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समाज के सर्वज्ञ


March 13th, 2007 at 11:59 pm | 17 Comments

जो कोई भी अख़बार आदि पढ़ता है अथवा टीवी पर समाचार चैनलों को झेलता है उसे कभी न कभी तो इस बात का एहसास होता ही होगा कि समाचार माध्यम पर जो बकवास की जा रही है उसका आगा-पीछा कुछ भी समाचार प्रस्तुत करने वाले को नहीं पता लेकिन फिर भी वह पिले जा रहा है, अपनी नौकरी बजाए जा रहा है, रिजक़ कमाए जा रहा है!! पत्रकार को जिस विषय की वह रिपोर्टिंग कर रहा है बहुतया उसके बारे में कुछ नहीं या बहुत कम ही पता होता है, लेकिन वह दर्शाता ऐसे है कि उससे अधिक उस विषय पर कोई नहीं बकवास कर सकता। ऐसा क्यों होता है? अब मेरी समझ में इसके केवल दो ही कारण आते हैं:

  1. पत्रकार का बॉस किसी जानकार व्यक्ति को नहीं पकड़ना चाहता तथा पत्रकार को भी उस विषय पर कुछ तैयारी करने का समय नहीं देना चाहता।
  2. पत्रकार स्वयं ही अपने को फन्ने खां से कम नहीं समझता जिसे हर विषय की पूर्ण से भी अधिक जानकारी है।

अब इन दोनों में से मूर्खता का कोई भी कारण हो लेकिन नतीजा तो वही होता है, मूर्खता की चाश्नी में लिपटी रपट/लेख जिसे यदि उस विषय का कोई जानकार पढ़/सुन ले तो तुरंत ताड़ जाए कि लिखने वाला निश्चय ही अव्वल दर्जे का मूर्ख रहा होगा।

मेरा ज्ञानक्षेत्र/कार्यक्षेत्र सूचना प्रौद्योगिकी का है, उसमें भी सॉफ़्टवेयर और इंटरनेट से जुड़ा हूँ। अब मैं यह नहीं कहता कि मैं अपनी गली-मोहल्ले में कोई तोपची हूँ लेकिन फिर भी कुछ तो बुद्धि रखता हूँ। जिस समय टीवी बाज़ार में आया था, मुझे नहीं पता कि उस समय भी इन पत्रकारों के हम-पेशा पूर्वजों ने उसके लाभ कम और हानि अधिक गिनाई थीं कि नहीं पर अब जब इंटरनेट लोगों में धीरे-२ अपनी जगह बनाता जा रहा है तो ये लोग इसकी सिर्फ़ खामियाँ ही दिखाने में लगे हैं, और खामियाँ भी ऐसी नहीं जो कि इंटरनेट के आगमन से ही आई है वरन्‌ ऐसी जो वर्षों-शताब्दियों से समाज का अंतरंग भाग रही हैं।

अभी रविवार ही की बात है, हिन्दी ब्लॉगर भेंटवार्ता के लिए मैं क्नॉट प्लेस के एक कैफ़े कॉफ़ी डे में बैठा आने वाले अन्य ब्लॉगर साथियों की प्रतीक्षा कर रहा था तो मेरी दृष्टि एक दिन पुराने यानि कि शनिवार के एक अंग्रेज़ी समाचारपत्र मेट्रो नाओ(Metro Now) पर पड़ी। समय व्यतीत करने की गरज से मैं उसे कॉफ़ी की चुस्कियों के साथ पढ़ने लगा। अख़बार के दूसरे पन्ने पर इंटरनेट संबन्धी एक समाचार और एक लघु लेख था, तो मैं थोड़ा ध्यान से पढ़ने लगा। समाचार दिल्ली के रयान इंटरनेशनल स्कूल की किसी कक्षा नौ की छात्रा के बारे में था जो कि घर से लापता थी अथवा भाग गई थी। अब ख़बर में यह बात विशिष्ट रूप से दर्शाई गई थी कि कन्या इंटरनेट पर किसी सिद्धार्थ नामक लड़के से चैटिंग करती थी और कुछ समय से कदाचित्‌ दोनों का प्रेम प्रसंग चल रहा था, कन्या की सहेलियों के बयान से तो यही समझ आता है कि कम से कम कन्या तो अमुक लड़के की ओर आकर्षित थी। और एक रविवार वह अपने घर से भाग गई, उसके माता-पिता और पुलिस का मानना है कि वह अमुक लड़के के साथ भाग गई है। पुलिस ने उस लड़के के घर को पंजाब में कपूरथला तक ट्रेस किया लेकिन लड़का वहाँ नहीं मिला और उसके माता-पिता भी लड़के की मौजूदा स्थिति से अनभिज्ञ थे। यहाँ तक तो सब चौकस लेकिन फिर पत्रकार का परोक्ष रूप से इस बात पर ज़ोर देना कि यह सब इंटरनेट के कारण हुआ किसी भी मूर्ख को दिखाई दे जाएगा। तो यदि शब्दों के ताने-बाने के बीच पढ़ें तो आप समझ जाएँगे कि पत्रकार इंटरनेट के मामले में अज्ञानी लोगों को यह समझा रहा है कि यदि इंटरनेट न होता या अमुक कन्या को उसका प्रयोग नहीं करने दिया जाता तो कदाचित्‌ वह घर से न भागती(स्कूल से फिर भी भाग सकती थी)। गोया इसका अर्थ तो ठीक वही हुआ कि यदि कन्या किसी से फोन पर बात करती और फिर उसके साथ भाग जाती तो इसमें फोन का दोष होता। स्कूल में पढ़ने वाले किसी विद्यार्थी के साथ भागती तो स्कूल का दोष है, कन्या यदि स्कूल ही नहीं जाती तो वैसा नहीं होता, घर में आने वाले किसी रिश्तेदार के सुपुत्र के साथ भाग जाती तो रिश्तेदारों का होना ही गुनाह होता!!! :roll:

तत्पश्चात मेरी दृष्टि जिस पर गई वह एक लघु लेख की भांति था जिसमें बताया गया था कि इंटरनेट किस प्रकार दुष्ट है और दुष्ट लोगों से भरा पड़ा है(जैसे यहाँ पर वे दुष्ट लोग मंगल ग्रह से आए हैं)। उसमें किसी कॉलसेन्टर में कार्य करने वाली किसी महिला का उदाहरण दिया गया था। अमुक महिला इंटरनेट पर एक पुरूष के झांसे में आ गई जिसने अपने आपको एक गिगोलो(पुरूष वेश्या) बताया और दावा किया कि वह कई अमीर और प्रसिद्ध महिलाओं के साथ सो चुका है। कन्या उससे प्रभावित हो गई, फोन नंबरों की अदला-बदली हुई। उसके बाद उस तथाकथित गिगोलो ने लड़की का पीछा(स्टॉक यानि कि stalk) करना आरम्भ कर दिया और एक दिन उसने अपने कुछ मित्रों के साथ राह चलती उस कन्या का अपनी गाड़ी में अपहरण कर लिया और अपने घर ले जाकर उसके साथ बलात्कार किया।

कोई ज्ञानी व्यक्ति सबसे पहले तो इस वाक्ये से संबन्धित यह प्रश्न करेगा कि वह महिला अपने को एक गिगोलो बताने वाले व्यक्ति के साथ कर क्या रही थी?? निश्चय ही वह महिला कोई समाज सुधारक तो थी नहीं जो कि वेश्या उत्थान कार्यक्रम के तहत उस व्यक्ति से संपर्क बनाए हुए थी। वेश्यावृत्ती भारत में गैरकानूनी है, तो यह तो वही बात हुई कि चोर के घर डाका पड़ गया, तो हल्ला किस बात का है भई?? इंटरनेट का दोष कहाँ है??

दूसरे उदाहरण के तौर पर समीरा(बदला हुआ नाम) नाम की एक महिला के साथ घटी घटना बताई गई थी। समीरा इंटरनेट पर चैटिंग करते हुए एक पुरूष के संपर्क में आई जो कि अपने को दिल्ली पुलिस के किसी एसीपी(असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ़ पुलिस) का भाई बताता था। अब इन दोनों का संबन्ध इतना आगे बढ़ गया कि दोनों के शारीरिक संबन्ध भी बन गए। अब मलाई चाटने के बाद बिल्ली तो निकल ली, मतलब मौज लेने के बाद वह बंदा पतली गली से कट लिया, उस बेचारी समीरा के फोन भी सुनने बंद कर दिए। कुछ समय बाद इस प्रकार के आग्रहों से युक्त उस व्यक्ति के मित्रों के फोन इन मैडम को आने लगे, तंग आकर मैडम ने शहर से ही पलायन कर लिया।

तो इस वाक्ये पर कोई भी समझदार यही पूछेगा कि इसमें इंटरनेट का क्या दोष है? इंटरनेट ने तो समीरा को एक अपरिचित व्यक्ति से अंतरंग संबन्ध बनाने को नहीं कहा था। यदि कोई राह चलता व्यक्ति अपने को डीसीपी(डिप्टी कमिश्नर ऑफ़ पुलिस) अथवा पुलिस कमिश्नर का भाई या बेटा बताता तो क्या समीरा उसके साथ भी ऐसे संबन्ध बना लेती? इंटरनेट क्या कोई विश्वसनीयता की मोहर है कि वहाँ मिलने वाला व्यक्ति पाक़-साफ़ मन का होगा? क्या वहाँ उपस्थित लोग किसी दूसरे ग्रह से आए हैं या सतयुग के प्राणी हैं??

अब कोई इंटरनेट अज्ञानी इन दोनों समाचारों को पढ़ेगा तो यही निष्कर्ष निकालेगा कि इंटरनेट से दूर रहने में ही भलाई है, और यही छवि बहुत से ऐसे जन्तुओं की जमात वाले ये दोनों लेखक/पत्रकार प्रक्षेपित करना चाहते हैं।

एक तो लोगों में इंटरनेट को लेकर वैसे ही जानकारी कम और भ्रांतियाँ अधिक हैं, ऊपर से कलम की ताकत का दुरुपयोग करने वाले ये पत्रकार उसके बारे में और मिथ्या प्रचार कर रहे हैं। अभी पिछले नवंबर की कड़क सर्दी में नीरज भाई ने मुझे अपने टीवी चैनल के एक कार्यक्रम “इंडिया बोले” में इंटरनेट प्रयोगकर्ता के तौर पर बुलाया था जिसका विषय साईबर संबन्ध पर था। उसमें भी लोगों के विचार आदि सुनने को मिले तो यही प्रतीत हुआ कि अधिकतर जनता इसी भ्रांति से ग्रसित है कि इंटरनेट एक दुःस्वप्न है, शैतान का अवतार है, इससे जितना दूर रहा जाए उतना ही बेहतर है। तो ऐसे में यह देखकर और भी खीज होती है जब किसी पत्रकार आदि को इन भ्रांतियों को सशक्त करते देखता हूँ। उस समय मेरे मन में वाकई यह ख़्याल आता है कि पत्रकार वाकई एक ऐसा जन्तु है जो कि हमेशा दयनीय और टुच्ची सनसनी की खोज में रहता है, इसलिए ऐसे पत्रकारों से मैं यही कहना चाहूँगा:

आपके पास कलम की ताकत है, टीवी/रेडियो प्रसारण का बल/पहुँच है, इसलिए इसे केवल रिजक़ कमाने का साधन मत समझिए। रिजक़ पर आपका उतना ही हक़ है जितना किसी और का लेकिन आपको यह भी समझना चाहिए कि आपका रिजक़ कमाने का साधन लाखों-करोड़ों लोगों को प्रभावित करता है और यदि आप इस साधन का उपयोग भ्रांति फैलाने और लोगों को गुमराह करने के लिए करते हैं तो आप समाजद्रोह कर रहे हैं जिसके लिए आप दंड के पात्र हैं और विश्वास कीजिए कि यदि आज नहीं तो कल, आपको किसी न किसी रूप में दंड अवश्य मिलेगा।

इसलिए अभी भी समय है, अपनी रोटियाँ सेंकने के लिए लोगों को गुमराह न करें। चोर, स्मगलर आदि भी अपनी रोटियाँ सेंकने के अधिकारी हैं लेकिन जो मार्ग वे अख़्तियार करते हैं वह गैरकानूनी होता है। आपका मार्ग फिलहाल गैरकानूनी नहीं ठहराया जा सकता परन्तु समाज के विरूद्ध अवश्य है।

लेकिन अपने सीमित अनुभव के कारण यह भी जानता हूँ कि पत्रकार नामक दयनीय जन्तु के कान पर जूँ भी न रेंगेगी और वह अपनी टुच्ची मानसिकता, संकीर्ण दृष्टिकोण के साथ इस हीन कार्य में लगा रहेगा।

17 Comments

अनुराग मिश्र


हाहाहाहाहा। हर तरफ से पत्रकार गाली खा रहे हैं लेकिन कोई सुने तो सही।


ई-स्वामी


मेरे इस हालिया लेख में मैने भी कुछ यही बात कहने की कोशिश की है.


Shrish


ऐ लो जो कुछ इस लेख में लिखा गया बहुत पहले से झेल रहा हूँ। अब क्या बताऊं बहुत से ऐसे लोग मिलते हैं, समय मिलने पर इस विषय पर हम भी ब्लॉगियाऊंगा।


निठल्ला चिन्तन » पत्रकार-रिपोर्टर और ब्रैकिंग न्यूज


[...] मजा, व्यंग्य, breaking news, journalist] आज ही अमित की ये वाली पोस्ट पढी और कुछ दिनों पहले स्वामी जी की ये [...]


Tarun


हमारी टिप्पणी हमारी पोस्ट को समझी जाय ;)


Tarun


पोस्ट ये रही


समीर लाल


सबके दिल की बात कह दी. हर व्यक्ति इतनी बेबाकी और हिम्मत से नहीं कह पाता…बधाई!!


प्रियंकर


वस्तुस्थिति का सही आकलन .

प्रौद्योगिकी के अश्व पर आरोहण के पहले इस घुड़सवारी के कुछ नियम तो सीखने ही होंगे . अब अगर आप अपने नौसिखिएपन, लापरवाही या मूर्खता की वजह से घोड़े की टापों के नीचे आ जाएं तो दोष आपका है न कि घोड़े का . आपको प्रौद्योगिकी पर सवारी गांठनी है न कि प्रौद्योगिकी का गुलाम होना है .


Amit


हर तरफ से पत्रकार गाली खा रहे हैं लेकिन कोई सुने तो सही।

अनुराग बाबू, चिकने घड़े पर कितना ही पानी डालो, कभी टिकेगा नहीं। बस ये जन्तु भी वैसे ही हैं, बच्चे अगवा होते रहेंगे, उनका क़त्ल होता रहेगा लेकिन ये लोग एक अडोबी के सीईओ के लड़के का समाचार ही दिखाएँगे, पुलिस सरेआम अत्याचार करेगी लेकिन ये लोग शिल्पा शेट्टी को दिखाएँगे जैसे किसी टीवी चैनल में कोई कांटेस्ट न जीता हो विश्व विजय पा ली हो।

मेरे इस हालिया लेख में मैने भी कुछ यही बात कहने की कोशिश की है

आपका लेख मैंने पढ़ा था स्वामी जी और उसका उल्लेख ग्लोबल वॉयसिस की अपनी हालिया चिट्ठा चर्चा में भी किया है। :)

ऐ लो जो कुछ इस लेख में लिखा गया बहुत पहले से झेल रहा हूँ।

मैं भी कई वर्षों से झेल रहा हूँ। अन्तत: मैंने अब टीवी चैनल देखने और समाचारपत्र पढ़ने ही बन्द कर दिए हैं। यदा-कदा इंटरनेट पर ही कोई समाचार वेबसाईट आदि देख लेता हूँ।

अब क्या बताऊं बहुत से ऐसे लोग मिलते हैं, समय मिलने पर इस विषय पर हम भी ब्लॉगियाऊंगा।

अवश्य। :)
तरूण भाई, अगली ब्रेक में समय मिलते ही आपकी पोस्ट पढ़ूँगा।

हर व्यक्ति इतनी बेबाकी और हिम्मत से नहीं कह पाता…बधाई!!

धन्यवाद समीर जी, लेकिन ये सार्थक तो तभी होगी जब कोई सुनेगा, किसी के कान पर जूँ तो रेंगे।


पूनम मिश्रा


बहुतों के दिल की बात आपने कही है.समाचार पत्र अब “सनसनी पत्र” हो गए हैं और समाचर चैनेल इस बात में व्यस्त हैं कि क्रिकेट विश्व कप का काउंटडाऊन दिखाएं.गंभीर मुद्दों को उठाना ,विशलेषण करना ,घटनाओं को निष्पक्ष तरह से प्रस्तुत करना अब लुप्त विधा हो गई है.विश्व में क्या हो रहा है यह भारतीय पत्रों और टीवी चैनलों को पता ही नहीं सिवाय इसके कि अरुण नायर की शादी में कौन शिरकत कर रहा है या ब्रिटेन के शाही परिवार की ताज़ा रंगरेलियां क्या हैं .


Amit


पूनम जी, कदाचित्‌ आपने मेरी पोस्ट ठीक से पढ़ी नहीं, मैंने उन बातों का कहीं ज़िक्र नहीं किया है जिनका उल्लेख आप ने किया।

मेरा तो यह अभिप्राय है कि पत्रकार नामक जन्तु अपने को सर्वज्ञ समझ ऐसी चीज़ों/विषयों के बारे में बात कर भ्रांतियाँ फैलाते हैं जिनके बारे में उनको कुछ भी नहीं पता। जो आपने कहा और जो मैंने कहा वह बहुत भिन्न है।


PRAMENDRA PRATAP SIN


आपने जो भी कहा वह ठीक है। पत्रकार बन्‍धु कुछ ज्‍यादा ही चटपटी खबरे देते है। अगर सरदार जी के बाद अगर किसी पर चुटकुला लिखा जा सकता तो अब पत्रकार ही आयेगें। :)


masijeevi


बात तो सही ही है। किंतु यह भी तय मानिए कि -
एक तो इन पत्रकारों को सर चढ़ाने में जनता की काफी भूमिका है।
दूसरे ये कि अपने माध्‍यम की सही प्रकृति लोगों तक पहुँचाने का दायित्‍व अपना भी है कुछ…

और रही कान पर जूँ रेंगने की…..तो रेंगेंगी रेंगेगी।


अनूप शुक्ला


लोगों में इंटरनेट को लेकर वैसे ही जानकारी कम और भ्रांतियाँ अधिक हैं, ऊपर से कलम की ताकत का दुरुपयोग करने वाले ये पत्रकार उसके बारे में और मिथ्या प्रचार कर रहे हैं।ये बात सच है। आधी-अधूरी जानकारी पाकर और देकर लोग एक अच्छे माध्यम के बारे में गलतफहमी पैदा करने के प्रयास में जाने-अनजाने शामिल हो रहे हैं।


rachana


अमित, हालाँकि मै आपके बात कहने के इतने उग्र तरीके का समर्थन नही करती लेकिन बात आपने ठीक कही है..अन्तरजाल पर भी अच्छी और बुरी दोनो बाते होती है,,हमे तय करना होगा कि हम अच्छी बातें सीखें..मैने तो कई चीजें यही से साखी…कई दिनों पहले मैने भी एक पोस्ट लिखी थी, टी वी पर अनावश्यक खबरें जोर शोर से दिखाये जाने पर…live and exclusive till the veiwer is dead! ( on my Eng blog ‘flying hopes’).


प्रत्यक्षा


विकास के दौड में इतनी ठोकरें तो आयेंगी । घीरे धीरे ज्ञान का घडा भरेगा फिर ऐसी गलतफहमियाँ दूर होती जायेंगी ।


kim agrawal


achha lekh hai.ak bat jarur hai, adami pahale khamiyan talasne ka adi hai.lekh me es bat ko saral or sahaj dhang se pesh kiya gaya hai.internet ki achaeyon ka prachar jyada hona chahiye,eskeliye bhi prayas ho.


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