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Archive for September, 2007


लोमो


September 22nd, 2007 | 2 Comments

नहीं-२, यह कोई मोमो (momo) जैसा व्यंजन नहीं है जिसको बनाया और खाया। ;) यह दरअसल नाम है रूस के एक कैमरा निर्माता का जो इसी नाम के कैमरे बाज़ार में लगभग पिछले सत्तर वर्षों से निकाल रहा है। शुरुआती दौर में सरकारी रही और 1993 में पब्लिक हुई यह कंपनी कहने को तो रूस की सबसे बड़ी ऑप्टिक निर्माता है लेकिन इसके कैमरे ज़रा अलग तरह के होते हैं। इसके कैमरे बहुत ही घटिया दर्जे के लेन्स प्रयोग करते हैं जिस कारण उनके द्वारा ली गई तस्वीरों में एक अलग बात होती है। इसके द्वारा ली गई तस्वीरें बहुत अच्छी क्या अच्छी भी नहीं आती, विग्नेटिंग दिखाई पड़ती है (यानि कि तस्वीर के बॉर्डर स्पष्ट नहीं होते, काले से होते हैं) और काफ़ी सैचुरेटिड (saturated) होती हैं यानि कि उनमें रंगों के कुछ शेड बहुत तीव्र होते हैं और तस्वीर बीच में से कुछ अधिक ही शॉर्प (sharp) होती है। लोमोग्राफ़ी के ऑस्ट्रियाई संस्थापक 1991 में चेकोस्लोवाकिया (czechoslovakia) की राजधानी प्राग (prague) के दौरे के दौरान लोमो कैमरे से रूबरू हुए और इस कैमरे से निकली धुंधली सी तस्वीरें उनको बहुत भा गई। उन्होंने इस तरह की तस्वीरों को कला के तौर पर बाज़ार में स्थापित किया और फिर लोमो कंपनी से एक करार किया जिसके तहत रूस के बाहर यह ऑस्ट्रियाई कंपनी लोमो कैमरों की एकलौती वितरक बनी।

डिजिटल कैमरों के दौर से पहले फिल्म पर उतारी गई तस्वीरों में अधिक सैचुरेशन (saturation) पाने के लिए क्रॉस प्रोसेसिंग (cross processing) भी की जाती थी जिसके तहत रंगीन स्लाईड फिल्म को उसके लिए बने रसायन घोल E6 में डेवेलप (develop) करने की जगह साधारण फिल्म के रसायन घोल C41 में डेवेलप किया जाता था। इस तरह की तस्वीरों ने जल्द ही एक पंथ (cult) का रूप ले लिया और डिजिटल कैमरों के आने के बाद तो लोमो फोटो के लिए आपके पास लोमो कैमरा होने की भी आवश्यकता नहीं रह गई, आप अपने किसी भी डिजिटल कैमरे से फोटो लेकर कंप्यूटर पर ही उसको लोमो बना सकते हैं।

जैसे यह देखिए मेरे कैमरे द्वारा ली गई असली तस्वीर:

और डम्पर के लोमो टूल द्वारा बनाया गया इसका लोमो यह है:

स्वयं मैंने पंगेबाज़ी कर यह एक हल्का लोमो बनाया जिसमे सैचुरेशन (saturation) इतना नहीं है:

और इसी फोटो में जब सैचुरेशन (saturation) बढ़ा दिया तो यह नतीजा निकला:

फोटो को लोमो बनाने के बहुत तरीके हैं, यदि सिर्फ़ फोटोशॉप (photoshop) को ही लें तो उसमें भी आप कई अलग-२ तरीकों से लोमो बना सकते हैं। इंटरनेट पर इसके लिए बहुत से ट्यूटोरियल (tutorial) मिल जाएँगे और कोई आवश्यक नहीं कि जैसा उनमें बताया गया है आप बिलकुल वैसा ही करें क्योंकि प्रत्येक फोटो अलग होती है और उसके रंग आदि भी अलग होते हैं। तो आप स्वयं पंगेबाज़ी करके देख सकते हैं और जो नतीजे आपको अच्छे लगें उन्हीं को अपनाएँ, आखिर यह सब सृजनात्मक कार्य है, अपनी क्रिएटिविटी (creativity) को कार्य पर लगाईये और नतीजे देखिए। :)

जो लोग फोटोशॉप (photoshop) जैसे किसी एडिटर (editor) में पंगेबाज़ी नहीं कर सकते या जिनको तुरंत नतीजे चाहिए वे डम्पर के इस लोमो जुगाड़ का भी प्रयोग कर सकते हैं, बस अपनी फोटो अपलोड करिए और उसका लोमो रूप प्राप्त कीजिए!! लोमोग्राफ़ी पर थोड़ा अधिक विस्तार से अंग्रेज़ी में यहाँ पढ़िए


ओ ऽऽ राम तेरा ऽऽ सेतु


September 19th, 2007 | 13 Comments

….. बना वोट पाने का माल ऽऽ,
कांग्रेस भी चाहे पाना इसको करुणा के साथ ऽऽ ॥


हमरी फोटू लगी गैलरी मा


September 18th, 2007 | 12 Comments

ईयहाँ वहाँ सुनत रहे एकठौ जगह पढ़े भी रहे कि फलां की फोटुओं की फलां गैलरी मा प्रदर्शनी हो रही है, फलां जगह डिसप्ले पर लगी है!! कई बार फोटू बहुत अच्छे होते तो कई बार ऐवईं चलती फिरती चवन्नी छाप फोटू होती कि सोच मा पड़ जाते कि ऐसन लोग जब प्रदर्शनी लगा सकत हैं और लोग-बाग़ देखन भी जात है, एकाध फोटू बिक भी जात(जिस मा प्रदर्शनी वगैरह की लागत लगभग सारी निकल आत है) हैं, तो हम काहे नाही अपनी भी लगा लें!! कोई रोके थोड़े ही है, ठीक ठाक तो हम भी खींच लेत हैं कभी कभार, तो आखिरकार हम भी अपनी प्रदर्शनी लगा लिए। अभी का है कि लगा लिए, लेकिन ऊ का प्रमाण का है? उधर नीरज दद्दा के ब्लॉग पर पढ़े रहे कि परभू राम को भी प्रमाण दे की जरूरत है, हम ठहरे मामूली गरीब आदमी, तो हमार को प्रमाण देई की जरूरत पड़े ही पड़ेगी!! तो प्रमाण हम तैयार कर लिए, प्रदर्शनी को हटाई दिए, ई है ऊ प्रमाण का फोटू जो साबित करे कि हम प्रदर्शनी लगाए थे!!

Gallery Exhibit!

ई फोटू हमहू लिए रहे, ऊ का प्रमाण है ई फोटू:

तो अब तो माने ही पड़ेगा कि हमार फोटू का भी प्रदर्शनी लगा था। ई का लगाए के हमार एकठौ तमन्ना भी पूरी हुई गवा, अब बाकियों का नंबर लगाएँगे!! ;)

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अरे चौंकिए मत, टेन्शन भी मत लीजिए, लेकिन यदि प्रदर्शनी लगाने की मुबारकबाद देना चाहते हैं तो अग्रिम रूप से ले लेंगे, बाद में कभी प्रदर्शनी लगाई तो तब वाले खाते में डाल दी जाएँगी!! कोई प्रदर्शनी वगैरह नहीं लगी मेरी किसी फोटो की, यह सिर्फ़ मज़ाक है। वह तितली की फोटो(दूसरे नंबर वाली) मैंने ही परसों रविवार(16 सितम्बर 2007) को ली है लेकिन वो गैलरी वाली फोटो(पहले नंबर वाली) सरासर नकली है। ;) तितली की इस फोटो को गैलरी में स्थित फ्रेम में एक मुफ़्त ऑनलाईन जुगाड़ के ज़रिए चढ़ाया है। इस जुगाड़ का नाम है डंपर (dumpr) और इस पर ऐसे कई फोकटी जुगाड़ हैं। अपनी पिछली पोस्ट में मैंने हिन्दी ब्लॉगजगत के चार महारथियों का स्कैच बना के दिखाया था, जो कि जुलाई में ली उनकी एक फोटो में कुछ पंगेबाज़ी करके बनाया था, तो कुछ लोगों ने पूछा था कि कैसे बनाया। अब मैंने तो पंगे लेकर उँगली करके किसी तरह बनाया था, इंटरनेट पर ढूँढेंगे तो बहुत ट्यूटोरियल (tutorial) भी मिल जाएँगे, लेकिन हर कोई कदाचित्‌ ऐसे पंगे समयाभाव आदि के कारण न ले पाए इसलिए एक तुरत-फुरत वाला जुगाड़ इस डंपर (dumpr) पर यहाँ उपलब्ध है। इस पर बिलकुल ही स्कैच जैसी बन जाती है फोटो, हर फोटो में शायद वो बात न आए लेकिन फ्री के जुगाड़ के रूप में यह अच्छा है। तो बस इंतज़ार किस बात का, इस पर फोटो अपलोड (upload) करिए या अपने फ़्लिकर (flickr), पिकासा (picasa), माईस्पेस (myspace) अथवा ज़ूमर (zoomr) पर मौजूद फोटो वाले पन्ने का लिंक या फोटो का सीधा लिंक डालिए और फोटो का एक क्लिक में स्कैच बनाईये, डाउनलोड कर अपनी ऑनलाईन फोटो एल्बम/गैलरी पर चढ़ाईये और सबको दिखाईये!! :)


हमहू भी स्केचियाएँ…..


September 15th, 2007 | 12 Comments

जुलाई में जीतू भाई के आगमन पर हुई रेगुलर ब्लॉगर मीट के कुछ लम्हें मैंने यहाँ दिखाए थे। उस दिन ली सभी तस्वीरों में से एक फोटो से मैं कुछ दिन पहले समय मिलने पर पंगे ले रहा था, अलग-२ कुछ प्रयोग से कर रहा था, नतीजन एक बढ़िया सा स्केच बन गया तो आखिरकार आज उसको अपलोड कर दिया अपने फ्लिकर गैलरी में। लीजिए आप भी देखिए और मौज लीजिए। :)

Bloggers' Day Out

( बाएँ से दाएँ – नीरज दादा, जगदीश जी, श्रीश और जीतू भाई )

असली फोटो जिससे पंगे लिए गए वह यहाँ है। इस स्कैच का रंगीन संस्करण यहाँ है


अथ श्री घिसा पिटा प्रलाप आरंभम्‌ भवति


September 7th, 2007 | 8 Comments

लो जी, फिर वही घिसा पिटा बदहज़मी युक्त प्रलाप शुरु हो गया कुछ लोगों का। किसी ने बताया कि दिल्ली में फैशन सप्ताह(fashion week) शुरु हो गया है और कई नामी देशी डिज़ाईनर भाग ले रहे हैं, अपनी कृतियाँ दिखा रहे हैं। वहीं किसी ने बताया कि फलां लोगों ने पुराना नग्नता और अश्लीलता का फटा बाँस फूँकना शुरु कर दिया है। अब भई अपने पल्ले ये नहीं पड़ता कि क्यों लोग कला और अश्लीलता में अंतर नहीं समझते!! किसी ने कहा कि पारंपरिक परिधानों को दर-किनार किया जा रहा है तो कोई बोला कि इस तरह के फैशन शो में प्रदर्शित होने वाले परिधान आम जनता के लिए नहीं होते। परिवर्तन प्रकृति का नियम है अन्यथा एक कोशिका वाले जीव से लेकर आज लाखों कोशिकाओं वाले जीवों का सफ़र कभी न हुआ होता। तो कोई आवश्यक नहीं है कि परंपरा को पकड़े हुए बाबा आदम के स्टाईल के परिधान ही पहने जाएँ। ऐसा नहीं है कि पारंपरिक परिधानों को त्यागा जा रहा है, लेकिन उनमें डिज़ाईनर अपनी रचनात्मक्ता और समझ के अनुसार बदलाव लाकर उनको बाज़ार में उतार रहे हैं। रीना ढाका, रितु बेरी, मनीष मल्होत्रा, रोहित बल जैसे नामी डिज़ाईनर औरतों के लिए साड़ियाँ और मर्दों के लिए कुर्ते, शेरवानी आदि भी डिज़ाईन करते हैं, तो इसलिए यह नहीं कह सकते कि परंपरागत परिधानों को त्याग दिया गया है। लेकिन इनके द्वारा डिज़ाईन किए गए परिधान आम जनता के लिए नहीं होते यह बात सत्य है। अब जब पचास हज़ार से लेकर लाख रूपए से उपर कीमत की साड़ियों और शेरवानियों की बात करेंगे तो आम जनता कहाँ से लेगी?? लेकिन इस तरह के परिधानों को डिज़ाईन करते समय ये लोग आम जनता को टार्गेट करते ही नहीं!! और यह कहाँ लिखा है कि फैशन शो आदि में सिर्फ़ आम जनता के पहनने लायक ही परिधान प्रदर्शित किए जाएँ? यदि किसी नामी चित्रकार की कलाकृतियों की प्रदर्शनी लगती है तो ये लोग वहाँ कला की तारीफ़ करने लगते हैं कि क्या कलाकार है और क्या कला का नमूना है। क्या उसके सभी चित्र आदि इतने सस्ते होते हैं कि आम जनता खरीद सके? लाखों रूपयों में बिकने वाले चित्रों के एक अलग दर्जे के ग्राहक होते हैं; प्रशंसक बहुत हो सकते हैं लेकिन सभी खरीददार नहीं हो सकते। अमां कोई समाजवादी कम्यूनिस्ट राष्ट्र में रह रहे हो क्या जहाँ जो कार्य हो समस्त जनता-जनार्दन के भले के लिए हो? यदि आपके सामाजिक वृत्त (social circle) में कोई ऐसे परिधान नहीं पहनता तो इसका अर्थ यह नहीं कि कोई पहनता ही नहीं, आखिर समाज आपकी या मेरी या कल्लू की सामाजिक परिधि (social circle) तक ही तो सीमित नहीं है!!

अब यदि आम जनता इतने महंगे डिज़ाईनर परिधान नहीं खरीद सकती तो क्या करे? दो ही रास्ते होते हैं; या तो मन मसोस चुप बैठे या पड़ोस के बुटीक के दर्ज़ी को उस डिज़ाईन की तस्वीर वगैरह दिखा अपने लिए भी वैसा कुर्ता, सलवार-सूट आदि बनवा लें। पाईरेसी(piracy) वगैरह हर जगह है, यहाँ भी है!! ;)

वैसे कोई पूछे तो यह पूछना चाहिए कि ये “परंपरा” का रोना रोने वालों में कितने लोग धोती-कुर्ते में घूमते हैं? अपने दफ़्तर आदि धोती-कुर्ता पहन और पाँव में चप्पल डाल के बैलगाड़ी या घोड़ागाड़ी में जाते हैं? और मोहतरमाओं में कितनी लैक्में, लोरियाल आदि से लेकर देशी ब्रांडों की लिप्सटिक, पाउडर आदि सौन्दर्य प्रसाधनों की जगह परंपरागत सौन्दर्य प्रसाधन प्रयोग करती हैं? चेहरे के लिए एवर यूथ वगैरह का संतरे अखरोठ वाला फेस स्क्रब(face scrub) प्रयोग हो सकता है, परंपरागत नुस्खा नहीं!! अब इन लोगों से ऐसे प्रश्न कर लो तो ये लोग या तो बगलें झांकने लगेंगे अथवा बेतुका सा उत्तर देंगे – “आप तो अति में चले गए जी”!! कारण? भई इनका विरोध बेतुका है, जिसका न कोई सिर है न पैर, जबरदस्ती वाले विरोध की हवा निकलते देख और क्या कहेंगे!! वैसे अंग्रेज़ी स्टाईल की कमीज़ पैन्ट पहने अंकल तथा अंग्रेज़ी स्टाईल की कमीज़ और अमेरिकी स्टाईल की जीन्स पहने आंटियाँ जब परंपरा की वकालत करते हैं तो मामला मुझे बहुत हास्यप्रद लगता है, चक्कर में पड़ जाता हूँ कि कहाँ की परंपरा की बात हो रही है!! ;)

जहाँ तक अश्लीलता का प्रश्न है,

सिमटे तो दिल-ए-आशिक़, फैले तो ज़माना है

स्वयं जो पहनों वह श्लील और परंपरागत, दूसरा पहने तो अश्लील और अपरंपरागत!!

इन संस्कृति के दारोगाओं को यह बात समझ नहीं आती कि वस्त्र आदि श्लील-अश्लील नहीं होते, श्लील अथवा अश्लील व्यक्ति के विचार, उसकी सोच, मानसिकता और नज़रें होती हैं। कोई लड़की यदि तंग लो-कट टॉप(low cut top) और छोटी स्कर्ट पहन सामने बैठी है तो यदि आप वासनायुक्त नज़र/विचार के साथ उसकी गर्दन से नीचे उसको देखते हैं या उसकी टॉगों पर नज़र फिराते हैं तो वह लड़की या उसके वस्त्र अश्लील नहीं हैं वरन्‌ आपके विचार और आपकी सोच अश्लील है। वहीं दूसरी ओर यदि आप उसके सौन्दर्य को निहारते हैं तो वह अश्लील नहीं है, प्रकृति ने उसको शारीरिक सौन्दर्य से नवाज़ा है तथा उस लड़की को इस बात का गर्व है, आपको अपने पर काबू नहीं है या कॉम्पलेक्स हो रहा है तो मुँह फेर लीजिए, खामखां हल्ला क्यों मचाते हैं!! प्रकृति ने सबको एक जैसा नहीं बनाया है, किसी के पास शारीरिक सौन्दर्य है तो किसी के पास आंतरिक तो किसी के पास दोनों। तो जब आप अपने भीतर के सौन्दर्य, अपने विचारों के सौन्दर्य के प्रदर्शन को अश्लील नहीं मानते तो किसी के शारीरिक सौन्दर्य के प्रदर्शन को क्यों मानते हैं? अब अगला व्यक्ति नग्न तो नहीं घूम रहा, कपड़े पहन रखे हैं जो उस पर फबते हैं(डिज़ाईनर लोग ऐरे-गैरे को अपने परिधान पहना प्रदर्शित नहीं करते), आपको किस बात की टेन्शन है?

ये गूढ़ ज्ञान की बातें नहीं हैं, लेकिन संकुचित मानसिकता वाले छोटे से दिमाग में फिर भी नहीं समाने वाली। इनको प्राप्त करने हेतु विचारों की आवाजाही के लिए मस्तिष्क के द्वार पर लगे अलीगढ़ी ताले हटाकर कपाट खोलने होंगे, दिल को भी बड़ा करना होगा।