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Archive for August, 2007


बैकअप जो लिया होता …..


August 14th, 2007 | 14 Comments

कल मेरे मोबाइल को पता नही क्या हुआ, रेडियो सुनते-२ अचानक अटक गया। मैंने सोचा कि बंद कर दोबारा चालू कर लेता हूँ, तो बंद किया, लेकिन बंद होते के बाद चालू न हो कर दिया और एरर(error) संदेश टिका दिया स्क्रीन पर कि फोन चालू होने में समस्या है और मुझे रिटेलर(retailer) को संपर्क करना चाहिए। फोन लेकर मैं नोकिआ के उस डीलर(dealer) के पास पहुँचा जिससे फोन पिछले दिसंबर में लिया था, फोन जाँचने के बाद उसने कहा कि पास ही स्थित नोकिआ केयर(nokia care) में ले जाना चाहिए, फोन के सॉफ़्टवेयर में दिक्कत है जिसको वे कुछ ही मिनट में ठीक कर दे देंगे। यानि कि फोन के सिम्बिअन ऑपरेटिंग सिस्टम(symbian operating system) में कुछ लफ़ड़ा हो गया था। शायद मैंने कुछ दिन पहले जो फर्मवेयर अपडेट(firmware update) किया था वह सही से नहीं हुआ था।

बहरहाल, मैं फोन लेकर नोकिआ केयर में पहुँचा तो मुझे वहाँ बोला गया कि मामला कुछ ही मिनट में वे सही कर देंगे लेकिन फोन की मेमोरी में जो है वो सब मिट जाएगा, यानि कि पूरी एड्रेस बुक(address book), एसएमएस संदेश(sms messages), नोट्स(notes) आदि!! मैंने उनसे कहा कि यदि वे बैकअप ले सकते हैं तो कृपया ले लें लेकिन उन्होंने असमर्थता जताई। कोई और चारा न था, सो मैंने कह दिया कि जो कर सकें कर दें। दस मिनट बाद फोन चालू हालत में फर्मवेयर अपडेट के साथ मुझे सौंप दिया गया, बिना किसी डाटा के!! अब एक बात का शुक्र यह था कि लगभग पूरी एड्रेस बुक मेरे सिम कार्ड में भी थी, तो वे नंबर तो वहाँ से कॉपी हो गए, जो नए नंबर हाल ही में पिछले तीन महीनों में डाले थे वे उड़ गए थे!! एसएमएस संदेश और नोट्स का कोई बैकअप नहीं था, इसलिए वे हमेशा के लिए चले गए। नोट्स तो कोई खास नहीं थे लेकिन 200 एसएमएस संदेशों में कुछ काम के थे। सॉफ़्टवेयर आदि भी उड़ गए, लेकिन उनको तो दोबारा डाल लिया।

Backup!!

सबक: अपने फोन में मौजूद डाटा का भी बैकअप लेकर रखें, खासतौर से एड्रेस बुक और एसएमएस संदेशों का। यदि आपके फोन में मेमोरी कार्ड लगता है तो आप फोन मेमोरी का बैकअप वहाँ भी रख सकते हैं, लेकिन मेरा सुझाव है कि इन दोनों(फोन मेमोरी और मेमोरी कार्ड) का बैकअप अपने कंप्यूटर पर भी अवश्य रखें।


डिजिटल कैमरा ….. – भाग ३


August 13th, 2007 | 11 Comments

पिछले भाग से आगे …..

camera

पिछले भाग में मैंने सुझाव दिया एक नई सूचि बनाएँ जिसमें हो कि आपको कैमरे में क्या-२ चाहिए या आप कैमरे का प्रयोग कैसे करेंगे। साथ ही रिव्यू आदि पढ़ने का सुझाव दिया, मेगापिक्सल मिथ(myth) से सावधान रहने का मश्वरा दिया और ऑप्टिकल ज़ूम(optical zoom) की बात की। इससे पहले कि आगे बढ़े, पिछली पोस्ट की कुछ रोचक टिप्पणियों पर एक नज़र डाली जाए।

शास्त्री जी ने टिप्पणी की

अधिकतर छायाचित्र सिर्फ 1.3 मेगापिक्सल से लिये गये है, लेकिन चित्रों का स्तर बहुत अच्छा है. इसका एक रहस्य है. केमरा में 16x ऑप्टिकल ज़ूम है

अब मैं ज़रा असमंजस में पड़ गया, 1.3 मेगापिक्सल का कैमरा और 16x का ऑप्टिकल ज़ूम? ऐसा कैसे हो सकता है? मैंने गूगलवा पर ढूँढने की कोशिश भी की लेकिन नहीं मिला ऐसा कोई कैमरा। या तो ऐसा होगा कि शास्त्री जी के पास डिजिटल कैमरा न होकर वीडियो कैमरा/कैमकॉर्डर होगा क्योंकि उनमें ऑप्टिकल ज़ूम काफ़ी अधिक होता है लेकिन शुरुआती मॉडल कम मेगापिक्सल के आ रहे थे, या फिर शास्त्रीजी के कैमरे का कुल ज़ूम(ऑप्टिकल गुणा डिजिटल ज़ूम) 16x होगा और वे मेरे खुलासा करने के बाद भी गलती से ऐसा लिख गए। बहरहाल, मैंने शास्त्री जी की टिप्पणी पर उनसे निवेदन किया था कि वे अपने कैमरे का मॉडल और कंपनी आदि बताएँ, मैं जानने के लिए उत्सुक हूँ लेकिन शास्त्री जी ने हमेशा की भांति टिप्पणी का उत्तर नहीं दिया।

बहरहाल, इसके बाद अक्स ने पूछा

and how much optical zoom is ok?

यानि कि “कितना ऑप्टिकल ज़ूम ठीक रहता है?”। तो अब इसका उत्तर मैंने यह दिया

कितना ऑप्टिकल ज़ूम लेना है यह आप पर निर्भर करता है। आपने किस तरह कि फोटोग्राफ़ी करनी है उस पर तो निर्भर करता ही है, आपकी जेब पर भी निर्भर करता है। जैसे यदि आम फोटोग्राफ़ी करनी है और आप घूमने फिरने जाते हैं तो सामान्यतः 3x का ज़ूम काफ़ी रहता है। आजकल 5x-6x ज़ूम वाले कैमरे भी सस्ते हो गए हैं। तो यदि कितना ज़ूम होता है इसका अंदाज़ा नहीं है तो किसी भी कैमरे की बड़ी दुकान में जाकर दो-तीन अलग-२ ज़ूम वाले कैमरे चला के देख लो। खरीदना कोई आवश्यक नहीं है, वहाँ सिर्फ़ देख के भी आ सकते हो। तो उन कैमरों को ट्राई करने से अंदाज़ा हो जाएगा कि 3x में कितना ज़ूम मिल रहा है और 6x में कितना, फिर उसके बाद अपने हिसाब से निर्णय कर सकते हो कि कितने ज़ूम वाला कैमरा लेना है।

मैं समझता हूँ कि जो अन्य भी इस दुविधा में होंगे उनकी दुविधा का समाधान हो गया होगा। तो अपने कैमरा कैसे पसंद करें वाली कड़ी पर आगे बढ़ते हैं।

ऑप्टिकल ज़ूम के साथ-२ आजकल एक नई फीचर बाज़ार में अपनी जड़े मज़बूत कर रही है, इमेज स्टेबिलाईज़ेशन (image stabilization)। जो लोग इससे अंजान हैं उनके लिए आम शब्दों में इसका अर्थ है – एक ऐसी तकनीक जिससे कैमरे को पकड़ने वाले हाथों के कंपन के कारण फोटो जो थोड़ी सी हिल जाती है उसको रोकना/प्रभाव कम करना। हाथों में कंपन लगभग हर किसी के होता है, किसी के हाथों में कम होता है तो किसी के में अधिक। डिजिटल कैमरे को यदि पकड़े हुए हैं और फोटो ले रहे हैं तो कभी कैमरा इस कंपन के कारण थोड़ा हिल जाता है और फोटो उतनी शॉर्प(sharp) नहीं आती जितनी आनी चाहिए वरन्‌ थोड़ी धुंधला जाती है, जो कि खास तौर पर तब दिखाई देता है जब आप बड़ा प्रिंट निकालें या कम शटर स्पीड(shutter speed) पर कम रोशनी में तस्वीर लेते हैं। यह तकनीक आजकल कैमरों में आम होती जा रही है, इससे लैस बहुत से कैमरे आए दिन बाज़ार में आ रहे हैं। तो क्या हर कैमरे की इमेज स्टेबिलाईज़ेशन बढ़िया होती है? नहीं!! आम प्रचलन में आजकल बाज़ार में एक से अधिक तरह की इमेज स्टेबिलाईज़ेशन आज बाज़ार में है। पहले तरह की है ऑप्टिकल इमेज स्टेबिलाईज़ेशन(optical image stabilization) जिसमें कैमरे के लेन्स में सेन्सर आदि लगे होते हैं जो कि कंपन को पहचान लेन्स के अंदर मौजूद तत्वों को पोजीशन कर कंपन का प्रभाव कम करने का प्रयास करते हैं। दूसरे तरह की इमेज स्टेबिलाईज़ेशन को एन्टी ब्लर तकनीक(anti blur technology) के नाम से जाना जाता है जिसमें कैमरे की बॉडी(body) के भीतर उसके फोटो सेन्सर के साथ इसको लगाया जाता है जो कि सेन्सर को पोजीशन कर उसको कंपन का प्रभाव कम करने को कहता है। एक और तरह की इमेज स्टेबिलाईज़ेशन चल रही है जिसको डिजिटल इमेज स्टेबिलाईज़ेशन(digital image stabilization) कहते हैं। इसमें कैमरे के अंदर का सॉफ़्टवेयर डिजिटली कंपन के प्रभाव को कम करने का प्रयत्न करता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि ऑप्टिकल इमेज स्टेबिलाईज़ेशन सबसे बेहतरीन होती है, उससे बेहतर और प्रभावकारी कोई नहीं, और सबसे घटिया(न होने से भी बेकार) डिजिटल इमेज स्टेबिलाईज़ेशन होती है। एन्टी ब्लर तकनीक आदि ठीक काम करती है, लेकिन ऑप्टिकल इमेज स्टेबिलाईज़ेशन जितनी प्रभावशाली नहीं होती। एक बात जो यहाँ गौर करने वाली है वह यह कि हर कंपनी की ऑप्टिकल इमेज स्टेबिलाईज़ेशन भी एक जैसी नहीं होती, किसी की बिलकुल प्रभावशाली नहीं होती तो किसी की बहुत प्रभावशाली होती है। इस पर मैं अपने विचार बाद में रखूँगा जब मैं कंपनियों के बारे में बात करूँगा।

एक महत्वपूर्ण बात यह निर्णय लेने की है कि आपको बेसिक प्वाइंट एण्ड शूट(point and shoot) कैमरा लेना है कि ब्रिज(bridge)/प्रोज़्यूमर(prosumer) कैमरा लेना है या डीएसएलआर(dslr) लेना है। प्वाइंट एण्ड शूट हुए वे कैमरे जो कि आम कैमरे होते हैं, प्रायः छोटे साइज़ के साधारण कैमरे जिसको आप लक्ष्य की ओर साधें और शटर(shutter) दबा फोटो ले लें। उसमें आपको पहले से ही सैट कई तरह के सीन(scene) मोड(mode) मिल जाएँगे अलग-२ तरह की फोटो लेने के लिए, जैसे लैन्डस्केप(landscape), पोर्ट्रेट(portrait), पार्टी(party), मैक्रो(macro), नाईट लैन्डस्केप(night landscape), नाईट पोर्ट्रेट(night portrait) आदि। इस तरह के कैमरों में मैनुअल(manual) कंट्रोल बहुत कम(न के बराबर) होता है और लगभग सभी कुछ ऑटोमैटिक होता है। ये कैमरे आम जन(जिनको फोटोग्राफ़ी की तकनीकी जानकारी नहीं होती) के लिए होते हैं। ये कैमरे सबसे सस्ते आते हैं और इनको प्रयोग करना बहुत आसान होता है तथा रख-रखाव का कोई खास झंझट नहीं होता। डीएसएलआर प्रोफेशनल कैमरे होते हैं उन लोगों के लिए जो कि फोटोग्राफी में काफ़ी दक्ष हैं और उसकी तकनीकी जानकारी रखते हैं तथा जो अपने कैमरों में लगभग हर चीज़ को स्वयं निर्धारित करना चाहते हैं, जैसे शटर स्पीड, आपर्चर(aperture), आईएसओ(iso) आदि। इन कैमरों की खासियत यह है कि ये आपको अधिकतम कंट्रोल देते हैं, आप कैमरे के लेन्स आदि भी आवश्यकता अनुसार बदल सकते हैं, लेकिन ये कैमरे सबसे महंगे आते हैं और इनको काफ़ी अच्छे रख-रखाव की आवश्यकता होती है। डीएसएलआर के बारे में तकनीकी रूप से जानने के लिए अंग्रेज़ी विकिपीडिया पर यह लेख देखें। लेकिन बहुत से ऐसे लोग भी है जो कि डीएसएलआर और प्वाइंट एण्ड शूट की खूबियाँ चाहते हैं लेकिन इन दोनों की खामियाँ नहीं चाहते। तो ऐसे लोगों के लिए कैमरा निर्माताओं ने उन्नत प्वाइंट एण्ड शूट कैमरे निकाले जिनमें डीएसएलआर और प्वाइंट एण्ड शूट की लगभग सभी खूबियाँ थीं और खामियाँ न के बराबर, इन कैमरों को ब्रिज अथवा प्रोज़्यूमर कैमरे कहते हैं। ये कैमरे साधारणतया डीएसएलआर से कुछ चीज़ों में ही कम होते हैं(जैसे लेन्स बदल नहीं सकते, कैमरे का सेन्सर डीएसएलआर से छोटा होता है) और ये प्वाइंट एण्ड शूट से महँगे और डीएसएलआर से सस्ते होते हैं।

यदि आप अभी फोटोग्राफी में नए हैं या कोई खास जानकारी नहीं रखते या हल्का-फुल्का छोटा कैमरा चाहते हैं तो आपके लिए बेसिक प्वाइंट एण्ड शूट ही सही है। यदि आप फोटोग्राफी की अच्छी जानकारी रखते हैं अथवा उसको सीखने के इच्छुक हैं तो ब्रिज/प्रोज़्यूमर कैमरे में निवेश करना अच्छा रहेगा। और यदि आप बहुत अच्छी जानकारी रखते हैं तो फिर तो आपके लिए डीएसएलआर ही चंगा है। हर तरह के लोगों और हर तरह की इच्छाओं के अनुरूप आजकल कैमरे मिल जाते हैं। तो आपको यह निश्चय करना है कि आपको किस प्रकार का कैमरा लेना है।

अगले भाग में जारी …..


चक दे ….. हो चक दे इंडिया ……


August 10th, 2007 | 6 Comments

चक‌ दे इंडिया के प्रोमो आदि टीवी पर काफ़ी समय से आ रहे हैं, न्यूज़ चैनलों और बॉलीवुड के खबरी कार्यक्रमों में भी इसकी काफ़ी चर्चा है, कुल मिला के इस फिल्म से काफ़ी आशाएँ रखी जा रही हैं, आखिर किंग खान की फिल्म है जिसमें वो (मेरी जानकारी अनुसार) दूसरी बार किसी खेल टीम के कोच के रूप में नज़र आएँगे। इससे पहले वह अपनी एक शुरुआती फिल्म चमत्कार, जो कि 1992 में रिलीज़ हुई थी, में एक कॉलेज की क्रिकेट टीम के लल्लू कोच के रूप में नज़र आए थे जिसमें उनका साथ दिया था भूत बने नसीरुद्दीन शाह ने। उस समय तो कोच की लाज भूत बादशाह ने मैच जीत के बचा ली थी, लेकिन इस बार कौन बचाएगा? ;)

अभी तक चक दे इंडिया के जो ट्रेलर आदि देखे हैं, उससे फिल्म की कहानी का कुछ-२ अंदाज़ा हो गया है। पिछले साल, 2006 में, हॉलीवुड की एक फिल्म आई थी, ग्लोरी रोड (Glory Road) जो कि अमेरिकी कॉलेज टेक्सस वेस्टर्न(Texas Western) की बास्केटबॉल टीम के कोच डॉन हैस्किन्स की वास्तविक ज़िन्दगी के उस हिस्से पर बनी थी जब वो टेक्सस वेस्टर्न के कोच बने थे। टेक्सस वेस्टर्न कॉलेज बास्केटबॉल लीग में बहुत पिछड़ी हुई टीम थी जिसके लिए कोई अच्छा खिलाड़ी खेलना नहीं चाहता था। यह वह दौर था जब सिर्फ़ गोरे प्रोफ़ेशनली खेलते थे, काले नीग्रो खिलाड़ियों को कोई नहीं लेता था और यदि लेता था तो एकाध ही होता था एक टीम में और वह भी रिज़र्व। डॉन हैस्किन्स को जब कोच बनाया गया तो कॉलेज के प्रधानाचार्य ने खिलाड़ियों को सिर्फ़ छात्रवृत्ति(scholarship) दे सकने में ही समर्थता जताई थी, लेकिन कोई भी अच्छा गोरा खिलाड़ी इस टीम के लिए खेलने को तैयार नहीं था। चिढ़कर डॉन हैस्किन्स ने रीति के विरुद्ध जाते हुए देश भर में से बढ़िया खेलने वाले नीग्रो खिलाड़ियों को टीम में लिया, ऐसे खिलाड़ी जो सबसे बेहतरीन खेलते थे लेकिन उनके काले रंग के कारण उनको कोई अपनी टीम में नहीं लिए हुए था। सब ने इस टीम का मज़ाक उड़ाया और एक्सपर्ट्स(experts) ने पहले से ही कह दिया कि डॉन का यह प्रयोग जल्द ही अपने मुँह पर गिर असफ़ल हो जाएगा। लेकिन उन सबके मुँह पर ज़ोरदार तमाचा तब पड़ा जब इस टीम ने खेलना आरंभ किया, कोई टीम इसके आगे टिक नहीं सकी और 17 मैच लगातार जीतकर लीग में चौथा स्थान हासिल किया और उसके बाद इक्कीस मैच जीत और सिर्फ़ एक मैच हारकर इस टीम ने NCAA में तीसरे स्थान पर प्रवेश किया था। 1966 के ऐतिहासिक फाइनल में इसका सामना हुआ था उस समय की मौजूदा नंबर एक और चैम्पियन टीम केन्टकी विश्वविद्यालय(University of Kentucky) से जिसके कोच अडोल्फ रुप्प को शताब्दी का कोच(coach of the century) कहा जा रहा था। उस फाइनल में डॉन हैस्किन्स ने पहले पाँच खिलाड़ी जो कोर्ट में उतारे वो सभी नीग्रो थे, चैम्पियनशिप इतिहास में यह पहली बार हुआ था। कड़े मुकाबले के बाद आखिरकार डॉन हैस्किन्स की टेक्सस वेस्टर्न माइनर्स ने केन्टकी विश्वविद्यालय को धूल चटाई थी और टेक्सस वेस्टर्न की इस टीम ने वह साल 28 जीत और 1 हार के रिकॉर्ड पर समाप्त किया था। यह फाइनल मैच विश्व खेल इतिहास में one of the biggest upsets के तौर पर दर्ज हुआ और इस वर्ष सितंबर में 1966 की इस टीम को नाएस्मिथ मेमोरिअल बास्केटबॉल हॉल ऑफ़ द फेम(Naismith Memorial Basketball Hall of Fame) में शामिल किया जाएगा। कोच हैस्किन्स को इसी हॉल ऑफ़ फेम मे 1997 में बतौर कोच शामिल किया गया।

तो कहने का अर्थ यह है कि चक‌ दे इंडिया मुझे तो ग्लोरी रोड से ही प्रभावित लग रही है, क्या यह भी एक और हॉलीवुड इंस्पायर्ड फिल्म होने वाली है!! अब कहीं से भी इंस्पायर्ड हो इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता, यदि फिल्म अच्छी होती है तो मुझे पसंद आती है, चाहे वह रीमेक(remake) हो या किसी फिल्म से प्रभावित हो। तो प्रश्न अब यह है कि जोश लूकस ने डॉन हैस्किन्स की जो शानदार भूमिका निभाई थी, क्या शाहरुख इस देसी फिल्म में जानदार भूमिका निभा सकेंगे? कोच का किरदार रोमांटिक हीरो के किरदार से अलग होता है, इसलिए अलग तरह के अभिनय की दरकार होगी। सुना है कि आज यह फिल्म रिलीज़ हो रही है, तो अब तो यह फिल्म देखने के बाद ही पता चलेगा कि शाहरुख है कि नहीं!! ;)

वैसे मैं ग्लोरी रोड देखने का सुझाव अवश्य दूँगा, बहुत अच्छी फिल्म है और मेरी पसंदीदा फिल्मों की सूचि में इसने जगह बना ली है। :)


डिजिटल कैमरा ….. – भाग २


August 7th, 2007 | 16 Comments

पिछले भाग से आगे …..

camera

पिछले भाग में मैंने सुझाव दिया था कि आपको डिजिटल कैमरा किसलिए चाहिए उन कारणों की सूचि बना लें, आगे कैमरे का चुनाव करने में भी सहायक होगी। तो उस सूचि से अब उन कारणों को लेकर एक नई सूचि बनाएँ जिसमें हो कि आपको कैमरे में क्या-२ चाहिए या आप कैमरे का प्रयोग कैसे करेंगे। उदाहरणार्थ, आप अधिकतर किस तरह की फोटोग्राफी करेंगे; पोर्ट्रेट(portrait) लेंगे या लैन्डस्केप(landscape), खेलों(sports) आदि की फोटो लेंगे या मैक्रो(macro) लेंगे, या फिर इस बारे में अनिश्चित हैं और सभी प्रकार की फोटोग्राफी करेंगे? क्या आप प्रोफेशनल फोटोग्राफर हैं/बनना चाहते हैं? या सिर्फ़ शौकिया फोटोग्राफी करेंगे? क्या आप सिर्फ़ कुछ अवसरों(घर आदि में किसी पार्टी फंक्शन या कहीं सैर-सपाटे पर गए) पर ही तस्वीरें लेना चाहेंगे या फोटोग्राफी की कला को सीखना चाहेंगे? क्या आपके लिए कैमरे का आकार और वज़न अधिक मायने रखता है; क्या आपको छोटा और हल्का कैमरा चाहिए या आप अच्छे फीचर(features) वाले बड़े कैमरे को लेना पसंद करेंगे? क्या आपको कैमरों और फोटोग्राफी का कोई पूर्व अनुभव है? यदि अनुभव है तो कितना है? आप कैमरे में किन खास फीचर्स(features) को चाहेंगे? और सबसे महत्वपूर्ण, आपका बजट कितना है?

इन सब के बारे में विचार करें, यदि किसी अच्छे से कैमरे की दुकान में जाते हैं(पड़ोस की छोटी इलेक्ट्रॉनिक्स की दुकान में नहीं जिसने 2-3 चलतऊ चीनी कैमरे रखे हुए हैं) तो वहाँ भी सेल्समैन आपसे कुछ इसी तरह के प्रश्न कर सकता है, यदि आप उससे राय लेंगे कि कौन सा कैमरा लिया जाए। लेकिन उसकी राय केवल और केवल एक सुझाव के तौर पर ही लें, उस पर पूर्ण विश्वास कर उसके द्वारा सुझाया कैमरा न लें ले क्योंकि (जैसा मैंने अधिकतर देखा है)वह आपको सबसे महँगा कैमरा टिकाने का प्रयास करेगा, कोई आवश्यक भी नहीं कि उसे कुछ खास पता हो इन चीज़ों के बारे में।

बेहतर विकल्पों और सुझावों के लिए ऑनलाईन कैमरा रिव्यू वेबसाइटों पर सर्च करें। डीपीरिव्यू.कॉम कैमरों के बारे में जानने के लिए एक अति उत्तम वेबसाइट है, मैं भी इसकी सलाह पर अधिक भरोसा करता हूँ। इस तरह कुछ और वेबसाइटें भी मिल जाएँगी आपको जहाँ आप अपने बजट और फीचर की आवश्यकता अनुसार कैमरे देख सकते हैं। भारत में रहने वाले बंधुओं को व्यक्तिगत तौर पर सुझाव दूँगा कि यहाँ छपने वाली तकनीकी पत्रिकाओं में यदा-कदा छपने वाले कैमरा रिव्यू आदि को कोई भाव न दें, उनमें सुझाव इतने बेतुके होते हैं कि साफ़ दिखता है कि सारा मामला प्रायोजित है!! भारत में फिलहाल फोटोग्राफी संबन्धी कोई खास पत्रिकाएँ नहीं हैं, लेकिन योरोप और अमेरिका आदि में कुछेक अच्छी पत्रिकाएँ छपती हैं इस विषय पर भी। यहाँ भारत में जो एकाध फोटोग्राफी संबन्धी पत्रिकाएँ निकलती हैं उनमें बेहतर फोटोग्राफी करने संबन्धी तो कदाचित्‌ कुछ अच्छे सुझाव मिल जाएँ लेकिन कैमरा लेने संबन्धी अच्छे सुझावों की अपेक्षा न ही करें तो बेहतर है, क्योंकि जितना मैंने देखा है, उनमे रिव्यू(review) करने वाले या तो सालों पुराने मॉडल को नया समझते हैं(क्योंकि भारत में वह हाल ही में आया होता है) या मेगापिक्सल(megapixel) के पीछे भाग रहे होते हैं!!

मेगापिक्सल सब कुछ नहीं है, इसलिए उसके पीछे मत भागिए!! कैमरा निर्माता भी वही कर रहे हैं आजकल जो पर्सनल कंप्यूटर निर्माता(personal computer) करते आए हैं। जिस तरह पर्सनल कंप्यूटर निर्माता अपने टीवी/प्रिंट आदि विज्ञापनों में सिर्फ़ प्रोसेसर और एलसीडी स्क्रीन(LCD Screen) आदि के बारे में ही बताते हैं और अंदर दूसरे महत्वपूर्ण पुर्ज़ों(parts/components) में खेल खेल जाते हैं, उसी प्रकार कैमरा निर्माता भी आजकल सिर्फ़ मेगापिक्सल का खेल खेल रहे हैं, नए वर्ज़न/अपडेट में मेगापिक्सल बढ़ाओ और कैमरा बेचो। अज्ञानी जनता भी इस मेगापिक्सल के झांसे में आ जाती है यह जाने बिना कि मेगापिक्सल सब कुछ नहीं होता!!

मेरे सबसे बड़े ममेरे भाई, जो कि अभी बारहवीं कक्षा में पढ़ रहा है, को गैजेट्स(gadgets) में बड़ी रूचि है ,इधर उधर से अपने अज्ञानी मित्रों से प्राप्त जानकारियाँ आदि मुझे बताता रहता है; मैं भी बड़े मज़े से सुनता हूँ क्योंकि कई बार किसी चीज़ के बाज़ार में आने की जानकारी मुझे ऐसे ही मिलती है, बाकी जानकारी बेशक गलत हो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि सही जानकारी प्राप्त करने के मेरे पास उससे अधिक साधन हैं!! ;) तो ऐसे ही एक बार उसको किसी ने डिजिटल कैमरों और मेगापिक्सल के बारे में बताया होगा कि जितना गुड़ उतना ही मीठा, तो तब से वो यह अवधारणा लेकर बैठ गया है कि मेगापिक्सल जितने अधिक हों उतना ही बढ़िया कैमरा!! जब 2 मेगापिक्सल वाले कैमरा फोन आए तो भजने लगा कि बहुत बढ़िया हैं, जब मैंने नोकिआ एन70(Nokia N70) म्यूज़िक एडिशन फोन लिया जिसमें 2 मेगापिक्सल वाला कैमरा है तो मेरे को शाबासी सी दी कि अब ढंग का कैमरा फोन लिया है, कुछ दिन बाद चहक के मुझे बता रहा था कि फलां फोन आया है 5 मेगापिक्सल वाले कैमरा के साथ तो उसको लेने वाले को डिजिटल कैमरे की तो कोई आवश्यकता ही नहीं होगी!! मैंने उसको समझाया कि कैमरा फोन अपनी जगह है और पूर्ण कैमरा अपनी जगह, दोनों में बहुत अंतर होता है। मेगापिक्सल से कुछ नहीं होता, अधिक मेगापिक्सल वाले सस्ते चीनी कैमरे(1000 से 4000 रूपए के बीच) भी मिल जाते हैं बाज़ार में लेकिन उनकी गुणवत्ता उनसे कम मेगापिक्सल वाले दूसरे स्थापित ब्रांड के कैमरे के सामने कहीं नहीं होती!! स्थापित ब्रांड वाले कैमरे को छोड़िए, मैंने तो उन सस्ते जुगाड़ों की गुणवत्ता अपने नोकिआ एन70(Nokia N70) के आगे भी टिकती नहीं देखी!!

मेगापिक्सल सिर्फ़ फोटो के रेज़ोल्यूशन(resolution) से संबन्ध रखता है, कि फोटो का आकार कितना बड़ा है और उसमें कितनी डिटेल/गहराई(depth) है। आम शब्दों में कहें तो ज़्यादा मेगापिक्सल का लाभ तभी है जब आपने प्रिंट निकालने हों, यदि कंप्यूटर पर ही फोटो रखने हैं तो कोई खास लाभ नहीं। प्रिंट भी यदि 4×6 या 8×12 तक के निकालने हैं तो 5-6 मेगापिक्सल पर ली फोटो काफी है, 10 मेगापिक्सल पर लेने से कोई अधिक अच्छी नहीं आ जाएगी। तो इसलिए मेगापिक्सल के अतिरिक्त भी कैमरे में कुछ होना चाहिए!!

ऑप्टिकल ज़ूम (optical zoom) किसी भी कैमरे का मेरे अनुसार अति महत्वपूर्ण पहलू होता है। अधिकतर डिजिटल कैमरों में दो तरह का ज़ूम(zoom) होता है, ऑप्टिकल ज़ूम और डिजिटल ज़ूम(digital zoom)। इन दोनों में डिजिटल ज़ूम पर ध्यान न ही दें तो बेहतर है क्योंकि डिजिटल ज़ूम और कुछ नहीं करता सिर्फ़ आपकी फोटो को डिजिटली बड़ा कर देता है(यानि कि जैसे रबड़ को खींच दिया हो) जिससे फोटो फट सी जाती है, जबकि ऑप्टिकल ज़ूम असल ज़ूम होता है जो कि लेन्स(lens) को पोज़ीशन कर प्राप्त किया जाता है और जिससे फोटो की क्वालिटी में कोई अंतर नहीं आता। कुछ कैमरा निर्माता(प्रायः निचले दर्जे के) आपको एक ही ज़ूम का आंकड़ा बताएँगे; कि कैमरे में 12x का ज़ूम है, जिसका अर्थ यह भी हो सकता है कि उसमें 3x का ऑप्टिकल ज़ूम है और 4x का डिजिटल ज़ूम – 3 गुणा 4 हुआ 12। अब इसमें आपके लिए 3x का ही ज़ूम काम का है, बाकी बेकार है। सस्ते कैमरे में अधिक ऑप्टिकल ज़ूम नहीं मिलता, क्योंकि अधिक ऑप्टिकल ज़ूम के लिए लेन्स की गुणवत्ता अधिक होनी चाहिए जिस कारण लेन्स की कीमत बढ़ जाती है और नतीजन कैमरे की कीमत बढ़ती है। इसलिए कैमरा लेते समय यह देखें कि उसका ऑप्टिकल ज़ूम कितना है, 3x का ऑप्टिकल ज़ूम आजकल सामान्य है और न्यूनतम अपेक्षा होती है, इससे कम वाले कैमरे को नज़रअंदाज़ करना ही बेहतर होगा आपके लिए।

अगले भाग में जारी …..


फ्री की मोबाइल सेवा ……


August 5th, 2007 | 9 Comments

….. क्या आप भुगतने के लिए तैयार हैं??

mobi-ads -- mobile advertisements
भुगतना? हाँ जी भुगतना, अब ऐसे ही तो फ्री में मोबाइल से फुनवा लगा गाँव में अम्मा से या बगल के ऑफिस में, अपने जगमग एलसीडी(LCD) स्क्रीन के सामने बैठी, रीता से गप्पें तो नहीं ना मार सकोगे ना!! तो उसके लिए का भुगतना होगा? अरे भई ज्यादा कछु नहीं, सिर्फ़ कुछ विज्ञापन झेलने होंगे। नहीं समझे? लो, कल्लो बात, कौन से झाड़ में घुसे रहते हो भई?? ऊ ससुरा गुगलवा ने अपने फुनवा का प्रोटोटाइप(prototype) बना लिया है जिसको ऊ एक बरस में बाज़ार में उतार सकता है, फिलहाल अमरीका के मोबाइल सेवा प्रदाताओं और मोबाइल फुनवा बनाने वालों के साथ सांठ-गाँठ करने में लगा है ताकि मोबाइल निर्माता उसके अनुसार फोन बनाएँ और सेवा प्रदाता उसके अनुसार सेवा प्रदान करें।

बाकी कुछ हो न हो, लेकिन मजे की बात ई रहेगी कि मोबाइल सेवा प्रदाता क्या सोचते हैं इस बारे में, क्योंकि वॉल स्ट्रीट जर्नल के मुताबिक गुगलवा के साथ ई सैटिंग सेवा प्रदाताओं के लिए दो-धारी तलवार है; गुगलवा के साथ सैटिंग का लाभ ई हो सकता है कि अधिक से अधिक लोग डाटा प्लान लेंगें जिनमें पैसा बनेगा क्योंकि कॉल वाली सेवा में वैसे भी अधिक पैसा नहीं रहा है तो वहीं दूसरी ओर ई डर भी है कि मोबाइल विज्ञापन की डॉलर कमाऊ ज़मीन उनके हाथ से जाती रहेगी!!

अब यदि गुगलवा अपनी इस नई सेवा को बाज़ार में लाता है तो मोबाइल बाज़ार में आने वाली दूसरी ऐसी कंपनी होगी जिसका इस बाज़ार से पहले कोई लेना-देना नहीं था। काहे? अरे पहली ऊ ससुरी सेब कंपनी है ना जो मैंफोन….. यानि कि आईफोन(iphone) निकाले रही, बेशक खामखा का डॉलर बर्बाद शोशा ही सही लेकिन लोग तो पिले रहे ना ऊ का फुनवा ले की खातिर। अब सेब….. यानि कि ऐपलवा ने तो सिर्फ़ एक के साथ सांठ-गाँठ करी, ऐ टी एण्ड टी(AT&T) के साथ, लेकिन गुगलवा तो घणा होशियार रहे, स्यानों में डेढ़ स्याना रहे, इसलिए ऊ एक के साथ नहीं सब मोबाइल सेवा प्रदाताओं के साथ सैटिंग करेगा, ग्राहक जाएगा तो किधर बच के जाएगा, बचने के लिए बैन्डविड्थ कम पड़ जाएगी कौनो कैरियर ना मिलेगा!! ;)

वैसे ई सेवा को ऊ लोग कदाचित्‌ ही प्रयोग करें जो मोबाइल सेवा का खर्चा वहन करने की क्षमता रखते हैं। अब का है कि ऊ लोग इस तरह कॉलवा के बीच में रेडियो/टीवी शो की तरह कमर्शियल ब्रेकवा नाही लेना पसंद करेंगे ना!! तो ई भी हुई सकत है कि गुगलवा की ई सेवा अल्पव्यस्कों(teenagers) और ऊ लोगन को टार्गेट(target) करे जौन मोबाइलवा का खर्चा नाही उठा सकत!!

तो अब देखे का है कि ई गुगलवा का नया शगूफ़ा कब तक बाज़ार में आवत है, और का रंग दिखावत है!!