पहली बात, मैंने कस्टर्ड की बात क्यों कही? अब ऐसा नहीं है कि मुझे हर समय खाने पीने की बात ही सूझती है, लेकिन वो ऐसा है कि “royale” शब्द का अर्थ जानने के लिए मैंने गूगल से पूछा तो उत्तर मिला:
a thin custard cooled and cut into decorative shapes. Used to garnish soups primarily.
अब क्या करें, अपनी तो कोई गलती नहीं है ना इसमे!!
बहरहाल, अब हुआ यूँ कि कल(रविवार) का पिरोगराम बनाया जेम्स बांड (James Bond) की नई फ़िल्म “कसीनो रोयाल”(Casino Royale) देखने का। टिकट पहले दिन ही PVR की वेबसाइट पर बुक करवा ली थी और सीटें भी बीचों बीच अपनी पसंद की चुन ली थीं। तो बस फ़िर क्या था, अपने मित्र को ले पहुँच गए क्नॉट प्लेस के पीवीआर रिवोली पर और काउन्टर पर बुकिंग का नंबर दे अपनी आरक्षित टिकटें हासिल की और सिनेमा में प्रवेश किया। समय से कुछ मिनट पहले पहुँच गए थे इसलिए कोई टेन्शन नहीं थी, हॉल के द्वार अभी खुले नहीं थे। कुछ मिनट प्रतीक्षा के बाद खुले और एक महिला अटेन्डेन्ट ने हमको हमारी सीटें दिखाई। कुछ मिनट और कुछ विज्ञापनों के बाद फ़िल्म भी आरंभ हो गई।
अब फ़िल्म का ट्रेलर देख मुझे लगा था कि शायद फ़िल्म बेकार होगी, लेकिन ऐसा नहीं है। फ़िल्म में बांड परंपरा के विपरीत कोई चमत्कारी उपकरण आदि नहीं दिखाए हैं लेकिन उसके बावजूद फ़िल्म सही लगी। परंपरागत तरीके से, फ़िल्म की शुरुआत एक एक्शन से भरपूर दृश्य से होती है जब अपना नया और हट्टा-कट्टा बांड 40-50 मंज़िल उँची क्रेन और गर्डर आदि से छलांग लगाता है और इस प्रकार फ़िल्म सही चलती रहती है। जैसा कि बांड फ़िल्मों में अक्सर होता है, मध्य तक आते आते फ़िल्म धीमी सी हो जाती है, ऐसा इसलिए भी लगता है क्योंकि आरम्भ लगभग हर बांड फ़िल्म का विस्फ़ोटक तरीके से होता है इसलिए मध्य तक आते आते फ़िल्म धीमी लगने लगती है।
लेकिन इस सब के बावजूद फ़िल्म बढ़िया है, खूबसूरत जगहों पर इसको फ़िल्माया गया है, संगीत आदि भी सही है। फ़िल्म के अंत तक आते आते एक जबरदस्त ताश का खेल होता है एक शाही से जुआघर में जिसमें बांड को हर हाल में जीतना आवश्यक होता है नहीं तो 15 करोड़ डॉलर आतंकवादियों के हाथ चले जाएँगे!! और इस खेल के दौरान बांड लगभग मर जाता है क्योंकि उसे कोई ज़हर दे देता है!!
खैर, फ़िल्म की कथा का तो मैं खुलासा नहीं करूँगा, क्योंकि यदि आपने नहीं देखी तो इसको देख अवश्य लीजिए। यदि आपको बांड की फ़िल्में अच्छी लगती हैं और इससे पहले आपने शॉन कॉनरी(पहला जेम्स बांड) या पियर्स ब्रॉसनैन(पिछला जेम्स बांड) की फ़िल्में देखी हैं तो इस फ़िल्म को देखने से पहले अपने मन में कोई आशाएँ आदि नहीं रखना। नए बांड डेनिएल क्रेग का प्रदर्शन औसत है, आने वाली फ़िल्मों में ही पता चलेगा कि इसमे कितना दम है।
फ़िल्म से बिना कोई आशा रखे उसे देखो तो वो बहुत अच्छी लगेगी। इसलिए कोई आशा नहीं रखी जाए और मौज ली जाए।
वैसे एक रोचक बात यह है कि सोनी पिक्चर की भारतीय साइट पर इस फ़िल्म के भारत में आने की तारीख़ 15 दिसंबर की है, जबकि यहाँ यह फ़िल्म 17 नवंबर को रिलीज हुई जब सारे विश्व में हुई, तो क्या यहाँ के सिनेमा वालों के पास पाईरेटिड कापी है??
साइट का रखरखाव करने वाले ऐसे आलसी और बेकार हैं कि सही जानकारी लिख नहीं सकते और गलत जानकारी को अपनी साइट पर ठीक भी नहीं कर सकते!!
बस अभी अभी थोड़ी देर पहले इंडिया टीवी के स्टूडियो से वापस लौटा हूँ। क्यों? अरे अनायस ही अपने नीरज भाई को सायं करीब सात बजे मेरी याद आ गई, बोले कि रात बारह बजे एक प्रोग्राम ज़िन्दा प्रसारित होगा, मतलब लाइव प्रसारित होगा और उसमे क्या मैं आ सकता हूँ। उन्होंने बताया कि इंटरनेट पर लोगों के बनते संबन्धों और उनकी खूबियों तथा खामियों पर चर्चा होगी, मेरे साथ दो-तीन और एक्सपर्ट होंगे जो कि चर्चा करेंगे, बोले तो अपनी विशेषज्ञ वाली राय देंगे। अपने को विशेषज्ञ करार दिए जाते ही अपन तो फूल के कुप्पा हो गए, और जब यह पत चला कि भले लोग एक गाड़ी सेवा में लगा देंगे जो लेने भी आ जाएगी और छोड़ भी जाएगी तो फ़िर क्या था, अपन तैयार हो गए। लेकिन जैसे कि किसी साक्षात्कार में कहा जाता है कि आपको कुछ समय बाद कन्फ़र्म किया जाएगा तो उसी तरह नीरज भाई ने कहा कि पक्का करके वो थोड़ी देर में बताएँगे। तो थोड़ी देर बाद फ़ुनवा बजा और नीरज भाई बोले कि हमारा सेलेक्शन हो गया है।
ठीक समय पर गाड़ी लेने पहुँच गई, अपन तैयार बैठे थे, सो तुरंत निकल लिए। अब ड्राईवर साहब ज़रा आराम से कायदे-कानून को ध्यान में रखते हुए 40-45 किलोमीटर की गति से चला रहे थे तो हम कार्यक्रम आरम्भ होने से केवल कुछ मिनट पहले ही पहुँचे। स्टूडियो पहुँचते ही नीरज भाई आअकर गले मिले और अपना ऑफ़िस दिखाया जहाँ वो विराजमान होते हैं, जो कि ऑफ़िस कम और रिकॉर्डरूम अधिक लग रिया था।
उसके बाद उन्होंने कार्यक्रम आदि के बारे में बताया और फ़िर अपने एक सहकर्मी के हवाले कर नीरज भाई अपने घर निकल लिए। अब ऊ सहकर्मी महोदय ने विशेषज्ञ पैनल की अन्य सदस्या निरूपमा जी से मिलवाया जो कि एस्कॉर्ट हॉस्पिटल में मनोवैज्ञानिक हैं और फ़िर पैनल के तीसरे और अंतिम विशेषज्ञ पवन दुग्गल जी भी आ गए जो कि सर्वोच्च न्यायालय में वकील हैं। तदोपरांत हम लोगों को मेक-अप कक्ष में ले जाया गया जहाँ थोड़ा हम लोगों को शाहिद कपूर बनाने का प्रयास किया गया।
उसके बाद सीधे प्रसारण कक्ष में जहाँ कार्यक्रम शूट होना था।
अब कार्यक्रम में क्या हुआ यह तो आपने देख ही लिया होगा, नहीं देखा तो नीरज भाई से दरख़्वास्त की जाए कि कार्यक्रम का वीडियो उपलब्ध करवाया जाए। लेकिन इतना कहूँगा कि रात 12 से 3 बजे के कार्यक्रम में भी लोगों का रिस्पॉन्स काफ़ी अच्छा था, कई लोग पूरे भारत में कार्यक्रम देख रहे थे और फ़ोन कर अपने प्रश्न आदि पूछ रहे थे। तीन घंटे कब और कैसे बीत गए पता ही नहीं चला, समय अदृश्य पंखों पर उड़ान भरता रहा और कार्यक्रम समाप्त हो गया। पवन जी और निरूपमा जी से विदा ली और अपने बसेरे पर वापस आ गए।
जितनी भी चर्चा वहाँ हुई, उससे अपने तौर पर मैं यही निश्कर्ष निकालूँगा कि लोगों के मन में भ्रांति काफ़ी आधिक है। वास्तविक संसार में कोई प्रेम संबन्ध या व्यवसायिक संबन्ध असफ़ल हो जाए तो अलग बात है लेकिन इंटरनेट के ज़रिए यदि ऐसा हो तो इंटरनेट पर लांछन लगा दिया जाता है। यह बेवकूफ़ी भी है, अज्ञान भी बहुत है, लेकिन अभी सुबह के पाँच बजने वाले हैं, सोने का समय हो आया है इसलिए इस विषय पर भी फ़िर कभी।
हाँ, तो पिछली बार एक कहानी प्रस्तुत की और पूछा कि “दोषी कौन है”। अब कुछ बंधुओं ने उत्तर देने का प्रयास किया, लेकिन बहुत से उत्तर देने से कतरा गए। काहे? अब यह तो मुझे नहीं पता, उन्हीं से पूछा जाए तो बताएँगे ना!!
बहरहाल, उत्तर हम बताए देते हैं कि दोषी कौन है, लेकिन कुछ डिटेल आदि देना इस विषय में आवश्यक है। तो पहले कहानी में मौजूद या चर्चित पात्रों को एनालाइज़ कर लिया जाए!!
इंद्र देव: अजी ये तो दोषी हो ही नहीं सकते, कैसे हो सकते हैं, इनकी तो कहानी में कोई भूमिका ही नहीं है, सिर्फ़ ज़िक्र मात्र है वो भी अंत में ब्राह्मण द्वारा, और कोई जादू मंतर की कहानी मैंने सुनाई नहीं(जानने वाले जानते हैं कि अपने को ऐसी वाहियात बातों पर विश्वास भी नहीं)। तो इसलिए इंद्र देव को बाइज़्ज़त बरी किया जाता है।
रखवाला: अब दोषी तो यह भी नहीं। कोई एक ही काम थोड़े ही है उसको कि चौबीसों घंटे गाय के सिरहाने रहे!! वह बाग़ का भी रखवाला है और फ़िर और भी कई काम है, अब बच्चे की जान लोगे क्या!!
गाय के घूमने फ़िरने का समय होगा, इसलिए भी हो सकता है कि उसको खुला छोड़ दिया हो, इसलिए इस पर भी कोई मुकदमा नहीं बनता, इसलिए इसको भी बाइज़्ज़त बरी किया जाता है।
गाय: अब गाय पूरी तरह तंदरूस्त थी, कोई गुप्त रोग आदि भी नहीं था उसको, पोस्टमॉर्टम में यह साबित हो गया, और इसका तो मर्डर….. बोले तो खून हुआ था तो यह तो दोषी हो ही नहीं सकती।
ब्राह्मण: इतनी बेदर्दी से तो गाय को पीटा, मरेगी नहीं तो क्या अमर हो जाएगी?? यही दोषी है।
अब भाई लोगों ने सोचा कि यार इतनी आसान सी कहानी और कोई गुत्थी भी नहीं, ऐसा कैसे हो सकता है। लगता है कि सीआईडी, डॉन आदि सीरियल देख सभी का दिमाग जासूसी हो गया है, सीधे साधे मामले में भी कोई टेढ़ा मोड़ निकालने की सोचते हैं। अरे भई कहानी और प्रश्न सीधे थे और उत्तर भी सीधा ही था/है, ब्राह्मण ही दोषी।
लेकिन आप सोचते हैं कि इसके पीछे क्या मकसद? तो यार मकसद हम पैदा किए देते हैं। अब आप कहानी, उसके दृश्य और उसके पात्रों का अवलोकन कीजिए। ब्राह्मण है हमारी सरकार मशीनरी जो काफ़ी दूर से चली आ रही है(भई लगभग साठ सालों से चली आ रही है) और अभी काफ़ी आगे जाना है(हम तो समझते हैं कि अभी काफ़ी आगे जाना है, आप अलग सोचते हों तो जुदा बात है)। गाय है जनता, बहुत भोली है, कोई कितना भी शोषण करे, कुछ नहीं कहती, कोई मार मार के जान ले ले तब भी नहीं। रखवाला है कानून व्यवस्था, या कह सकते हैं कि उच्च तथा मुख्य न्यायालय जिसके “डील-डौल”(ताकत) को देख ब्राह्मण(सरकारी मशीनरी) भी काँपे!! अब इंद्र कौन है? इंद्र हैं बहुराष्ट्रीय(देशी और विदेशी) धनाढ्य कंपनियाँ जो कि ठीक इंद्र की भांति संपन्न हैं, विलासिता में डूबी रहती हैं और जिनका सिंहासन बहुत जल्दी हिलता है!!
यदि अभी भी समझ नहीं आया तो बताता हूँ, दरअसल कहानी पूरी कि पूरी अन्योक्ति अलंकार के रस में डूबी(”नहाई” कहना ठीक नहीं) हुई थी। अब पात्रों पर से नक़ाब हटाने के बाद आपको समझ आ गया होगा कि कहानी वास्तव में कौन सी तस्वीर दिखा रही थी। पर कुछ लोगों का अन्योक्ति अलंकार से पहले कभी वास्ता नहीं पड़ा, वे दूसरे की कही/लिखी हर चीज़ face value पर लेते हैं, शब्दों का आक्षरिक अर्थ यानि कि literal meaning लेते हैं और मज़े की बात है कि कविता भी कर लेते हैं। अब कवि होना और अलंकारों से अनभिज्ञता, बात हज़म नहीं होती कदाचित् हाजमोला लेनी ही होगी!!
अब मैंने ऐसा क्यों कहा? अरे भई कुछ नहीं, किसी पर कोई कटाक्ष नहीं है। वो बात दरअसल यूँ है कि पिछली बार जब मैंने एक प्रोफ़ेसर साहब के एक वाहियात लेख का तीया-पाँच किया था तो संपन्न लोगों की ओर इशारा करते हुए राजबालकों और राजपरिवार का उदाहरण दिया था जो कि अन्योक्ति अलंकार ही था निश्चित रूप से। अब इन साहब को कुछ और नहीं मिला तो मुझ पर व्यंग्य कसने लगे कि एक लोकतंत्र का वासी हो मैं राजतंत्र की वकालत कर रहा हूँ। तब मुझे एहसास हुआ कि जब लिख रहे हो तो बता तो कहाँ कौन सा अलंकार प्रयोग किया है, अतिश्योक्ति आदि तो खैर अधिकतर को समझ आ ही जाता है, अन्योक्ति के बारे में बता देना ही ठीक है, वरना खामखा लोग अपना और मेरा और दूसरों का समय बर्बाद करें, उसका कोई लाभ नहीं, भई आखिर कभी चाणक्य ने कहा था:
जीवन का एक क्षण सौ करोड़ स्वर्ण मुद्राएँ देने पर भी नहीं खरीदा जा सकता
जो कि शत-प्रतिशत सही है, इसलिए काहे किसी का समय बर्बाद करो, दिमाग पर ज़ोर डलवाओ, इसलिए बता दिया अभी कि कहानी में अन्योक्ति अलंकार था।
तो यह तो मैंने कहानी के अंत में पूछे गए प्रश्न का उत्तर दे जिज्ञासु जनों की जिज्ञासा को शांत किया। लेकिन मुद्दे की बात अभी बाकी है। परन्तु अब सुबह हो आई है, समय नहीं है, इसलिए इसको अगली बार ज़ारी रखेंगे।
अभी सोते सोते ख्याल आया, तुरंत कम्पयूटर चालू करा और उस ख्याल को ब्लॉग पर उतार रहा हूँ। ना….. ना….. कोई नया फ़ड्डा नहीं है, कोई नया विवाद नहीं है, बड़े ही काम की चीज़ है, एक लघु कथा और एक आसान प्रश्न है।
एक बार की बात है, एक ब्राह्मण कहीं दूर से पैदल चल कर आ रहा था। दोपहर का समय था और धूप तेज़ हो चली थी। पास ही उसे एक बग़ीचा दिखाई दिया और फ़लदार वृक्ष की छाँव में उसने कुछ देर आराम करने की सोची। अभी उसकी आँख लगी ही थी कि एक गाय उधर आ निकली और रंभाने लगी। ब्राह्मण के विश्राम में विघ्न पड़ा और उसकी निद्रा टूट गई। उसने तरह तरह की आवाज़ कर गाय को भगाने का बड़ा प्रयत्न किया लेकिन गाय वहीं विचरती रही और रंभाती भी रही। ब्राह्मण ने आव देखा न ताव, अपनी लाठी उठाई और निरीह गाय को बेदर्दी से पीटने लगा। आवेश में बह चुके ब्राह्मण का हाथ तब रूका जब उसने देखा कि गाय भूमि पर गिर पड़ी है और उसका रंभाना बन्द हो गया। तसल्ली हो जाने पर ब्राह्मण पेड़ के नीचे पुनः नींद के हवाले हो गया।
कुछ समय बाद सांय काल होने पर सूर्य का प्रकोप कम हुआ, मौसम थोड़ा ठंडा हुआ और ब्राह्मण की निद्रा खुली, उसने अपने को बहुत तरोताज़ा महसूस किया। फ़िर उसकी नज़र उस गाय पर पड़ी, वह अभी भी वैसे ही भूमि पर पड़ी हुई थी। ब्राह्मण को शंका हुई तो निवारण हेतू वह गाय के पास गया। पास जाकर पता चला कि गाय परलोक सिधार गई है। ब्राह्मण के हाथ पाँव फूल गए, उसके हाथों गौ हत्या हो गई थी। कोढ़ में खाज की तरह उसी समय बग़ीचे का रखवाला उसी गाय को ढूँढता हुआ वहाँ आया और गाय को मरा पाकर हतप्रभ रह गया। ब्राह्मण पर उसे संदेह हुआ तो उसने पूछा, “हे विप्र, मैं इस बग़ीचे और गाय का रखवाला हूँ। क्या आप बता सकते हैं कि इस गाय की मृत्यु का कारण कौन है?”
ब्राह्मण का दिमाग तेज़ी से चल रहा था, उसकी नज़र हट्टे कट्टे रखवाले और उसकी मोटी लाठी पर थी। अंत में ब्राह्मण ने निर्णय लिया और बोला, “वत्स, इंद्र देव इसकी मृत्यु का कारण हैं। क्योंकि गऊ को यम तो ले जा नहीं सकते, ऐसा कार्य तो देवेन्द्र ही के बस में हैं।”
रखवाला मुँह बाए ब्राह्मण को देखता रहा, उसको समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहे।
अब आप बताएँ कि वास्तव में गौ हत्या किसने की? ब्राह्मण ने? या इंद्र देव ने?
उत्तर के साथ तर्क हो तो बहुत बढ़िया रहेगा।
अस्वीकरण: यह लेख एकाध अन्य लेखों और वैसी मानसिकता रखने वालों को धरातल पर लाने का प्रयास है। इसमें आलोचना भी है, कटाक्ष भी है, और व्यंग्य भी है, लेकिन किसी का अपमान करने का इरादा नहीं है। यदि आप इस सबको सही भावना से नहीं ले सकते तो कृपया आगे नहीं पढ़ें। कोई भी असभ्य टिप्पणी तुरंत मिटा दी जाएगी। आपको सावधान कर दिया गया है, आगे जो हो उसके ज़िम्मेदार आप स्वयं हैं।
यह कोई नई बात नहीं, ऐसे मुद्दे पहले भी उठते आए हैं, आगे भी उठते आएँगे। सवाल यह है कि इन बेकार के मुद्दों पर हम अपना कितना समय व्यर्थ करने के लिए तैयार हैं? आज दो व्यक्तियों के विचार पढ़ लगा कि थोड़ा समय मुझे भी निकालना चाहिए इस व्यर्थाग्नि में आहुति देने के लिए।
यहाँ इस मुद्दे की शुरुआत हुई सृजनशिल्पी जी के लेख “सत्ता की साजिश और भूमंडलीकरण” से जिस पर संजय भाई की टिप्पणी से तथाकथित हलचल हुई, कुछ लोगों के पंख हिले। ज़्यादा कुछ नहीं संजय भाई ने बस इतना ही कहा था:
मैं यह नहीं समझ पा रहा हूँ की पेप्सी का विरोध करने से क्या सबको पानी मिल जाएगा या फिर पाँच सितारा स्कुलो को रोक कर सबको शिक्षा मिलना तय हो जाएगा?
बात तो उनकी तर्कसंगत है, परन्तु यहाँ ज़रा तर्क को हम साईड में लगा देते हैं, उससे हर किसी का पाला नहीं पड़ता।
तो हम आगे बढ़ते हैं। सृजनशिल्पी जी ने एक अन्य पोस्ट इस विषय पर लिखी जिसमें उन्होंने दो बातें बताई।
तो भई पहली वाली बात पर तो संजय भाई अपना मत ज़ाहिर कर ही चुके हैं, उसमें कहने को कुछ खास है नहीं, इसलिए उस व्यर्थाग्नि में मैं कोई आहुति नहीं दे रहा। अनूप जी ने जो अपनी टिप्पणी में सहमति असहमति वाली बात कही उससे मैं भी सहमत हूँ। प्रजातंत्र है भई, हर कोई अपनी अपनी सोच रखने के लिए स्वतंत्र है। क्या वे क्षुब्ध चिट्ठाकार यह समझते हैं कि जिस बात से वे सहमत हैं उससे सभी को समहत होना आवश्यक है?? यदि ऐसा समझते हैं तो कम से कम इस बात को कहने का जिगरा भी होना चाहिए, नहीं तो जो समझना है समझते रहो, समझने पर अभी हमारी सरकार ने कोई टैक्स नहीं लगाया है!!
दूसरी वाली बात पर आते हैं, वो व्यर्थता के मापदण्ड पर अधिक महत्व रखती है इसलिए आहुति उसी को मिलनी चाहिए।
हाँ तो साहबान, बात यह है कि सृजनशिल्पी जी ने जिन प्रोफ़ेसर साहब का लेख छापा वे दिल्ली विश्वविद्यालय के गणित विभाग के विभागाध्यक्ष रह चुके हैं। खैर हमें उनकी जॉब प्रोफ़ाईल से क्या करना, हमें तो केवल उनके विचारों से आपत्ति है क्योंकि वे बहुत ही सीमित ज्ञान पर आधारित मालूम पड़ते हैं और बड़ा निष्कर्ष निकालते हैं।
तो प्रोफ़ेसर साहब लिखते हैं:
भारतीय बाजार में उतरने के बाद एक कोल्ड ड्रिंक कम्पनी की उच्च स्तरीय प्रबंध समिति ने अपने मूल मंत्र की घोषणा की–“हमारा सबसे बड़ा दुश्मन है, पानी”। बात सीधी थी–गर्म देश में राह चलने वाले को पानी न मिले तो झक मारकर आदमी प्यास बुझाने के लिए कुछ भी लेगा, किसी भी कीमत पर लेगा। रणनीति बनी, योजनाएँ बनाई गई कि सार्वजनिक स्थानों पर पानी कम से कम मिले। सार्वजनिक स्थानों–बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों पर लगे नल सूखने लगे। जब गाड़ियों का समय होता तब विशेष रूप से नल बन्द रहने लगे। रेलों में, बसों में, विशेष रूप से नल बन्द रहने लगे। रेलों में, बसों में बोतलों की टनटनाहट और फेरीवालों की आवाज “कोल्ड ड्रिंक….कोल्ड ड्रिंक” तेज होती गई।
अब गोया कोल्ड ड्रिंक कंपनी की उच्च स्तरीय समिति ने ऐसी बात कही होगी तो ज़ाहिर है कि खुल्लम खुल्ला तो नहीं कही होगी, आपस की बात होगी, तो इन साहब को कैसे पता चली?? क्या राज़ है इसमें मास्टरजी??
खैर वे आगे लिखते हैं कि:
इस नए युग में पानी का ही नहीं, लस्सी, ठंडई, तरह तरह के शरबत और स्वास्थ्यवर्धक फलों के रस का स्थान मोटापा बढ़ाने वाले, दाँत और हड्डी गलाने वाले अल्कोहल युक्त पेप्सी और कोक ने ले लिया।
तो गोया मास्टरजी को यह नहीं पता कि लस्सी, शरबत और स्वास्थयवर्धक फ़लों के रस के सेवन से भी मोटापा और गैस आदि की समस्या होती है। यकीन नहीं आता तो किसी भी डॉक्टर के पास चलिए हम आपको तसल्ली करवाए देंगे। लेकिन किसी सरकारी डॉक्टर के पास नहीं जाएँगे, हम किसी समझदार डॉक्टर की सलाह दिलवाना चाहते हैं मास्टर जी को।
आगे लिखते हुए मास्टर जी कहते हैं:
फिर पानी की बदनामी होने लगी। जी हाँ, सार्वजनिक स्थानों पर उपलब्ध पानी की, नगर निगमों द्वारा वितरित पानी की, रेल प्रशासन द्वारा स्टेशनों पर उपलब्ध कराए गए पानी को गन्दा और पीने लायक न होने की बात फैलाई गई।
तो मास्टरजी, कभी आप रेलवे स्टेशन, बस अड्डे आदि पर बने प्याऊ आदि पर गए हैं? गए होते तो ऐसा नहीं कहते। कोई बात नहीं, हम ज्ञानवर्धन किए देते हैं। बात यूँ है मास्टर जी कि इन स्थानों पर जो प्याऊ होते हैं, उनकी सफ़ाई आदि का कदाचित् ही ध्यान रखा जाता है, तो अस्वच्छ तो अपने आप हो गए। पानी की स्वच्छता को तो एक बार को गोली मारो, लेकिन जिस टूटी से वह निकलता है जब उसपर और आसपास गंदगी पड़ी होगी तो पानी तो अपने आप पीने लायक नहीं रहेगा, चाहे उसमें से बोतलबंद पानी निकल रहा हो!! अब यह मत कह देना मास्साब कि यह प्याऊ आदि की इस दुर्गति की ज़िम्मेदार भी कोला कंपनियाँ हैं।
आगे इन मास्साब का कहना है:
गाँधीजी ने एक बार ही पानी पीकर कुल्हड़ को तोड़ देने को मनुष्य के श्रम का अपमान बताया था। सन्त तिरुवल्लुवर ने साड़ी को नष्ट करके, पैसा देकर उसकी भरपाई करने वाले की मूर्खता की कथा सुनाई थी। पानी पीकर बोतल तोड़ते हुए जब लोगों को देखता हूँ तो लगता है कि गाँधी-तिरुवल्लुवर की गर्दन मरोड़ी जा रही है। एक लीटर पानी पीकर तीन रुपये की प्लास्टिक की बोतल तोड़ना यूज एंड थ्रो संस्कृति में ढालने का बेजोड़ उदाहरण है। रेलवे लाइन पर सभी जगह टूटी हुई प्लास्टिक की बोतलों की सजावट देखी जा सकती है। फटेहाल बच्चे इन बोतलों को उठाकर बेचने न ले जाते तो सुप्रीम कोर्ट को इस अम्बार की सफाई करने का आदेश रेलवे प्रशासन को देने के लिए मजबूर होना पड़ता। वैसे, वैष्णो देवी की यात्रा के रास्ते में टूटी प्लास्टिक की बोतलों का भक्तों द्वारा चढ़ाया जा रहा अम्बार यदि ऐसे ही बढ़ता रहा तो कुछ वर्षों बाद वैष्णो देवी यात्रा को भी बन्द करना पड़ेगा, जैसा कि फूलों की घाटी को बंद करना पडा था।
मास्साब, एक बात कहना चाहूँगा। कभी कोई कार्य करने से पहले आप सोचते हैं कि ऐसा क्यों किया जा रहा है? या भेड़चाल के तहत बस कर देते हैं क्योंकि सभी ऐसा कर रहे हैं?? यह 2 + 2 वाला फ़ंडा नहीं है जहाँ हमेशा उत्तर 4 ही आएगा। पुनः ज्ञानवर्धन हम किए देते हैं। पानी पीकर बोतल तोड़ने को इसलिए कहा जाता है ताकि बिना पुनर्चक्रण के वे बोतलें प्रयोग ना हो सकें। अब उनका पुनर्चक्रण करना हर किसी के बस का रोग नहीं, तो इसका यह लाभ कि कुछ असमाजिक तत्व उन बोतलों को इकट्ठा कर उसमें नल का पानी भर उसे दोबारा पैक कर न बेच सकें। अब आप कहने लगेंगे कि भई यह तो गलत बात है, गरीब लोगों का रोज़गार मारा जा रहा है उन्हें बोतलें दोबारा पैक कर बेचने से रोक कर, तो मास्साब, कल को यह नहीं कहना कि चोर को पकड़ क्यों उसके पेट पर लात मारी जा रही है, आतंकवादी को मारते क्यों हो वो तो अपना काम ही कर रहा था बेचारा गरीब!! और रही बात बोतलों के बढ़ते ढेर की, तो मास्साब, आप सरकारी सफ़ाई विभाग का आलस्य क्यों नहीं देखते, लोगों की जेब तुरंत साफ़ कर देने वाले अपने काम यानि कि असली साफ़ सफ़ाई से मुँह मोड़े खड़े हैं, तो कूड़े का ढेर तो अपने आप ही लगेगा ना??
बस…..बस…..मास्साब, हम समझ सकते हैं आपकी मनोस्थिति, कुछ मत कहिए!!
बहरहाल, आगे मास्टर जी लिखते हैं:
घर में खरीदकर पानी पीने वाले नौकरों और सामान्य अतिथियों के लिए सरकारी पानी ही प्रयोग करते हैं। खरीदे हुए पानी को नौकर-चाकरों से बचाकर रखने की रणनीति अपनाई जाती है।
क्या “खरीदा हुआ” पानी लगा रखा है? घर में जो पानी आता है वो मुफ़्त में आता है?? आपका तो पता नहीं मास्टर जी पर हमारे यहाँ और लाखों अन्य लोगों के घरों में वरुण विभाग ने मीटर लगा रखे हैं जिस पर दर्ज होता है कि वह घर एक माह में कितना पानी इस्तेमाल करता है और उसके अनुसार उस घर के लोगों को वरुण विभाग को प्रयोग किए गए पानी का नकद भुगतान करना पड़ता है। तो नल में आने वाला पानी मुफ़्त तो कहीं से नहीं हुआ!! और हमने अभी एक्वागार्ड और फ़िल्टर आदि द्वारा पेयजल के शुद्धिकरण में लगने वाली बिजली को तो गिना भी नहीं। तो क्या “खरीदा हुआ पानी” का रट्टा लगा रखा है? हम मुफ़्तखोर नहीं है, आपकी कह नहीं सकते!!
और पानी पिलाना यदि पुण्य का कार्य है तो ये जाकर वरुण विभाग वालों को बताओ जो पैसे लेने के बावजूद सड़ा गंदा पानी सप्लाई करते हैं!! फ़िर वो बताएँगे आपको कि क्या और कितना पुण्य का कार्य है।
अजी अभी कहाँ जाते हैं, मास्टर जी के पास अभी मसाला समाप्त नहीं हुआ। वे आगे फ़रमाते हैं:
पहले सार्वजनिक शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा के साथ भी यही किया गया। फलस्वरूप, अमीरों के स्कूल अलग और गरीबों के अलग, अमीरों के अस्पताल अलग और गरीबों के अस्पताल अलग हो गए। अब बँटवारा हो रहा है, अमीर का पानी और गरीब का पानी।
वैसे इसका उत्तर भी संजय भाई ने सही तरीके से दिया है, लेकिन ताबूत में एकाध कील मैं भी ठोक देता हूँ। मास्टर जी को कदाचित् यह ध्यान नहीं रहा कि पुरातन समय में भी ऐसा होता था, राजबालकों के गुरुकुल अलग भी होते थे जहाँ आम जनता के बालकों को शिक्षा नहीं दी जाती थी। राजसी खाने और आम जन के खाने में पहले भी ज़मीन आसमान का अंतर होता था, अब पानी को फ़िल्टर करने आदि की तकनीक और मशीने नहीं थी उनके पास वरना राजसी पानी भी आम जन के पानी से अलग हो जाता!!!
तो गौरतलब बात यह है कि यहाँ किस चीज़ पर बहस हो रही है? यहाँ बहस की जड़ अमीर-गरीब के बीच का फ़ासला है। अब कुछ लोग इसको बदल देना चाहते हैं, ऐसे घाट बनाना चाहते हैं कि जहाँ शेर और बकरी एक साथ पानी पिएँ। अच्छी बात है, लगे रहो, यही कह सकते हैं हम, क्योंकि हम जैसे खुले विचारों की मानसिकता रखने वाले जानते हैं कि ये लोग एक भ्रम में जी रहे हैं, जीवन की सच्चाई से अभी अवगत नहीं हैं। जीवन की सच्चाई यह है कि अमीर-गरीब का फ़ासला आज का नहीं है, जब से मानव सभ्यता जन्मी है तभी से है, हज़ारों वर्षों से यह फ़ासला बना रहा है, यह एक ऐसा सत्य है जिसे आप क्या कोई नहीं बदल सकता। समाज के अस्तित्व के लिए यह फ़ासला आवश्यक है, जिस दिन किसी ने इस फ़ासले को समाप्त कर दिया उस दिन समाज के नाश का समय आ जाएगा। परन्तु अभी आने वाले समय में ऐसा होता नहीं नज़र आता। सोवियत संघ के संस्थापक लेनिन और अन्य समाजवादी लोगों का यही प्रयास था, नतीजा सभी को पता है।
पर यह बात इन प्रोफ़ेसर साहब जैसे लोगों को समझ नहीं आती, वे इस मृगतृष्णा के पीछे निरंतर भागते रहते हैं इस भ्रम को पाले कि उनकी सोच सही है और एक दिन वे इस सोच को पूरा कर दिखाएँगे। इनको चाहिए कि वापस अपने काम धंधे पर लगें, विद्यार्थियों को 2 + 2 पढ़ाएँ, ये जीवन शास्त्र की बातें हैं, गणित वाले मास्साब के लेवल की नहीं हैं।
गौर किया जाए तो यह निष्कर्ष भी निकलता है कि बात यहाँ कोला या बोतल बंद पानी की नहीं है, बात है बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विरोध करने की, चाहे वह कैसे भी तर्कों या कुतर्कों से किया जाए। कोला को लेकर इतना उखड़ रहे हैं, क्या अपनी देसी कैम्पा कोला को भूल गए?? बोतल बंद पानी के पाप में मग्न देसी पानी की कंपनियों को भूल गए??
खैर छोड़ो यार, इस व्यर्थाग्नि में आहुति देने का मन हो आया, इसलिए हमने भी अपना कुछ समय बर्बाद कर लिया, इसी बहाने ब्लॉग पर एक नई पोस्ट आ गई, बल्ले भई!!