RSS

भ्रमित है भ्रम …..


November 12th, 2006 at 01:44 am | 23 Comments

अस्वीकरण: यह लेख एकाध अन्य लेखों और वैसी मानसिकता रखने वालों को धरातल पर लाने का प्रयास है। इसमें आलोचना भी है, कटाक्ष भी है, और व्यंग्य भी है, लेकिन किसी का अपमान करने का इरादा नहीं है। यदि आप इस सबको सही भावना से नहीं ले सकते तो कृपया आगे नहीं पढ़ें। कोई भी असभ्य टिप्पणी तुरंत मिटा दी जाएगी। आपको सावधान कर दिया गया है, आगे जो हो उसके ज़िम्मेदार आप स्वयं हैं।

यह कोई नई बात नहीं, ऐसे मुद्दे पहले भी उठते आए हैं, आगे भी उठते आएँगे। सवाल यह है कि इन बेकार के मुद्दों पर हम अपना कितना समय व्यर्थ करने के लिए तैयार हैं? आज दो व्यक्तियों के विचार पढ़ लगा कि थोड़ा समय मुझे भी निकालना चाहिए इस व्यर्थाग्नि में आहुति देने के लिए।

यहाँ इस मुद्दे की शुरुआत हुई सृजनशिल्पी जी के लेख “सत्ता की साजिश और भूमंडलीकरण” से जिस पर संजय भाई की टिप्पणी से तथाकथित हलचल हुई, कुछ लोगों के पंख हिले। ज़्यादा कुछ नहीं संजय भाई ने बस इतना ही कहा था:

मैं यह नहीं समझ पा रहा हूँ की पेप्सी का विरोध करने से क्या सबको पानी मिल जाएगा या फिर पाँच सितारा स्कुलो को रोक कर सबको शिक्षा मिलना तय हो जाएगा?

बात तो उनकी तर्कसंगत है, परन्तु यहाँ ज़रा तर्क को हम साईड में लगा देते हैं, उससे हर किसी का पाला नहीं पड़ता। ;) तो हम आगे बढ़ते हैं। सृजनशिल्पी जी ने एक अन्य पोस्ट इस विषय पर लिखी जिसमें उन्होंने दो बातें बताई।

  1. संजय भाई की टिप्पणी से कुछ चिट्ठाकार लोग क्षुब्ध हुए लेकिन अपनी प्रतिक्रिया उन्होंने इसलिए व्यक्त नहीं की ताकि संजय भाई को बुरा न लगे।
  2. संजय भाई की और उनके जैसी मानसिकता रखने वाले लोगों को लाईन पर लाने के लिए किसी प्रोफ़ेसर साहिब का लेख छापा।

तो भई पहली वाली बात पर तो संजय भाई अपना मत ज़ाहिर कर ही चुके हैं, उसमें कहने को कुछ खास है नहीं, इसलिए उस व्यर्थाग्नि में मैं कोई आहुति नहीं दे रहा। अनूप जी ने जो अपनी टिप्पणी में सहमति असहमति वाली बात कही उससे मैं भी सहमत हूँ। प्रजातंत्र है भई, हर कोई अपनी अपनी सोच रखने के लिए स्वतंत्र है। क्या वे क्षुब्ध चिट्ठाकार यह समझते हैं कि जिस बात से वे सहमत हैं उससे सभी को समहत होना आवश्यक है?? यदि ऐसा समझते हैं तो कम से कम इस बात को कहने का जिगरा भी होना चाहिए, नहीं तो जो समझना है समझते रहो, समझने पर अभी हमारी सरकार ने कोई टैक्स नहीं लगाया है!! ;) दूसरी वाली बात पर आते हैं, वो व्यर्थता के मापदण्ड पर अधिक महत्व रखती है इसलिए आहुति उसी को मिलनी चाहिए। ;)

हाँ तो साहबान, बात यह है कि सृजनशिल्पी जी ने जिन प्रोफ़ेसर साहब का लेख छापा वे दिल्ली विश्वविद्यालय के गणित विभाग के विभागाध्यक्ष रह चुके हैं। खैर हमें उनकी जॉब प्रोफ़ाईल से क्या करना, हमें तो केवल उनके विचारों से आपत्ति है क्योंकि वे बहुत ही सीमित ज्ञान पर आधारित मालूम पड़ते हैं और बड़ा निष्कर्ष निकालते हैं।

तो प्रोफ़ेसर साहब लिखते हैं:

भारतीय बाजार में उतरने के बाद एक कोल्ड ड्रिंक कम्पनी की उच्च स्तरीय प्रबंध समिति ने अपने मूल मंत्र की घोषणा की–“हमारा सबसे बड़ा दुश्मन है, पानी”। बात सीधी थी–गर्म देश में राह चलने वाले को पानी न मिले तो झक मारकर आदमी प्यास बुझाने के लिए कुछ भी लेगा, किसी भी कीमत पर लेगा। रणनीति बनी, योजनाएँ बनाई गई कि सार्वजनिक स्थानों पर पानी कम से कम मिले। सार्वजनिक स्थानों–बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों पर लगे नल सूखने लगे। जब गाड़ियों का समय होता तब विशेष रूप से नल बन्द रहने लगे। रेलों में, बसों में, विशेष रूप से नल बन्द रहने लगे। रेलों में, बसों में बोतलों की टनटनाहट और फेरीवालों की आवाज “कोल्ड ड्रिंक….कोल्ड ड्रिंक” तेज होती गई।

अब गोया कोल्ड ड्रिंक कंपनी की उच्च स्तरीय समिति ने ऐसी बात कही होगी तो ज़ाहिर है कि खुल्लम खुल्ला तो नहीं कही होगी, आपस की बात होगी, तो इन साहब को कैसे पता चली?? क्या राज़ है इसमें मास्टरजी??

खैर वे आगे लिखते हैं कि:

इस नए युग में पानी का ही नहीं, लस्सी, ठंडई, तरह तरह के शरबत और स्वास्थ्यवर्धक फलों के रस का स्थान मोटापा बढ़ाने वाले, दाँत और हड्डी गलाने वाले अल्कोहल युक्त पेप्सी और कोक ने ले लिया।

तो गोया मास्टरजी को यह नहीं पता कि लस्सी, शरबत और स्वास्थयवर्धक फ़लों के रस के सेवन से भी मोटापा और गैस आदि की समस्या होती है। यकीन नहीं आता तो किसी भी डॉक्टर के पास चलिए हम आपको तसल्ली करवाए देंगे। लेकिन किसी सरकारी डॉक्टर के पास नहीं जाएँगे, हम किसी समझदार डॉक्टर की सलाह दिलवाना चाहते हैं मास्टर जी को। ;)

आगे लिखते हुए मास्टर जी कहते हैं:

फिर पानी की बदनामी होने लगी। जी हाँ, सार्वजनिक स्थानों पर उपलब्ध पानी की, नगर निगमों द्वारा वितरित पानी की, रेल प्रशासन द्वारा स्टेशनों पर उपलब्ध कराए गए पानी को गन्दा और पीने लायक न होने की बात फैलाई गई।

तो मास्टरजी, कभी आप रेलवे स्टेशन, बस अड्डे आदि पर बने प्याऊ आदि पर गए हैं? गए होते तो ऐसा नहीं कहते। कोई बात नहीं, हम ज्ञानवर्धन किए देते हैं। बात यूँ है मास्टर जी कि इन स्थानों पर जो प्याऊ होते हैं, उनकी सफ़ाई आदि का कदाचित्‌ ही ध्यान रखा जाता है, तो अस्वच्छ तो अपने आप हो गए। पानी की स्वच्छता को तो एक बार को गोली मारो, लेकिन जिस टूटी से वह निकलता है जब उसपर और आसपास गंदगी पड़ी होगी तो पानी तो अपने आप पीने लायक नहीं रहेगा, चाहे उसमें से बोतलबंद पानी निकल रहा हो!! अब यह मत कह देना मास्साब कि यह प्याऊ आदि की इस दुर्गति की ज़िम्मेदार भी कोला कंपनियाँ हैं। ;)

आगे इन मास्साब का कहना है:

गाँधीजी ने एक बार ही पानी पीकर कुल्हड़ को तोड़ देने को मनुष्य के श्रम का अपमान बताया था। सन्त तिरुवल्लुवर ने साड़ी को नष्ट करके, पैसा देकर उसकी भरपाई करने वाले की मूर्खता की कथा सुनाई थी। पानी पीकर बोतल तोड़ते हुए जब लोगों को देखता हूँ तो लगता है कि गाँधी-तिरुवल्लुवर की गर्दन मरोड़ी जा रही है। एक लीटर पानी पीकर तीन रुपये की प्लास्टिक की बोतल तोड़ना यूज एंड थ्रो संस्कृति में ढालने का बेजोड़ उदाहरण है। रेलवे लाइन पर सभी जगह टूटी हुई प्लास्टिक की बोतलों की सजावट देखी जा सकती है। फटेहाल बच्चे इन बोतलों को उठाकर बेचने न ले जाते तो सुप्रीम कोर्ट को इस अम्बार की सफाई करने का आदेश रेलवे प्रशासन को देने के लिए मजबूर होना पड़ता। वैसे, वैष्णो देवी की यात्रा के रास्ते में टूटी प्लास्टिक की बोतलों का भक्तों द्वारा चढ़ाया जा रहा अम्बार यदि ऐसे ही बढ़ता रहा तो कुछ वर्षों बाद वैष्णो देवी यात्रा को भी बन्द करना पड़ेगा, जैसा कि फूलों की घाटी को बंद करना पडा था।

मास्साब, एक बात कहना चाहूँगा। कभी कोई कार्य करने से पहले आप सोचते हैं कि ऐसा क्यों किया जा रहा है? या भेड़चाल के तहत बस कर देते हैं क्योंकि सभी ऐसा कर रहे हैं?? यह 2 + 2 वाला फ़ंडा नहीं है जहाँ हमेशा उत्तर 4 ही आएगा। पुनः ज्ञानवर्धन हम किए देते हैं। पानी पीकर बोतल तोड़ने को इसलिए कहा जाता है ताकि बिना पुनर्चक्रण के वे बोतलें प्रयोग ना हो सकें। अब उनका पुनर्चक्रण करना हर किसी के बस का रोग नहीं, तो इसका यह लाभ कि कुछ असमाजिक तत्व उन बोतलों को इकट्ठा कर उसमें नल का पानी भर उसे दोबारा पैक कर न बेच सकें। अब आप कहने लगेंगे कि भई यह तो गलत बात है, गरीब लोगों का रोज़गार मारा जा रहा है उन्हें बोतलें दोबारा पैक कर बेचने से रोक कर, तो मास्साब, कल को यह नहीं कहना कि चोर को पकड़ क्यों उसके पेट पर लात मारी जा रही है, आतंकवादी को मारते क्यों हो वो तो अपना काम ही कर रहा था बेचारा गरीब!! और रही बात बोतलों के बढ़ते ढेर की, तो मास्साब, आप सरकारी सफ़ाई विभाग का आलस्य क्यों नहीं देखते, लोगों की जेब तुरंत साफ़ कर देने वाले अपने काम यानि कि असली साफ़ सफ़ाई से मुँह मोड़े खड़े हैं, तो कूड़े का ढेर तो अपने आप ही लगेगा ना?? :P बस…..बस…..मास्साब, हम समझ सकते हैं आपकी मनोस्थिति, कुछ मत कहिए!! ;)

बहरहाल, आगे मास्टर जी लिखते हैं:

घर में खरीदकर पानी पीने वाले नौकरों और सामान्य अतिथियों के लिए सरकारी पानी ही प्रयोग करते हैं। खरीदे हुए पानी को नौकर-चाकरों से बचाकर रखने की रणनीति अपनाई जाती है।

क्या “खरीदा हुआ” पानी लगा रखा है? घर में जो पानी आता है वो मुफ़्त में आता है?? आपका तो पता नहीं मास्टर जी पर हमारे यहाँ और लाखों अन्य लोगों के घरों में वरुण विभाग ने मीटर लगा रखे हैं जिस पर दर्ज होता है कि वह घर एक माह में कितना पानी इस्तेमाल करता है और उसके अनुसार उस घर के लोगों को वरुण विभाग को प्रयोग किए गए पानी का नकद भुगतान करना पड़ता है। तो नल में आने वाला पानी मुफ़्त तो कहीं से नहीं हुआ!! और हमने अभी एक्वागार्ड और फ़िल्टर आदि द्वारा पेयजल के शुद्धिकरण में लगने वाली बिजली को तो गिना भी नहीं। तो क्या “खरीदा हुआ पानी” का रट्टा लगा रखा है? हम मुफ़्तखोर नहीं है, आपकी कह नहीं सकते!! ;) और पानी पिलाना यदि पुण्य का कार्य है तो ये जाकर वरुण विभाग वालों को बताओ जो पैसे लेने के बावजूद सड़ा गंदा पानी सप्लाई करते हैं!! फ़िर वो बताएँगे आपको कि क्या और कितना पुण्य का कार्य है। ;)

अजी अभी कहाँ जाते हैं, मास्टर जी के पास अभी मसाला समाप्त नहीं हुआ। वे आगे फ़रमाते हैं:

पहले सार्वजनिक शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा के साथ भी यही किया गया। फलस्वरूप, अमीरों के स्कूल अलग और गरीबों के अलग, अमीरों के अस्पताल अलग और गरीबों के अस्पताल अलग हो गए। अब बँटवारा हो रहा है, अमीर का पानी और गरीब का पानी।

वैसे इसका उत्तर भी संजय भाई ने सही तरीके से दिया है, लेकिन ताबूत में एकाध कील मैं भी ठोक देता हूँ। मास्टर जी को कदाचित्‌ यह ध्यान नहीं रहा कि पुरातन समय में भी ऐसा होता था, राजबालकों के गुरुकुल अलग भी होते थे जहाँ आम जनता के बालकों को शिक्षा नहीं दी जाती थी। राजसी खाने और आम जन के खाने में पहले भी ज़मीन आसमान का अंतर होता था, अब पानी को फ़िल्टर करने आदि की तकनीक और मशीने नहीं थी उनके पास वरना राजसी पानी भी आम जन के पानी से अलग हो जाता!!! ;)

तो गौरतलब बात यह है कि यहाँ किस चीज़ पर बहस हो रही है? यहाँ बहस की जड़ अमीर-गरीब के बीच का फ़ासला है। अब कुछ लोग इसको बदल देना चाहते हैं, ऐसे घाट बनाना चाहते हैं कि जहाँ शेर और बकरी एक साथ पानी पिएँ। अच्छी बात है, लगे रहो, यही कह सकते हैं हम, क्योंकि हम जैसे खुले विचारों की मानसिकता रखने वाले जानते हैं कि ये लोग एक भ्रम में जी रहे हैं, जीवन की सच्चाई से अभी अवगत नहीं हैं। जीवन की सच्चाई यह है कि अमीर-गरीब का फ़ासला आज का नहीं है, जब से मानव सभ्यता जन्मी है तभी से है, हज़ारों वर्षों से यह फ़ासला बना रहा है, यह एक ऐसा सत्य है जिसे आप क्या कोई नहीं बदल सकता। समाज के अस्तित्व के लिए यह फ़ासला आवश्यक है, जिस दिन किसी ने इस फ़ासले को समाप्त कर दिया उस दिन समाज के नाश का समय आ जाएगा। परन्तु अभी आने वाले समय में ऐसा होता नहीं नज़र आता। सोवियत संघ के संस्थापक लेनिन और अन्य समाजवादी लोगों का यही प्रयास था, नतीजा सभी को पता है।

पर यह बात इन प्रोफ़ेसर साहब जैसे लोगों को समझ नहीं आती, वे इस मृगतृष्णा के पीछे निरंतर भागते रहते हैं इस भ्रम को पाले कि उनकी सोच सही है और एक दिन वे इस सोच को पूरा कर दिखाएँगे। इनको चाहिए कि वापस अपने काम धंधे पर लगें, विद्यार्थियों को 2 + 2 पढ़ाएँ, ये जीवन शास्त्र की बातें हैं, गणित वाले मास्साब के लेवल की नहीं हैं। :)

गौर किया जाए तो यह निष्कर्ष भी निकलता है कि बात यहाँ कोला या बोतल बंद पानी की नहीं है, बात है बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विरोध करने की, चाहे वह कैसे भी तर्कों या कुतर्कों से किया जाए। कोला को लेकर इतना उखड़ रहे हैं, क्या अपनी देसी कैम्पा कोला को भूल गए?? बोतल बंद पानी के पाप में मग्न देसी पानी की कंपनियों को भूल गए??

खैर छोड़ो यार, इस व्यर्थाग्नि में आहुति देने का मन हो आया, इसलिए हमने भी अपना कुछ समय बर्बाद कर लिया, इसी बहाने ब्लॉग पर एक नई पोस्ट आ गई, बल्ले भई!! ;) :D

23 Comments

Jitu


बल्ले बल्ले, चलो इसी बहाने पोस्ट तो लिखी।दोनो पार्टी लगे रहो, दूसरे चिट्ठाकार भी कूदो इसमे, चलो इसी बहाने, चिट्ठे तो लिखे जाएंगे, वैसे ही सूखा पड़ा हुआ है।

ये तर्क कुतर्क चलते रहेंगे, अनंतकाल तक, ना मानो तो मिलना प्रलय के बाद, तब भी लोग इस पर बहस करते मिलेंगे।

रही बात, हमारे क्या विचार है? भई हमे तो यह टापिक ही फिजूल का दिखता है, हम अभी थोड़े बिजी है, फुरसत मिलते ही, इस पर जरुर कुछ छापेंगे, तब तक, जय हिन्द।


रवि


“…अस्वीकरण: यह लेख एकाध अन्य लेखों और वैसी मानसिकता रखने वालों को धरातल पर लाने का प्रयास है। इसमें आलोचना भी है, कटाक्ष भी है, और व्यंग्य भी है, लेकिन किसी का अपमान करने का इरादा नहीं है। यदि आप इस सबको सही भावना से नहीं ले सकते तो कृपया आगे नहीं पढ़ें। कोई भी असभ्य टिप्पणी तुरंत मिटा दी जाएगी। आपको सावधान कर दिया गया है, आगे जो हो उसके ज़िम्मेदार आप स्वयं हैं।…”

चिट्ठाकारों के लिए यह डिस्क्लेमर बना कर आपने बड़ा पुण्य का काम किया है. इसे अपने चिट्ठे के मास्ट हेड पर स्थायी रूप से लगाना पड़ेगा ऐसा लग रहा है… :)


Prabhakar Pandey


यथार्थ लेख ।


Amit


चिट्ठाकारों के लिए यह डिस्क्लेमर बना कर आपने बड़ा पुण्य का काम किया है. इसे अपने चिट्ठे के मास्ट हेड पर स्थायी रूप से लगाना पड़ेगा ऐसा लग रहा है

किसे? आपको या मुझे?? ;) :D


पंकज बेंग़ाणी


अमित,

कुछ बेवकुफ लोग जबरदस्ती के ज्ञानी बनकर ज्ञान बाँटने चल देते हैं। वैसे भी दुनिया में उपदेश देना सबसे आसान और मन माफिक काम है। और कुछ लोगों ने बकायदा इसमें पी.एच.डी. कर रखी है।

इन लोगों की सोच में मुझे वामपंथ का गहरा असर दिखता है जो दुनिया में अपनी प्रासंगिकता खोता जा रहा है।

समाज सुधार का बीडा तो उठाने का ढोंग करते हैं पर वास्तविकता से कोसों दूर रहते हैं।

पेप्सी कोला में लाखों मजदुर भी काम करते हैं। उनको रोजगार मिलता है। वो पक्ष भी देखिए।

और पानी पीने वाला पानी ही पिएगा. पानी की प्यास कोला से नहीं मिटी है ना मिटेगी। तो अच्छा है जमीन पर रहो। अच्छा हो हम सब मिलकर कुछ रचनात्मक सहयोग करें जो समाज के काम आए।


आशीष


अमित,

मै इस लेख से पूरी तरह सहमत हूं। यदि आप किसी के विचारो से सहमत नही है तो खुलकर सामने आयें। शालीनता से अपने विचार रखें।
वैसे मेरे ख्याल से देश का सबसे ज्यादा नुकसान इन तथाकथित समाजवादीयो या साम्यवादीयो ने ही किया है।


SHUAIB


वाह क्या बात है अमीतजी आप भी लिखने लगे और वो भी जबरदस्त, मैं समझा आप लिखते लिखते बोर हो चुके हैं – अब इस लेख से अंदाज़ा हुआ की आप मौका देख कर लिखते हैं – बहुत बढिया :)


keea


किसी से भी कोई बात जबरदस्‍ती नही मनवाई जा
सकती इसलिए यह कहना सहीहै कि किसी को भले
न रुचे लेकिन आपका चिट्‌ठा जरूर अच्‍छा लग रह है
मेरी बधाइयाँ।
—–कृष्‍णशंकर सोनाने


Amit


वाह क्या बात है अमीतजी आप भी लिखने लगे और वो भी जबरदस्त, मैं समझा आप लिखते लिखते बोर हो चुके हैं

अरे भईये बोर नहीं हुए थे, बस लिखने को कोई ऐसी बात नहीं मिलती थी, और कुछ दूसरे कार्यों में व्यस्त रहते हैं, इसलिए समय भी नहीं मिलता। :)

अब इस लेख से अंदाज़ा हुआ की आप मौका देख कर लिखते हैं – बहुत बढिया

हाँ यह भी कह सकते हैं, रोज़ गोलियाँ दागने से अच्छा है कि कभी कभार गोला दागा जाए, ज़्यादा ड्रामेटिक असर होता है!! ;)

लेकिन आपका चिट्‌ठा जरूर अच्‍छा लग रह है
मेरी बधाइयाँ।

धन्यवाद कृष्णशंकर जी। :)


संजय बेंगाणी


भाई अमित जो मैं लिख नहीं सकता था, वो आपने लिख दिया. जो भी हो प्रोफेसर की बखिया मैं इस तरह तो नहीं उधेड़ सकता था.
अच्छा लिखा है.


सरकारी सुस्ती और चहेतों का पूंजीवाद « कीबोर्ड के सिपाही


[...] संयोग से उसी वक़्त मौजूद सृजनशिल्पी से मेरी नेट पर बात हुई और मैंने कह दिया कि अंतर को समझे बिना की गई संजय जी की टिप्पणी मुझे ठीक नहीं लगी. जवाबन उन्होंने मुझे प्रतिटिप्पणी कर अपनी बात कहने का कहा. बात आयी-गयी हो गई. प्रियंकर जी और अमित जी तेज़ निकले और अपनी-अपनी बातें कह गए. समयाभाव के चलते मैं नहीं कह सका. यूं भी सभी के ब्लॉग पर टिप्पणी करना मुमकिन नहीं होता था. मैंने टिप्पणी नहीं दी और अब अपने विचार प्रकट करना ठीक समझा है.   [...]


दोषी कौन ….. ?? « world from my eyes – दुनिया मेरी नज़र से!!


….. आप बताईये!!


अनूप शुक्ला


बात तो है सो है लेकिन लेख बहुत ताव में लिखा है भाई! डर लग रहा है कुछ टिप्पणी करते हुये. फिर भी यह अच्छा लगा कि जो ठीक समझते हो वह लिखा. लेकिन गुस्सा थोड़ा कम होता तो और अच्छा लगता.


Amit


बात तो है सो है लेकिन लेख बहुत ताव में लिखा है भाई!

हाँ, थोड़ा ताव में लिखा है इस बात से इन्कार नहीं करूँगा।

डर लग रहा है कुछ टिप्पणी करते हुये.

ये तो गलत बात है अनूप जी, कैसा डर? हर किसी को अपनी बात कहने का हक है, जब लोग बेसिरपैर की बात करते नहीं डरते तो आप तो मुझे विश्वास है कि बेसिरपैर की बात नहीं करेंगे, फ़िर कैसा डर। :)

लेकिन गुस्सा थोड़ा कम होता तो और अच्छा लगता.

वो यूँ है कि जब किसी को ऐसी बे सिर-पैर की बातें करते और अपने को समझदार साबित करते देखता हूँ तो मेरा पारा चढ़ जाता है!! :) वैसे मैंने सारे लेख में हास्य और व्यंग्य वाला स्वर बनाए रखने का पूर्ण प्रयास किया, पता नहीं आपको गुस्सा कहाँ से झलक दिखला गया!! ;)


प्रियंकर


एक लोकतांत्रिक समाज में किसी विषय विशेष पर हो रही बहस में अपनी बात के पक्ष में राजतंत्रीय और सामंती समाज का उदाहरण, गंभीर बहस में हास्य के उपयोग
का अच्छा नमूना है.
बहस में तर्क-वितर्क और कुतर्क तो हो रहे थे पर गाली से अभी तक सभी को परहेज़ था. पंकज ने अलग मत रखने वालों को ‘बेवकुफ़’ कह कर वह सीमा भी लांघ दी. यह अलग बात है कि वे अभी तक बेवकूफ़ की सही वर्तनी भी लिखना नहीं जानते . पर इसमें उनका क्या दोष यह तो सरकार का और सरकारी स्कूलों की ‘सब्सीडाइज्ड’ पढाई का दोष है. पांच सितारा स्कूल में पढे होते तो ऐसा थोड़े ही होता. तब फ़र्राटे से अंग्रेजी में गाली देते .


Amit


प्रियंकर महोदय, “बेवकूफ़” कहना और गाली देने में फ़र्क है। रही बात वर्तनी की, तो perfect कोई नहीं होता। और एक निवेदन है, एक दूसरे पर यदि इस तरह छींटाकशी करनी है तो अपने गाली गलौच के प्रोग्राम को कहीं और ले जाएँ, मेरे ब्लॉग को बक्श दें। :)


प्रियंकर


वाह भई वाह, व्यंग्य करना गलत और गाली गलौच है और ‘बेवकूफ़’ कहना सभ्यता और संस्कार . क्या तराज़ू है न्याय का . अमित महोदय,
मुझे नहीं पता इसके क्या कारण हैं पर अपनी तुर्शी और तल्खी थोड़ी कम करो तो और बेहतर लिख पाओगे . और तब यह आदेश/अनुदेश/प्रार्थना भी नहीं करनी पड़ेगी कि “मेरे ब्लॉग को बक्श दें.”
आशा करता हूं आप मेरे अनुरोध पर ध्यान देंगे

स्नेह के साथ,


Amit


वाह भई वाह, व्यंग्य करना गलत और गाली गलौच है और ‘बेवकूफ़’ कहना सभ्यता और संस्कार . क्या तराज़ू है न्याय का .

मैंने नहीं कहा कि “बेवकूफ़” कहना सभ्य है, आप अपने आप से मतलब निकाल रहे हैं तो निकालिए लेकिन उसको मेरे द्वारा कथित मत बनाईये।

दूसरी बात, आपस में एक दूसरे पर छींटाकशी करना कोई अक्लमंदी की बात नहीं है, कोई आपसे सहमत नहीं है तो इसका अर्थ यह नहीं कि आप उसे भला बुरा कहने लगें। और यदि कहना ही है तो ये आपका और दूसरे बन्दे के बीच का मामला है, इसलिए इसे कहीं और ले जाईये, यहाँ मत करिए। खामखा खूँटे से उखड़ने की ज़रूरत नहीं है, जब आप किसी पर बेसिर-पैर की टिप्पणियाँ और व्यंग्य करते रहे तो सही है, तर्क सामने आते ही खूँटे से उखड़ जाते हो!!

तीसरी और अंतिम बात, लगता है विनम्रता से निवेदन कर मैंने गलती कर दी, आपसे कड़क हो कर ही कहना चाहिए था कि यहाँ अपना झगड़ा करने की आवश्यकता नहीं है!! माफ़ कीजिए मुझे आपकी तरह बनावट नहीं आती। जैसा महसूस करता हूँ वैसा ही लिखता हूँ। दोहरे मापदण्ड की बात करने से पहले यह देखिए कि क्या लिखा गया था जिसके प्रतिउत्तर में मैंने ये लेख/व्यंग्य लिखा, दोनों की भाषा और सार मिलाईये और फ़िर कुछ कहिए।


प्रियंकर


१. छींटाकशी की शुरुआत पंकज ने की थी पर चूंकि वह आपके पक्ष में लिख रहे थे सो वह छींटाकशी आपको मधुर और सात्विक लग रही थी. अतः आपने उनसे कोई विनम्र ‘निवेदन’ नहीं किया .
२. कोई भी सार्वजनिक बहस दो व्यक्तियों के बीच का मामला नहीं होता उसमें सबकी हिस्सेदारी होती है और सबको अपनी बात कहने का हक होता है .
३. जब बंदा टिप्पणी आपके ब्लॉग पर करेगा और उस पर आपको कोई ऐतराज़ नही होगा तो स्वाभाविकरूप से उस पर जो जवाबी टिप्पणी आएगी वह भी आपके ब्लॉग पर ही आएगी.
४. कौन खूंटे से उखड़ रहा है और किसके पास तर्क हैं, इसका फ़ैसला हम और आप न करें तो बेहतर होगा. यह फ़ैसला अन्य चिट्ठाकारों पर छोड़ना बेहतर रहेगा .
५. रही बात आपकी विनम्रता की तो इस बारे में मैं अभी कुछ नहीं कह रहा हूं. हां, अनूप भाई जरूर बड़ी भद्रता से आपको इस संदर्भ में कुछ संकेत दे चुके हैं.
६. जहां तक आपकी कड़क का सवाल है,जल्दी ही आगरा या दिल्ली में आपसे मिलने का प्रयास करूंगा ताकि आपकी कड़क देख सकूं और अपनी कड़क दिखा सकूं.
७. इतनी दूर से आप मेरे बनावटीपन को जान गये सो आपकी दूरदृष्टि का प्रशंसक हूं .
८. अरे भाई आपके लेख पर तो मैंने कुछ कहा ही नहीं सिवाय इसके कि एक तर्कदोष या ‘फ़ैलेसी’ की ओर संकेत किया था कि राजतंत्र कोई आदर्श शासन व्यवस्था नहीं थी और न है, कि उसे उदाहरण के रूप में उद्धृत किया जा सके.
पुनः स्नेह के साथ,


Amit


१. छींटाकशी की शुरुआत पंकज ने की थी पर चूंकि वह आपके पक्ष में लिख रहे थे सो वह छींटाकशी आपको मधुर और सात्विक लग रही थी. अतः आपने उनसे कोई विनम्र ‘निवेदन’ नहीं किया .

खामखा? पंकज भाई की बात को मैंने उस तरह से नहीं लिया जिस तरह आपने लिया, यानि कि खामखा की बदसलूकी निकालना। उन्होंने एक वास्तविक बात कही कि किसी को भाषण और नसीहत देना बहुत ही आसान काम है और वाकई कुछ लोगों को उसमें महारत हासिल है। अब आप उस बात का खामखा बतंगड़ बना रहे हैं उसे अशिष्ट कहकर तो ठीक है, बनाईये, मेरा कुछ नहीं घिसता।

२. कोई भी सार्वजनिक बहस दो व्यक्तियों के बीच का मामला नहीं होता उसमें सबकी हिस्सेदारी होती है और सबको अपनी बात कहने का हक होता है .

बिलकुल होता है और खुशी हुई यह जानकर कि आप इस बात से इत्तफ़ाक रखते हैं, परन्तु मैंने यह नहीं कहा कि बहस सार्वजनिक रूप से मत करो। मैंने सिर्फ़ इतना कहा कि भई यदि एक दूसरे को कुछ भला बुरा कहना है तो कहीं और जाओ यहाँ मत करो, आप उसे सार्वजनिक रूप से करो या निजी तौर पर, मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता।

३. जब बंदा टिप्पणी आपके ब्लॉग पर करेगा और उस पर आपको कोई ऐतराज़ नही होगा तो स्वाभाविकरूप से उस पर जो जवाबी टिप्पणी आएगी वह भी आपके ब्लॉग पर ही आएगी.

बिलकुल आएगी, लेकिन कोई आवश्यक नहीं है। मैंने सृजनशिल्पी जी के ब्लॉग पर टिप्पणी नहीं की सिर्फ़ यह सोच कि मैं कुछ ऐसा लिखने वाला हूँ जो कदाचित्‌ उन्हें अपने ब्लॉग पर पसंद नहीं आए, इसलिए अपने विचार अपने ब्लॉग पर लिखे।

५. रही बात आपकी विनम्रता की तो इस बारे में मैं अभी कुछ नहीं कह रहा हूं.

बड़ी मेहरबानी, बहुत बड़ा एहसान किया।

हां, अनूप भाई जरूर बड़ी भद्रता से आपको इस संदर्भ में कुछ संकेत दे चुके हैं.

क्या कहना चाहते हैं, कि मैं बद्तमीज़ और अशिष्ट हूँ। कह लो, आपके कहने से कम से कम मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता, सबको अपनी सोच रखने का अधिकार है, आप भी रखो।

६. जहां तक आपकी कड़क का सवाल है,जल्दी ही आगरा या दिल्ली में आपसे मिलने का प्रयास करूंगा ताकि आपकी कड़क देख सकूं और अपनी कड़क दिखा सकूं.

जब मर्जी देखना और शौक से देखना, अपन किसी से डरने वालों में से नहीं।

८. अरे भाई आपके लेख पर तो मैंने कुछ कहा ही नहीं सिवाय इसके कि एक तर्कदोष या ‘फ़ैलेसी’ की ओर संकेत किया था कि राजतंत्र कोई आदर्श शासन व्यवस्था नहीं थी और न है, कि उसे उदाहरण के रूप में उद्धृत किया जा सके.

मैंने तो राजतंत्र का कहीं ज़िक्र ही नहीं किया ना ही उसके गुण-दोष पर कुछ लिखा। सृजनशिल्पी जी ने जिन प्रोफ़ेसर साहब का लेख अपने ब्लॉग पर अपनी बात के समर्थन में डाला था, मैंने तो बस उन प्रोफ़ेसर साहब की बातों में गलतियाँ बताई हैं।


प्रियंकर


मैं मैं और केवल मैं

”मैने उस तरह से नहीं लिया”
(दूसरा उस तरह से ले तो बतंगड़ बनाना हुआ)

”मेरा कुछ नहीं घिसता”

”मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता”

”मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता”

(पड़ता है भैये,फ़र्क पड़ता है. इस दुनिया में सब चीजों का एक दूसरे पर असर पड़ता है और इसलिए फ़र्क भी पड़ता है. अभी चपेट में आये नहीं हो इसलिये ऐसा लग रहा है .)

(अपन और तुपन की भेंट तो जरूर होगी. आखिर इटावा वाले आगरा वालों से नहीं मिलेंगे तो किससे मिलेंगे. इसमें डरना-डराना कहां से आ गया? )

“मास्टर जी को कदाचित्‌ यह ध्यान नहीं रहा कि पुरातन समय में भी ऐसा होता था, राजबालकों के गुरुकुल अलग भी होते थे जहाँ आम जनता के बालकों को शिक्षा नहीं दी जाती थी। राजसी खाने और आम जन के खाने में पहले भी ज़मीन आसमान का अंतर होता था”

( ये शब्द आपके ही हैं न, इसमें आप अपने तर्क को बल देने के लिये राजतंत्रीय व्यवस्था के अन्तर्गत राजबालकों/गुरुकुलों/राजसी खानपान की बात कर रहे हैं. मानो वह कोई आदर्श व्यवस्था हो . और चूंकि वह तब थी इसलिए अब क्यों न हो? लोकतांत्रिक व्यवस्था में रहने वाला कोई समझदार आदमी ऐसा सोच भी कैसे सकता है ? बहुत आश्चर्य की बात है)
मैंने अपनी ओर से लेख पर कोई अवांछनीय टिप्पणी की हो याद नहीं पड़ता . हां! संभवतः आपने मान लिया है कि अनूप जी द्वारा बताये गये दो गुण/लक्षण : ताव और क्रोध आपके व्यक्तित्व के प्रतिनिधि लक्षण हैं . सो आपकी शैली भी ताव और क्रोध से रंजित दिखती है. भैये ब्लड प्रेशर का ध्यान रखो और कुछ ध्यान-मनन शुरु करो .अभी बहुत कुछ देखना बाकी है.

हालांकि आप सार्वजनिक रूप से घोषित कर चुके हैं कि आप कविता नहीं समझते तब भी चलते-चलते वसीम बरेलवी का एक शेर अर्ज़ है :
जरा सा कतरा कहीं आज़ गर उभरता है
समंदरों ही के लहजे में बात करता है ॥

और अब इस तर्क-वितर्क को पूर्ण विराम देते हुए विदा लेता हूं .


Amit


मैं मैं और केवल मैं

बिलकुल, जो बोल रहा हूँ अपनी ओर से बोल रहा हूँ, किसी दूसरे के कहे शब्दों को अपने अनुसार प्रक्षेपित नहीं कर रहा!!

(पड़ता है भैये,फ़र्क पड़ता है. इस दुनिया में सब चीजों का एक दूसरे पर असर पड़ता है और इसलिए फ़र्क भी पड़ता है. अभी चपेट में आये नहीं हो इसलिये ऐसा लग रहा है .)

पड़ता होगा, जब पड़ेगा तब उसे भी देख लेंगे।

(अपन और तुपन की भेंट तो जरूर होगी. आखिर इटावा वाले आगरा वालों से नहीं मिलेंगे तो किससे मिलेंगे. इसमें डरना-डराना कहां से आ गया? )

बहुत बड़ी गलतफ़हमी में हो भाया, अपना आगरा से कोई लेना देना नहीं है, अपन खालिस दिल्लीवासी हैं। लगता है किसी गलत पते पर आ गए हो!! ;)

“मास्टर जी को कदाचित्‌ यह ध्यान नहीं रहा कि पुरातन समय में भी ऐसा होता था, राजबालकों के गुरुकुल अलग भी होते थे जहाँ आम जनता के बालकों को शिक्षा नहीं दी जाती थी। राजसी खाने और आम जन के खाने में पहले भी ज़मीन आसमान का अंतर होता था”

( ये शब्द आपके ही हैं न, इसमें आप अपने तर्क को बल देने के लिये राजतंत्रीय व्यवस्था के अन्तर्गत राजबालकों/गुरुकुलों/राजसी खानपान की बात कर रहे हैं. मानो वह कोई आदर्श व्यवस्था हो . और चूंकि वह तब थी इसलिए अब क्यों न हो? लोकतांत्रिक व्यवस्था में रहने वाला कोई समझदार आदमी ऐसा सोच भी कैसे सकता है ? बहुत आश्चर्य की बात है)

भाया, मैंने सिर्फ़ “अमीर-गरीब के लिए कुछ अलग क्यों” वाली बात पर उदाहरण दिया था, यहाँ राजबालकों का या राजसी खानपान का उदाहरण अन्योक्ति अलंकार के रूप में किया गया है जो कि धनाढ्य और संपन्न लोगों की ओर इशारा करता है, किसी भी तरह के तंत्र की तो मैंने कोई बात ही नहीं की, ना राजतंत्र की और ना ही लोकतंत्र की। और रही लोकतंत्र के नागरिक की ऐसे सोचने की बात, तो भई हर चीज़ में कोई ना कोई खराबी होती है, परफ़ैक्ट कुछ नहीं होता। जहाँ तक मुझे ज्ञात है मैंने राजतंत्र का समर्थन तो कभी किया ही नहीं। दूसरी बात यह कि जो सोच उन प्रोफ़ेसर साहब ने अपने लेख में प्रक्षेपित की वह थी समाजवाद की जिसका लोकतंत्र से कोई लेना देना नहीं, वह भी आगे जाकर एक तानाशाही बन जाता है, सोवियत संघ इसका उत्तम उदाहरण है जिसका आरंभ तो अच्छा था परन्तु चलते चलते वह एक तानाशाही ही बन गया था जहाँ किसी को कोई आज़ादी नहीं। लोकतंत्र की बात करने वाला ऐसे विचारों का समर्थन करता है?? ये अवश्य आश्चर्य की बात है!!

मैंने अपनी ओर से लेख पर कोई अवांछनीय टिप्पणी की हो याद नहीं पड़ता . हां! संभवतः आपने मान लिया है कि अनूप जी द्वारा बताये गये दो गुण/लक्षण : ताव और क्रोध आपके व्यक्तित्व के प्रतिनिधि लक्षण हैं . सो आपकी शैली भी ताव और क्रोध से रंजित दिखती है.

मैंने कब कहा कि लेख पर आपने कोई अवांछनीय टिप्पणी की? आपने अनूप जी की टिप्पणी को अपने अनुसार मोड़ने की कोशिश की सो मैंने उसके अनुरूप आपको उत्तर दिया, अनूप जी को तो मैंने कुछ कहा ही नहीं क्योंकि उनकी तो मैं इज़्ज़त करता हूँ और उन्होंने भी मुझे कुछ उल्टा-सीधा नहीं कहा।

भैये ब्लड प्रेशर का ध्यान रखो और कुछ ध्यान-मनन शुरु करो .अभी बहुत कुछ देखना बाकी है.

सहानुभूति के लिए शुक्रिया, चाहे वह व्यंग्यपूर्ण ही सही। ब्लड प्रेशर का तो मैं पूर्ण ध्यान रखता हूँ, आज तक तो कोई शिकायत नहीं रही।

हालांकि आप सार्वजनिक रूप से घोषित कर चुके हैं कि आप कविता नहीं समझते तब भी चलते-चलते वसीम बरेलवी का एक शेर अर्ज़ है :
जरा सा कतरा कहीं आज़ गर उभरता है
समंदरों ही के लहजे में बात करता है ॥

कहीं अपनी बात तो नहीं कर रहे?? ;)

और अब इस तर्क-वितर्क को पूर्ण विराम देते हुए विदा लेता हूं .

आपकी श्रद्धा है।


फ़ुरसतिया » मनुष्य खत्म हो रहे हैं, वस्तुयें खिली हुई हैं


[...] [सुपरिचित कथाकार अखिलेश का नाम हिंदी कथा पाठकों के लिये जाना-पहचाना नाम है। उनकी कहानी चिट्ठी में देश के तमाम पढ़े-लिखे युवा अपने को या अपने परिवेश को किसी न किसी न रूप में मौजूद पाते हैं। अखिलेश का एक आत्मक्थ्य नुमा लेख मेरे पसंदीदा लेखों में हैं। प्रख्यात साहित्यिक कथापत्रिका, ‘कथादेश’, के फरवरी २००० के अंक में प्रकाशित यह लेख पत्रिका के नियमित स्तम्भ ‘मैं और मेरा समय’में छ्पा था। इस स्तम्भ के अंतर्गत प्रसिद्ध लेखकों के अपने समय के बारे में अनुभव व विचार प्रस्तुत किये जाते हैं। हिंदी ब्लाग जगत में जब सृजन शिल्पी के एक लेख पर संजय बेंगाणी पर की टिप्पणी पर लेख उस पर अमित का लेख और फिर नीरज दीवान का बड़ी मेहनत से लिखा विचारोत्तेजक लेख प्रकाशित हुआ तो मुझे एक बार फिर यह लेख बहुत याद आया। इसलिये मैं अखिलेशजी के इस लेख को यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। आशा है कि लेख अपनी पर्याप्त लंबाई के बावजूद आपको पढ़ने और सोचने के लिये मजबूर करेगा] अखिलेश [...]


Leave A Message

name
email
blog
:mrgreen: :twisted: :arrow: :evil: :idea: :oops: :roll: :cry: :lol: :cool: :shock: :sad: :smile: :???: :grin: :razz: :eek: :mad: :neutral: :wink: :!: :?: :tup: :tdown: