मई 2007 के दूसरे सप्ताहांत पर पुनः तुन्गनाथ जाने का कार्यक्रम बना। पिछली बार का हादसा याद था, लेकिन जोश बरकरार था और मन में नई उमंग थी। इस बार की अपनी यात्रा भी अलग होनी थी, इस बार तम्बू वगैरह लेकर चल रहे थे, पैक्ड रेडी-टू-ईट(ready-to-eat) खाना साथ था जो कि तुरन्त बनने वाली किस्म का था। तुन्गनाथ पर पिछली बार की ठंड का अनुभव होने के कारण मैंने यात्रा पर निकलने से पहले ला-फूमा का नया स्लीपिंग बैग खरीदा जो कि 5 डिग्री सेल्सियस से 0 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान आराम से झेल लेता है; पहली रात तम्बू चोपता में लगाना था और समुद्र स्तर से लगभग साढ़े बारह हज़ार फीट की ऊँचाई पर रात को तापमान कम होने की पूरी आशा थी, मई में भी, क्योंकि इतनी उँचाई पर सारा साल ही ठंड रहती है। एक और खास बात यह थी कि यह व्हर्लविन्ड(whirlwind) यात्रा होनी थी क्योंकि यदि इसको आराम से करना हो तो चार दिन लगते हैं और हमे इसको तीन दिन में निपटाना था।
इस बार दिल्ली से गाड़ी ले जाने की जगह हम हरिद्वार तक ट्रेन से गए और वहाँ से आगे जाने के लिए टाटा सूमो ली। केवल योगेश और मेरी ही यह तुन्गनाथ की दूसरी यात्रा थी, बाकी के पाँचों साथी पहली बार जा रहे थे।
चूँकि इस यात्रा के फोटो मैंने पिछली बार लिए थे, इसलिए लेने के लिए इस बार कुछ खास नहीं था।
( देवप्रयाग में भगीरथी और अलकनंदा का संगम )
( ऋषिकेश की ओर जाती गंगा )
( सियालसौर पर सड़क किनारे एक रेस्तरां में दोपहर भोजन के लिए रूके थे। वहीं बगल में ऊपर से बह कर आ रही थी मंदाकिनी। )
( चोपता पहुँच हमारी कैम्पसाइट से दिखाई देती हिम से ढकी पर्वत शृंखला )
( दो-तीन सप्ताह पूर्व तक तो तुन्गनाथ पर भी बर्फ़ थी जो कि पिघली नहीं थी, यानि कि अप्रैल के महीने में जब हम मुक्तेश्वर की यात्रा पर थे। )
( यदि मेरा कैमरे पर पोलराइज़र लगा होता तो यह फोटो और बढ़िया आता )
( इस पर्वत ने और दृश्य ने तो मेरा मन मोह लिया था )
अगले भाग में जारी …..



7 Comments
समीर लाल
अरे वाह, बहुत कम शब्द और चित्रों में बहुत सही वृतांत,,,, मजा आया पढ़कर..ठंड झेल पाये कि नहीं उस स्लिपिंग बैग में.
समीर लाल
यार भई, तुम्हारे पठनीय में हम नहीं दिखते, क्या नाराजगी है…कि कुछ और बेहतर लेखन स्तर करना होगा?
संजय बेंगाणी
दृश्यों ने मन मोह लिया. सुन्दर तस्वीरें.
masijeevi
खूबसूरत तस्वीरें
श्रीश शर्मा
वाह तस्वीरें देखकर मजा आ गया। यार उतरांचल में कई ऐसी जगह हैं पहाड़ों पर जहाँ दूर-दूर तक कोई इंसान नजर नहीं आता। ऐसे लोकेशन पर हों और बरसात हो रही हो मजा आ जाता है, उस समय के आनंद का वर्णन करना संभव नहीं है।
aalochak
बढिया ! बहुत ही बढिया!!
Amit
सभी का धन्यवाद।
बताउँगा, अगली कड़ी में!!
नाराज़गी नहीं है और लेखन स्तर भी नीचे नहीं है(बेहतर करने की संभावना तो सदैव ही रहती है, परफैक्ट कोई नहीं होता)। बात यूँ है कि वो लिंक मैंने जब यह ब्लॉग आरम्भ किया था तब डाले थे, उस समय गिने चुने लोगों को ही पढ़ता था, उसके बाद से अपडेट नहीं किया!!
हाँ, ऐसा तो है, उत्तरांचल ही क्या, दुनिया भर में ऐसी बहुत जगह हैं!!