बदलता समय ….. बदलते स्वाद
आज करीब एक साल बाद जामा मस्जिद के पास स्थित करीम होटल में खाना खाने गया। मन ही मन करीम के तन्दूरी चिकन के बारे में सोच सोच लड्डू फूट रहे थे!!
रविवार और ठण्ड का मौसम होने के कारण अच्छी खासी भीड़ थी, लगभग 20 मिनट प्रतीक्षा करने के बाद टेबल मिली। थोड़ी और प्रतीक्षा के बाद लज़ीज़ तन्दूरी चिकन भी सामने था, लेकिन पहला निवाला मुँह में लेते ही सारा मज़ा किरकिरा हो गया। करीम होटल के स्वादिष्ट खाने की जो लज़ीज़ यादें मन में बसी थी वो सारी की सारी धराशाई हो गई। मैंने कई जगह तन्दूरी चिकन खाया है, कहीं अच्छा तो कहीं बेकार, लेकिन इतना बेस्वाद कहीं नहीं खाया था अभी तक। समय के साथ बदलाव आते हैं लेकिन क्या स्वाद बढ़िया से घटिया और बद् से बद्तर हो जाता है?
अभी कुछ दिन पहले मेरे मित्र संतोष ने बताया था कि हाल ही में जब पहली बार अपनी पत्नी के साथ करीम होटल गए तो उन्हें तन्दूरी चिकन में कोई मज़ा नहीं आया, उसका स्तर इतना नहीं था जितना नाम सुना था। संतोष की बात सुन मुझे विश्वास नहीं आया, मैंने कहा कि हो सकता है कि उस दिन अच्छा नहीं बना हो या संतोष का ही मुँह का स्वाद खराब हो, लेकिन आज स्वयं खाने के बाद मुझे विश्वास हो गया। एक वर्ष में करीम होटल के खाने का स्वाद वाकई गिर गया है।
आज भी करीम के बरसों के जमाए नाम का ही नतीजा है कि कई लोग सिर्फ़ नाम सुनकर पहली बार खाने आते हैं। लेकिन स्वाद के इस गिरते स्तर के चलते कब तक नाम बना रहेगा? अब तो अगली बार जाने से पहले मुझे भी सोचना होगा।





9 Comments
संजय बेंगाणी
नई जगह तलाशो. बिना गुणवत्ता ‘नाम ही काफी है’ के भरोसे ज्यादा दिन तक कुछ भी नहीं चल सकता.
Amit
सही कहा। वैसे नई जगह तो अपन तलाशते ही रहते हैं इसलिए बढ़िया जगह का कोई टोटा नहीं, परन्तु करीम के गिरते स्वाद के स्तर को देख अफ़सोस अवश्य हुआ, इसका तन्दूरी चिकन वाकई बहुत बढ़िया था, तभी तो यह अपनी लिस्ट में सबसे ऊपर था।
शशि सिंह
वक़्त-वक़्त की बात है अमित मियां… जब मुर्गे का वक़्त ख़राब होता है तो चच्चा करीम के हाथों बिरयानी और तंदूरी अच्छी बनती हैं. अब लगता है चच्चा करीम का वक़्त ख़राब आने वाला है… आप जैसे कुछ ग्राहक टूटे तो शायद मुर्गे की खपत कम हो और मुर्गों के दिन बहुरे. आमीन!!!
Amit
अरे कोई एक ही जगह थोड़े ही है खाने की, और भी बहुत से बढ़िया बनाने वालों को जानते हैं हम!!
और वैसे भी अपन इतने मुर्गे नहीं खाते, बल्कि यूँ कहो कि कभी कभार एकाध महीने में एकाध बार खाते हैं।
ratna
क्नाट-प्लेस में युनाइटेड काफी हाउस का कुक चिकन की सभी डिश बहुत अच्छी बनाता है।
राजीव
अभी इसी माह के प्रारम्भ में मैं दिल्ली में तकरीबन एक पखवारे के प्रवास पर था। वहीं पर मैंने एक दिन भोजन के समय एक परिचित द्वारा “करीम होटल” के बारे में पहली बार सुना और उन सज्जन द्वारा इस होटल की और उसके व्यंजनों की बहुत तारीफ़ सुनी। कई बार भोजन के लिये करने वाली लम्बी प्रतीक्षा का भी उन्होंने ज़िक्र किया था। चूंकि मैं शाकाहारी हूँ, लिहाज़ा मैंने उस पर अधिक ध्यान नहीँ दिया परंतु उसकी चर्चा यहाँ पढ़ कर लगता है कि वास्तव में माँसाहारी व्यंजनों के लिये यह बहुत लोकप्रिय भोजनालय हैं। ख़ैर मुझे क्या, कभी मौका लगा तो वहाँ जा कर बेसब्री से प्रतीक्षारत लोगों की भीड़ का जायज़ा अवश्य ले लूँगा।
Amit
वहाँ भी खाया हुआ है रत्ना जी और उससे बढ़िया भी खाया हुआ है, इसलिए उसको “कोई खास नहीं” वाली श्रेणी में रखा हुआ है।
लोकप्रिय तो अवश्य है, यह जामा मस्जिद वाला होटल लगभग सौ साल पुराना है।
अब वैसे इसकी कई शाखाएँ दिल्ली, नोएडा और गुड़गाँव में खुल गई हैं लेकिन जामा मस्जिद के बाद निज़ामुद्दीन स्थित करीम होटल ही बढ़िया था, अब पता नहीं वहाँ का स्तर भी गिर गया क्या!!
Shrish
इसीको कहते हैं:
मुर्गा जान से गया और मुल्ला जी को लुत्फ न आया।
Amit
हाँ लेकिन यह कहते हुए यह भूल जाते हैं कि गेंहूँ तो काट लिए(यानि पौधा जान से गया) लेकिन रोटी कभी कभी ठीक से नहीं सिकती(यानि मज़ा नहीं आता)!!