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Archive for August, 2006


बादलों के उस पार – भाग २


August 25th, 2006 | 9 Comments

गतांक से आगे …..

चोपटा की ओर जाते समय मार्ग में एक से बढ़कर एक नज़ारे देखने को मिले। सुबह का समय था, कहीं कहीं हल्की धूप पड़ रही थी और सुहावना मौसम था। मन ही नहीं कर रहा था कि कहीं जाएँ, बस एकटक बैठे प्रकृति की सुन्दरता को निहारते रहें।



आखिरकार हम चोपटा पहुँच ही गए। सुबह के लगभग साढ़े नौ बजे थे और आस पास ऊपर देखने पर केवल धुंध एवं कोहरे के बादल ही दिखाई दे रहे थे। सामने के ढाबे पर हमको पिछली रात मिले अंकल एवं उनका परिवार बैठा दिखाई दिया, तो उनसे बचने के लिए साथी लोग दूसरी दुकान पर चाय के लिए चले गए। चाय आदि के बाद सभी चलने के लिए तैयार थे। ऊपर ठण्ड का मुकाबला करने के लिए हमने चॉकलेट आदि ली, मैंने ऊपर चढ़ने में सहायता के लिए एक डंडी ली और हम लोग अपनी 4 किलोमीटर की पैदल चढ़ाई पर निकल चले।


( तुन्गनाथ की चढ़ाई आरंभ करने का प्रवेश द्वार )


मैं केवल अपना स्लीपिंग बैग और कुछ दवाईयाँ लेकर ही चढ़ रहा था। स्लीपिंग बैग में ही एक जोड़ी गर्म कपड़े लपेट रखे थे। दूसरे साथी थोड़ा बहुत सामान लेकर चढ़ रहे थे। लड़कियों ने अपना मेकअप का सामान भी रख लिया था। ;) परन्तु थोड़ी दूर जाते ही हाल बुरे हो गए। खड़ी चढ़ाई थी, रास्ता पूरा का पूरा पथरीला था, जिसे आदत ना हो उसके लिए चढ़ना वाकई कठिन कार्य था। ऊपर से मेरा स्लीपिंग बैग बार बार कंधे से फ़िसल रहा था। मोन्टू ने अपने बैग के साथ मेरा स्लीपिंग बैग पकड़ने का प्रस्ताव रखा और मैंने कृतज्ञतापूर्वक उसे स्वीकार कर लिया। लेकिन पसीने और एक दिन की बढ़ी शेव गर्दन पर चुभ रही थी जिस कारण गर्दन लाल हो गई थी तथा जलन हो रही थी। तो इसलिए टेलकम पाऊडर का एक छोटा डिब्बा जेब में रखा और थोड़ी थोड़ी देर बाद उसे लगाते हुए चल रहा था। जैसे जैसे ऊपर जाता जा रहा था, ऐसा लगता जा रहा था कि किसी भी समय हिम्मत जवाब दे देगी। इसलिए थोड़ी थोड़ी देर बाद रूक रूक कर एक टॉफ़ी मुँह में डालता और पानी का घूँट लेता तो जान में जान आती। एक किलोमीटर बाद चाय आदि का एक पड़ाव दिखा जहाँ पहुँचकर मोन्टू और स्निग्धा नें मैगी खाई तथा दूध की बनी बर्फ़ी ली जो कि वाकई स्वादिष्ट थी।


( चाय वाले की लड़कियों के साथ स्निग्धा )


चाय आदि पी सभी पुनः चल पड़े, अपन भी कुछ अनमने ढंग से चल पड़े। अब अपने आप पर गुस्सा आ रहा था कि क्यों तंदुरूस्त नहीं हैं कि सभी की तरह चढ़ाई कर सकें!! लेकिन फ़िर अपने को समझाया कि यह पहाड़ी चढ़ाई है जिसका अभ्यास नहीं है, इसी कारण चलने में दिक्कत है नहीं तो यदि समतल जगह होती, जैसे दिल्ली की सड़के आदि तो चलने में कोई दिक्कत नहीं थी। पर फ़िर अंतर्मन ने कहा कि बाकी लोग भी तो मेरी तरह अभ्यस्त नहीं है, फ़िर वे कैसे चले जा रहे हैं?? अब इसका उत्तर क्या देता!! काकन अपना आईपॉड कान में लगा सबसे आगे चली जा रही थी, मोन्टू उसके पीछे था और स्निग्धा मेरे साथ मेरा हौसला बढ़ाते हुए चल रही थी।


( ऊपर तुन्गनाथ की ओर जाता आगे का मार्ग )



( बादलों के उस पार जहाँ और भी है )


हौसले की डोर मज़बूती से पकड़े हम दूसरे चाय के पड़ाव पर पहुँचे। यहाँ बैठ चैन की साँस ली। चाय वाले से पता चला कि हम लगभग ढाई किलोमीटर आ गए हैं, यानि कि लगभग डेढ़ किलोमीटर की चढ़ाई और बाकी थी। पुनः हौसला बटोर हम चल पड़े अपनी मन्ज़िल की ओर। आखिरकार तकरीबन 5 घंटे बाद हम ऊपर तुन्गनाथ पहुँच गए। वहाँ पहली जो सराय दिखी उसी में चले गए। सराय के मालिक अंकल गढ़वाल राईफ़ल से सेवानिवृत्त फ़ौजी थे जिन्होंने 1962-1971 के दौरान चीन और पाकिस्तान से हुई लड़ाईयों में भाग लिया था। सभी साथी लोग थके मांदे थे, तुरंत कुर्सियों पर पसर गए और गर्म चाय का आनंद लेने लगे। उसके बाद मंदिर हो कर आने का निर्णय लिया, फ़ौजी अंकल ने चार पूजा की थालियाँ हम लोगों के लिए सजा दी थी। तो हम सामने मौजूद मंदिर की ओर हो लिए। यह मंदिर भी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में था।


( तुन्गनाथ – कदाचित्‌ भारत का सबसे ऊँचा मन्दिर )



( तुन्गनाथ )


एक पुजारी ने हमारी पूजा करवाई। पुजारी ने ही बताया कि तुन्गनाथ भी पांडवों द्वारा लगभग 5500 वर्ष पहले बनाया गया था। विश्वास या अविश्वास का कोई प्रश्न नहीं था, जिसको मानना है वो माने, जिसको नहीं मानना वो नहीं माने। हमें बिना ठोस तथ्यों के यकीन नहीं तो हम नहीं मानते। पूजा अर्चना के बाद पुजारी ने कहा कि सांय काल साढ़े सात बजे आरती होती है और यदि हम आ सकें तो आना चाहिए। अपने को तो ठण्ड लग रही थी, वापस सराय में आकर गर्म कपड़े पहने, लेकिन ध्यान आया कि अपनी जैकेट तो नीचे गाड़ी में ही भूल आया था!! :( खैर, अपना स्लीपिंग बैग खोल उसमें घुस गए और रजाई ओढ़ ली तो थोड़ा चैन पड़ा। तभी गर्मा-गर्म पकौड़े बन कर आ गए और उनका भोग लगाया गया। लेकिन सारी गड़बड़ यहीं हो गई। जिस तेल में पकौड़े बने थे, वह रास नहीं आया और तबियत खराब सी लगी। सिर पर कंबल लपेट अपन तो स्लीपिंग बैग में सो गए, बाकी लोग आरती में भी हो आए और सांय काल सूर्यास्त का अदभुद नज़ारा भी देखा, लेकिन अपन बाहर नहीं आए। परन्तु हमारे लिए कुछ सुन्दर तस्वीरें ले ली गई ताकि हम देख सकें कि हमने कैसा नज़ारा “लाईव” नहीं देखा। आप भी देखिए:


( तुन्गनाथ से देखा संध्याकाल )



( अस्त होते सूर्य की लाली )


लेकिन रात्रि होते होते तबियत और खराब लग रही थी। उल्टी आने को हो रही थी, इसलिए खाना भी नहीं खाया। थोड़ी देर बाद सोचा की कर करा के मामला निबटा ही लिया जाए। उल्टी करने से अंदर का कचरा बाहर निकल गया तो राहत मिली। वापस कमरे में आकर मैंने और मोन्टू ने ऑक्सीजन की कमी से निबटने के लिए दवाई खाई, चैन पड़ा तो फ़िर नींद की शरण में पहुँचे। सभी का सुबह 4 बजे उठने का पिरोगराम था, ताकि एक किलोमीटर का और रास्ता तय कर चन्द्रशिला की चोटी पर जा नंदा देवी के पीछे से होने वाले सूर्योदय को देखा जा सके। अपनी तो नींद तीन बजे ही खुल गई और रजाई में लिपटे बेचैनी से बैठे रहे। लेकिन कुदरत महरबान तो इंसान कीकड़ी पहलवान, सुबह सवेरे तेज़ बरसात होने लगी, सभी के अरमानों पर बारिश का पानी पड़ गया। अब तो टेन्शन थी कि बारिश रूके तो नीचे की यात्रा आरम्भ की जाए। दिन निकलने पर सभी ने मैगी का नाश्ता किया, मैंने भी किया। उसके बाद बरसात रूकी तो फ़ौजी अंकल को विदा कह हम वापस नीचे की ओर बढ़ चले। बरसात के कारण सारे रास्ते में फ़िसलन थी, इसलिए सावधानी से उतरा जा रहा था। लेकिन उतरने की रफ़्तार चढ़ने की रफ़्तार से अधिक थी। तकरीबन ढाई घंटे में हम लोग वापस चोपटा पहुँच गए थे। मिशन तुन्गनाथ पूरा होने पर सभी प्रसन्न थे।


( तुन्गनाथ से वापसी पर )


मैं स्निग्धा का आभारी हूँ कि चढ़ते और उतरते समय वह मेरा हौसला बढ़ाती मेरे साथ चल रही थी और मोन्टू का आभारी हूँ कि चढ़ते समय उसने मेरा स्लीपिंग बैग ले मेरा बोझ कम किया। :) चोपटा में अधिक समय ना लगाते हुए सभी ने अपना अपना सामान गाड़ी में लादा और गाड़ी में सवार हो वापसी की राह पकड़ी। अब हमारा अगला पड़ाव मन्दाकिनी नदी के तट पर सियालसौर में मौजूद गढ़वाल मण्डल का यात्री निवास था, जो कि उखीमठ से तकरीबन 20 किलोमीटर आगे था।

अगलें अंक में ज़ारी …..


बादलों के उस पार – भाग १


August 23rd, 2006 | 11 Comments

नया सवेरा और एक और नई यात्रा पर जाने का पिरोगराम। ;) इस बार मंज़िल थी पंच केदारों में तृतीय केदार तुन्गनाथ। दिल्ली से लगभग 495 किलोमीटर का सड़क का सफ़र कर पहुँचना था चोपटा और वहाँ से 4 किलोमीटर का पैदल सफ़र कर और लगभग 3000 फ़ीट की चढ़ाई कर पहुँचना था तुन्गनाथ। वैसे वहाँ घोड़े आदि भी चलते हैं लेकिन हम लोग तो पैदल ही चलने का पिरोगराम बनाए थे। ज़्यादा नहीं, इस बार हम केवल 4 लोग ही थे यात्रा पर।

इस बार भी वही हुआ जो कि हर यात्रा से पहले होता है, विचारों का आदान प्रदान आदि, यानि कि समझ गए होंगे!! ;) शुक्रवार 11 अगस्त की रात्रि हम लोग निकल चले गाड़ी में। हमारा पहला पड़ाव पड़ना था उखीमठ नाम की जगह पर जो कि रूद्रप्रयाग से भी आगे है। रात्रि के अंधकार को चीरती गाड़ी भागती रही और बाकी लोग पीछे बैठे नींद लेने लगे, मैं आगे ड्राईवर के बगल में बैठा था, सो नहीं सकता था, पर झपकी फ़िर भी आ ही जाती। लेकिन कदाचित्‌ हम लोगों की शुरूआत सही नहीं हुई थी, हरिद्वार से पहले सड़क पर एक जगह छोटी-मोटी दुर्घटना हो गई थी और इस कारण दो घंटे तक जाम लगा था जहाँ हम बेचैनी से जाम खुलने की प्रतीक्षा करते गर्मी में सड़ रहे थे, करने के लिए कुछ था नहीं, मक्खियाँ भी नहीं थी जो उन्हें मारते!! ;) आखिरकार पुलिस की गाड़ी आई और उन्होंने जादू-मंतर मारा, गाड़ियाँ धीरे धीरे आगे सरकने लगी और एक बार पुनः हम अपनी राह पर थे।


लगभग 6 बजे के आस पास हम ऋषिकेश पहुँचे, जहाँ हम दो घंटे पहले पहुँच गए होते यदि जाम में ना फ़ंसे होते। हमने वहाँ से देवप्रयाग की राह पकड़ी पर थोड़ा आगे पुलिस ने रोक लिया। फ़िर वही ड्रामा आरम्भ हुआ जो होता है, बाकी समझदार को इशारा काफ़ी है। लेकिन बिना जेब ढीली किए पुलिस वाले को समझा-बुझा के निकल लिए। अभी थोड़ा आगे और गए होंगे कि फ़िर पुलिस वालों ने रोक लिया। अब यहाँ पर दो सौ रूपए का चढ़ावा देना पड़ा, तब जान छूटी। :( लेकिन उसके बाद तो बेधड़क निकलते चले गए, किसी ने नहीं रोका। देवप्रयाग पहुँच हमने अलकनंदा और भगीरथी का संगम देखा। ये दो नदियाँ गंगा का रूप ले ऋषिकेश की ओर बढ़ जाती हैं।


( देवप्रयाग में अलकनंदा और भगिरथी के संगम से बनती गंगा )


पेटपूजा का ख्याल आया तो देवप्रयाग के गढ़वाल मण्डल के यात्री निवास में पहुँचे, मुँह-हाथ धो तरोताज़ा हुए, लड़कियों ने अपना-अपना मेकअप सही किया और उसके बाद बेस्वाद पूरी-भाजी का अनमने ढ़ंग से नाश्ता किया। तत्पश्चात निकल चले अपनी मंज़िल की ओर और जैसे जैसे आगे बढ़ते जा रहे थे, सुंदर पहाड़ी नज़ारों की गिनती बढ़ती जा रही थी!! :D


आखिरकार, रास्ता पूछते पूछते हम उखीमठ और वहाँ के गढ़वाल मण्डल के यात्री निवास पर पहुँच गए। यात्री निवास पहाड़ी की ढलान पर बना हुआ था, सामने बायीं ओर दूसरे पर्वत की ढलान पर बसी गुप्तकाशी दिखाई देती थी और दायीं ओर दूर केदार पर्वत भी दिखाई देता था लेकिन अधिकतर वह बादलों के पीछे छुपा हुआ था। नीचे तलहटी में बहती मन्दाकिनी नदी भी दिखाई दे रही थी, पहाड़ी सड़कें भी दिखाई दे रही थी, कुल मिला कर नज़ारा ऐसा था कि बस घंटों उसी को देखते रहो!! :)


( नीचे बहती मन्दाकिनी और पहाड़ी सड़कें )

( गुप्तकाशी )


यहाँ हमने दोपहर का खाना खाया, और फ़िर नहा धो के तरोताज़ा हुए। अभी गुप्तकाशी हो कर आने का पिरोगराम बन ही रहा था कि तभी बरसात होने लगी और सारे अरमानों पर बूंद बूंद पानी पड़ गया। खैर, थोड़ी देर हमने बरसात और बढ़िया हो चले मौसम का मज़ा लेने की सोची, इसलिए बरामदे में कुर्सियाँ डाल के पसर गए(कुर्सियों पर ही)। संध्या हो आई थी जब निर्णय लिया गया कि पास के ओंकारेश्वर मंदिर को देख आते हैं जो कि लगभग आधा किलोमीटर की दूरी पर था। हम लोग टार्च आदि ले पैदल ही निकल पड़े। मन्दिर बहुत पुराना और जीर्ण-शीर्ण था, एक पुजारी ने बताया कि यह मंदिर लगभग 5500 वर्ष पूर्व पांडवों ने महाभारत के युद्ध के बाद उस समय बनवाया था जब वे मोक्ष की प्राप्ति के लिए शिव जी को प्रसन्न करने का प्रयास कर रहे थे।


( तथाकथित 5500 वर्ष पहले पांडवों द्वारा बनवाया गया ओंकारेश्वर मंदिर )


संध्या काल की आरती का समय हो आया था, पुजारी ने आरती में बैठने का आग्रह किया, बाकी साथियों का मन था, इसलिए हम भी आरती में बैठ गए। आरती समाप्त होते होते पूर्ण अंधकार हो आया था, हम अपनी अपनी टार्चों से मार्ग को रोशन करते वापस यात्री निवास की ओर बढ़ चले। यात्री निवास की बिजली भी गोल थी, जेनरेटर चला रखा था। हम भोजन करने पहुँचे तो एक और परिवार जो वहाँ हमारे बाद आया था, वह भी आ गया। उन लोगों ने भी तुन्गनाथ जाना था, परन्तु कुछ अनिश्चय की सी स्थिती थी, कदाचित्‌ वे लोग केदारनाथ की ओर निकल जाते। उस परिवार के बुजुर्ग एक अंकल ने हम लोगों को अपनी केदारनाथ की यात्रा का किस्सा सुनाया, अपने जीवन और धार्मिक दर्शन से अवगत कराने की असफ़ल चेष्टा की, नशे में होने के कारण वे अंकल एक बात कई कई बार बोल जाते थे। खैर, अपना रात्रि-भोज समाप्त कर हम उठ खड़े हुए और शुभरात्रि कह उस परिवार से विदा ली। अगले दिन सुबह वह परिवार हमसे पहले चोपटा की ओर निकल गया, यानि उनका तुन्गनाथ जाने का ही निर्णय था। बाकी लोगों को सुबह सुबह उनके जाने की खुशी थी, लेकिन मैं तो सुबह देख कर ही खुश था, बादल नहीं थे, हल्की धूप निकल आ रही थी और सामने केदार पर्वत की चोटी और उस पर जमी बर्फ़ खूब चमक रही थी।


( केदार पर्वत की बर्फ़ से ढकी चोटी )


ऐसा सुंदर नज़ारा देख दिल बाग-बाग हो गया। सोचा कि अभी इतने सुंदर नज़ारे देखने को मिल रहे हैं, आगे तो और भी मिलेंगे। तो हम भी अपना हिसाब-किताब चुकता कर यात्री निवास से चोपटा की ओर चल पड़े, जो कि लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर था।

अगलें अंक में ज़ारी …..


स्वर्ग में या स्वर्ग के निकट – भाग २


August 9th, 2006 | 5 Comments

गतांक से आगे …..

अब फ़ूलों इत्यादि की तस्वीरें ले चुके तो सोचा कि थोड़ा आराम किया जाए, लगभग आठ घंटे गाड़ी में सफ़र किया था, हाल थोड़े ढीले ढाले ही थे। तो वापस ऊपर पहुँचे, अरे अपने कमरों में भई, उससे ऊपर जाने का अभी टैम नहीं आया!! ;) तो ऊपर पहुँच देखा कि यार लोग सुस्ता रहे हैं, हम सोचे कि हम भी थोड़ा सुस्ता लें। पर सुस्ता नहीं पाए, निश्चय किया कि तुरत फ़ुरत नहा धो तैयार हो लिया जाए और फ़िर घूमने फ़िरने का पिरोगराम सैट किया जाए। लेकिन उससे पहले पेट-पूजा का प्रश्न था, तो यात्री निवास में ही नाश्ते का निश्चय किया गया। तो दो कुड़ियाँ खटिया तोड़ अंदाज़ में अपने कमरे में सुस्ता रही थी, संतोष नाश्ता करने के आदि नहीं, तो हम बाकी के पाँच जन नीचे डाईनिंग हॉल में आ गए और पूरी-छोले तथा ब्रेड ऑमलेट के मजे लिए। तभी हमारी वार्ता यात्री निवास के मैनेजर साहब से हुई, सरल से व्यक्ति लगे। हम लोगों से पूछा कि हमारा कहाँ जाने का कार्यक्रम है, तो हमने उनसे पूछा कि हमें कहाँ जाना चाहिए। उन्होंने कई जगह बताई, कलसी में उपस्थित इतिहास की धरोहर के बारे में भी बताया(अरे बताते हैं, सब्र रखो भई), और बताया कि हम चक्राता पहाड़ पर भी जा सकते हैं, लेकिन चूंकि उसका एक तरफ़ा रास्ता लगभग 40 किलोमीटर के करीब है, तो सांय काल तक ही लौटना होगा। गर्मी कुछ बढ़ सी गई थी, तो हमने सोचा की पहाड़ की सैर कर ली जाए, बाकी जगह समय होने पर देख लेंगे। मैनेजर साहब हमारे साथ चलने को तैयार थे। तो पेट पूजा के बाद नहाने आदि की सुध ली, इतने में बाकी की दोनों देवियों ने भी अपना काम निबटा लिया और सज धज सभी नीचे पहुँचे। पर वहाँ तो एक नया सीन खड़ा हो गया था, हमारे सरदारजी, अरे ड्राईवर साहब, नदारद थे। कहाँ गए किसी को पता नहीं। मैं और दीपक बाहर आस पास की दुकानों और “शेर-ए-पंजाब” ढाबे पर भी देख आए कि कहीं बैठे मुर्गे वगैरह तो नहीं पाड़ रिये, पर वो तो गधे के सिर से सींग और सरकार की देशभक्ति की तरह गायब थे। हम लोग यात्री निवास के द्वार पर खड़े टेन्शन ले ही रहे थे कि दीपक को एक कर्मचारी ने कहा कि पीछे मौजूद खाली हॉलों में देख लें, सो हम उधर ही लपक लिए। एक हॉल के द्वार के बाहर दो कुत्ते बैठे रखवाली कर रहे थे, उसके अन्दर एक बिस्तर पर ड्राईवर साहब मौज से सो रहे थे, हमने उन्हें हिला-डुला के जगाया और चलने के लिए कहा। फ़ौरन पगड़ी बाँध वो तैयार हुए और हम निकल पड़े।

मार्ग में मौसम बहुत ही सुहावना सा हो आया था, धूप चली गई थी और काली घटा घिर आई थी, तो तस्वीरें लेने से कैसे चूकते!! तुरंत गाड़ी रुकवाई और तस्वीरें ले डाली!!



अब कलसी पहुँच हमें पता चला कि यह इलाका भारतीय सेना के नियंत्रण में है(बाद में ज्ञात तथ्यों से पता चलता है कि यह इलाका सेना की establishment 22 ने नाम से जानी जाने वाली टुकड़ी के नियंत्रण में है जो कि तिब्बती मूल के लोगों को भर्ती कर बनाई गई है जिसे रॉ जैसी संस्था प्रशिक्षण देती है)। साथ ही यह भी पता चला कि रास्ता एक तरफ़ा है, इसलिए एक समय सारिणी बनी हुई है, फ़लां-से-फ़लां समय तक यहाँ से यातायात चलेगा और फ़लां-से-फ़लां समय के दौरान वहाँ ऊपर से नीचे की ओर आने वाला यातायात आएगा, तीन तीन घंटे के खंड थे। तो अभी अपना नंबर आने में लगभग एक घंटे से ऊपर था, मैनेजर साहब ने कहा कि हम “वो” देख आएँ, अरे वही इतिहास की धरोहर!! वैसे किसी को उसमें अधिक रूचि न थी, जो थी वो हम ही जागृत किए थे। ;) तो अपनी गाड़ी लाईन में सबसे आगे खड़ी कर हम पैदल ही निकल लिए ढलान की ओर। यमुना किनारे, एक बहुत ही अच्छे से बने हरी घास वाले भूमि के टुकड़े पर एक छोटा सा कमरा सा बना हुआ, जिसमें प्रसिद्ध मौर्य सम्राट और बौद्ध धर्म के प्रचारक, सम्राट अशोक का शिलालेख रखा है जो कि दो हज़ार वर्ष से भी अधिक पुराना है और अभी तक के भारत और पाकिस्तान में मिले शिलालेखों के मुकाबले काफ़ी अच्छी हालत में है। इस पर प्राकृत भाषा में कुछ लिखा है जो कि भाषा ज्ञान ना होने के कारण अपनी समझ में नहीं आया। ;)



शिलालेख देख लिया, उसके बारे में जितना पता था उससे बस थोड़ा अधिक ही वहाँ उपस्थित एक परिचय-पत्थर पर लिखा था जो फ़टा फ़ट पढ़ डाला। अब इस जगह की ओर अधिक तवज्जो गई तो महसूस हुआ कि यह जगह कितनी शांत है और कितनी शांति अन्दर मन को देती है, बहुत ही सुहावना सा मौसम हो रहा था और जैसे ही वापस चलने को हुए, हल्की सी बूंदा-बांदी भी आरम्भ हो गई। वापस गाड़ी के पास पहुँच लोगों को भूख लग आई थी, संतोष ने नाश्ता भी नहीं किया था, जबकि हम में से कुछ ने नाश्ता डट के किया था, तो एक ढाबे में प्रवेश कर गए और कुछ ने खाना खाया और बाकियों ने शीतलपेय ले उनका साथ दिया। आखिर जैसे तैसे समय कट ही गया और हमारे लिए मार्ग अवरोध हट गया, जाने का संकेत मिल गया और गाड़ी में ठुस हम लोग चल दिए।

पहाड़ी सड़क बहुत ही संकरी थी, पर दृश्य इतना जबरदस्त नज़र आ रहा था सारे रास्ते कि बस पूछो मत। जगह जगह सड़क के बाजू में ही सफ़ेद ठण्डे पानी के झरने से बह रहे थे, मौसम एकाएक इतना बढ़िया हो गया था कि लगा उतना ही विश्वास हुआ अपनी किस्मत पर जितना सरकारी बाबुओं के समय पर दफ़्तर आने पर होता है!! ;) अब लेकिन जब मौसम इतना बढ़िया था और नज़ारा लाजवाब था तो फ़िर तस्वीरें लेने से कैसे चूकते?? इसलिए नहीं चूके ना, और बीच बीच में एकाध बार गाड़ी रूकवा तस्वीरें ले डाली!! :D



आखिरकार हम लोग रूकते चलते ऊपर चोटी तक पहुँच ही गए। वहाँ पर छोटा सा कस्बा बसा हुआ था तथा सेना की छावनी सी बनी थी जिसके द्वार के सामने तस्वीरें लेना वर्जित है। यहाँ हर ओर बादल ही बादल दिखाई दे रहे थे, पहाड़ से नीचे कुछ नहीं दिखाई दे रहा था, सिर्फ़ श्वेत मेघ दिख रहे थे। मौसम ठण्डा था वहाँ, ऐसा लग रहा था कि कोई अच्छी तरह से वातानुकूलित कमरा आदि हो। सुट्टा आदि लगाने के लिए सिगरेट-बीड़ी लोगों की बाहर आ गई, बाजू में से एक राह नीचे जंगल की ओर जा रही थी तो हम बाकी लोगों के साथ उधर ही चल दिए। कुछ कदम ही चले होंगे कि दाईं ओर नज़र गई और वहीं की वहीं थम गई। जो नज़ारा सामने था वह मैंने पहली बार देखा था। हुआ यूँ कि बादलों में घिरे होने के कारण यहाँ सूर्य की किरणे नहीं पड़ पा रही थी, लेकिन बादलों में उपस्थित एक सुराख से सूर्य की किरणें बाजू वाले पर्वत की चोटी पर पड़ रही थी और ऐसा लग रहा था कि वह हिस्सा जहाँ सूर्य की किरणें पड़ रही हैं मानो किसी टॉर्च की रोशनी में नहाया हुआ हो। फ़टाफ़ट कैमरे में इस दृश्य को उतारा गया, पर कुछ दूरी पर होने के कारण और प्रयाप्त प्रकाश ना होने के कारण तस्वीर उतनी बढ़िया तो नहीं आई जितना बढ़िया नज़ारा था परन्तु फ़िर भी देखने और अनुमान लगाने योग्य आ ही गई। :)



थोड़ा आगे गए तो एक ओर मौजूद पहाड़ी की साईड में कुछ पत्थर आदि उभरे हुए थे। इन्हें देख संतोष और स्निग्धा को पर्वतारोहण का शौक चर्राया, पहले संतोष और फ़िर स्निग्धा उन उभरी जगहों पर हाथ-पाँव टिका कर किसी तरह थोड़ा उपर चढ़ गए और ऐसे खड़े हुए कि मानो ऐवरेस्ट फ़तह कर लिया हो!! ;) हमारे पास अधिक समय नहीं था, हम केवल आधा घंटा ही चक्राता पर बिता सकते थे क्योंकि यदि हम आधे घंटे में वापसी की यात्रा नहीं करते तो फ़िर हमें 3 घंटे प्रतीक्षा करनी पड़ती और उस समय तक अंधेरा हो जाता और अंधेरे में पहाड़ी सड़क पर ना चढ़ाई सुगम होती है और ना ही नीचे उतरना। बीच में एक कस्बे में हम लोग रूके जहाँ सभी ने चाय आदि पी और गर्मा-गर्म कऱारे पकौड़ों का नाश्ता करा। वहीं से यात्री निवास के मैनेजर बाबू ने यात्री निवास में फ़ोन कर कह दिया कि मुर्गे आदि का इंतज़ाम रखा जाए हम लोगों के रात्रि भोजन के लिए। वापसी के मार्ग में हमने एक और बहुत ही बढ़िया दृश्य देखा जिसे अपने कैमरे में उतारना कोई नहीं भूला।


पहाड़ी से नीचे उतर हम यात्री निवास के मार्ग पर थे कि यमुना के उपर बने पुल पर रूक गए और सभी ने पुल से नीचे उतर यमुना के किनारे जाने की सोची। तो फ़िर क्या था, हम भी सभी के साथ चल दिए। पानी के पास पहुँच सभी ने तीव्र बहाव देखा, तस्वीरें आदि ली। तभी मेरी नज़र उपर आकाश में गई और एक अजीब सा छोटा बादल देखा, अष्टभुज यानि कि ऑक्टोपस के आकार का, तो क्या था, तुरंत तस्वीर ले डाली।


जब तक हम औरों को बता पाते, तब तक वह बादल बीकानेर वाले के मलाई घेवर के माफ़िक गायब हो चुका था!! तो यानि कि इकलौती तस्वीर हमारे कैमरे में ही थी, यह सोच मन में लड्डू फ़ूट पड़े, सोचा कि चलो हमने कोई तो ऐसी तस्वीर ली जो समूह में किसी और ने नहीं ली!! ;) यात्री निवास पर वापस आ सभी ने सबसे पहले नहा-धो तरोताज़ा होने की सोची, और उसके बाद रमित और संतोष ने लैपटॉप-स्पीकर आदि तामझाम लगा संगीत का जुगाड़ किया, उधर दीपक और मैं मौज से बैठे बाकि लोगों को टेबल-बोतल आदि सजाते देख रहे थे। पहली मंज़िल पर मौजूद हमारे कमरों के बाहर का बारामदा थोड़ा बड़ा सा था, इसलिए सभी इंतज़ाम वहाँ खुले में किया गया। बस समय हो रहा था, संगीत आदि चलाया गया और महफ़िल आरम्भ हुई, बीयर, वोदका और व्हिस्की की बोतलें खुल गई, और शाम रंगीन होने लगी। :cool:

पता नहीं कब रात्रि के दस बज गए और तब यात्री निवास के एक कर्मचारी ने आकर कहा कि बहुत रात हो गई है, हमे खाना खा लेना चाहिए। तो सभी ने सोचा कि बस बहुत हुआ, अब पेट पूजा की जाए। सभी नीचे पहुँचे और भोजन आरम्भ किया। क्या खाना बनाया था बावर्ची ने, मज़ा ही आ गया। तृप्त हो हम थोड़ी देर रिसेप्शन हॉल में बतियाने बैठे, कोई बच्चा कहीं किसी संकरे कुएँ में गिर गया था और उसका बचाव कार्य ज़ोरों पर था, विशेषज्ञ आए हुए थे और पूरा कांड ज़ी न्यूज़ वाले भारत पाकिस्तान के क्रिकेट मैच की तरह लाईव दिखा रहे थे। मुझे और दीपक को नींद आ रही थी, हम दोनों ने ही बोतल वगैरह लगानी नहीं थी, इसलिए हम दोनों सोने चले गए, बाकी लोगों का पुनः बोतल वगैरह लगाने का पिरोगराम था।

ऐसा लगा कि अभी अभी सोया था और पाँच मिनट में ही अलार्म बज उठा। देखा तो सुबह के 6 बज रहे थे और कमरे की बाल्कनी के आती आवाज़ से पता चला कि खूब ज़ोरों पर बारिश हो रही है। हमारा सुबह सुबह आसन बैराज जाने का पिरोगराम था, पर अब मामला खटाई में पड़ता दिखा। मन किया कि फ़िर सो जाऊँ और सो गया। थोड़ी देर बाद दीपक को उठाया और पता लगाने को बोला कि बारिश रूकि कि नहीं, आवाज़ नहीं आ रही थी। नहीं रूकी थी, सो अपन ही उठ लिए और कमरे से बाहर गैलरी में आ गए जहाँ कुछ लोग बैठे बारिश का आनंद ले रहे थे। हमने पकौड़ों की फ़रमाईश की और पता चला कि उन्हें बनाने का आदेश रसोई में भिजवा दिया है, आते ही होंगे। यह सुन अपना मन कुछ प्रसन्न हुआ। पकौड़ों का नाश्ता कर हमने सोचा कि ऐसे ही, जिस हाल में हैं, आसन बैराज देख आते हैं, बारिश रूक गई थी। सबसे पहले हम बैराज के निकट मौजूद गढ़वाल मण्डल विकास निगम के वॉटर स्पोर्ट रिसॉर्ट में पहुँचे, मॉनसून होने के कारण पानी के सभी खेल आदि बन्द थे, हमने यहाँ नाश्ता करने की सोची, परन्तु पता लगा कि समय लगेगा। तो हमने बैराज देख आने की सोची। बैराज भी सेना के कब्ज़े में लगा, और उधर तस्वीरें आदि लेना वर्जित था। पानी अपने उफ़ान पर था, बैराज के सभी द्वार खुले हुए थे। पास ही भूमि के एक टुकड़े पर पेड़ लगे हुए थे और घास आदि थी। वहाँ कुछ बन्दर धूम मचा रहे थे और एक ट्रक के पास खड़े काँवड़ ला रहे कुछ भक्तजन उन बन्दरों की ओर केले आदि फ़ेंक रहे थे।


एक छोटे से उभरे हुए पत्थर पर बड़ा सा बन्दर बैठा केला खा रहा था, मैंने सोचा कि उसकी तस्वीर थोड़ा निकट से ली जाए, पर उसने सोचा कि मैं उसका केला लेने आ रहा हूँ, इसलिए उसने मुझ पर यलग़ार का ऐलान कर दिया। अब मेरा साहस देखिए, मैंने एक्शन के दौरान उसकी तस्वीर ले डाली और फ़िर वहाँ से हटा। अब इस साहस के लिए कम से कम पुलिट्ज़र तो मिलना ही चाहिए!! ;)


तत्पश्चात हम लोग वापस वॉटर स्पोर्ट रिसॉर्ट पहुँचे, जहाँ घंटों प्रतीक्षा करने के बाद हमारा नाश्ता आया, सर्विस बहुत ही बेकार, करीब आठ परांठे सेकने में उस रसोईये को एक घंटा लग गया, पर कुछ भी हो, नाश्ता स्वादिष्ट था जिसके कारण हम सभी का गुस्सा काफ़ुर हो गया। वापस यात्री निवास पहुँच हम लोगों ने तैयार हो चेकआऊट किया और वापसी की राह पकड़ी। अब हमारा इरादा कतई उस मार्ग से जाने का नहीं था जिससे हम आए थे। तो सबसे पहले हम पहुँचे पांवटा साहिब, जिसे दसवें सिख गुरू गोबिन्द सिंह जी ने सन्‌ 1685 के आसपास बनवाया था। गुरुद्वारे में हमें तस्वीरें लेने की आज्ञा मिल गई तो हमने फ़िर कोई विलम्ब नहीं किया!! :D




यहाँ हमने लंगर में खाना भी खाया और गुरुद्वारे में ही बना हुआ संग्रहालय भी देखा जिसमें तस्वीरों द्वारा गुरु तेग़बहादुर की भी जीवनी दर्शायी हुई है। समय तेज़ी से बीतता जा रहा था, हम लोगों ने अपनी राह पकड़ी, और यमुनानगर तथा करनाल होते हुए दिल्ली की ओर बढ़ चले। यह मार्ग बहुत ही बढ़िया था और उस पर हमारी गाड़ी मस्त तरीके से भाग रही थी। एक ढाबे पर रोक सभी ने चाय आदि पी और मैंने डूब चुके सूर्य के पीछे आकाश में रह गए रंगों की तस्वीरें ले डाली।


चाय पी किसी को मज़ा नहीं आया, बुरा सा मुँह सभी उठे और निश्चय किया कि अब बस एक बार किसी अच्छी सी जगह खाना खाने के लिए ही रूकेंगे। मूर्थल पहुँच सुखदेव के प्रसिद्ध ढाबे पर हम भोजन करने को रूके। बाहर गर्मी थी, इसलिए हम अंदर वातानुकूलित जगह पर जाकर बैठे, परन्तु अभी बैठे कुछ मिनट ही हुए थे कि बिजली रानी नाराज़ हो गई और वातानुकूलित हॉल की ऐसी कि तैसी फ़िर गई। परन्तु खाना वाकई बहुत स्वादिष्ट था, इसमें कोई दो राय नहीं। परन्तु एक बात हमको असंजस में डाल रही थी कि बाहर तो लिखा था “सुखदेव ढाबा” और अन्दर की ओर “प्रकाश ढाबा” का बोर्ड लगा था। खैर हमको क्या, खाना बढ़िया था, बस वही बहुत था। यह तस्वीर उस ढाबे की, अपने फ़ुरसतिया जी के लिए, जिन्होंने एक बार कहा था कि किसी और की नहीं तो कम से कम रेस्तरां की फ़ोटो लगा देते। तो लीजिए देखिए, पेश-ए-खिदमत है। :)


बस अब देर सी हो रही थी, गाड़ी सरपट भाग ली, एक एक कर सभी को उनके घर छोड़ा गया, आखिर में मैं लगभग डेढ़ बजे वापस घर पहुँचा।

यह यात्रा भी बड़ी सुखमयी और आनंददायी रही, चक्राता पर्वत की अभी भी याद आती है, बहुत ही मनोरम और शांत जगह है, और ठण्डी भी है, बिलकुल बीयर की बोतल के माफ़िक!! ;) यदि कुछ दिन प्रकृति के बीच शांत वातावरण में बिताने हों तो उसके लिए बहुत सही जगह है।


स्वर्ग में या स्वर्ग के निकट – भाग १


August 3rd, 2006 | 11 Comments

ना, यह कोई धार्मिक अथवा आध्यात्मिक प्रवचन नहीं है, यह तो एक और यात्रा का विवरण है। हाँ, लगता है कि जुलाई का महीना मेरे लिए यात्राओं का महीना ही था, एक ही माह में दो-दो यात्राएँ!! अभी जयपुर यात्रा और ब्लॉगर भेंटवार्ता की यादें ताज़ा ही थीं कि मैं निकल पड़ा एक और यात्रा पर।

इस बार रूख था कलसी की ओर, प्रसिद्ध पांवटा साहिब से थोड़ा आगे, देहरादून से लगभग 50 किलोमीटर पहले, हिमाचल और उत्तरांचल की सीमाओं पर बसा एक छोटा सा कस्बा, जहाँ रखी है इतिहास की एक धरोहर। कौन सी धरोहर? बताएँगे भई, समय आने पर सब बताएँगे, सब्र रखो। :)

हाँ, तो इस यात्रा की प्लानिंग आदि अपनी जयपुर यात्रा से पहले ही आरम्भ हो गई थी। जयपुर यात्रा और इसके बीच मात्र एक सप्ताहांत था, और लगभग 14 दिन। समय तेज़ी से सरकता गया और हर यात्रा से पहले के जो लटके-झटके, नाज-नखरे, रूठना-मनाना, यानि कि मान मनौव्वल जैसा कि अपेक्षित था, हुआ, पूरे जोशो-खरोश से हुआ। ;) एक ने कहा कि बरसात का मौसम है, नहीं जाएँगे, पहाड़ों में फ़ंस जाएँगे, तो दूसरे ने सुझाव दिया कि चलो आगरा चलते हैं या जयपुर चलते हैं। हम भी ढीठों की तरह अड़े रहे कि जयपुर से दो सप्ताह पहले आए हैं और आगरा बरसात में कोई खूबसूरत नहीं हो जाता, जाएँगे तो अब कलसी ही जाएँगे नहीं तो हम कहीं नहीं जा रहे, जिसे जहाँ जाना है चला जाए। ;) :P शब्दों और विचारों का तूफ़ान थमा, लोग जाने के लिए तैयार हुए, गाड़ी हमारे द्वारे आई और हम निकल चले। आशा के विपरीत मुझे मिला के आठ लोग निकल चले थे, कहाँ लग रहा था कि कोई नहीं जाएगा और कहाँ आठ लोग जा रहे थे, वाह रे मानस बुद्धि!! :)

तो 21 जुलाई 2006 की रात्रि हम निकल चले। पर यह ध्यान नहीं रहा कि शिवरात्रि आ रही है, काँवड़ उठा लोग आ रहे होंगे और मुख्य मार्गों पर भीड़ और यातायात धीमा होगा। पर खैर, हम बाग़पत-साहरनपुर के रास्ते लग लिए क्योंकि इस पर काँवड़ियों का आना जाना नहीं था। किस्मत हमेशा की तरह ज़ोरों पर थी, रास्ता इतना खराब और टूटा फ़ूटा कि बस पूछो ही मत, खाली सड़क पर भी गाड़ी तेज़ नहीं जा सकती थी, और गाड़ी ठसाठस भरी हुई थी, आठ हम लोग और नौंवा वाहनचालक। ;) हंसी मज़ाक और टाँग-खिचाई के चलते रास्ता आराम से कट रहा था कि अचानक बीयाबन में मार्ग पर गाड़ी रोकनी पड़ी, आगे ट्रकों की पंक्ति रूकी पड़ी थी, दोनों ओर, जाम लगा हुआ था। अब कोई पूछे कि दोनो ओर खेत और जंगल, बीच में टूटी-फ़ूटी सड़क, सुबह के 3 बजे जाम लगने का क्या अर्थ। तभी हमारे रेजिडेन्ट जासूस संतोष तफ़तीश करने गाड़ी से उतर आगे गए और हम लोग भी उतर टाँगें सीधी करने लगे। थोड़ी देर में संतोष वापस आए और बताया कि पुलिस वाले ट्रकों से वसूली कर रहे थे जिसके कारण जाम लगा हुआ था, संतोष ने उन्हें 3-4 गालियाँ सुनाईं तो वे डंडे के माफ़िक सीधे हुए और रास्ता खोला। अब कोई सोचे कि ऐसा कैसे हो सकता है, यूपी पुलिस को हूल दे सके ऐसा कौन हो सकता है, तो भई समझ जाओ, कोई पहुँचा हुआ बन्दा होगा जो ऐसा कर सके, संतोष चाहते तो उन वसूली करते पुलिसियों की “गंगाजल” स्टाईल क्लास भी ले सकते थे पर अपनी शराफ़त के सदके छोड़ दिया। ;)

बहरहाल, हम ऊपर-नीचे होते, हिलते डुलाते, वातानुकूलित गाड़ी की मौज लेते अपने रास्ते लगे रहे। कुछेक गाँवों आदि से भी गुज़रे, शनिवार की सुबह हो आई थी, खेतों को देखा, लोगों की सुबह की चहल पहल देखी, स्कूल जाते बच्चे देखे, भई अब सभी हमारी तरह बेकार तो नहीं बैठे हैं ना कि सप्ताहांत की छुट्टी मनाएँ!! ;) बीच में एकाध बार रूककर सभी ने गाड़ी से बाहर आ अपनी अपनी टाँगें और अन्य सामान सीधा किया, खेतों के बीच सुबह सवेरे का नज़ारा बहुत उत्तम था सो कैमरे आदि अपनी अपनी गुफ़ाओं से निकल हरकत में आ गए।




आखिरकार हम विकासनगर पहुँचे और फ़िर पूछते पाछते डाक पत्थर नामक जगह जहाँ पर मौजूद था गढ़वाल मण्डल विकास निगम का यात्री निवास जिसमें हमारा आरक्षण था। तुरत फ़ुरत हमें हमारे कमरे सौंप दिए गए और अपना सामान पटक मैं नीचे पहुँच गया जहाँ संतोष पहले से ही तस्वीरें आदि लेने में व्यस्त थे। अनीशा तस्वीरें ले चुकी थीं तथा किसी और की कोई दिलचस्पी नहीं थी। पर वहाँ से सामने वेग से बहती यमुना नदी और दूर नज़र आते चक्राता पहाड़ों का जो नज़ारा था वो वाकई देखने योग्य था, तस्वीरें उस नज़ारे को बयान नहीं कर सकती!!




तो बस फ़िर क्या था, संतोष के साथ मैं भी फ़टा-फ़ट तस्वीरें अपने कैमरे में कैद करने में व्यस्त हो गया।



परन्तु नज़ारे से अधिक दिलचस्पी संतोष को पेड़ों पर बैठने वाली चिड़ियाओं और फूलों पर बैठने वाली तितलियों में थी, सो वे उनकी तस्वीरें लिए जा रहे थे, चुपके से उनके निकट पहुँच जैसे एक बाघ अपने शिकार के निकट पहुँचता है।


मेरे कैमरे में संतोष के कैमरे जितना दम ना था, इसलिए मैंने उन पक्षियों और तितलियों की तस्वीरें लेने की चेष्टा नहीं की, लेकिन यात्री निवास के छोटे से बाग़ और उसमें लगे रंग बिरंगे फूलों ने मुझे आकर्षित किया और मैंने झट उनकी तस्वीरें ले डाली।




अगलें अंक में ज़ारी …..