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ऐडसेन्स या नॉनसेन्स?


December 1st, 2007 at 07:07 am | 13 Comments

अज्ञानीलाल ने कहीं पढ़ा कि ब्लॉगस्पॉट पर फोकट में ब्लॉग बनाया जा सकता है और उस पर गूगल के ऐडसेन्स (AdSense) वाले विज्ञापन लगा दो और फिर बस बैठकर देखते जाओ, डॉलरों की बरसात हो जाती है। बस फिर क्या था, तुरत-फुरत अज्ञानीलाल ने ब्लॉग बनाया, टशन वाली टेमप्लेट (template) लगाई, थोड़ा इधर से थोड़ा उधर से पोस्ट करने के लिए माल मसाला जुगाड़ा। ऐडसेन्स (AdSense) के खाते की मंजूरी भी थोड़े दिन में आ गई और बस फिर क्या था, अज्ञानीलाल ने पूरे ब्लॉग को विज्ञापनों से सजा दिया और डॉलरों की बरसात की प्रतीक्षा करने लगा। एक दिन बीता, दो दिन बीते, दिन पर दिन बीते, लेकिन एक फूटी कौड़ी भी न आई बेचारे के खाते में। उसने फिर कंप्यूटर के चूहे को दौड़ाया, कुछ क्लिक वगैरह किए और कहीं पढ़ा कि विज्ञापन पर क्लिक होगा तभी कुछ उसका भला होगा। फिर किसी समझदार मित्र ने समझाया कि दूसरे की बाट क्यों देखो कि वह तुम्हारा भला करने आएगा। अज्ञानीलाल को बात जंच गई और उसने अपना भला स्वयं ही करने की सोची। लेकिन पहले उसने इस बात को परखना उचित समझा कि क्या वह अपना भला स्वयं कर सकता था कि नहीं। उसने कुछ क्लिक किए, नतीजा सामने आया, कई डॉलरों की तो नहीं लेकिन कुछ आधे, कुछ पूरे, कुछ चौथाई डॉलरों की एन्ट्री अवश्य हो गई उसके खाते में!!

मामला सैट, अपना भला स्वयं कर सकता था, बस फिर क्या था, लग गया दनादन क्लिक पर क्लिक करने। सुबह उठ दिशा मैदान के बाद थोड़े क्लिक करता, नाश्ता करने के बाद थोड़े क्लिक करता, ऑफिस पहुँच थोड़े क्लिक करता, लंच आननफानन निपटा के क्लिक करता, शाम को बॉस बुलाए तो क्लिक करके जाता, वापस आकर थोड़े क्लिक करता, ऑफिस से निकलने के पहले थोड़े क्लिक, फिर घर पहुँच थोड़े क्लिक, रात्रि भोजन के पश्चात थोड़े क्लिक, लल्लू को होमवर्क कराते समय क्लिक, सोने से पहले थोड़े और क्लिक। समस्या तो उसकी यह थी कि वह नींद में भी क्लिक करता था लेकिन उनकी गिनती नहीं हो पाती थी गूगल के सर्वर पर इसलिए उनसे कुछ हासिल नहीं होता था। खुजली वाला कुत्ता इतनी बार दिन में नहीं खुजाता होगा जितनी बार क्लिकरोग से ग्रसित अज्ञानीलाल एक दिन में क्लिकियाते थे!!

मेहनत का फल मीठा होता है, चाहे देखने में ही मीठा लगे!! अज्ञानीलाल के खाते में सेन्ट दर सेन्ट जुड़ते गए और तकरीबन नब्बे डॉलर जमा हो गए। घर पर क्लिकियाने के बाद अज्ञानीलाल प्रसन्नचित्त मुद्रा में ऑफिस पहुँचे, सोचे कि दिन ढलते-२ गूगल से पहले चेक लायक सौ डॉलर तो बना ही लेंगे, महीने भर का गाड़ी के पेट्रोल का खर्च तो निकल आया समझो। लेकिन ऑफिस पहुँच ईमेल का डिब्बा खोलते ही उनकी कुर्सी के नीचे से मानो ज़मीन निकल गई(अब पैर ज़मीन पर नहीं थे नहीं तो उनके नीचे से भी निकल जाती)!!

काहे? अरे भई ऐडसेन्स (AdSense) विभाग से ईमेलवा आया था और ऊ यह नहीं कह रहा था कि बबुआ अज्ञानीलाल तुहार चेक भेज दिए हैं, ऊ कह रहा था कि बच्चू तुम सेर तो हम सवा सेर, अपना भला स्वयं करने के अपराध में तुहार खाता बंद किया जा रहा है और जमा सभी डॉलर बमय सेन्ट जब्त किए जाते हैं, राम का नाम लो और निकल लो पतली गली से, दोबारा भूल के भी मत झांकना इस गली में!!!

बेचारा अज्ञानीलाल, अपना भला होने के लिए दूसरों की प्रतीक्षा कर लेता तो यह दिन खराब न जाता, दोनो समय का खाना गले से नीचे उतर रहा होता, लल्लू को गणित का प्रश्न हल न कर पाने पर झापड़ का प्रसाद नहीं दिया होता….. हाय कोमल सा लल्लू, अभी बेचारा सिर्फ़ आठ साल का ही तो है!!!

क्या इस भयावह हादसे से अज्ञानीलाल बच जाता यदि वह दूसरे अंजान लोगों की प्रतीक्षा करता अपना भला करने के लिए?

जानने के लिए पढ़िए वेब २.० (Web 2.0) की एक भयावह और अनसुलझी पहेली पर रोशनी डालने वाला सनसनीखेज खुलासा…..

 
फोटो साभार: dullhunk
 

13 Comments

अनूप शुक्ल


ये सोने की मुर्गी का पेट फ़ाड़ के अन्डे निकालनी वाली बात की तरह है। :)


kakesh


लगे रहो जी. हम सुन रहे हैं.


सागर चन्द नाहर


हमने तो यह भि सुना था कि हमें क्लिक करने के लिये अनुरोध करने वाले श्रीमान “क” का खाता भी एडसेन्स वालों ने बन्द कर दिया है।
कहीं अज्ञानीलाल ही “श्रीमान क” तो नहीं?
http://nahar.wordpress.com/2007/07/19/ad-sence/


संजय बेंगाणी


अरे बाप रे कितना क्लिकयाता है बन्दा. खाता तो तुरंत बन्द हो जाना चाहिए था.

और डराते क्यों हो वेब 2 के नाम से. जो है फटाफट बता कर खत्म करो भाई, रक्तचाप बढ़ रहा है.


आलोक कुमार


लगाए चटके, बजे पटाखे।


दीपक भारतदीप


बहुत बढिया व्यंग्य
दीपक भारतदीप


Sanjeet Tripathi


हा हा!! सही है गुरु!!!

अब इ वेब 2 का है भैय्या!!


Amit


ये सोने की मुर्गी का पेट फ़ाड़ के अन्डे निकालनी वाली बात की तरह है।

मैं अनूप जी इससे सहमत नहीं हूँ, अर्थात्‌ यह तुलना फिट नहीं बैठती। :)

कहीं अज्ञानीलाल ही “श्रीमान क” तो नहीं?

जी नहीं सागर जी, सत्य घटनाओं से प्रेरित अज्ञानीलाल का किरदार काल्पनिक ही है। :) और वह श्रीमान क तो एक नासमझ बालक है, उसकी छोड़िए, भूतकाल में उसने अपनी मूर्खता को साबित करने वाली टिप्पणियाँ मेरे ब्लॉग पर की हैं। ;)

और डराते क्यों हो वेब 2 के नाम से. जो है फटाफट बता कर खत्म करो भाई, रक्तचाप बढ़ रहा है.

हा हा हा, दिल थाम के बैठिए!! :)

बहुत बढिया व्यंग्य

अभी तो शुरुआत भी नहीं की दीपक जी!! :)

अब इ वेब 2 का है भैय्या!!

इस बारे में अंग्रेज़ी का यह लेख पढ़िए।


अजित वडनेरकर


अमित भाई , मज़ा आ गया । पहली बार आपके ब्लाग पर आया हूं और कई दिनों बाद दिल खोलकर हंसा हूं। अगर हकीकत है तो सही, व्यंग्य है तो सही । आनंदम् मंगलम्


Pramendra Pratap Singh


पिछली बार मैने इसे खोला किन्‍तु खुला नही, और टिप्‍पणी नही हो पाई, नई वाली पर करता हूँ। :)


ghughutibasuti


वाह ! बहुत बढ़िया !
घुघूती बासूती


Amit


अजीत जी, आप मेरा लेख पढ़ दिल खोलकर हंसे इससे बड़ी तारीफ़ शायद ही मिले, मुझे खुशी है कि आपको हंसी के कुछ पल प्राप्त करा सका। आशा है कि आप अब इस ब्लॉग पर आते जाते रहेंगे। :)
प्रमेन्द्र बाबू, अब के तो टिप्पणी हो ही गई इस पोस्ट पर!! ;)


RC Mishra


अरे भाई जब लिखो तो बता दिया करो..दिखते तो रोज़ ही हो..

इसलिये कह रहा हूँ कि आज एक बार पे पूरा पढ़ गया..मज़ा आया..जानदार व्यंग्य पढ़ के..

वैसे एड सेन्स हम भी लगाये हुए हैं :)।


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