का यह बयान सस्ती लोकप्रियता बटोरने का एक हथकण्डा मात्र है।
Amit
हड्डियाँ हैं या नहीं यह मैं नहीं जानता, और अभी नई जाँच के परिणाम भी सामने नहीं आए हैं परन्तु इस बात की पूरी संभावना है कि यह वाकई लोकप्रियता पाने की एक गिरी हुई हरकत है। सत्य तो यह है कि किसी व्यक्ति विशेष की बढ़ती लोकप्रियता इन राजनीतिज्ञों से पचाई नहीं जाती यदि वह व्यक्ति इनकी भी जेबें गर्म नहीं कर दे तो।
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भैया मैं ये नही मानता कि ये सस्ती लोकप्रियता बटोरने का असफल प्रयास है | बल्कि ये कहना सही होगा कि ये किसी की तेजी से बढती लोकप्रियता की गाडी का “वैकुम्” काटने की निन्दनीय कोशिश है |
मैं रामदेव जी को अक्सर सुनता हूँ | वही एक सन्त हैं जो बिना लाग-लपेट के बात कहते हैं | ढोंग ( परम्पारगत और आधुनिक , देशी व विदेशी , दोनो ) से सचेत करते रहते हैं | किसी भी चीज को रहस्यमय रखना उनकी प्रकृति में है ही नही |
एक दूसरी बात — ये वामपन्थी कब से शाकाहार और शाकाहारियों के हमदर्द हो गये ? सावधान ! कहीं शैतान शास्त्र की बात तो नहीं कर रहा ?
Amit
अनुनाद, अगर मान भी लिया जाए कि यह सस्ती लोकप्रियता पाने का असफल प्रयास नहीं है, तो भी यह बेकार का विवाद खड़ा करने का निन्दनीय प्रयास अवश्य है।
अब मैं इस बारे में कुछ नहीं कहना चाहूँगा, क्योंकि जितना मैंने देखा है, उस अनुभव का निचोड़ यही है कि जितने भी धर्म गुरू, सन्यासी, साधु आदि हैं वे सब ढ़ोंगी हैं। अब अगर कोई किसी को मानता है तो बेशक माने, वह उसका व्यक्तिगत निर्णय है!!
हम्म!!
एक बात और, यहाँ वर्डप्रेस के साथ अकिसमेट प्रयोग किया जा रहा है जो न जाने क्यों अंग्रेज़ी के अलावा दूसरी भाषा में की गई टिप्पणियों को “स्पैम” समझता है, तो इसलिए मुझे प्रत्येक टिप्पणी को सही करार देना पड़ता है, इसलिए यदि आपकी टिप्पणी पोस्ट करने के बाद दिखाई न दे तो सब्र रखें, दोबारा न पोस्ट करें!!