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Archive for January, 2006


एक शाम ब्लॉगर्स के साथ!!


January 2nd, 2006 | 5 Comments

आज की शाम मैंने पहली बार दिल्ली ब्लॉगर्स की मासिक भेंटवार्ता में भाग लिया। और शायद आज मौसम भी कुछ अधिक ही कृपालु था कि सुबह से ही बरसने को तैयार था। जैसे ही मैं सवा छह बजे निकलने को हुआ, अचानक बारिश चालू हो गई। कुछ देर बाद जब आकाश ने बरसना बंद किया तो मैंने शुक्र मनाया और कनॉट प्लेस की ओर निकल पड़ा। रास्ते में दो-तीन बार हल्की बौछार तो पड़ी लेकिन मैं ढृढ़ निश्चय के साथ आगे बढ़ता रहा। दिमाग मेरा तब खराब हो गया जब लक्ष्मी-नारायण मंदिर की ओर मुड़ते ही जैसे आसमान फ़ट पड़ा और तेज़ बारिश शुरु हो गई, जय हो लक्ष्मी-नारायण!! फ़िर भी मैं निर्विकार आगे बढ़ता रहा और गोल मार्किट, बंगला साहिब होता हुआ कनॉट प्लेस पहुँचा। चूँकि मुझे ज्ञात नहीं था कि “बरिस्ता” कहाँ है, मैं बाहरी परिधि की परिक्रमा करने लगा। रूबी ट्यूसडे के बाद आया फ़ेडरल बैंक और उसके बाद मुझे आखिरकार दिखाई पड़ा “बरिस्ता”!! :) आख़िरकार मैं पहुँच ही गया, तब तक बारिश भी थम चुकी थी, पर मैं पूरा भीग चुका था और मेरी पतलून थोड़ी गंदी भी हो चुकी थी। ख़ैर, मैंने अपनी मोटरसाईकिल पार्किंग में खड़ी की, और सीट के नीचे से एक सूखा कपड़ा निकाल कर अपना बैग और हैलमेट और अपने कपड़ों को पोंछा(लगता है कि मुझे एक गाड़ी लेनी ही पड़ेगी)। मैं एक घंटा देरी से पहुँचा था, तो इसलिए बिना अधिक विलम्ब किए मैं “बरिस्ता” की ओर लपका।

अंदर द्वार के निकट ही दो टेबलों को जोड़ कर एक झुंड बैठा था, मुझे लगा कि शायद ये ही वे लोग हैं, तो मैंने एक से पूछा कि क्या वे दिल्ली ब्लॉगर्स भेंटवार्ता के लिए आए हैं। उत्तर हाँ में मिला तो मुझे थोड़ी राहत महसूस हुई(कि मुझे इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा)। जिन महोदय से मैंने प्रश्न किया था वे और कोई नहीं बल्कि आज शाम के मेज़बान शिवम विज थे। और शिवम ने फ़िर मेरा परिचय अन्य लोगों से कराया परन्तु मेरा ध्यान एक लम्बे बालों वाले व्यक्ति की ओर गया और मुझे यह जानकर थोड़ा आश्चर्य हुआ कि वे शाम के ख़ास मेहमान, इंडिया अनकट ख़्याति प्राप्त ब्लॉगर अमित वर्मा हैं। पहली छाप ही बड़ी कूल थी, और बातों से तो अमित और भी समझदार लगे!! ;) फ़िर मेरा ध्यान एक और “कूल” से दिखने वाले शख्स की ओर गया और परिचय के बाद पता चला कि वे हैं तरूण जो कि टीटीजी(TTG) के उपनाम से जाने जाते हैं। और भी ब्लॉगर बिरादरी के मेंम्बरान से परिचय हुआ जिनमें थी ऐश्वर्या तथा दो और लड़कियाँ जिनके नाम मैं पकड़ नहीं पाया। तत्पश्चात मुलाकात हुई साकेत से और कुछ अन्य ब्लॉगर बंधुओं से।

मैंने अपनी मनपसन्द मिंट चॉकलेट का मग लिया और बैठ गया शिवम और अमित के साथ बातें करने(और किसलिए इकठ्ठा हुए थे हम)!! मुझे यह सुनकर कोई आश्चार्य नहीं हुआ जब शिवम ने बताया कि वह सोचे बैठे थे कि चूँकि डिजिट ब्लॉग का एक ब्लॉगर हूँ, मैं डिजिट पत्रिका की ओर से आया हूँ। फ़िर हम दोनों के बीच एक लघु विवाद आरम्भ हुआ कि हमें यह बात पाठकों पर ज़ाहिर कर देनी चाहिए कि हम डिजिट पत्रिका से कोई वास्ता नहीं रखते हैं, तो मैंने साफ़ कर दिया कि हमने ऐसा अपने बारे में लिख रख़ा है और एक अस्वीकरण भी लगा रख़ा है जिनकी कड़ियाँ ब्लॉग के हर पन्ने पर सबसे ऊपर विराजमान हैं। अब कोई उन्हे पढ़ने का कष्ट नहीं करता तो इसमें हमारा कोई दोष नहीं है!! ;) तत्पश्चात शिवम ने डिजिट पत्रिका के ट्रेडमार्क उल्लंघन का मुद्दा उठाया क्योंकि हमने अपने ब्लॉग का नाम “डिजिट ब्लॉग” रखा हुआ है। तो मैंने ख़ुलासा करते हुए कहा कि हम यह कहीं नहीं कह रहे कि हम किसी भी रूप में डिजिट पत्रिका या जसुभाई डिजिटल मीडिया या उनकी किसी भी कंपनी से जुड़े हुए हैं। साथ ही, “डिजिट” एक आम शब्द है और इसे कोई भी प्रयोग कर सकता है, इसको कोई अपना ट्रेडमार्क नहीं बना सकता। और फ़िर यदि कोई ट्रेडमार्क का उल्लंघन कर भी रहा है तो वह डिजिट पत्रिका वाले हो सकते हैं क्योंकि “डिजिट” नाम से एक पत्रिका तो युनाईटेड किंगडम में भी प्रकाशित होती है। ;) मेरे इस तर्क के सामने शिवम निरूत्तर थे। तरूण के साथ भी कुछ इधर उधर की बातें हुई और मैंने अपनी भीगी हुई जॉकेट को अपनी कुर्सी पर पीछे सूखने के लिए टाँग दिया(बरिस्ता के लगभग सभी “आउटलेट” वातानुलूलित होते हैं इसलिए अंदर तापमान गर्म था)। बातें चलती रही, तरूण के मेलबार्न जाने से लेकर अमित के पाकिस्तान जाने तक और वहाँ के क्रिकेट के मैदानों और प्रैसबाक्सों की सुविधा तक। अमित, अंग्रेज़ों के अंग्रेज़ी अख़बार गार्जियन की ओर से पाकिस्तान में होने वाली भारत और पाकिस्तान के टेस्ट मुकाबलों पर पत्रकारिता करेंगे और अपनी कलम(यानि कि अपने कीबोर्ड) का जादू दिखाएँगे। अमित के बारे में मेरी पहली छाप यही रही कि वे एक सुलझे हुए “फ़ंडू” प्रकार के व्यक्ति हैं जिनके साथ बात करते हुए समय की ओर से लापरवाह हो जाना कोई बड़ी बात नहीं है।

लेकिन समय तो अपनी गति से व्यतीत होता ही है। जल्द ही तरूण ने विदा ली। मैंने एक फ़ोटो के लिए कहा लेकिन तरूण ने शिष्टतापूर्वक इंकार कर दिया। इंस्टापंडित से लेकर देसीपंडित तक बातें चलती रही और फ़िर जब हम कुछ ही लोग रह गए थे(“बरिस्ता” ख़ाली हो चुका था), तब जिक्र आया हिन्दी के ब्लॉगों का। किसी ने पूछा कि वहाँ उपस्थित बिरादरी में कोई हिन्दी में ब्लॉग करता है, तो मैंने बेशर्मी से स्वीकार किया कि मैं ऐसा करता हूँ!! ;) फ़िर कुछ बातें चली हिन्दी चिट्ठाविश्व की और इस बार के इन्डिब्लॉगीज़ और निर्णायकों की। अमित ने कहा कि देबाशिश कुछ हिन्दी ब्लॉगों पर शुरु करने को कह रहे थे और क्या मैं उन्हे जानता हूँ। मैंने कहा कि मैं इस बार के इन्डिब्लॉगीज़ पुरस्कारों के स्पॉनसरों में से एक हूँ तो अमित ने निर्णय लिया कि मैं देबाशिश से वाकिफ़ हूँ। इससे पहले कि मैं कहता कि देबाशिश से मेरी पहचान हाल ही की है और हम दोनों ने सिर्फ़ दो-तीन ही ईमेल अदल बदल की हैं, बातों का रूख़ कहीं और मुड़ गया और मेरा स्पष्टीकरण मेरे मुख़ में ही रह गया। अब मैं तो यह भी भूल गया कि अमित ने किस बारे में देबाशिश से संपर्क करने का जिक्र किया था, शायद मुझे अमित को ईमेल करके पूछना पड़ेगा। ;)

सभी अमित को मुख़्य अतिथि होने के कारण एक भाषण देने को कह रहे थे, पर अमित ने किसी तरह उस बात को टाल दिया। उपस्थित सभी ब्लॉगरों में अमित को मिला कर अधिकतर पत्रकार थे। वह लगभग 14-15 लोगों का जमाव था। समय बीतता रहा और साढ़े नौ बजे सभी उठ खड़े हुए, अब जाने का समय आ गया था। मैंने अमित से यादगार के तौर पर एक फ़ोटो के लिए कहा, तो अमित इस शर्त पर मंजूरी दी कि मैं यह फ़ोटो ईन्टर्नेट पर नहीं डालूँगा। मैंने शर्त स्वीकार की तो एक बंधु ने अमित और साकेत के साथ मेरी तस्वीर उतारी, फ़िर मैंने शिवम को भी इसी शर्त पर तैयार किया और अमित ने मेरी शिवम और साकेत के साथ तस्वीर ख़ींची। चूँकि मैंने ईन्टर्नेट पर तस्वीरें न डालने का वायदा किया था, इसलिए मैं उस पर अमल करूँगा और वे तस्वीरें ईन्टर्नेट की चमक-धमक कभी नहीं देख़ेंगी। :)

फ़िर अमित ने विदा ली, शिवम तथा कुछ और लोग रात्रि भोजन के लिए पास के किसी रेस्त्रां में जा रहे थे, मैंने उनके निमन्त्रण को शिष्टतापूर्वक अस्वीकार किया और पार्किंग की ओर बढ़ गया। रास्ते भर मैं इस बात का शुक्र मनाता आया कि सड़कों पर बहुत कम यातायात था और सबसे अहम बात कि बारिश नहीं हुई, और मैं 40 मिनट में बिना भीगे घर पहुँच गया।

आज की शाम यकीनन उम्मीद से अच्छी बीती, और मैं अगले मास की भेंट का बेसब्री से इन्तज़ार कर रहा हूँ, जिसमें अमित वर्मा और साकेत(और तरूण) तो नहीं होंगे, लेकिन फ़िर भी शाम मज़ेदार रहेगी ऐसी पूरी आशा है!! ;)


नई मुद्रा, नया भारत?


January 2nd, 2006 | No Comments

रजनीश बाबू ने सत्रहवीं अनुगूँज की और विषय है, “क्या भारतीय मुद्रा बदल जानी चाहिए?“। उनका कहना है कि जैसे 2001 में यूरोप में नई मुद्रा यूरो का प्रयोग चालू हुआ था और कई बदलाव आए थे, उसी प्रकार भारत में यदि एक नई मुद्रा चालू की जाए जिसका एक रूपया पुराने पचास रूपयों के बराबर हो, तो यहाँ पर भी क्राँति आ सकती है। उदाहरण वे दे रहे हैं जर्मनी का जिसके मार्क की कीमत से दोगुनी कीमत यूरो की रखी गई और जिसके कारण वहाँ की अर्थव्यवस्था में कई बदलाव आए। रजनीश ने सोच विचार करते हुए कुछ परिणामों को अंकित किया है जो कि सार्थक हो सकते हैं यदि भारतीय मुद्रा का पुनर्मूल्यांकन किया गया तो।

परन्तु बहुत सी अहम बातें हैं जिन पर मैं रजनीश से सहमत नहीं हूँ। पहली और सबसे अहम बात तो यह है कि बेशक मार्क से दोगुनी कीमत होने के कारण यूरो ने जर्मनी की अर्थव्यवस्था पर अपना सद्प्रभाव नहीं छोड़ा है, परन्तु रजनीश एक बात भूल गए कि यूरो केवल जर्मनी में ही नहीं बल्कि लगभग पूरे यूरोप में चलता है, और यूरोप एक देश नहीं बल्कि कई देशों से बना एक महाद्वीप है। हर देश की अपनी एक मुद्रा है और सबकी कीमत अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में समान नहीं है। हालांकि मैं इस विषय में ज्यादा ज्ञान नहीं रखता हूँ परन्तु जहाँ तक मैं जानता हूँ, यूरो का दाम देश के स्वर्ण कोष और उसकी मुद्रा के डॉलर के अनुपात भाव की तर्ज पर रखा गया था। यूरो का प्रस्ताव यूरोप की एकीकृत मुद्रा के तौर पर रखा गया था जोकि यूरोप को संगठित करने के प्रयास का एक महत्वपूर्ण अंश है। तो इसलिए जर्मनी के मार्क और वहाँ की अर्थव्यवस्था का उदाहरण देना उचित नहीं है। दूसरी बात यह है कि चूंकि यूरो का जन्म किसी एक देश की मुद्रा के पुनर्मूल्यांकन के तौर पर नहीं हुआ था, इसलिए उसका उदाहरण यहाँ इस मुद्दे पर अहम रूप से देना पूर्णतया अनुचित है। तीसरी बात यह है कि यूरोपीय संघ के सभी सदस्य देशों ने यूरो को पूर्णतया नहीं अपनाया है। जहाँ जर्मनी जैसे देश हैं जिन्होने यूरो के चलते अपनी मुद्रा रद्द कर दी, वहीं अभी कई देशों में यूरो घरेलू मुद्रा के साथ साथ प्रयोग की जा रही है, परन्तु प्राथमिकता घरेलू मुद्रा को ही दी जाती है।

जहाँ तक मेरा विचार है, अभी ऐसी कोई आफ़त नहीं आन पड़ी है कि भारतीय मुद्रा का पुनर्मूल्यांकन हो और एक नई मुद्रा को स्थापित किया जाए। और वैसे भी किसी भी मुद्रा का मूल्य देश के स्वर्ण भंण्डार के अनुरूप कम अथवा ज्यादा होता है। तो नई भारतीय मुद्रा को पुनर्मूल्यांकित करके उसकी एकाई को पुरानी मुद्रा की पचास(अथवा कम या ज्यादा) एकाईयों के बराबर नहीं मूल्यांकित किया जा सकता।

तो यदि रजनीश के दिए हुए परिणामों का अवलोकन करें तो वे और उनके विरूद्ध मेरी टिप्पणियाँ इस प्रकार हैं।

रजनीश द्वारा कथित फ़ायदे:

  1. नई मुद्रा को इस्तेमाल करने वाली आटोमैटिक मशीनें बनाईं जा सकती हैं जिनसे लोग टिकटें आदि ख़रीदें। क्या यह काम अब वर्तमान मुद्रा के चलते नहीं हो सकता?
  2. नेताओं के दबाये हुये ब्लैक के करोड़ों रुपये बाहर आएंगे। किस विश्वास के साथ यह बात कही जा सकती है? और यदि मान भी लिया जाए कि ऐसा हो जाता है, तो क्या हो जाएगा? क्या उन नेताओं का कोई कुछ बिगाड़ लेगा? कोई आजतक यह प्रश्न तो उठा नहीं पाया कि लालू ने अपनी बेटी के विवाह में जो 52 करोड़ रूपये खर्च किए वे कहाँ से आए, और फ़िर यहाँ तो लगभग सभी नेताओं की काली कमाई की बात हो रही है जिसका कुल योग कई हज़ार करोड़ रूपये होगा। यदि हम इस संभावना पर भी विचार कर लें कि हर नेता की काली कमाई का योग पता लग भी जाता है, तो क्या होगा? यह तो ज़ाहिर है कि वह संपत्ति देश में तो गाड़ नहीं रखी होगी, वह तो किसी स्विस बैंक या किसी केयमैन द्वीप के बैंक में सड़ रही होगी और वे लोग तो खातेदार के अतिरिक्त किसी और कि एक भी दमड़ी देने से रहे। स्वयंमेव जयते…
  3. बाहर जाने की लालसा कम होगी। रुपयों डॉलरों में फ़र्क कम रह जाएगा। डॉलर की तरफ़ आकर्षण कम हो सकता है। यह क्या तर्क हुआ भई? क्या जिन देशों की मुद्रा डॉलर से अधिक कीमती होती है, वहाँ के निवासी विदेश भ्रमण के लिए नहीं जाते? यदि ऐसा है तो अधिकतर यूरोपीय देश इस श्रेणी में आ जाएँगे क्योकि यूरो की कीमत डॉलर से अधिक है। साथ ही गिनती में आ जाएँगे मिड्डल-ईस्ट के कुछ देश जैसे सऊदी अरब जहाँ का दीनार डॉलर के अनुपात में काफ़ी कीमती है!! और रूपये तथा डॉलर की कीमत लगभग समानांतर हो जाने से डॉलर की ओर आकर्षण कम क्यों हो जाएगा? डॉलर एक तरह से विश्वीय मुद्रा है तथा अधिकतर अंतर्राष्ट्रीय व्यापार डॉलर में ही होता है, इसलिए इसकी ओर आकर्षण तो तभी समाप्त हो सकता है जब इसका स्थान लेने के लिए कोई दूसरी मुद्रा आ जाए। यूरो की रचना का एक मुख्य कारण यह भी था कि वह डॉलर को हटा कर स्वयं विश्वीय मुद्रा बन जाए पर ऐसा हो न पाया!!

रजनीश द्वारा कथित नुकसान:

  1. महंगाई बढ़ेगी। कौन से तथ्य यह सिद्ध करते हैं? क्या अभी महंगाई नही बढ़ रही?
  2. गरीबी बढ़ सकती है। पुनः तथ्यों का अभाव।
  3. ज़्यादा तनख़्वाह की माँग हो सकती है। यह तो महंगाई के अनुपात में चलता है। यदि महंगाई बढ़ती है तो अधिक वेतन की माँग तो होगी ही, फ़िर भी मैं यही कहूँगा, “तथ्यों का अभाव”!!
  4. शायद अंतर्राष्ट्रीय कंपनियां भारत में निवेश से हिचकें। मेरे अनुसार ऐसा होने की आधी आधी संभावना है। क्योंकि भारतीय बाज़ार अभी बढ़ रहा है, इसलिए यहाँ पर कमाई के अवसर अधिक हैं परन्तु यदि भारतीय मुद्रा का भाव डॉलर के बराबर या उससे अधिक हो जाता है तो कदाचित निवेश में कमी हो सकती है क्योंकि अभी तो अधिक निवेश का एक कारण भारतीय मुद्रा का डॉलर के अनुपात में कम होना भी है।

यदि मेरी स्मरण शक्ति धोख़ा नहीं खा रही, तो जहाँ तक मुझे याद है, पिछले से पिछले सार्क सम्मेलन में भारत ने सार्क देशों के लिए एक संयुक्त मुद्रा का प्रस्ताव रखा था(ऐसा मैंने अख़बार में पढ़ा था), जैसे कि यूरोप में यूरो है। इस बारे में बात अधिक आगे नहीं बढ़ी थी लेकिन फ़िर भी एक सम्भावना है, शायद यह कभी यथार्थ हो जाए!! ;)


नया दिन, नया समय, नया साल!!


January 1st, 2006 | 4 Comments

समय अपनी गति से बढ़ता रहा, घड़ी ने बारह बजाए, पुराना साल 2005 बीत गया और नए साल 2006 ने द्वार पर दस्तक दी। जी, नया साल 2006 आ गया है और आप सभी को मेरी ओर से नव वर्ष 2006 की हार्दिक बधाई। :)

आशा है कि यह वर्ष मेरे और आपके जीवन में बीते हुए वर्ष से भी अधिक हर्ष और उल्लास लाएगा और जो शोकमयी घटनाएँ पिछले वर्ष मेरे(और आपके) साथ घटी वे जीवन पर और इस वर्ष पर अपना सद्प्रभाव ही डालेंगी।

नव वर्ष सभी के लिए आनंदमयी और मंगलमयी हो। :)