ये तेरी पार्किंग ये मेरी पार्किंग!!
कुछ समय पहले टेलीविजन पर एक फ़िल्म देखी थी, “ये तेरा घर ये मेरा घर” जिसमें सुनील शेट्टी मकान मालिक होतें हैं जिन्हे मकान बेचना होता है परन्तु किराएदार महिमा चौधरी और उनके घर वाले मकान खाली करने को तैयार नहीं होते और पूरी फ़िल्म में सुनील-महिमा लड़ते रहते हैं।
बहरहाल वह तो मामला ही अलग था, उसमें तो सुनील का मकान पर अधिकार था और वे अपनी जगह सही थे। परन्तु आजकल कुछ ऐसा ही असल जीवन में भी देखने को मिल जाता है। ज्यादा दूर की नहीं, अपनी नानीजी की हाऊसिंग सोसाईटी का ही किस्सा है। वहाँ मामाजी के एक घर के सामने सबसे ऊपर एक परिवार रहता है। परिवार में माँ-बाप और बेटा-बहु, यानि कुल चार प्राणी। अब इन लोगों के पास एक फ़िएट पालिओ पहले से थी, फ़िर इन्होनें एक सेन्ट्रो भी ले ली। लड़के की शादी हुई और चमचमाती शेवरलेट ओप्ट्रा भी मिल गई(भई वाह)। अब समस्या है कि खड़ी कहाँ करें, हाऊसिंग सोसाईटी में अब पार्किंग की पर्याप्त जगह नहीं बची है क्योंकि लगभग हर घर में एक गाड़ी तो है ही, किसी किसी के पास इन लोगों की तरह तीन-चार गाड़ियाँ भी हैं। तो इन लोगों के बाजू में एक प्रकार की गली सी है जिसमें गाड़ियाँ खड़ी होती हैं। अब जिस ब्लॉक में इनका घर है उसमें ११ अन्य फ़्लैट भी हैं, इनकी वाली साईड पर इनको मिला ६ हैं। तो भई और लोग बाग भी अपने घर के आगे गाड़ी खड़ी करना चाहते हैं। वैसे तो उस गली में चार गाड़ियाँ आराम से आ सकती हैं परन्तु खड़ी केवल तीन ही होती हैं। अब एक गाड़ी तो इनके पड़ोसियों की खड़ी होती है, बाकी दो इन लोगों की(तीसरी अन्य जगह खड़ी करते हैं)।
यहाँ तक तो सब ठीक है, परन्तु गड़बड़ आगे होती है। इन लोगों की तीन में से एक बार में एक ही गाड़ी प्रयोग होती है, तो बाकी दो खड़ी रहती हैं। अभी कुछ दिन पहले इनकी शेवरलेट गई हुई थी(जो सबसे अधिक जगह घेरती है)। तो जगह खाली देख उसी ब्लॉक में रहने वाले एक साहब ने अपनी गाड़ी खड़ी कर दी। देर रात जवान लड़का अपनी पत्नी समेत शेवरलेट में लौटा और अपनी पार्किंग को खाली न पाकर खून खौल उठा। जिन साहब की गाड़ी खड़ी थी उन्हें बाहर बुलाकर जो उसने बवाल मचाया, तौबा। कहा कि वह पार्किंग उसकी है तो साहब ने अपनी गाड़ी क्योंकर खड़ी की। अब उसे समझाया गया कि पार्किंग पर उसका नाम नहीं लिखा और वह सुरक्षित भी नहीं है, कोई भी खड़ी कर सकता है, और वह क्यों न अपने घर के आगे खड़ी करें, क्या वह पूरी गली उसकी बपौती है आदि आदि!! लड़के का दिमाग सनक गया, अपने पड़ोसी से तो गाड़ी हटाने की कहने की तो उसकी हिम्मत नहीं तो निश्चय किया कि इन साहब से ही बदला लिया जाए। अपनी शेवरलेट ठीक उनकी गाड़ी के आगे खड़ी कर चलता बना, गाड़ी आधी से अधिक बाहर निकलती हुई सोसाईटी के अंदर जाने वाली सड़क पर आ रही थी, पर क्या फ़र्क पड़ता है!! सुबह वह लड़का तो अपनी दूसरी गाड़ी ले चलता बना पर इन साहब की बन आई, उनकी गाड़ी उस लड़के की दो गाड़ियों के बीच फ़ंसी पड़ी थी।
बाद में मामला किसी तरह सुलटा।
एक अन्य घटना में, मेरे पड़ोस में ऊपर की तरफ़ एक लड़का रहता है जो कि अपनी मोटरसाईकिल कुछ आगे की ओर खड़ी करता है। अब मैं अधिकतर रोज़ सांय काल अपनी मोटरसाईकिल पर थोड़ी देर हवाखोरी के लिए निकलता हूँ और एकाध घंटे में लौट आता हूँ। अब एक दिन उस लड़के को न जाने क्या खुरक मची, मेरे जाने के तुरन्त बाद अपनी मोटरसाईकिल मेरे घर के आगे जहाँ मैं खड़ी करता हूँ, खड़ी कर दी। जब मैं लौटा तो अपनी जगह रूकी पाकर आश्चर्य हुआ क्योंकि कोई वहाँ नहीं खड़ी करता, हमारे ऊपर रहने वाले भी आजू-बाजू खड़ी कर लेते हैं पर घर के द्वार पर तो मेरी मोटरसाईकिल ही खड़ी होती है। एकाध बार की बात मान मैंने अनदेखा कर दिया और अपनी मोटरसाईकिल थोड़ा आगे खड़ी कर दी। परन्तु अगले दिन सांयकाल भी यही वाक्या हुआ, मेरे जाने के बाद उस लड़के ने पुन: अपनी मोटरसाईकिल मेरी जगह पर खड़ी कर दी। उस बार भी मैंने यह सोच अनदेखा कर दिया कि अब यदि कल ऐसा हुआ तो फ़िर बात करनी ही पड़ेगी कि क्या खुजली मची है उस लड़के को, क्योंकि जहाँ वह खड़ी करता था वह जगह रात्रि उसके आने के बाद तक खाली पड़ी होती है, तो इसलिए वह ये सब जानबूझकर पंगा लेने के लिए ही कर रहा है। अगली सांय भी जैसी कि आशा थी, पुन: वही हुआ। तो उसके अगले दिन सुबह सवेरे जब वह आफ़िस जाने के लिए मोटरसाईकिल साफ़ करने आता है तो उसे पकड़ लिया और बस हो गया झगड़ा। अंत में उसे उसकी मोटरसाईकिल समेत तोड़ कर बाहर फ़ेंक देने की चेतावनी दी जिससे वह किलस गया और लड़ने को तैयार हो गया। मैं भी कमर कस तैयार हो गया, वैसे भी बहुत दिन हो गए थे हाथ साफ़ किए, खुजली सी हो रही थी।
परन्तु हमारे ऊपर के फ़्लैट में रहने वाला एक लड़का आ गया और उसे चुप रह चलता किया। वह दिन है और आज का दिन है, उसने अपनी मोटरसाईकिल कभी हमारे घर के द्वार पर नहीं बाँधी।
तो इस सब बकवास का क्या अर्थ है? वह यह कि आजकल बढ़ती गाड़ियों के कारण पार्किंग की समस्या बहुत अधिक होती जा रही है, लोग किसी डकैत की भांति आपकी पार्किंग को हड़पने के चक्कर में रहते हैं। कहीं भी जाकर अपनी गाड़ी खड़ी करो, तुरन्त एक लड़का हाथ में एक पर्ची लिए पार्किंग के पैसे लेने आ जाता है, चाहे वह जगह अधिकृत पार्किंग न हो, पर पार्किंग माफ़िया हर जगह है और इस तरह जबरन पार्किंग शुल्क वसूल कर रोज़ के लाखों कमाता है। कनॉट प्लेस में भी पार्किंग की समस्या विकट है(जैसा कि ऐसी जगह से अपेक्षित होता है)। अभी कुछ समय पहले नगर निगम द्वारा पाया गया था कि पालिका भूमिगत पार्किंग में कुछ गाड़ियाँ तो दो-तीन वर्ष से खड़ी आराम कर रहीं हैं जिन्हें नगर निगम ने लावारिस घोषित कर नीलाम कर दिया था(कदाचित् वे चोरी की हुई गाड़ियाँ थी)।
और जैसे हालात दिख रहे हैं, निकट भविष्य में यह समस्या और भी अधिक विकट हो जाएगी, शॉपिंग कॉमप्लेक्स तो बनते जा रहे हैं पर पार्किंग की कोई यथेष्ट सुविधा नहीं है। दिल्ली सरकार को यह अभी से ध्यान में लेना आरम्भ कर देना चाहिए कि यातायात के साथ साथ पार्किंग की समस्या भी बड़ी है जो कि पुल आदि बनने से नहीं दूर होगी, सो इसलिए यदि भूमि के ऊपर जगह नहीं है तो भूमिगत पार्किंग बनाने के बारे में विचार करना चाहिए।



5 Comments
Pankaj Bengani
बडी गंदी समस्या है भाई. और मजे की बात यह है कि हम सब भुक्तभोगी है. “Lenses” वाले सुझाव के लिए धन्यवाद
Amit
सही कह रहे हो भईये और यह समस्या बहुत बड़ी भी बन जाएगी यदि समाधान न किया गया तो।
कोई बात नहीं।
alka
Read almost all of your posts including bloggers’ meet. But this one is like icing on cake.
Tarun
देश में तीन ही तो चीजें हैं जो बेतहाशा बढ़ रही हैं, मोबाईल, गाड़ियाँ (कार वगैरह) और जनसंख्या और वो कहते हैं ना ‘अति की भली ना बरसना, अति की भली ना धूप’ तो जनाब बस इंतजार कीजिये उस दिन का जिस दिन इस अति का अंत आये तब तक ‘जो जल्दी आये वो पहला’।
वैसे कुछ भारतीयों से मुझे यहाँ बहुत कोफ्त होती है वो कहीं पर भी गाड़ी खड़ी कर देते हैं, सारे कायदे कानून ताक पर रख कर।
Amit
हुम्म!!
भईये यहाँ का हाल देखोगे तो पता नहीं क्या क्या हो जाएगा!!
यहाँ तो लोगों को इतनी रईसी बरस रही है कि बाज़ार से कुछ कदम दूरी पर ही घर है पर सब्ज़ी लेने जा रहे हैं तो गाड़ी में जाएँगे और सड़क पर ही खड़ी कर देंगे, आधी सड़क दोनो ओर इसी कारण घिरी रहती है!!
और नगर निगम वाले भी उस्ताद लोग हैं। किनारे पर जो पटरी लोगों के चलने के लिए बनाई गई थी, उस पर खोमचे रेहड़ी वालों ने अपनी अपनी दुकाने-खोखे खड़े कर लिए। निगम वालों ने महसूस किया कि उनको हटा पाना तो उनके वश में नहीं सो उनसे घूस खा के उन्हें “तहबज़ारी” का तमगा टिका कानूनी रूप से अधिकृत कर दिया!!