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	<title>Comments on: भ्रमित है भ्रम &#8230;..</title>
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	<description>the world from my eyes in my language - दुनिया मेरी नज़र से मेरी भाषा में</description>
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		<title>By: फ़ुरसतिया &#187; मनुष्य खत्म हो रहे हैं, वस्तुयें खिली हुई हैं</title>
		<link>http://hindi.amitgupta.in/2006/11/12/misconcepted-misconception/#comment-542</link>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया &#187; मनुष्य खत्म हो रहे हैं, वस्तुयें खिली हुई हैं</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 19 Nov 2006 13:17:14 +0000</pubDate>
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		<description>[...] [सुपरिचित कथाकार अखिलेश का नाम हिंदी कथा पाठकों के लिये जाना-पहचाना नाम है। उनकी कहानी चिट्ठी में देश के तमाम पढ़े-लिखे युवा अपने को या अपने परिवेश को किसी न किसी न रूप में मौजूद पाते हैं। अखिलेश का एक आत्मक्थ्य नुमा लेख मेरे पसंदीदा लेखों में हैं। प्रख्यात साहित्यिक कथापत्रिका, &#8216;कथादेश&#8217;, के फरवरी २००० के अंक में प्रकाशित यह लेख पत्रिका के नियमित स्तम्भ &#8216;मैं और मेरा समय&#8217;में छ्पा था। इस स्तम्भ के अंतर्गत प्रसिद्ध लेखकों के अपने समय के बारे में अनुभव व विचार प्रस्तुत किये जाते हैं। हिंदी ब्लाग जगत में जब सृजन शिल्पी के एक लेख पर संजय बेंगाणी पर की टिप्पणी पर लेख उस पर अमित का लेख और फिर नीरज दीवान का बड़ी मेहनत से लिखा विचारोत्तेजक लेख प्रकाशित हुआ तो मुझे एक बार फिर यह लेख बहुत याद आया। इसलिये मैं अखिलेशजी के इस लेख को यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। आशा है कि लेख अपनी पर्याप्त लंबाई के बावजूद आपको पढ़ने और सोचने के लिये मजबूर करेगा] अखिलेश [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] [सुपरिचित कथाकार अखिलेश का नाम हिंदी कथा पाठकों के लिये जाना-पहचाना नाम है। उनकी कहानी चिट्ठी में देश के तमाम पढ़े-लिखे युवा अपने को या अपने परिवेश को किसी न किसी न रूप में मौजूद पाते हैं। अखिलेश का एक आत्मक्थ्य नुमा लेख मेरे पसंदीदा लेखों में हैं। प्रख्यात साहित्यिक कथापत्रिका, &#8216;कथादेश&#8217;, के फरवरी २००० के अंक में प्रकाशित यह लेख पत्रिका के नियमित स्तम्भ &#8216;मैं और मेरा समय&#8217;में छ्पा था। इस स्तम्भ के अंतर्गत प्रसिद्ध लेखकों के अपने समय के बारे में अनुभव व विचार प्रस्तुत किये जाते हैं। हिंदी ब्लाग जगत में जब सृजन शिल्पी के एक लेख पर संजय बेंगाणी पर की टिप्पणी पर लेख उस पर अमित का लेख और फिर नीरज दीवान का बड़ी मेहनत से लिखा विचारोत्तेजक लेख प्रकाशित हुआ तो मुझे एक बार फिर यह लेख बहुत याद आया। इसलिये मैं अखिलेशजी के इस लेख को यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। आशा है कि लेख अपनी पर्याप्त लंबाई के बावजूद आपको पढ़ने और सोचने के लिये मजबूर करेगा] अखिलेश [...]</p>
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	<item>
		<title>By: Amit</title>
		<link>http://hindi.amitgupta.in/2006/11/12/misconcepted-misconception/#comment-541</link>
		<dc:creator>Amit</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 17 Nov 2006 22:12:53 +0000</pubDate>
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		<description>&lt;blockquote&gt;मैं मैं और केवल मैं&lt;/blockquote&gt;
बिलकुल, जो बोल रहा हूँ अपनी ओर से बोल रहा हूँ, किसी दूसरे के कहे शब्दों को अपने अनुसार प्रक्षेपित नहीं कर रहा!!

&lt;blockquote&gt;(पड़ता है भैये,फ़र्क पड़ता है. इस दुनिया में सब चीजों का एक दूसरे पर असर पड़ता है और इसलिए फ़र्क भी पड़ता है. अभी चपेट में आये नहीं हो इसलिये ऐसा लग रहा है .)&lt;/blockquote&gt;
पड़ता होगा, जब पड़ेगा तब उसे भी देख लेंगे।

&lt;blockquote&gt;(अपन और तुपन की भेंट तो जरूर होगी. आखिर इटावा वाले आगरा वालों से नहीं मिलेंगे तो किससे मिलेंगे. इसमें डरना-डराना कहां से आ गया? )&lt;/blockquote&gt;
बहुत बड़ी गलतफ़हमी में हो भाया, अपना आगरा से कोई लेना देना नहीं है, अपन खालिस दिल्लीवासी हैं। लगता है किसी गलत पते पर आ गए हो!! ;)

&lt;blockquote&gt;&quot;मास्टर जी को कदाचित्‌ यह ध्यान नहीं रहा कि पुरातन समय में भी ऐसा होता था, राजबालकों के गुरुकुल अलग भी होते थे जहाँ आम जनता के बालकों को शिक्षा नहीं दी जाती थी। राजसी खाने और आम जन के खाने में पहले भी ज़मीन आसमान का अंतर होता था&quot;

( ये शब्द आपके ही हैं न, इसमें आप अपने तर्क को बल देने के लिये राजतंत्रीय व्यवस्था के अन्तर्गत राजबालकों/गुरुकुलों/राजसी खानपान की बात कर रहे हैं. मानो वह कोई आदर्श व्यवस्था हो . और चूंकि वह तब थी इसलिए अब क्यों न हो? लोकतांत्रिक व्यवस्था में रहने वाला कोई समझदार आदमी ऐसा सोच भी कैसे सकता है ? बहुत आश्चर्य की बात है)&lt;/blockquote&gt;
भाया, मैंने सिर्फ़ &quot;अमीर-गरीब के लिए कुछ अलग क्यों&quot; वाली बात पर उदाहरण दिया था, यहाँ राजबालकों का या राजसी खानपान का उदाहरण अन्योक्ति अलंकार के रूप में किया गया है जो कि धनाढ्य और संपन्न लोगों की ओर इशारा करता है, किसी भी तरह के तंत्र की तो मैंने कोई बात ही नहीं की, ना राजतंत्र की और ना ही लोकतंत्र की। और रही लोकतंत्र के नागरिक की ऐसे सोचने की बात, तो भई हर चीज़ में कोई ना कोई खराबी होती है, परफ़ैक्ट कुछ नहीं होता। जहाँ तक मुझे ज्ञात है मैंने राजतंत्र का समर्थन तो कभी किया ही नहीं। दूसरी बात यह कि जो सोच उन प्रोफ़ेसर साहब ने अपने लेख में प्रक्षेपित की वह थी समाजवाद की जिसका लोकतंत्र से कोई लेना देना नहीं, वह भी आगे जाकर एक तानाशाही बन जाता है, सोवियत संघ इसका उत्तम उदाहरण है जिसका आरंभ तो अच्छा था परन्तु चलते चलते वह एक तानाशाही ही बन गया था जहाँ किसी को कोई आज़ादी नहीं। लोकतंत्र की बात करने वाला ऐसे विचारों का समर्थन करता है?? ये अवश्य आश्चर्य की बात है!!

&lt;blockquote&gt;मैंने अपनी ओर से लेख पर कोई अवांछनीय टिप्पणी की हो याद नहीं पड़ता . हां! संभवतः आपने मान लिया है कि अनूप जी द्वारा बताये गये दो गुण/लक्षण : ताव और क्रोध आपके व्यक्तित्व के प्रतिनिधि लक्षण हैं . सो आपकी शैली भी ताव और क्रोध से रंजित दिखती है.&lt;/blockquote&gt;
मैंने कब कहा कि लेख पर आपने कोई अवांछनीय टिप्पणी की? आपने अनूप जी की टिप्पणी को अपने अनुसार मोड़ने की कोशिश की सो मैंने उसके अनुरूप आपको उत्तर दिया, अनूप जी को तो मैंने कुछ कहा ही नहीं क्योंकि उनकी तो मैं इज़्ज़त करता हूँ और उन्होंने भी मुझे कुछ उल्टा-सीधा नहीं कहा।

&lt;blockquote&gt;भैये ब्लड प्रेशर का ध्यान रखो और कुछ ध्यान-मनन शुरु करो .अभी बहुत कुछ देखना बाकी है.&lt;/blockquote&gt;
सहानुभूति के लिए शुक्रिया, चाहे वह व्यंग्यपूर्ण ही सही। ब्लड प्रेशर का तो मैं पूर्ण ध्यान रखता हूँ, आज तक तो कोई शिकायत नहीं रही।

&lt;blockquote&gt;हालांकि आप सार्वजनिक रूप से घोषित कर चुके हैं कि आप कविता नहीं समझते तब भी चलते-चलते वसीम बरेलवी का एक शेर अर्ज़ है :
जरा सा कतरा कहीं आज़ गर उभरता है
समंदरों ही के लहजे में बात करता है ॥
&lt;/blockquote&gt;
कहीं अपनी बात तो नहीं कर रहे?? ;)

&lt;blockquote&gt;और अब इस तर्क-वितर्क को पूर्ण विराम देते हुए विदा लेता हूं .&lt;/blockquote&gt;
आपकी श्रद्धा है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p>मैं मैं और केवल मैं</p></blockquote>
<p>बिलकुल, जो बोल रहा हूँ अपनी ओर से बोल रहा हूँ, किसी दूसरे के कहे शब्दों को अपने अनुसार प्रक्षेपित नहीं कर रहा!!</p>
<blockquote><p>(पड़ता है भैये,फ़र्क पड़ता है. इस दुनिया में सब चीजों का एक दूसरे पर असर पड़ता है और इसलिए फ़र्क भी पड़ता है. अभी चपेट में आये नहीं हो इसलिये ऐसा लग रहा है .)</p></blockquote>
<p>पड़ता होगा, जब पड़ेगा तब उसे भी देख लेंगे।</p>
<blockquote><p>(अपन और तुपन की भेंट तो जरूर होगी. आखिर इटावा वाले आगरा वालों से नहीं मिलेंगे तो किससे मिलेंगे. इसमें डरना-डराना कहां से आ गया? )</p></blockquote>
<p>बहुत बड़ी गलतफ़हमी में हो भाया, अपना आगरा से कोई लेना देना नहीं है, अपन खालिस दिल्लीवासी हैं। लगता है किसी गलत पते पर आ गए हो!! <img src='http://hindi.amitgupta.in/wp-content/plugins/smilies-themer/ig_cool/icon_wink.gif' alt=';)' class='wp-smiley' /> </p>
<blockquote><p>&#8220;मास्टर जी को कदाचित्‌ यह ध्यान नहीं रहा कि पुरातन समय में भी ऐसा होता था, राजबालकों के गुरुकुल अलग भी होते थे जहाँ आम जनता के बालकों को शिक्षा नहीं दी जाती थी। राजसी खाने और आम जन के खाने में पहले भी ज़मीन आसमान का अंतर होता था&#8221;</p>
<p>( ये शब्द आपके ही हैं न, इसमें आप अपने तर्क को बल देने के लिये राजतंत्रीय व्यवस्था के अन्तर्गत राजबालकों/गुरुकुलों/राजसी खानपान की बात कर रहे हैं. मानो वह कोई आदर्श व्यवस्था हो . और चूंकि वह तब थी इसलिए अब क्यों न हो? लोकतांत्रिक व्यवस्था में रहने वाला कोई समझदार आदमी ऐसा सोच भी कैसे सकता है ? बहुत आश्चर्य की बात है)</p></blockquote>
<p>भाया, मैंने सिर्फ़ &#8220;अमीर-गरीब के लिए कुछ अलग क्यों&#8221; वाली बात पर उदाहरण दिया था, यहाँ राजबालकों का या राजसी खानपान का उदाहरण अन्योक्ति अलंकार के रूप में किया गया है जो कि धनाढ्य और संपन्न लोगों की ओर इशारा करता है, किसी भी तरह के तंत्र की तो मैंने कोई बात ही नहीं की, ना राजतंत्र की और ना ही लोकतंत्र की। और रही लोकतंत्र के नागरिक की ऐसे सोचने की बात, तो भई हर चीज़ में कोई ना कोई खराबी होती है, परफ़ैक्ट कुछ नहीं होता। जहाँ तक मुझे ज्ञात है मैंने राजतंत्र का समर्थन तो कभी किया ही नहीं। दूसरी बात यह कि जो सोच उन प्रोफ़ेसर साहब ने अपने लेख में प्रक्षेपित की वह थी समाजवाद की जिसका लोकतंत्र से कोई लेना देना नहीं, वह भी आगे जाकर एक तानाशाही बन जाता है, सोवियत संघ इसका उत्तम उदाहरण है जिसका आरंभ तो अच्छा था परन्तु चलते चलते वह एक तानाशाही ही बन गया था जहाँ किसी को कोई आज़ादी नहीं। लोकतंत्र की बात करने वाला ऐसे विचारों का समर्थन करता है?? ये अवश्य आश्चर्य की बात है!!</p>
<blockquote><p>मैंने अपनी ओर से लेख पर कोई अवांछनीय टिप्पणी की हो याद नहीं पड़ता . हां! संभवतः आपने मान लिया है कि अनूप जी द्वारा बताये गये दो गुण/लक्षण : ताव और क्रोध आपके व्यक्तित्व के प्रतिनिधि लक्षण हैं . सो आपकी शैली भी ताव और क्रोध से रंजित दिखती है.</p></blockquote>
<p>मैंने कब कहा कि लेख पर आपने कोई अवांछनीय टिप्पणी की? आपने अनूप जी की टिप्पणी को अपने अनुसार मोड़ने की कोशिश की सो मैंने उसके अनुरूप आपको उत्तर दिया, अनूप जी को तो मैंने कुछ कहा ही नहीं क्योंकि उनकी तो मैं इज़्ज़त करता हूँ और उन्होंने भी मुझे कुछ उल्टा-सीधा नहीं कहा।</p>
<blockquote><p>भैये ब्लड प्रेशर का ध्यान रखो और कुछ ध्यान-मनन शुरु करो .अभी बहुत कुछ देखना बाकी है.</p></blockquote>
<p>सहानुभूति के लिए शुक्रिया, चाहे वह व्यंग्यपूर्ण ही सही। ब्लड प्रेशर का तो मैं पूर्ण ध्यान रखता हूँ, आज तक तो कोई शिकायत नहीं रही।</p>
<blockquote><p>हालांकि आप सार्वजनिक रूप से घोषित कर चुके हैं कि आप कविता नहीं समझते तब भी चलते-चलते वसीम बरेलवी का एक शेर अर्ज़ है :<br />
जरा सा कतरा कहीं आज़ गर उभरता है<br />
समंदरों ही के लहजे में बात करता है ॥
</p></blockquote>
<p>कहीं अपनी बात तो नहीं कर रहे?? <img src='http://hindi.amitgupta.in/wp-content/plugins/smilies-themer/ig_cool/icon_wink.gif' alt=';)' class='wp-smiley' /> </p>
<blockquote><p>और अब इस तर्क-वितर्क को पूर्ण विराम देते हुए विदा लेता हूं .</p></blockquote>
<p>आपकी श्रद्धा है।</p>
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		<title>By: प्रियंकर</title>
		<link>http://hindi.amitgupta.in/2006/11/12/misconcepted-misconception/#comment-540</link>
		<dc:creator>प्रियंकर</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 17 Nov 2006 13:32:53 +0000</pubDate>
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		<description>मैं मैं और केवल मैं

&#039;&#039;मैने उस तरह से नहीं लिया&#039;&#039;
(दूसरा उस तरह से ले तो बतंगड़ बनाना हुआ)

&#039;&#039;मेरा कुछ नहीं घिसता&#039;&#039;

&#039;&#039;मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता&#039;&#039;

&#039;&#039;मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता&#039;&#039;

(पड़ता है भैये,फ़र्क पड़ता है.  इस दुनिया में सब चीजों का एक दूसरे पर असर पड़ता है और इसलिए फ़र्क भी पड़ता है. अभी चपेट में आये नहीं हो इसलिये ऐसा लग रहा है .)

(अपन और तुपन की भेंट तो जरूर होगी. आखिर इटावा वाले आगरा वालों से नहीं मिलेंगे तो किससे मिलेंगे. इसमें डरना-डराना कहां से आ गया? )


&quot;मास्टर जी को कदाचित्‌ यह ध्यान नहीं रहा कि पुरातन समय में भी ऐसा होता था, राजबालकों के गुरुकुल अलग भी होते थे जहाँ आम जनता के बालकों को शिक्षा नहीं दी जाती थी। राजसी खाने और आम जन के खाने में पहले भी ज़मीन आसमान का अंतर होता था&quot;

( ये शब्द आपके ही हैं न, इसमें आप अपने तर्क को बल देने के लिये राजतंत्रीय व्यवस्था के अन्तर्गत राजबालकों/गुरुकुलों/राजसी खानपान की बात कर रहे हैं. मानो वह कोई आदर्श व्यवस्था हो . और चूंकि वह तब थी इसलिए अब क्यों न हो? लोकतांत्रिक व्यवस्था में रहने वाला कोई समझदार आदमी ऐसा सोच भी कैसे सकता है ?  बहुत आश्चर्य की बात है)
मैंने अपनी ओर से लेख पर कोई अवांछनीय टिप्पणी की हो याद नहीं पड़ता . हां! संभवतः आपने  मान लिया है कि अनूप जी द्वारा बताये गये दो गुण/लक्षण : ताव और क्रोध आपके व्यक्तित्व के प्रतिनिधि लक्षण हैं . सो आपकी शैली भी ताव और क्रोध से रंजित दिखती है. भैये ब्लड प्रेशर का ध्यान रखो और कुछ ध्यान-मनन शुरु करो .अभी बहुत कुछ देखना बाकी है.

हालांकि आप सार्वजनिक रूप से घोषित कर चुके हैं कि आप कविता नहीं समझते तब भी चलते-चलते वसीम बरेलवी का एक शेर अर्ज़ है :
जरा सा कतरा कहीं आज़ गर उभरता है
समंदरों ही के लहजे में बात करता है ॥

और अब इस तर्क-वितर्क को पूर्ण विराम देते हुए विदा लेता हूं .</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मैं मैं और केवल मैं</p>
<p>&#8221;मैने उस तरह से नहीं लिया&#8221;<br />
(दूसरा उस तरह से ले तो बतंगड़ बनाना हुआ)</p>
<p>&#8221;मेरा कुछ नहीं घिसता&#8221;</p>
<p>&#8221;मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता&#8221;</p>
<p>&#8221;मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता&#8221;</p>
<p>(पड़ता है भैये,फ़र्क पड़ता है.  इस दुनिया में सब चीजों का एक दूसरे पर असर पड़ता है और इसलिए फ़र्क भी पड़ता है. अभी चपेट में आये नहीं हो इसलिये ऐसा लग रहा है .)</p>
<p>(अपन और तुपन की भेंट तो जरूर होगी. आखिर इटावा वाले आगरा वालों से नहीं मिलेंगे तो किससे मिलेंगे. इसमें डरना-डराना कहां से आ गया? )</p>
<p>&#8220;मास्टर जी को कदाचित्‌ यह ध्यान नहीं रहा कि पुरातन समय में भी ऐसा होता था, राजबालकों के गुरुकुल अलग भी होते थे जहाँ आम जनता के बालकों को शिक्षा नहीं दी जाती थी। राजसी खाने और आम जन के खाने में पहले भी ज़मीन आसमान का अंतर होता था&#8221;</p>
<p>( ये शब्द आपके ही हैं न, इसमें आप अपने तर्क को बल देने के लिये राजतंत्रीय व्यवस्था के अन्तर्गत राजबालकों/गुरुकुलों/राजसी खानपान की बात कर रहे हैं. मानो वह कोई आदर्श व्यवस्था हो . और चूंकि वह तब थी इसलिए अब क्यों न हो? लोकतांत्रिक व्यवस्था में रहने वाला कोई समझदार आदमी ऐसा सोच भी कैसे सकता है ?  बहुत आश्चर्य की बात है)<br />
मैंने अपनी ओर से लेख पर कोई अवांछनीय टिप्पणी की हो याद नहीं पड़ता . हां! संभवतः आपने  मान लिया है कि अनूप जी द्वारा बताये गये दो गुण/लक्षण : ताव और क्रोध आपके व्यक्तित्व के प्रतिनिधि लक्षण हैं . सो आपकी शैली भी ताव और क्रोध से रंजित दिखती है. भैये ब्लड प्रेशर का ध्यान रखो और कुछ ध्यान-मनन शुरु करो .अभी बहुत कुछ देखना बाकी है.</p>
<p>हालांकि आप सार्वजनिक रूप से घोषित कर चुके हैं कि आप कविता नहीं समझते तब भी चलते-चलते वसीम बरेलवी का एक शेर अर्ज़ है :<br />
जरा सा कतरा कहीं आज़ गर उभरता है<br />
समंदरों ही के लहजे में बात करता है ॥</p>
<p>और अब इस तर्क-वितर्क को पूर्ण विराम देते हुए विदा लेता हूं .</p>
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		<title>By: Amit</title>
		<link>http://hindi.amitgupta.in/2006/11/12/misconcepted-misconception/#comment-539</link>
		<dc:creator>Amit</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 17 Nov 2006 11:22:09 +0000</pubDate>
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		<description>&lt;blockquote&gt;१. छींटाकशी की शुरुआत पंकज ने की थी पर चूंकि वह आपके पक्ष में लिख रहे थे सो वह छींटाकशी आपको मधुर और सात्विक लग रही थी. अतः आपने उनसे कोई विनम्र ‘निवेदन’ नहीं किया .&lt;/blockquote&gt;
खामखा? पंकज भाई की बात को मैंने उस तरह से नहीं लिया जिस तरह आपने लिया, यानि कि खामखा की बदसलूकी निकालना। उन्होंने एक वास्तविक बात कही कि किसी को भाषण और नसीहत देना बहुत ही आसान काम है और वाकई कुछ लोगों को उसमें महारत हासिल है। अब आप उस बात का खामखा बतंगड़ बना रहे हैं उसे अशिष्ट कहकर तो ठीक है, बनाईये, मेरा कुछ नहीं घिसता।

&lt;blockquote&gt;२. कोई भी सार्वजनिक बहस दो व्यक्तियों के बीच का मामला नहीं होता उसमें सबकी हिस्सेदारी होती है और सबको अपनी बात कहने का हक होता है .&lt;/blockquote&gt;
बिलकुल होता है और खुशी हुई यह जानकर कि आप इस बात से इत्तफ़ाक रखते हैं, परन्तु मैंने यह नहीं कहा कि बहस सार्वजनिक रूप से मत करो। मैंने सिर्फ़ इतना कहा कि भई यदि एक दूसरे को कुछ भला बुरा कहना है तो कहीं और जाओ यहाँ मत करो, आप उसे सार्वजनिक रूप से करो या निजी तौर पर, मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता।

&lt;blockquote&gt;३. जब बंदा टिप्पणी आपके ब्लॉग पर करेगा और उस पर आपको कोई ऐतराज़ नही होगा तो स्वाभाविकरूप से उस पर जो जवाबी टिप्पणी आएगी वह भी आपके ब्लॉग पर ही आएगी.&lt;/blockquote&gt;
बिलकुल आएगी, लेकिन कोई आवश्यक नहीं है। मैंने सृजनशिल्पी जी के ब्लॉग पर टिप्पणी नहीं की सिर्फ़ यह सोच कि मैं कुछ ऐसा लिखने वाला हूँ जो कदाचित्‌ उन्हें अपने ब्लॉग पर पसंद नहीं आए, इसलिए अपने विचार अपने ब्लॉग पर लिखे।

&lt;blockquote&gt;५. रही बात आपकी विनम्रता की तो इस बारे में मैं अभी कुछ नहीं कह रहा हूं.&lt;/blockquote&gt;
बड़ी मेहरबानी, बहुत बड़ा एहसान किया।

&lt;blockquote&gt;हां, अनूप भाई जरूर बड़ी भद्रता से आपको इस संदर्भ में कुछ संकेत दे चुके हैं.&lt;/blockquote&gt;
क्या कहना चाहते हैं, कि मैं बद्तमीज़ और अशिष्ट हूँ। कह लो, आपके कहने से कम से कम मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता, सबको अपनी सोच रखने का अधिकार है, आप भी रखो।

&lt;blockquote&gt;६. जहां तक आपकी कड़क का सवाल है,जल्दी ही आगरा या दिल्ली में आपसे मिलने का प्रयास करूंगा ताकि आपकी कड़क देख सकूं और अपनी कड़क दिखा सकूं.&lt;/blockquote&gt;
जब मर्जी देखना और शौक से देखना, अपन किसी से डरने वालों में से नहीं।

&lt;blockquote&gt;८. अरे भाई आपके लेख पर तो मैंने कुछ कहा ही नहीं सिवाय इसके कि एक तर्कदोष या ‘फ़ैलेसी’ की ओर संकेत किया था कि राजतंत्र कोई आदर्श शासन व्यवस्था नहीं थी और न है, कि उसे उदाहरण के रूप में उद्धृत किया जा सके.&lt;/blockquote&gt;
मैंने तो राजतंत्र का कहीं ज़िक्र ही नहीं किया ना ही उसके गुण-दोष पर कुछ लिखा। सृजनशिल्पी जी ने जिन प्रोफ़ेसर साहब का लेख अपने ब्लॉग पर अपनी बात के समर्थन में डाला था, मैंने तो बस उन प्रोफ़ेसर साहब की बातों में गलतियाँ बताई हैं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p>१. छींटाकशी की शुरुआत पंकज ने की थी पर चूंकि वह आपके पक्ष में लिख रहे थे सो वह छींटाकशी आपको मधुर और सात्विक लग रही थी. अतः आपने उनसे कोई विनम्र ‘निवेदन’ नहीं किया .</p></blockquote>
<p>खामखा? पंकज भाई की बात को मैंने उस तरह से नहीं लिया जिस तरह आपने लिया, यानि कि खामखा की बदसलूकी निकालना। उन्होंने एक वास्तविक बात कही कि किसी को भाषण और नसीहत देना बहुत ही आसान काम है और वाकई कुछ लोगों को उसमें महारत हासिल है। अब आप उस बात का खामखा बतंगड़ बना रहे हैं उसे अशिष्ट कहकर तो ठीक है, बनाईये, मेरा कुछ नहीं घिसता।</p>
<blockquote><p>२. कोई भी सार्वजनिक बहस दो व्यक्तियों के बीच का मामला नहीं होता उसमें सबकी हिस्सेदारी होती है और सबको अपनी बात कहने का हक होता है .</p></blockquote>
<p>बिलकुल होता है और खुशी हुई यह जानकर कि आप इस बात से इत्तफ़ाक रखते हैं, परन्तु मैंने यह नहीं कहा कि बहस सार्वजनिक रूप से मत करो। मैंने सिर्फ़ इतना कहा कि भई यदि एक दूसरे को कुछ भला बुरा कहना है तो कहीं और जाओ यहाँ मत करो, आप उसे सार्वजनिक रूप से करो या निजी तौर पर, मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता।</p>
<blockquote><p>३. जब बंदा टिप्पणी आपके ब्लॉग पर करेगा और उस पर आपको कोई ऐतराज़ नही होगा तो स्वाभाविकरूप से उस पर जो जवाबी टिप्पणी आएगी वह भी आपके ब्लॉग पर ही आएगी.</p></blockquote>
<p>बिलकुल आएगी, लेकिन कोई आवश्यक नहीं है। मैंने सृजनशिल्पी जी के ब्लॉग पर टिप्पणी नहीं की सिर्फ़ यह सोच कि मैं कुछ ऐसा लिखने वाला हूँ जो कदाचित्‌ उन्हें अपने ब्लॉग पर पसंद नहीं आए, इसलिए अपने विचार अपने ब्लॉग पर लिखे।</p>
<blockquote><p>५. रही बात आपकी विनम्रता की तो इस बारे में मैं अभी कुछ नहीं कह रहा हूं.</p></blockquote>
<p>बड़ी मेहरबानी, बहुत बड़ा एहसान किया।</p>
<blockquote><p>हां, अनूप भाई जरूर बड़ी भद्रता से आपको इस संदर्भ में कुछ संकेत दे चुके हैं.</p></blockquote>
<p>क्या कहना चाहते हैं, कि मैं बद्तमीज़ और अशिष्ट हूँ। कह लो, आपके कहने से कम से कम मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता, सबको अपनी सोच रखने का अधिकार है, आप भी रखो।</p>
<blockquote><p>६. जहां तक आपकी कड़क का सवाल है,जल्दी ही आगरा या दिल्ली में आपसे मिलने का प्रयास करूंगा ताकि आपकी कड़क देख सकूं और अपनी कड़क दिखा सकूं.</p></blockquote>
<p>जब मर्जी देखना और शौक से देखना, अपन किसी से डरने वालों में से नहीं।</p>
<blockquote><p>८. अरे भाई आपके लेख पर तो मैंने कुछ कहा ही नहीं सिवाय इसके कि एक तर्कदोष या ‘फ़ैलेसी’ की ओर संकेत किया था कि राजतंत्र कोई आदर्श शासन व्यवस्था नहीं थी और न है, कि उसे उदाहरण के रूप में उद्धृत किया जा सके.</p></blockquote>
<p>मैंने तो राजतंत्र का कहीं ज़िक्र ही नहीं किया ना ही उसके गुण-दोष पर कुछ लिखा। सृजनशिल्पी जी ने जिन प्रोफ़ेसर साहब का लेख अपने ब्लॉग पर अपनी बात के समर्थन में डाला था, मैंने तो बस उन प्रोफ़ेसर साहब की बातों में गलतियाँ बताई हैं।</p>
]]></content:encoded>
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		<title>By: प्रियंकर</title>
		<link>http://hindi.amitgupta.in/2006/11/12/misconcepted-misconception/#comment-538</link>
		<dc:creator>प्रियंकर</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 16 Nov 2006 10:22:54 +0000</pubDate>
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		<description>१. छींटाकशी की शुरुआत पंकज ने की थी पर चूंकि वह आपके पक्ष में लिख रहे थे सो वह छींटाकशी आपको मधुर और सात्विक लग रही थी.  अतः आपने उनसे कोई विनम्र &#039;निवेदन&#039; नहीं किया .
२. कोई भी सार्वजनिक बहस दो व्यक्तियों के बीच का मामला नहीं होता उसमें सबकी हिस्सेदारी होती है और सबको अपनी बात कहने का हक होता है .
३. जब बंदा टिप्पणी आपके ब्लॉग पर करेगा और उस पर आपको कोई ऐतराज़ नही होगा तो स्वाभाविकरूप से उस पर जो जवाबी टिप्पणी आएगी वह भी आपके ब्लॉग पर ही आएगी.
४. कौन खूंटे से उखड़ रहा है और किसके पास तर्क हैं, इसका फ़ैसला हम और आप न करें तो बेहतर होगा. यह फ़ैसला अन्य चिट्ठाकारों पर छोड़ना बेहतर रहेगा .
५. रही बात आपकी विनम्रता की तो इस बारे में मैं अभी कुछ नहीं कह रहा हूं.  हां, अनूप भाई जरूर बड़ी भद्रता से आपको इस संदर्भ में कुछ संकेत दे चुके हैं.
६. जहां तक आपकी कड़क का सवाल है,जल्दी ही आगरा या दिल्ली में आपसे मिलने का प्रयास करूंगा ताकि आपकी कड़क देख सकूं और अपनी कड़क दिखा सकूं.
७. इतनी दूर से आप मेरे बनावटीपन को जान गये सो आपकी दूरदृष्टि का प्रशंसक हूं .
८. अरे भाई आपके लेख पर तो मैंने कुछ कहा ही नहीं सिवाय  इसके कि एक तर्कदोष या &#039;फ़ैलेसी&#039; की ओर संकेत किया था कि राजतंत्र कोई आदर्श शासन व्यवस्था नहीं थी और न है, कि उसे उदाहरण के रूप में उद्धृत किया जा सके.
पुनः स्नेह के साथ,</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>१. छींटाकशी की शुरुआत पंकज ने की थी पर चूंकि वह आपके पक्ष में लिख रहे थे सो वह छींटाकशी आपको मधुर और सात्विक लग रही थी.  अतः आपने उनसे कोई विनम्र &#8216;निवेदन&#8217; नहीं किया .<br />
२. कोई भी सार्वजनिक बहस दो व्यक्तियों के बीच का मामला नहीं होता उसमें सबकी हिस्सेदारी होती है और सबको अपनी बात कहने का हक होता है .<br />
३. जब बंदा टिप्पणी आपके ब्लॉग पर करेगा और उस पर आपको कोई ऐतराज़ नही होगा तो स्वाभाविकरूप से उस पर जो जवाबी टिप्पणी आएगी वह भी आपके ब्लॉग पर ही आएगी.<br />
४. कौन खूंटे से उखड़ रहा है और किसके पास तर्क हैं, इसका फ़ैसला हम और आप न करें तो बेहतर होगा. यह फ़ैसला अन्य चिट्ठाकारों पर छोड़ना बेहतर रहेगा .<br />
५. रही बात आपकी विनम्रता की तो इस बारे में मैं अभी कुछ नहीं कह रहा हूं.  हां, अनूप भाई जरूर बड़ी भद्रता से आपको इस संदर्भ में कुछ संकेत दे चुके हैं.<br />
६. जहां तक आपकी कड़क का सवाल है,जल्दी ही आगरा या दिल्ली में आपसे मिलने का प्रयास करूंगा ताकि आपकी कड़क देख सकूं और अपनी कड़क दिखा सकूं.<br />
७. इतनी दूर से आप मेरे बनावटीपन को जान गये सो आपकी दूरदृष्टि का प्रशंसक हूं .<br />
८. अरे भाई आपके लेख पर तो मैंने कुछ कहा ही नहीं सिवाय  इसके कि एक तर्कदोष या &#8216;फ़ैलेसी&#8217; की ओर संकेत किया था कि राजतंत्र कोई आदर्श शासन व्यवस्था नहीं थी और न है, कि उसे उदाहरण के रूप में उद्धृत किया जा सके.<br />
पुनः स्नेह के साथ,</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Amit</title>
		<link>http://hindi.amitgupta.in/2006/11/12/misconcepted-misconception/#comment-537</link>
		<dc:creator>Amit</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 15 Nov 2006 18:45:18 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://hindi.amitgupta.in/2006/11/12/misconcepted-misconception/#comment-537</guid>
		<description>&lt;blockquote&gt;वाह भई वाह, व्यंग्य करना गलत और गाली गलौच है और ‘बेवकूफ़’ कहना सभ्यता और संस्कार . क्या तराज़ू है न्याय का .&lt;/blockquote&gt;
मैंने नहीं कहा कि &quot;बेवकूफ़&quot; कहना सभ्य है, आप अपने आप से मतलब निकाल रहे हैं तो निकालिए लेकिन उसको मेरे द्वारा कथित मत बनाईये।

दूसरी बात, आपस में एक दूसरे पर छींटाकशी करना कोई अक्लमंदी की बात नहीं है, कोई आपसे सहमत नहीं है तो इसका अर्थ यह नहीं कि आप उसे भला बुरा कहने लगें। और यदि कहना ही है तो ये आपका और दूसरे बन्दे के बीच का मामला है, इसलिए इसे कहीं और ले जाईये, यहाँ मत करिए। खामखा खूँटे से उखड़ने की ज़रूरत नहीं है, जब आप किसी पर बेसिर-पैर की टिप्पणियाँ और व्यंग्य करते रहे तो सही है, तर्क सामने आते ही खूँटे से उखड़ जाते हो!!

तीसरी और अंतिम बात, लगता है विनम्रता से निवेदन कर मैंने गलती कर दी, आपसे कड़क हो कर ही कहना चाहिए था कि यहाँ अपना झगड़ा करने की आवश्यकता नहीं है!! माफ़ कीजिए मुझे आपकी तरह बनावट नहीं आती। जैसा महसूस करता हूँ वैसा ही लिखता हूँ। दोहरे मापदण्ड की बात करने से पहले यह देखिए कि क्या लिखा गया था जिसके प्रतिउत्तर में मैंने ये लेख/व्यंग्य लिखा, दोनों की भाषा और सार मिलाईये और फ़िर कुछ कहिए।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p>वाह भई वाह, व्यंग्य करना गलत और गाली गलौच है और ‘बेवकूफ़’ कहना सभ्यता और संस्कार . क्या तराज़ू है न्याय का .</p></blockquote>
<p>मैंने नहीं कहा कि &#8220;बेवकूफ़&#8221; कहना सभ्य है, आप अपने आप से मतलब निकाल रहे हैं तो निकालिए लेकिन उसको मेरे द्वारा कथित मत बनाईये।</p>
<p>दूसरी बात, आपस में एक दूसरे पर छींटाकशी करना कोई अक्लमंदी की बात नहीं है, कोई आपसे सहमत नहीं है तो इसका अर्थ यह नहीं कि आप उसे भला बुरा कहने लगें। और यदि कहना ही है तो ये आपका और दूसरे बन्दे के बीच का मामला है, इसलिए इसे कहीं और ले जाईये, यहाँ मत करिए। खामखा खूँटे से उखड़ने की ज़रूरत नहीं है, जब आप किसी पर बेसिर-पैर की टिप्पणियाँ और व्यंग्य करते रहे तो सही है, तर्क सामने आते ही खूँटे से उखड़ जाते हो!!</p>
<p>तीसरी और अंतिम बात, लगता है विनम्रता से निवेदन कर मैंने गलती कर दी, आपसे कड़क हो कर ही कहना चाहिए था कि यहाँ अपना झगड़ा करने की आवश्यकता नहीं है!! माफ़ कीजिए मुझे आपकी तरह बनावट नहीं आती। जैसा महसूस करता हूँ वैसा ही लिखता हूँ। दोहरे मापदण्ड की बात करने से पहले यह देखिए कि क्या लिखा गया था जिसके प्रतिउत्तर में मैंने ये लेख/व्यंग्य लिखा, दोनों की भाषा और सार मिलाईये और फ़िर कुछ कहिए।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: प्रियंकर</title>
		<link>http://hindi.amitgupta.in/2006/11/12/misconcepted-misconception/#comment-536</link>
		<dc:creator>प्रियंकर</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 15 Nov 2006 14:13:54 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://hindi.amitgupta.in/2006/11/12/misconcepted-misconception/#comment-536</guid>
		<description>वाह भई वाह, व्यंग्य करना गलत और गाली गलौच है और &#039;बेवकूफ़&#039; कहना सभ्यता और संस्कार . क्या तराज़ू है न्याय का .        अमित महोदय,
मुझे नहीं पता इसके क्या कारण हैं पर अपनी तुर्शी और तल्खी थोड़ी कम करो तो और बेहतर लिख पाओगे . और तब यह आदेश/अनुदेश/प्रार्थना भी नहीं करनी पड़ेगी कि &quot;मेरे ब्लॉग को बक्श दें.&quot;
आशा करता हूं आप मेरे अनुरोध पर ध्यान देंगे

स्नेह के साथ,</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>वाह भई वाह, व्यंग्य करना गलत और गाली गलौच है और &#8216;बेवकूफ़&#8217; कहना सभ्यता और संस्कार . क्या तराज़ू है न्याय का .        अमित महोदय,<br />
मुझे नहीं पता इसके क्या कारण हैं पर अपनी तुर्शी और तल्खी थोड़ी कम करो तो और बेहतर लिख पाओगे . और तब यह आदेश/अनुदेश/प्रार्थना भी नहीं करनी पड़ेगी कि &#8220;मेरे ब्लॉग को बक्श दें.&#8221;<br />
आशा करता हूं आप मेरे अनुरोध पर ध्यान देंगे</p>
<p>स्नेह के साथ,</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Amit</title>
		<link>http://hindi.amitgupta.in/2006/11/12/misconcepted-misconception/#comment-535</link>
		<dc:creator>Amit</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 15 Nov 2006 13:29:18 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://hindi.amitgupta.in/2006/11/12/misconcepted-misconception/#comment-535</guid>
		<description>प्रियंकर महोदय, &quot;बेवकूफ़&quot; कहना और गाली देने में फ़र्क है। रही बात वर्तनी की, तो perfect कोई नहीं होता। और एक निवेदन है, एक दूसरे पर यदि इस तरह छींटाकशी करनी है तो अपने &lt;em&gt;गाली गलौच&lt;/em&gt; के प्रोग्राम को कहीं और ले जाएँ, मेरे ब्लॉग को बक्श दें। :)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>प्रियंकर महोदय, &#8220;बेवकूफ़&#8221; कहना और गाली देने में फ़र्क है। रही बात वर्तनी की, तो perfect कोई नहीं होता। और एक निवेदन है, एक दूसरे पर यदि इस तरह छींटाकशी करनी है तो अपने <em>गाली गलौच</em> के प्रोग्राम को कहीं और ले जाएँ, मेरे ब्लॉग को बक्श दें। <img src='http://hindi.amitgupta.in/wp-content/plugins/smilies-themer/ig_cool/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: प्रियंकर</title>
		<link>http://hindi.amitgupta.in/2006/11/12/misconcepted-misconception/#comment-534</link>
		<dc:creator>प्रियंकर</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 15 Nov 2006 13:09:51 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://hindi.amitgupta.in/2006/11/12/misconcepted-misconception/#comment-534</guid>
		<description>एक लोकतांत्रिक समाज में किसी विषय विशेष पर हो रही बहस में अपनी बात के पक्ष में राजतंत्रीय और सामंती समाज का उदाहरण, गंभीर बहस में हास्य के उपयोग
का अच्छा नमूना है.
बहस में तर्क-वितर्क और कुतर्क तो हो रहे थे पर गाली से अभी तक सभी को परहेज़ था. पंकज ने अलग मत रखने वालों को &#039;बेवकुफ़&#039; कह कर वह सीमा भी लांघ दी. यह अलग बात है कि वे अभी तक बेवकूफ़ की सही वर्तनी भी लिखना नहीं जानते . पर इसमें उनका क्या दोष यह तो सरकार का और सरकारी स्कूलों की &#039;सब्सीडाइज्ड&#039; पढाई का दोष है. पांच सितारा स्कूल में पढे होते तो ऐसा थोड़े ही होता. तब फ़र्राटे से अंग्रेजी में गाली देते .</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>एक लोकतांत्रिक समाज में किसी विषय विशेष पर हो रही बहस में अपनी बात के पक्ष में राजतंत्रीय और सामंती समाज का उदाहरण, गंभीर बहस में हास्य के उपयोग<br />
का अच्छा नमूना है.<br />
बहस में तर्क-वितर्क और कुतर्क तो हो रहे थे पर गाली से अभी तक सभी को परहेज़ था. पंकज ने अलग मत रखने वालों को &#8216;बेवकुफ़&#8217; कह कर वह सीमा भी लांघ दी. यह अलग बात है कि वे अभी तक बेवकूफ़ की सही वर्तनी भी लिखना नहीं जानते . पर इसमें उनका क्या दोष यह तो सरकार का और सरकारी स्कूलों की &#8216;सब्सीडाइज्ड&#8217; पढाई का दोष है. पांच सितारा स्कूल में पढे होते तो ऐसा थोड़े ही होता. तब फ़र्राटे से अंग्रेजी में गाली देते .</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Amit</title>
		<link>http://hindi.amitgupta.in/2006/11/12/misconcepted-misconception/#comment-533</link>
		<dc:creator>Amit</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 15 Nov 2006 10:31:56 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://hindi.amitgupta.in/2006/11/12/misconcepted-misconception/#comment-533</guid>
		<description>&lt;blockquote&gt;बात तो है सो है लेकिन लेख बहुत ताव में लिखा है भाई!&lt;/blockquote&gt;
हाँ, थोड़ा ताव में लिखा है इस बात से इन्कार नहीं करूँगा।

&lt;blockquote&gt;डर लग रहा है कुछ टिप्पणी करते हुये.&lt;/blockquote&gt;
ये तो गलत बात है अनूप जी, कैसा डर? हर किसी को अपनी बात कहने का हक है, जब लोग बेसिरपैर की बात करते नहीं डरते तो आप तो मुझे विश्वास है कि बेसिरपैर की बात नहीं करेंगे, फ़िर कैसा डर। :)

&lt;blockquote&gt;लेकिन गुस्सा थोड़ा कम होता तो और अच्छा लगता.&lt;/blockquote&gt;
वो यूँ है कि जब किसी को ऐसी बे सिर-पैर की बातें करते और अपने को समझदार साबित करते देखता हूँ तो मेरा पारा चढ़ जाता है!! :) वैसे मैंने सारे लेख में हास्य और व्यंग्य वाला स्वर बनाए रखने का पूर्ण प्रयास किया, पता नहीं आपको गुस्सा कहाँ से झलक दिखला गया!! ;)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p>बात तो है सो है लेकिन लेख बहुत ताव में लिखा है भाई!</p></blockquote>
<p>हाँ, थोड़ा ताव में लिखा है इस बात से इन्कार नहीं करूँगा।</p>
<blockquote><p>डर लग रहा है कुछ टिप्पणी करते हुये.</p></blockquote>
<p>ये तो गलत बात है अनूप जी, कैसा डर? हर किसी को अपनी बात कहने का हक है, जब लोग बेसिरपैर की बात करते नहीं डरते तो आप तो मुझे विश्वास है कि बेसिरपैर की बात नहीं करेंगे, फ़िर कैसा डर। <img src='http://hindi.amitgupta.in/wp-content/plugins/smilies-themer/ig_cool/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<blockquote><p>लेकिन गुस्सा थोड़ा कम होता तो और अच्छा लगता.</p></blockquote>
<p>वो यूँ है कि जब किसी को ऐसी बे सिर-पैर की बातें करते और अपने को समझदार साबित करते देखता हूँ तो मेरा पारा चढ़ जाता है!! <img src='http://hindi.amitgupta.in/wp-content/plugins/smilies-themer/ig_cool/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> वैसे मैंने सारे लेख में हास्य और व्यंग्य वाला स्वर बनाए रखने का पूर्ण प्रयास किया, पता नहीं आपको गुस्सा कहाँ से झलक दिखला गया!! <img src='http://hindi.amitgupta.in/wp-content/plugins/smilies-themer/ig_cool/icon_wink.gif' alt=';)' class='wp-smiley' /> </p>
]]></content:encoded>
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