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नया समय ….. नए चिट्ठाकार


January 3rd, 2007 at 04:02 pm | 7 Comments

कल रात लगभग 11 बजे मैं लान्सडौन में 3 दिन की छुट्टी के बाद वापस लौटा। आते ही सबसे पहले कंप्यूटर चला के ईमेल देखी, तीन दिन की अनुपस्थिति के चलते इन्बॉक्स में ईमेलें ठसा ठस भरी हुई थी, तो मैं कचरा ईमेलों को मिटाने और अन्य ईमेलों को पढ़ने बैठ गया, कई नए साल की शुभकामनाओं वाली ईमेलें थीं जिनके उत्तर दिए और कुछेक अन्य ईमेलें थीं।

एक ईमेल चिट्ठाकार समूह पर भी आई हुई थी किसी दिव्यभ आर्यन महाशय की जिसमें वे वही राग अलाप रहे थे जो कि अभी हाल ही में चिट्ठाकार समूह में चर्चित हुआ था। मुद्दा यह था कि कुछ नए चिट्ठाकार अपने अपने चिट्ठों अर्थात्‌ ब्लॉग पर प्रकाशित नई पोस्टों की सूचना ईमेल द्वारा पूरे समूह को दे रहे थे। अब एकाध तो ठीक है परन्तु जब कई ब्लॉगर कई कई ईमेलें करने लगेंगे तो सभी को दिक्कत होगी, जिसे कि वे लोग नहीं समझ रहे थे। अब उनकी दुविधा भी जायज़ है कि अपने नए ब्लॉग आदि के बारे में जब तक किसी को बताएँगे नहीं तो लोगों को पता कैसे चलेगा, लेकिन उचित समाधान बताए जाने पर भी उनका न समझना सिर्फ़ ढीढता को ही दर्शाता है। उनको बताया गया कि इस तरह हर नई पोस्ट के बारे में सभी को ईमेल करना अनुचित है, किसी को वे अपना ब्लॉग पढ़ने के लिए बाध्य नहीं कर सकते, केवल एक बार अपने ब्लॉग के बारे में बता दो, अपने ईमेल के सिग्नेचर में अपने ब्लॉग का पता रखो, नारद तथा हिन्दी ब्लॉग्स जैसी सेवाओं को अपने ब्लॉग के बारे में जानकारी दो ताकी सभी आपके ब्लॉग की नई पोस्ट आदि पढ़ सकें, फ़िर जिसको पढ़ना होगा वह पढ़ेगा, लेकिन कुछ लोगों को तो मानों स्पैम करने के लिए बहाना चाहिए, उनको इन उपायों में से कोई भी उपाय स्वीकार नहीं।

एक नए चिट्ठाकार ने यह मुद्दा भी उठाया कि उनकी पोस्ट पर कोई टिप्पणी नहीं करता तो यह बात भी समझ में आती है। इस पर तरूण भाई ने कहा कि लेने से पहले देने की सोचें क्योंकि “give and take” का ज़माना है। यदि आप दूसरे के ब्लॉग पर टिप्पणी करेंगे तो दूसरा भी आपके ब्लॉग पर बेशक टिप्पणी नहीं करे लेकिन एक बार कम से कम पढ़ने तो आएगा, और क्या पता नियमित पाठक बन नियमित टिप्पणियाँ दे। एक बात यह भी सोचने की है कि लिखने वाले को अपने आप से सच्चे दिल से पूछना चाहिए कि वह ऐसा क्या लिखता है कि लोग उसके ब्लॉग को पढ़ें और उस पर टिप्पणी भी दें? यदि वह कुछ ऐसा लिखता है जो लोगों को पसंद आता है तो लोगबाग़ पढ़ने भी आएँगे और टिप्पणियाँ भी करेंगे।

लेकिन यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि कुछ को यह बात भी स्वीकार्य नहीं, उनको तो लगातार स्पैम करना ही है, अपने ब्लॉग को जबर्दस्ती दूसरों को पढ़वाना है और टिप्पणियाँ भी लेनी हैं। मतलब यह तो वही बात हो गई(जैसे एक मित्र ने मुझे बताया था) कि मानों कह रहे हों:

सरपंचों की बात सिर-माथे, लेकिन नाली तो यहीं से बहेगी!!!

हाँ तो इन दिव्यभ महोदय ने तरूण भाई की ईमेल के उत्तर में चिट्ठाकार समूह में यह ईमेल करी जिसमें साहब हक/अधिकारों की बात करते हुए कहते हैं कि उनका तो हक बनता है अपनी बात को रखना, उस बात को कार्यान्वित करना बाकी सब की ज़िम्मेदारी है। अब यह कहाँ का कानून है भई?? बहरहाल अपनी खीज को दबाते हुए मैंने प्यार-मोहब्बत की भाषा में उत्तर दिया कि भई अधिकारों की बात करने से पहले व्यक्ति को अपनी ज़िम्मेदारियों को समझना और पूरा करने का प्रयास करना चाहिए, तभी वह अपने अधिकारों को प्राप्त करने योग्य है। लेकिन एक भूल मुझ से यह हुई कि यह नहीं देखा कि ईमेल कहाँ जा रही है, गलती से वह ईमेल चिट्ठाकार समूह मे जाने की बजाय दिव्यभ महोदय के पते पर चली गई। उस ईमेल के उत्तर में महाशय ने आज मुझे यह ईमेल भेजी:

Mr. Amit Gupt,
tumhare sahare mane Blog nahi Likhana shuru kiya hai.ya to tum aabbal darje ke bebakuf ho ya nakare.baat lagata hai ki tumhare dimaag me aati hi nahi.u know the problem of Hindi blogger is just like u…unke pass na to tahejib hoti hai aur na aakal,mai to samajhata tha ki samajhadaro ki toli hai yah.maine padha hai tumhara Blog jo likhate ho tum kud janate ho tumhare liye maine ye dhun taiyaar ki hai—
“Chale the Carvan me baith hazaro itihash rachane
par kuch jo ban jate hain itihash aur koi ek hi
de pata hai Gehara Paigam.” aage se mujhe mail karne ki jaroorat nahin hai aur na hi mera mail jayega aapke so called ChittaKar Bunglow me. Sukriya aur Hve a great morning Jindagi se kuch Seekhne ki koshish karo.thodi samajdari aur tahejib lao Nahi to wohin Atke Raho ge Samjhe.

Divyabh.

यानि कि बद्तमीज़ी और बेअक्ली वाली बात करने वाले साहब तमीज़ और अक्ल की बात कर रहे हैं, इस बात से मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ, संसार में ऐसे लोग भरे पड़े हैं और दुख की बात है कि अब ये लोग ऑनलाईन आ अपनी गंदगी फ़ैलाएँगे जिससे जल्द ही वास्तविक संसार की भांति यह इंटरनेट भी दूषित हो जाएगा। लेकिन क्या कर सकते हैं जी, मुक्त संसार है, सभी अपनी इच्छानुसार बर्ताव करने के लिए तैयार हैं।

इस पोस्ट का मकसद सिर्फ़ इस बात को दर्शाना है कि एक साधारण चलती चर्चा में लोग किस तरह व्यक्तिगत हो खामखा कीचड़ उछालने लगते हैं, यह भी कोई वैसे नई बात नहीं है, अभी हाल ही में परिचर्चा पर भी ऐसा देखने/पढ़ने को मिला। दूसरा मकसद अन्य हिन्दी चिट्ठाकारों को यह ईमेल पढ़वाना भी था क्योंकि अन्य चिट्ठाकारों को भी बद्तमीज़ और बेअक्ल कहा गया है।

और दिव्यभ महोदय, चूंकि आप नहीं चाहते कि आपको मैं ईमेल करूँ इसलिए आपकी तरह बद्तमीज़ और गंवार न होने के कारण मैं आपकी इच्छा का सम्मान करते हुए आपको ईमेल द्वारा अपना उत्तर नहीं देते हुए अपने ब्लॉग द्वारा दे रहा हूँ।

मैंने तो कहा ही नहीं कि मैंने आपको ब्लॉग लिखना सिखाया, यह कोई बहुत बड़ी बात भी नहीं है, यदि आपने अपने आप सीखा तो अच्छी बात, यदि किसी ने सिखाया तो उसका धन्यवाद करना मत भूलना(जो कि मुझे लगता है कि आप अवश्य भूल गए होंगे)। नाकारे होने के बारे में तो पता नहीं लेकिन बेवकूफ़ आप अवश्य हो क्योंकि बात आपके दिमाग में नहीं आती जो कि सीधी सरल भाषा में आपको कई लोगों ने समझाई। मैं दुआ करता हूँ कि आप कभी कोई गैरकानूनी कार्य न कर बैठो नहीं तो जज के सामने भी यही राग अलापोगे कि आपने तो कुछ गलत किया नहीं, वह तो कानून ही बेढंगा है!! हिन्दी ब्लॉगर समुदाय मेरे आने से पहले भी खुश था और मेरे आने के बाद भी, हाँ यही बात आपके आने के बाद के बारे में नहीं कही जा सकती शायद, लेकिन वो कहते हैं न कि “हाथी चलते रहते हैं …….”!! ;) हिन्दी चिट्ठाकार बहुत ही समझदार, तमीज़दार हैं, बस आप जैसी कुछ सड़ी मछलियाँ तालाब गंदा करने का भरसक प्रयास कर रही हैं जिसे सफ़ल होने से रोकने का पूर्ण प्रयास किया जाएगा।

आपको तो मैं ईमेल पहले भी नहीं करना चाहता था, वह तो याहू की गलती से चली गई, तथा चिट्ठाकार समूह मेरे अकेले का नहीं है, वह तो सभी का है, वैसे मुझे खुशी है कि तालाब से एक गंदी मछली कम हुई। रही बात ज़िन्दगी से कुछ सीखने की, वह तो मैं रोज़ ही सीखता हूँ, लेकिन आप जैसे बद्‌किस्मत नहीं सीख पाते क्योंकि उसके लिए अक्ल दरकार होती है। बाकी समझ और तहज़ीब लाने वाली बात गलती से आप अपनी जगह मेरे लिए लिख गए अन्यथा वह तो आप पर पूर्णतया सटीक बैठती है, क्योंकि आपको क्या पता मैं अटका हुआ हूँ, वह तो आप जैसों का ही दुर्भाग्य होता है!!!

साथ ही अंत में मैं दिव्यभ महोदय से क्षमा चाहता हूँ कि उनको मेरी ईमेल चली गई, अन्यथा उन जैसों को तो मैं ईमेल लिखना ही पसंद नहीं करता।

आगे से मुझे इस बात का खास ख़्याल रखना होगा कि जिसको ईमेल भेजना चाहता हूँ उसी को जाए, किसी ऐरे-गैरे को नहीं।

7 Comments

अफ़लातून


दिव्याभ का पत्र छाप कर आपने अभिव्यक्ति को तरजीह दी । बधाई ।


PRABHAT TANDON


ताज्जुब की बात है कि ऐसे-2 लोग भी होते हैं।


Shrish


अमित भाई, मुझे समझ नहीं आ रहा कि क्या टिप्पणी करुँ। मैं नहीं जानता कि उपरोक्त मामला क्या था। पर ‘बेवकूफ’, ‘नकारे’ जैसे निकृष्ट शब्दों का प्रयोग किसी भी सूरत में जायज नहीं। हिन्दी चिट्ठाकारी के पिछले तीन साल के इतिहास में कहीं भी ऐसे शब्दों का प्रयोग नहीं मिलता। मेरा तो मानना है कि हर प्रकार का विरोध भी सभ्यतापूर्ण ढंग से ही किया जाना चाहिए।

मैं उपरोक्त संदर्भ-ईमेल पढ़कर दंग रह गया और मुझे काफी देर तक विश्वास ही न हुआ। मैं अपने दोस्तों को गर्व से बताया करता हूँ कि हिन्दी चिट्ठाजगत में कितना प्रेमपूर्ण माहौल है, कितने परिपक्व, सभ्य सदस्य हैं। अब मैं किस मुँह से यह सब कहूँगा।

‘परिचर्चा’ पर भी कुछ दिन पहले इस तरह की घटना हुई थी। मैंने सब से शांति बनाने की भी अपील की। फिर मैंने उस सूत्र पर पोस्ट करने का विचार ही त्याग दिया क्योंकि अगर कुछ कहता तो लोग मुझे किसी न किसी गुट में रख देते। लेकिन मैं ही जानता हूँ कि उस बात से मैं कितना आहत हुआ।

अंत में सबसे प्रार्थना है कि भाई शांति बनाए रखो, इस तरह के घटिया अल्फाजों से परहेज करो। कोई विवाद है तो सभ्य इंसानों की तरह सुलझाओ। हिन्दी चिट्ठाकारों की इस छोटी सी बगिया को महकने दो।


सुनील


मैं भी श्रीश की बात से बहुत कुछ सहमत हूँ, लेकिन अंतर्जाल और चिट्ठाजगत स्वतंत्र जगहें हैं जहाँ जितने लोग बढ़ेंगे उतने अधिक मतभेद होंगे, यह तो स्वाभाविक ही है.

जहाँ तक ईमेल द्वारा दूसरों को अपने चिट्ठों के बारे में बतलाना है, एक बार ईमेल भेज कर बताना कि नया चिट्ठा है मान भी लिया जा सकता है, पर हर बार संदेश भेज कर बताना कि आप ने कुछ नया लिखा है, मुझे ठीक नहीं लगता. दूसरी तरफ़, आज कल स्पेम इतना अधिक हो गया कि ईमेल संदेशों को बिना पढ़े कूड़े में डालने के सभी अनुभवी हो गये हैं, इसलिए उनमें कुछ हिंदी चिट्ठाजगत के स्पेम भी जुड़ जायें तो अधिक अंतर नहीं आयेगा. व्यक्तिगत रूप में मैं किसी से बहस में नहीं पढ़ना चाहता, मेरा मंत्र है कि जब कुछ न भाये, तो डीलीट का बटन दबाओ और भूल जाओ.


Amit


दिव्याभ का पत्र छाप कर आपने अभिव्यक्ति को तरजीह दी ।

मैं समझा नहीं अफ़लातून जी। यदि दिव्यभ ने यह नहीं कहा होता कि उसे मेरी ईमेल नहीं चाहिए तो अपना उत्तर मैं उसे ईमेल द्वारा ही भेजता और यह पोस्ट न छापता। लेकिन चूंकि उसने ऐसा कहा इसलिए मुझे इस पोस्ट द्वारा उसकी ईमेल का उत्तर देना पड़ा। पता नहीं आप कैसे इसको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देख रहे हैं जबकि यहाँ स्वतंत्रता/परतंत्रता का कोई मुद्दा ही नहीं है, इसलिए कृपया अपनी बात समझाएँ। :)
श्रीश बाबू, कुछ कहने को रखा ही नहीं है, ईमेल पढ़ अच्छा तो मुझे भी नहीं लगा लेकिन इस तरह की ईमेल से कोई आश्चर्य नहीं हुआ। लेकिन दुखी होने की आवश्यकता नहीं है। जिस तरह व्यक्ति वास्तविक संसार में ऐसे लोगों से दूर रहना सीख लेता है उसी प्रकार लोग इंटरनेट पर भी ऐसे लोगों से दूर रहना सीख लेंगे। :)

अंतर्जाल और चिट्ठाजगत स्वतंत्र जगहें हैं जहाँ जितने लोग बढ़ेंगे उतने अधिक मतभेद होंगे, यह तो स्वाभाविक ही है.

बहुत सही कहा सुनील जी आपने, ऐसा ही कुछ मैंने भी अपनी इस पोस्ट में लिखा है कि चूँकि यह स्वतंत्र जगह है इसलिए यहाँ पर भी हर तरह के लोग आएँगे, इंटरनेट की बढ़ती पहुँच अधिक से अधिक लोगों को अपने दायरे में लेती जा रही है, जिसे अच्छा भी माना जा सकता है और बुरा भी, महज़ नज़रिए का फ़र्क है।

व्यक्तिगत रूप में मैं किसी से बहस में नहीं पढ़ना चाहता, मेरा मंत्र है कि जब कुछ न भाये, तो डीलीट का बटन दबाओ और भूल जाओ

बहुत सही मंत्र है, ईमेलों के साथ मैं भी यही करता हूँ।


afloo


आप चाहते तो सिर्फ़ अपना उत्तर देते लेकिन आपने दोनों छापा-यह मुझे ठीक लगा।पत्रकारीय दृष्टि से।शायद मैंने अपनी बात स्पष्ट कर दी ?


Amit


जिसका उत्तर दे रहा हूँ बिना उस संदेश का संदर्भ दिए उत्तर देने का कोई अर्थ/तुक नहीं है। जिस भी चीज़ का उत्तर देता हूँ उसका संदर्भ हमेशा संलग्न करता हूँ, आपको पता नहीं क्यों ऐसा पहली बार लगा। :)

शायद मैंने अपनी बात स्पष्ट कर दी ?

बिलकुल। :)


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