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	<title>Comments on: प्रवासी या परमेश्वर?</title>
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	<description>the world from my eyes in my language - दुनिया मेरी नज़र से मेरी भाषा में</description>
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		<title>By: Amit</title>
		<link>http://hindi.amitgupta.in/2006/01/09/nri-or-god/#comment-67</link>
		<dc:creator>Amit</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 20 Feb 2006 02:17:57 +0000</pubDate>
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		<description>रजनीश जी, लगता तो सही &quot;अप्रवासी&quot; ही है, परन्तु कहते प्रवासी हैं, यह भारत सरकार द्वारा प्रयोग किया जाने वाला शब्द है, इसलिए गलत तो हो ही नहीं सकता!! ;)

&lt;blockquote&gt;वैसे मैं पोस्ट पढ़ने में नारद से कम से कम डेढ़ महीना पीछे हूं। मुआफ़ कीजिए।&lt;/blockquote&gt;
कोई बात नहीं, हो जाता है। मैं भी अधिकतर ठीक ठाक सी लगने वाली रूचिकर पोस्ट ही पढ़ता हूँ, सारी पढ़ने का समय नहीं होता है। :)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>रजनीश जी, लगता तो सही &#8220;अप्रवासी&#8221; ही है, परन्तु कहते प्रवासी हैं, यह भारत सरकार द्वारा प्रयोग किया जाने वाला शब्द है, इसलिए गलत तो हो ही नहीं सकता!! <img src='http://hindi.amitgupta.in/wp-content/plugins/smilies-themer/ig_cool/icon_wink.gif' alt=';)' class='wp-smiley' /> </p>
<blockquote><p>वैसे मैं पोस्ट पढ़ने में नारद से कम से कम डेढ़ महीना पीछे हूं। मुआफ़ कीजिए।</p></blockquote>
<p>कोई बात नहीं, हो जाता है। मैं भी अधिकतर ठीक ठाक सी लगने वाली रूचिकर पोस्ट ही पढ़ता हूँ, सारी पढ़ने का समय नहीं होता है। <img src='http://hindi.amitgupta.in/wp-content/plugins/smilies-themer/ig_cool/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
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		<title>By: रजनीश मंगला</title>
		<link>http://hindi.amitgupta.in/2006/01/09/nri-or-god/#comment-66</link>
		<dc:creator>रजनीश मंगला</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 19 Feb 2006 22:47:14 +0000</pubDate>
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		<description>फ़िलहाल सिर्फ़ एक सवाल: देश के बाहर रहने वाले लोग प्रवासी होते हैं या अप्रवासी? मुझे लगता है ये अप्रवासी होना चाहिए। वैसे मैं पोस्ट पढ़ने में नारद से कम से कम डेढ़ महीना पीछे हूं। मुआफ़ कीजिए।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>फ़िलहाल सिर्फ़ एक सवाल: देश के बाहर रहने वाले लोग प्रवासी होते हैं या अप्रवासी? मुझे लगता है ये अप्रवासी होना चाहिए। वैसे मैं पोस्ट पढ़ने में नारद से कम से कम डेढ़ महीना पीछे हूं। मुआफ़ कीजिए।</p>
]]></content:encoded>
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		<title>By: Amit</title>
		<link>http://hindi.amitgupta.in/2006/01/09/nri-or-god/#comment-65</link>
		<dc:creator>Amit</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Jan 2006 19:49:05 +0000</pubDate>
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		<description>चलिये अनूप जी, आपके प्रश्नों का एक-एक करके उत्तर देता हूँ।
&lt;blockquote&gt;बॉलीवुड के सितारों द्वारा प्रस्तुत किए गए कार्यक्रमों को तो ये लोग दांत फ़ाड़ कर देख रहे थे&lt;/blockquote&gt;
यह सिर्फ़ उन दो लोगों के लिए नहीं था, यह उनके जैसी मानसिकता रखने वाले सभी लोगों की ओर था, अब यह मैं नहीं मान सकता कि इतने सारे लोगों में केवल दो-तीन ही इस तरह से असंतुष्ट थे, कुछ एक और भी होंगे, अब अख़बार वाले सभी के विचार तो नहीं छाप सकते ना!!

&lt;blockquote&gt;रईस(और बड़े व्यापारी) प्रवासी भारतीय यह समझते हों कि वे तोप हैं और यहाँ उनके साथ ईश्वरीय व्यवहार होना चाहिए, उन पर तो मैं थूकना भी नहीं चाहूँगा&lt;/blockquote&gt;
नहीं, कोई नहीं बोला थूकने को, मैं ज़रा ज्यादा जोश में आ गया था यह लिखते और पढ़ते समय!! :) इस वक्तव्य को पूरी गंभीरता से न लें, विशेषकर उस &quot;थूकने&quot; को!! ;) वह आक्षरिक अर्थ के लिए नहीं था!! :)

&lt;blockquote&gt;अमीर खासकर नवधनाड्य देसी हो या प्रवासी खुद को महान ही समझने के लिये अभिशप्त होता है इस व्यवहार में आश्चर्य कैसा?
कोई अगर बाहर से आया है तथा उसकी (जायज हो या नाजायज)अपेक्षायें पूरी नहीं हो सकीं तो अगर वह क्षोभ प्रकट करता है तो इसमें गलत क्या है भइये?&lt;/blockquote&gt;
मानता हूँ, लेकिन मेरे अनुभव में मैंने प्रवासी भारतीयों में ऐसा अधिक देखा है, अपने स्वयं के जीवन से मैं एक से ज्यादा उदाहरण दे सकता हूँ। और गलती क्षोभ प्रकट करने में नहीं है, गलती है ऐसी अपेक्षाएँ रखने में।

&lt;blockquote&gt;ये सवाल-जवाब तो यहां लिखे से किये गये। लेकिन भैया जितनी हिंदी हमें आती है उससे हमें तो यही लगा पढ़ने से कि यह पोस्ट प्रवासियों से चिढ़ दर्शाती है। लगता है कि दो लोगों से हुई बातचीत को आप सबके ऊपर फैला दिये।&lt;/blockquote&gt;
मैं पुनः कहूँगा कि मुझे प्रवासियों से कोई चिढ़ नहीं है, मुझे चिढ़ है उन प्रवासियों से जो ऐसी मानसिकता रखते हैं, और ऐसे बहुत से मिलेंगे भी, परन्तु बुराई के साथ अच्छाई भी होती है!! मेरा अनुभव कुछेक ऐसे प्रवासी भारतीयों के साथ भी रहा है जो विचारों से साधारण मनुष्य की भांति सोचते हैं। ज्यादातर प्रत्येक मनुष्य यह चाहता है कि वह अपूर्व आदर-सत्कार और यश को भोगे, परन्तु यदि वह अपनी मेहनत से कुछ ऐसा कार्य करके करना चाहता है जिसे लोग याद रखें तो वह जुदा बात है, परन्तु अपने प्रवासी होने के घमंड के तहत यह सोचना नैतिकता के मूल्यों के अनुसार ठीक नहीं है। इनमें और उन धार्मिक कट्टरपंथियों में क्या फ़र्क रह जाएगा, क्योंकि वे लोग भी कुछ ऐसी ही मानसिकता रखते हैं कि वे फ़लां धर्म को मानने वाले हैं इसलिए दूसरे धर्म के लोगों से श्रेष्ठ हैं!! हिटलर का भी तो यही मत प्रचार था कि आर्यन खून ही सर्वश्रेष्ठ है और उसे ही बाकी सब पर हुकूमत करने का अधिकार है!!

इसलिए यह कहना उचित नहीं कि मैंने दो लोगों से हुई बातचीत सब पर थोप दी, क्योंकि यह तो आप भी मानेंगे कि ऐसी मानसिकता वाले केवल दो-तीन ही लोग नहीं थे, प्रवासी भारतीय दिवस में भाग ले रहे मेहमानों में, और अख़बार वाले भी सभी का साक्षात्कार नहीं ले सकते थे।

&lt;blockquote&gt;बहरहाल यह हमारे विचार हैं जो सहमत हों उनका भी भला ,जो न सहमत हों उनका भी भला।&lt;/blockquote&gt;
तथास्तु!! :)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>चलिये अनूप जी, आपके प्रश्नों का एक-एक करके उत्तर देता हूँ।</p>
<blockquote><p>बॉलीवुड के सितारों द्वारा प्रस्तुत किए गए कार्यक्रमों को तो ये लोग दांत फ़ाड़ कर देख रहे थे</p></blockquote>
<p>यह सिर्फ़ उन दो लोगों के लिए नहीं था, यह उनके जैसी मानसिकता रखने वाले सभी लोगों की ओर था, अब यह मैं नहीं मान सकता कि इतने सारे लोगों में केवल दो-तीन ही इस तरह से असंतुष्ट थे, कुछ एक और भी होंगे, अब अख़बार वाले सभी के विचार तो नहीं छाप सकते ना!!</p>
<blockquote><p>रईस(और बड़े व्यापारी) प्रवासी भारतीय यह समझते हों कि वे तोप हैं और यहाँ उनके साथ ईश्वरीय व्यवहार होना चाहिए, उन पर तो मैं थूकना भी नहीं चाहूँगा</p></blockquote>
<p>नहीं, कोई नहीं बोला थूकने को, मैं ज़रा ज्यादा जोश में आ गया था यह लिखते और पढ़ते समय!! <img src='http://hindi.amitgupta.in/wp-content/plugins/smilies-themer/ig_cool/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> इस वक्तव्य को पूरी गंभीरता से न लें, विशेषकर उस &#8220;थूकने&#8221; को!! <img src='http://hindi.amitgupta.in/wp-content/plugins/smilies-themer/ig_cool/icon_wink.gif' alt=';)' class='wp-smiley' /> वह आक्षरिक अर्थ के लिए नहीं था!! <img src='http://hindi.amitgupta.in/wp-content/plugins/smilies-themer/ig_cool/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<blockquote><p>अमीर खासकर नवधनाड्य देसी हो या प्रवासी खुद को महान ही समझने के लिये अभिशप्त होता है इस व्यवहार में आश्चर्य कैसा?<br />
कोई अगर बाहर से आया है तथा उसकी (जायज हो या नाजायज)अपेक्षायें पूरी नहीं हो सकीं तो अगर वह क्षोभ प्रकट करता है तो इसमें गलत क्या है भइये?</p></blockquote>
<p>मानता हूँ, लेकिन मेरे अनुभव में मैंने प्रवासी भारतीयों में ऐसा अधिक देखा है, अपने स्वयं के जीवन से मैं एक से ज्यादा उदाहरण दे सकता हूँ। और गलती क्षोभ प्रकट करने में नहीं है, गलती है ऐसी अपेक्षाएँ रखने में।</p>
<blockquote><p>ये सवाल-जवाब तो यहां लिखे से किये गये। लेकिन भैया जितनी हिंदी हमें आती है उससे हमें तो यही लगा पढ़ने से कि यह पोस्ट प्रवासियों से चिढ़ दर्शाती है। लगता है कि दो लोगों से हुई बातचीत को आप सबके ऊपर फैला दिये।</p></blockquote>
<p>मैं पुनः कहूँगा कि मुझे प्रवासियों से कोई चिढ़ नहीं है, मुझे चिढ़ है उन प्रवासियों से जो ऐसी मानसिकता रखते हैं, और ऐसे बहुत से मिलेंगे भी, परन्तु बुराई के साथ अच्छाई भी होती है!! मेरा अनुभव कुछेक ऐसे प्रवासी भारतीयों के साथ भी रहा है जो विचारों से साधारण मनुष्य की भांति सोचते हैं। ज्यादातर प्रत्येक मनुष्य यह चाहता है कि वह अपूर्व आदर-सत्कार और यश को भोगे, परन्तु यदि वह अपनी मेहनत से कुछ ऐसा कार्य करके करना चाहता है जिसे लोग याद रखें तो वह जुदा बात है, परन्तु अपने प्रवासी होने के घमंड के तहत यह सोचना नैतिकता के मूल्यों के अनुसार ठीक नहीं है। इनमें और उन धार्मिक कट्टरपंथियों में क्या फ़र्क रह जाएगा, क्योंकि वे लोग भी कुछ ऐसी ही मानसिकता रखते हैं कि वे फ़लां धर्म को मानने वाले हैं इसलिए दूसरे धर्म के लोगों से श्रेष्ठ हैं!! हिटलर का भी तो यही मत प्रचार था कि आर्यन खून ही सर्वश्रेष्ठ है और उसे ही बाकी सब पर हुकूमत करने का अधिकार है!!</p>
<p>इसलिए यह कहना उचित नहीं कि मैंने दो लोगों से हुई बातचीत सब पर थोप दी, क्योंकि यह तो आप भी मानेंगे कि ऐसी मानसिकता वाले केवल दो-तीन ही लोग नहीं थे, प्रवासी भारतीय दिवस में भाग ले रहे मेहमानों में, और अख़बार वाले भी सभी का साक्षात्कार नहीं ले सकते थे।</p>
<blockquote><p>बहरहाल यह हमारे विचार हैं जो सहमत हों उनका भी भला ,जो न सहमत हों उनका भी भला।</p></blockquote>
<p>तथास्तु!! <img src='http://hindi.amitgupta.in/wp-content/plugins/smilies-themer/ig_cool/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: अनूप शुक्ला</title>
		<link>http://hindi.amitgupta.in/2006/01/09/nri-or-god/#comment-64</link>
		<dc:creator>अनूप शुक्ला</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Jan 2006 12:11:44 +0000</pubDate>
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		<description>बड़ा धांसू लेख लिखा है भाई। कुछ बातें जो समझ में नहीं आईं वे हैं:-
चूंकि आपने लिख ही दिया कि आपको प्रवासी भारतीयों से कोई चिढ़ नहीं है तो फिर यह किसके लिये लिखा?
&lt;strong&gt;बॉलीवुड के सितारों द्वारा प्रस्तुत किए गए कार्यक्रमों को तो ये लोग दांत फ़ाड़ कर देख रहे थे&lt;/strong&gt;
सब प्रवासियों के लिये या फिर केवल उन दो के लिये जिनका जिक्र ऊपर हुआ?

आपने लिखा कि :
&lt;strong&gt;
रईस(और बड़े व्यापारी) प्रवासी भारतीय यह समझते हों कि वे तोप हैं और यहाँ उनके साथ ईश्वरीय व्यवहार होना चाहिए, उन पर तो मैं थूकना भी नहीं चाहूँगा&lt;/strong&gt;

कोई वहां बोला क्या वहां थूकने को?

अमीर खासकर नवधनाड्य देसी हो या प्रवासी खुद को महान ही समझने के लिये अभिशप्त होता है इस व्यवहार में आश्चर्य कैसा?
कोई अगर बाहर से आया है तथा उसकी (जायज हो या नाजायज)अपेक्षायें पूरी नहीं हो सकीं तो अगर वह क्षोभ प्रकट करता है तो इसमें गलत क्या है भइये?
जैसेआप यहां कहे&lt;strong&gt; क्या आप किसी मंत्री के सामने उसके मुख पर यह कह सकते हैं कि वह आपका नौकर है?&lt;/strong&gt;

तो क्या इसी तर्ज पर आप उन दो प्रवासियों से पूछताछ किये क्या -कि क्या बोलता तू?
ये सवाल-जवाब तो यहां लिखे से किये गये। लेकिन भैया जितनी हिंदी हमें आती है उससे हमें तो यही लगा पढ़ने से कि यह पोस्ट प्रवासियों से चिढ़ दर्शाती है। लगता है कि दो लोगों से हुई बातचीत को आप सबके ऊपर फैला दिये। बहरहाल यह हमारे विचार हैं जो सहमत हों उनका भी भला ,जो न सहमत हों उनका भी भला।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बड़ा धांसू लेख लिखा है भाई। कुछ बातें जो समझ में नहीं आईं वे हैं:-<br />
चूंकि आपने लिख ही दिया कि आपको प्रवासी भारतीयों से कोई चिढ़ नहीं है तो फिर यह किसके लिये लिखा?<br />
<strong>बॉलीवुड के सितारों द्वारा प्रस्तुत किए गए कार्यक्रमों को तो ये लोग दांत फ़ाड़ कर देख रहे थे</strong><br />
सब प्रवासियों के लिये या फिर केवल उन दो के लिये जिनका जिक्र ऊपर हुआ?</p>
<p>आपने लिखा कि :<br />
<strong><br />
रईस(और बड़े व्यापारी) प्रवासी भारतीय यह समझते हों कि वे तोप हैं और यहाँ उनके साथ ईश्वरीय व्यवहार होना चाहिए, उन पर तो मैं थूकना भी नहीं चाहूँगा</strong></p>
<p>कोई वहां बोला क्या वहां थूकने को?</p>
<p>अमीर खासकर नवधनाड्य देसी हो या प्रवासी खुद को महान ही समझने के लिये अभिशप्त होता है इस व्यवहार में आश्चर्य कैसा?<br />
कोई अगर बाहर से आया है तथा उसकी (जायज हो या नाजायज)अपेक्षायें पूरी नहीं हो सकीं तो अगर वह क्षोभ प्रकट करता है तो इसमें गलत क्या है भइये?<br />
जैसेआप यहां कहे<strong> क्या आप किसी मंत्री के सामने उसके मुख पर यह कह सकते हैं कि वह आपका नौकर है?</strong></p>
<p>तो क्या इसी तर्ज पर आप उन दो प्रवासियों से पूछताछ किये क्या -कि क्या बोलता तू?<br />
ये सवाल-जवाब तो यहां लिखे से किये गये। लेकिन भैया जितनी हिंदी हमें आती है उससे हमें तो यही लगा पढ़ने से कि यह पोस्ट प्रवासियों से चिढ़ दर्शाती है। लगता है कि दो लोगों से हुई बातचीत को आप सबके ऊपर फैला दिये। बहरहाल यह हमारे विचार हैं जो सहमत हों उनका भी भला ,जो न सहमत हों उनका भी भला।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Amit</title>
		<link>http://hindi.amitgupta.in/2006/01/09/nri-or-god/#comment-63</link>
		<dc:creator>Amit</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 10 Jan 2006 11:09:07 +0000</pubDate>
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		<description>&lt;blockquote&gt;अप्रवासी भारतीय को अगर आपने बुलाया है, और वह अपने खर्चे से आया है तो उससे मेजबान की तरह पेश आओ. उसके समय की कद्र करो.&lt;/blockquote&gt;
कालीचरण, मैं यह नहीं मान सकता कि पधारे हुए प्रवासी भारतीयों के सत्कार में कोई कमी रखी गई होगी, क्यों कि यदि उनका सही सत्कार नहीं किया गया होता तो सिर्फ़ एक दो लोग ही नहीं बोलते, बहुत से लोग विरोध में बोलने आगे आते!! लेकिन बात यह है कि कितना भी कर दो, कुछ लोगों को तो फ़िर भी ख़ुजली होती ही है!!

&lt;blockquote&gt;पहले से ही कार्यक्रम तय करो और प्रोफेशनल तरीके से पूरा कार्यक्रम चलाओ&lt;/blockquote&gt;
यह बात भी गले से नीचे नहीं उतरती कि कोई समय सारिणी बनाए बिना ही कार्यक्रम हुए जा रहे हैं। यह कहना ही अत्यधिक हास्यपद लगता है क्योंकि यह किसी गली मोहल्ले की चौपाल आदि नहीं हो रही बल्कि प्रवासी भारतीय दिवस मनाया जा रहा है जिस पर भारतीय मीडिया के साथ साथ अंतर्राष्ट्रीय मीडिया की निगाहें भी टिकी हुई हैं और ऐसी किसी भी तरह की गड़बड़ भारतीय प्रशासन के लिए बड़ी हास्यप्रद हो सकती है और प्रशासन चाहे कितना भी निकम्मा क्यों न हो, जग हसाई से वह भी घबराता है!! :)


&lt;blockquote&gt;एक गलती की ओर ध्यान दिलाना चाहुंगा, आपने कीसी होटेल के vice-president का अनुवाद “उप-राष्ट्रपति” कर दिया है जो इस संदर्भ मे सही नही है. उचित होता कि आप “उपाध्यक्ष” का प्रयोग करते.&lt;/blockquote&gt;
आशीष, भूल स्वीकार है, इसके लिए मुझे खेद है और इस बारे में बताने का धन्यवाद!! जल्दी जल्दी लिखने में कभी कभी भूल-चूक हो जाती है, लेकिन मैंने भूल सुधार ली है!! :)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p>अप्रवासी भारतीय को अगर आपने बुलाया है, और वह अपने खर्चे से आया है तो उससे मेजबान की तरह पेश आओ. उसके समय की कद्र करो.</p></blockquote>
<p>कालीचरण, मैं यह नहीं मान सकता कि पधारे हुए प्रवासी भारतीयों के सत्कार में कोई कमी रखी गई होगी, क्यों कि यदि उनका सही सत्कार नहीं किया गया होता तो सिर्फ़ एक दो लोग ही नहीं बोलते, बहुत से लोग विरोध में बोलने आगे आते!! लेकिन बात यह है कि कितना भी कर दो, कुछ लोगों को तो फ़िर भी ख़ुजली होती ही है!!</p>
<blockquote><p>पहले से ही कार्यक्रम तय करो और प्रोफेशनल तरीके से पूरा कार्यक्रम चलाओ</p></blockquote>
<p>यह बात भी गले से नीचे नहीं उतरती कि कोई समय सारिणी बनाए बिना ही कार्यक्रम हुए जा रहे हैं। यह कहना ही अत्यधिक हास्यपद लगता है क्योंकि यह किसी गली मोहल्ले की चौपाल आदि नहीं हो रही बल्कि प्रवासी भारतीय दिवस मनाया जा रहा है जिस पर भारतीय मीडिया के साथ साथ अंतर्राष्ट्रीय मीडिया की निगाहें भी टिकी हुई हैं और ऐसी किसी भी तरह की गड़बड़ भारतीय प्रशासन के लिए बड़ी हास्यप्रद हो सकती है और प्रशासन चाहे कितना भी निकम्मा क्यों न हो, जग हसाई से वह भी घबराता है!! <img src='http://hindi.amitgupta.in/wp-content/plugins/smilies-themer/ig_cool/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<blockquote><p>एक गलती की ओर ध्यान दिलाना चाहुंगा, आपने कीसी होटेल के vice-president का अनुवाद “उप-राष्ट्रपति” कर दिया है जो इस संदर्भ मे सही नही है. उचित होता कि आप “उपाध्यक्ष” का प्रयोग करते.</p></blockquote>
<p>आशीष, भूल स्वीकार है, इसके लिए मुझे खेद है और इस बारे में बताने का धन्यवाद!! जल्दी जल्दी लिखने में कभी कभी भूल-चूक हो जाती है, लेकिन मैंने भूल सुधार ली है!! <img src='http://hindi.amitgupta.in/wp-content/plugins/smilies-themer/ig_cool/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: आशीष</title>
		<link>http://hindi.amitgupta.in/2006/01/09/nri-or-god/#comment-62</link>
		<dc:creator>आशीष</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 10 Jan 2006 10:38:07 +0000</pubDate>
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		<description>अमित,

एक गलती की ओर ध्यान दिलाना चाहुंगा, आपने कीसी होटेल के vice-president का अनुवाद &quot;उप-राष्ट्रपति&quot; कर दिया है जो इस संदर्भ मे सही नही है. उचित होता कि आप &quot;उपाध्यक्ष&quot; का प्रयोग करते.
हम लोग भारतिय राष्ट्रपति का अंग्रेजी अनुवाद President कर देते है जो कि गलत होता है, president का पर्यायवाची शब्द &quot;अध्यक्ष&quot; होना चाहिये ना कि &quot;राष्ट्रपति&quot;
आशीष</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अमित,</p>
<p>एक गलती की ओर ध्यान दिलाना चाहुंगा, आपने कीसी होटेल के vice-president का अनुवाद &#8220;उप-राष्ट्रपति&#8221; कर दिया है जो इस संदर्भ मे सही नही है. उचित होता कि आप &#8220;उपाध्यक्ष&#8221; का प्रयोग करते.<br />
हम लोग भारतिय राष्ट्रपति का अंग्रेजी अनुवाद President कर देते है जो कि गलत होता है, president का पर्यायवाची शब्द &#8220;अध्यक्ष&#8221; होना चाहिये ना कि &#8220;राष्ट्रपति&#8221;<br />
आशीष</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: kali</title>
		<link>http://hindi.amitgupta.in/2006/01/09/nri-or-god/#comment-61</link>
		<dc:creator>kali</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 10 Jan 2006 04:27:46 +0000</pubDate>
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		<description>मित्र बात सीधी सी है. अप्रवासी भारतीय को अगर  आपने बुलाया है, और वह अपने खर्चे से आया है तो उससे मेजबान की तरह पेश आओ. उसके समय की कद्र करो. पहले से ही कार्यक्रम तय करो और प्रोफेशनल तरीके से पूरा कार्यक्रम चलाओ. अगर  आपने पहले से पूरी समय-सारिणी बना कर रख दी है तो फिर उसको बता दो कि भैया सब कुछ जैसा बोला वैसा किया.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मित्र बात सीधी सी है. अप्रवासी भारतीय को अगर  आपने बुलाया है, और वह अपने खर्चे से आया है तो उससे मेजबान की तरह पेश आओ. उसके समय की कद्र करो. पहले से ही कार्यक्रम तय करो और प्रोफेशनल तरीके से पूरा कार्यक्रम चलाओ. अगर  आपने पहले से पूरी समय-सारिणी बना कर रख दी है तो फिर उसको बता दो कि भैया सब कुछ जैसा बोला वैसा किया.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Amit</title>
		<link>http://hindi.amitgupta.in/2006/01/09/nri-or-god/#comment-60</link>
		<dc:creator>Amit</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 09 Jan 2006 21:18:53 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://hindi.amitgupta.in/2006/01/09/nri-or-god/#comment-60</guid>
		<description>&lt;blockquote&gt;पर आपका लेख पढ़कर लगा कि अभी बहुत से भारतवासी उसी मानसिकता मे जी रहे हैं कि हम अप्रवासी गद्दार हैं, चँद डालरो के लिये जननी जन्मभूमी को छोड़ दिया हमने।&lt;/blockquote&gt;
ऐसा मैंने कब कहा? मैं प्रवासी भारतीयों के विरुद्ध नहीं हूँ, जिसको जहाँ जीविका मिलेगी वह वहाँ तो जाएगा ही। मेरे एक ताउजी और उनका परिवार भी लगभग तीन दशकों से विदेश में रह रहा है, उनके बच्चे भी वहीं पैदा हुए। मुझे क्षोभ नहीं है, और मुझे प्रवासी भारतीयों पर क्रोध भी नहीं है। मैं केवल अपना क्रोध उन प्रवासी भारतीयों पर प्रकट कर रहा था जो कि विदेश में जाकर बहुत पैसे वाले बन गए और यहाँ भारत आने पर यह सोचते हैं कि उन्हे विशिष्ट आदर सत्कार मिलना चाहिए जैसे वे अन्य भारतीयों से अधिक ऊँचे हो गए हों। यह सोच बिलकुल उसी सोच से मेल खाती है जोकि अंग्रेज़ी शासन में अंग्रेज़ अधिकारियों के भारतीय चाटुकारों की होती थी क्यों कि वे भी अपने को आम हिन्दुस्तानियों से ऊपर समझते थे!! यही मैंने अपने लेख में लिखा जिसे आप अनदेखा करते हुए केवल मेरे क्रोध को पकड़ कर बैठ गए!! ;) मेरे लेख का अन्तिम परिच्छेद दोबारा पढ़ेंगे तो समझ जाएँगे कि मैं क्या कहना चाह रहा हूँ।

&lt;blockquote&gt;अगर आज एक आप्रवासी भारत में काम धँधा शुरू करना चहे तो इसमें गलत क्या है? कम लागत तो यूक्रेन और ब्राजील में भी मिलती है, वहाँ पर ये आप्रवासी भारतीय आऊटसोर्सिंग कर लेते बजाये भारत के तो भी चिल्लपों मचाते कि नही आप देशभक्त महापुरुष लोग?&lt;/blockquote&gt;
बात पुनः वहीं अटकती है कि मैं प्रवासी भारतीयों के विरुद्ध नहीं हूँ, लेकिन उन लोगों से मुझे अवश्य चिढ़ मचती है जो कि देश के लिए कुछ करते तो नहीं पर प्रशासन आदि के बारे में फ़ब्तियाँ कसने में सबसे आगे होते हैं। स्कूल में मैंने पढ़ा था कि एक व्यक्ति के कुछ हक होते हैं और कुछ कर्तव्य, परन्तु इससे पहले व्यक्ति अपने हक जताने का अधिकारी बनें, उसे अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए, क्योंकि वह अपने कर्तव्यों का पालन करने के बाद ही अपने हक जताने का अधिकारी हो सकता है।

&lt;blockquote&gt;Bhaiye maaf karna phir se roman me likh reha hoon. Hindi me likhna ghar se hi ho pata hai.&lt;/blockquote&gt;
तो अंग्रेज़ी में लिख देते यार, रोमन में हिन्दी लिख कर क्यों मेरे ब्लॉग को दूषित कर रहे हो? ;) और हिन्दी लिखने के लिए आप इस &lt;a href=&quot;http://hindikeyboard.indiapress.org/&quot; rel=&quot;nofollow&quot;&gt;आनलाईन कीबोर्ड&lt;/a&gt; का प्रयोग कर सकते हो, या &lt;a href=&quot;http://www.hindini.com/tool/hug2.html&quot; rel=&quot;nofollow&quot;&gt;इस औज़ार&lt;/a&gt; का प्रयोग भी कर सकते हो!! :)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p>पर आपका लेख पढ़कर लगा कि अभी बहुत से भारतवासी उसी मानसिकता मे जी रहे हैं कि हम अप्रवासी गद्दार हैं, चँद डालरो के लिये जननी जन्मभूमी को छोड़ दिया हमने।</p></blockquote>
<p>ऐसा मैंने कब कहा? मैं प्रवासी भारतीयों के विरुद्ध नहीं हूँ, जिसको जहाँ जीविका मिलेगी वह वहाँ तो जाएगा ही। मेरे एक ताउजी और उनका परिवार भी लगभग तीन दशकों से विदेश में रह रहा है, उनके बच्चे भी वहीं पैदा हुए। मुझे क्षोभ नहीं है, और मुझे प्रवासी भारतीयों पर क्रोध भी नहीं है। मैं केवल अपना क्रोध उन प्रवासी भारतीयों पर प्रकट कर रहा था जो कि विदेश में जाकर बहुत पैसे वाले बन गए और यहाँ भारत आने पर यह सोचते हैं कि उन्हे विशिष्ट आदर सत्कार मिलना चाहिए जैसे वे अन्य भारतीयों से अधिक ऊँचे हो गए हों। यह सोच बिलकुल उसी सोच से मेल खाती है जोकि अंग्रेज़ी शासन में अंग्रेज़ अधिकारियों के भारतीय चाटुकारों की होती थी क्यों कि वे भी अपने को आम हिन्दुस्तानियों से ऊपर समझते थे!! यही मैंने अपने लेख में लिखा जिसे आप अनदेखा करते हुए केवल मेरे क्रोध को पकड़ कर बैठ गए!! <img src='http://hindi.amitgupta.in/wp-content/plugins/smilies-themer/ig_cool/icon_wink.gif' alt=';)' class='wp-smiley' /> मेरे लेख का अन्तिम परिच्छेद दोबारा पढ़ेंगे तो समझ जाएँगे कि मैं क्या कहना चाह रहा हूँ।</p>
<blockquote><p>अगर आज एक आप्रवासी भारत में काम धँधा शुरू करना चहे तो इसमें गलत क्या है? कम लागत तो यूक्रेन और ब्राजील में भी मिलती है, वहाँ पर ये आप्रवासी भारतीय आऊटसोर्सिंग कर लेते बजाये भारत के तो भी चिल्लपों मचाते कि नही आप देशभक्त महापुरुष लोग?</p></blockquote>
<p>बात पुनः वहीं अटकती है कि मैं प्रवासी भारतीयों के विरुद्ध नहीं हूँ, लेकिन उन लोगों से मुझे अवश्य चिढ़ मचती है जो कि देश के लिए कुछ करते तो नहीं पर प्रशासन आदि के बारे में फ़ब्तियाँ कसने में सबसे आगे होते हैं। स्कूल में मैंने पढ़ा था कि एक व्यक्ति के कुछ हक होते हैं और कुछ कर्तव्य, परन्तु इससे पहले व्यक्ति अपने हक जताने का अधिकारी बनें, उसे अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए, क्योंकि वह अपने कर्तव्यों का पालन करने के बाद ही अपने हक जताने का अधिकारी हो सकता है।</p>
<blockquote><p>Bhaiye maaf karna phir se roman me likh reha hoon. Hindi me likhna ghar se hi ho pata hai.</p></blockquote>
<p>तो अंग्रेज़ी में लिख देते यार, रोमन में हिन्दी लिख कर क्यों मेरे ब्लॉग को दूषित कर रहे हो? <img src='http://hindi.amitgupta.in/wp-content/plugins/smilies-themer/ig_cool/icon_wink.gif' alt=';)' class='wp-smiley' /> और हिन्दी लिखने के लिए आप इस <a href="http://hindikeyboard.indiapress.org/" rel="nofollow">आनलाईन कीबोर्ड</a> का प्रयोग कर सकते हो, या <a href="http://www.hindini.com/tool/hug2.html" rel="nofollow">इस औज़ार</a> का प्रयोग भी कर सकते हो!! <img src='http://hindi.amitgupta.in/wp-content/plugins/smilies-themer/ig_cool/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: Tarun</title>
		<link>http://hindi.amitgupta.in/2006/01/09/nri-or-god/#comment-59</link>
		<dc:creator>Tarun</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 09 Jan 2006 20:31:10 +0000</pubDate>
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		<description>Bhaiye maaf karna phir se roman me likh reha hoon. Hindi me likhna ghar se hi ho pata hai. Baat bilkul sahi hai videsho me aam nagrik ki terah rehne me koi problem nahi lekin India Aate hi apne ko VIP kyon samajhne lagte hain ye baat apne bhi kabhi samajh nahi aayi. Aur agar jyada hi problem hai to India jaaate hi kaahe ho. Koi to unhe samajhaye. Kaaran simple hai dil ke kisi kone me darr abhi bhi bana hai ki kya pata kab deshnikala mil jaaye videsh se.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>Bhaiye maaf karna phir se roman me likh reha hoon. Hindi me likhna ghar se hi ho pata hai. Baat bilkul sahi hai videsho me aam nagrik ki terah rehne me koi problem nahi lekin India Aate hi apne ko VIP kyon samajhne lagte hain ye baat apne bhi kabhi samajh nahi aayi. Aur agar jyada hi problem hai to India jaaate hi kaahe ho. Koi to unhe samajhaye. Kaaran simple hai dil ke kisi kone me darr abhi bhi bana hai ki kya pata kab deshnikala mil jaaye videsh se.</p>
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		<title>By: Atul</title>
		<link>http://hindi.amitgupta.in/2006/01/09/nri-or-god/#comment-58</link>
		<dc:creator>Atul</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 09 Jan 2006 15:52:09 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://hindi.amitgupta.in/2006/01/09/nri-or-god/#comment-58</guid>
		<description>अमित
आपकी बात में क्षोभ तो दिख रहा है, क्रोध भी दिख रहा है पर किस बात पर , समझ नही पा रहा। यार एक दो लोगो की बात छोड़ो। जो कुछेक अच्छी बाते इधर देखी ,सुनी वह यह थी कि दोहरी नागरिकता शुरू हुई, हवाई अड्डो पर कस्टम वालो की उजड्डता खत्म हुई, पंजाब में सन आफ पँजाब नाम से एक खिड़की निवेश योजना शुरू हुई। उत्तर प्रदेश सरकार ने भी अनिवासियों को उनके पुरखो के गाँव से जोड़ने की योजना शुरू की। पर आपका लेख पढ़कर लगा कि अभी बहुत से भारतवासी उसी मानसिकता मे जी रहे हैं कि हम अप्रवासी गद्दार हैं,  चँद डालरो के लिये जननी जन्मभूमी को छोड़ दिया हमने। बँधु यह सब चीजे पैमेने से तय होने लगे तो अपना प्रदेश छोड़ के हैदराबाद और बैंगलोर जा बसे कनपुरिये और नागपुरिये भी गद्दार कहलाने चाहिये कि नहीं? आखिर उन प्रदेशों ने किसी का क्या बिगाड़ा है? बात फकत इतनी है कि जहाँ जिसको जीविका के अच्छे मौके मिलते हैं वहाँ वह जाता है। अगर आज एक आप्रवासी भारत में काम धँधा शुरू करना चहे तो इसमें गलत क्या है? कम लागत तो यूक्रेन और ब्राजील में भी मिलती है, वहाँ पर ये आप्रवासी भारतीय आऊटसोर्सिंग कर लेते बजाये भारत के तो भी चिल्लपों मचाते कि नही आप देशभक्त महापुरुष लोग?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अमित<br />
आपकी बात में क्षोभ तो दिख रहा है, क्रोध भी दिख रहा है पर किस बात पर , समझ नही पा रहा। यार एक दो लोगो की बात छोड़ो। जो कुछेक अच्छी बाते इधर देखी ,सुनी वह यह थी कि दोहरी नागरिकता शुरू हुई, हवाई अड्डो पर कस्टम वालो की उजड्डता खत्म हुई, पंजाब में सन आफ पँजाब नाम से एक खिड़की निवेश योजना शुरू हुई। उत्तर प्रदेश सरकार ने भी अनिवासियों को उनके पुरखो के गाँव से जोड़ने की योजना शुरू की। पर आपका लेख पढ़कर लगा कि अभी बहुत से भारतवासी उसी मानसिकता मे जी रहे हैं कि हम अप्रवासी गद्दार हैं,  चँद डालरो के लिये जननी जन्मभूमी को छोड़ दिया हमने। बँधु यह सब चीजे पैमेने से तय होने लगे तो अपना प्रदेश छोड़ के हैदराबाद और बैंगलोर जा बसे कनपुरिये और नागपुरिये भी गद्दार कहलाने चाहिये कि नहीं? आखिर उन प्रदेशों ने किसी का क्या बिगाड़ा है? बात फकत इतनी है कि जहाँ जिसको जीविका के अच्छे मौके मिलते हैं वहाँ वह जाता है। अगर आज एक आप्रवासी भारत में काम धँधा शुरू करना चहे तो इसमें गलत क्या है? कम लागत तो यूक्रेन और ब्राजील में भी मिलती है, वहाँ पर ये आप्रवासी भारतीय आऊटसोर्सिंग कर लेते बजाये भारत के तो भी चिल्लपों मचाते कि नही आप देशभक्त महापुरुष लोग?</p>
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