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बाँटने से बढ़ती है…..


March 14th, 2008 at 07:07 am | 5 Comments

कभी-२ ऐसा हो जाता है कि कोई व्यक्ति ईमेल भेजना किसी को चाहता है और गलती से भेज किसी अन्य को देता है। मैं स्पैम या विज्ञापन वाली ईमेलों की बात नहीं कर रहा, मैं ईमानदार गलती की बात कर रहा हूँ। जैसे कुछ समय पहले मुझसे हुआ था, पंकज भाई को ईमेल भेज रहा था लेकिन गलती से किसी अन्य का ईमेल टाइप हो गया और उन साहब को चला गया। उनका जवाबी ईमेल आया कि जिसमें उन्होंने कहा कि मैं शायद किसी और को ईमेल भेज रहा था और उनको भेज बैठा तो मुझे गलती का एहसास हुआ और उनसे माफ़ी माँग पंकज भाई को ईमेल पुनः भेजा। यह गलती हुई एक जैसे लगने वाले ईमेल पते के कारण। फोन पर यह आम बात होती है, रांग नंबर लग जाता है और आ भी जाता है।

बहरहाल, मेरे ईमेल पते पर कई बार ऐसे ही रांग नंबर वाले ईमेल आते रहते हैं जिनमें कभी-२ रोचक से ईमेल आ जाते हैं। जैसे एक बार एक ईमेल आया जो किसी ने अपने किसी मित्र को भेजा होगा लेकिन गलत ईमेल पता प्रयोग करने के कारण मेरे पास आ गया जिसमें विश्व की 10 सबसे महंगी गाड़ियों की तस्वीरें थी, जिसे रोचक जान तस्वीरों सहित मैंने परिचर्चा में भी पोस्ट किया था। तो ऐसे ही आज एक रांग नंबर वाली ईमेल मिली है जिसमें एक बहुत ही अच्छी (अति)लघु कहानी है जिसका हिन्दी अनुवाद यहाँ दे रहा हूँ ताकि अन्य लोग भी सबक लें:

दो बीमार व्यक्ति हस्पताल के एक ही कमरे में थे। उनमें से एक का बिस्तर कमरे की एकलौती खिड़की के पास था और उसको प्रतिदिन एक घंटा बैठने की अनुमति थी। दूसरा व्यक्ति गंभीर रुप से बीमार था इसलिए हर समय बिस्तर पर ही पड़ा रहता था क्योंकि हिल-डुल नहीं सकता था। वे दोनों रोज़ घंटों तक बतियाते, अपने घर-परिवार की बातें करते, अपनी-२ नौकरियों की बातें करते, सेना में दोनों ने कुछ समय बिताया था तो अपने उन दिनों की बातें करते।

रोज़ जब खिड़की के पास वाला व्यक्ति उठकर बैठता तो वह दूसरे व्यक्ति को खिड़की के बाहर का नज़ारा बयान कर अपना समय व्यतीत करता। वह उसको खिड़की के बाहर सड़क के दूसरी ओर स्थित बाग के बारे में बताता, उसमें मौजूद तालाब के बारे में बताता, बाग में शाम को खेल रहे बच्चों और टहल रहे युगल जोड़ों के बारे में बताता, बाग में मौजूद सुन्दर फूलों के बारे में बताता। दूसरा व्यक्ति रोज़ के उस एक घंटे के लिए जीने लगा, प्रतिदिन वह आने वाले उस एक घंटे की प्रतीक्षा करता जब उसके मस्तिष्क को उस कमरे की कैद से से मुक्ति मिलेगी और वह बाहरी दुनिया के बारे में जान सकेगा। जैसे-२ वह वर्णन सुनता वैसे-२ वह आँखें बंद कर उसकी कल्पना अपने मस्तिष्क में करता और उसको प्रतीत होता कि वह स्वयं उन दृश्यों को देख रहा है। इस तरह कुछ माह बीत गए।

एक दिन सुबह नर्स उन दोनों का नाश्ता लाई तो उसने पाया कि खिड़की के पास वाला मरीज़ अपनी रात्रि की निद्रा में ही चल बसा है। उसे दुख हुआ, दूसरे व्यक्ति को भी दुख हुआ क्योंकि वह इन बीते महीनों में उसका मित्र बन गया था। आखिरकार उसके शव को वहाँ से हटा दिया गया तो उस व्यक्ति ने नर्स से अनुरोध किया कि उसको खिड़की के पास वाला बिस्तर दे दिया जाए। नर्स ने उस व्यक्ति को उसके कहे अनुसार दूसरे बिस्तर पर शिफ़्ट करा दिया।

धीरे-२, दर्दभरे प्रयासों के बाद इंच-२ कर वह व्यक्ति थोड़ा सा उठा ताकि वह अपनी आँखों से खिड़की के बाहर की दुनिया देख सके, वह दुनिया जिसके बारे में वह अभी तक सुनता और अपनी कल्पना की आँखों से जिसको देखता आया था। लेकिन खिड़की से बाहर देखते ही उसकी आशाओं पर पानी फिर गया, खिड़की के बाहर उसको सिर्फ़ एक सफ़ेद दीवार नज़र आई और उसके अतिरिक्त कुछ न नज़र आया। जब नर्स पुनः आई तो उसने उससे पूछा कि यह खिड़की के बाहर दीवार कैसे आई, कल तक तो वहाँ से सुन्दर बाग दिखता था जिसके बारे में वह दूसरा व्यक्ति रोज़ बताता था। इस पर नर्स ने आश्चर्य दिखाते हुए बताया कि इस खिड़की के सामने की दीवार तो शुरु से ही है, हो सकता है कि दूसरा व्यक्ति सिर्फ़ हौसला अफ़ज़ाई के लिए उसको वह बाग आदि का वर्णन सुनाता हो।

यह लघु कथा डूबते को तिनके का सहारा होता है वाली कहावत को चरितार्थ करती है कि कैसे आशा की एक ज्योती हौसला बनाए रखती है, ठीक वैसे जैसे इस कथा में खिड़की के पास वाला व्यक्ति गंभीर रुप से बीमार दूसरे व्यक्ति को बाग आदि का झूठा वर्णन कर उसके मन में जीवन के प्रति आस बंधाता रहा, बीमार व्यक्ति रोज़ उस एक घंटे के लिए जीने लगा और धीरे-२ स्वस्थ हुआ। खुशी बाँटने से बढ़ती ही है कम नहीं होती, किसी के ग़म में शरीक हो आप उसके ग़म को थोड़ा कम कर सकते हैं लेकिन किसी के साथ आप अपनी खुशी बाँट उसे अपने से दोगुणी खुशी दे सकते हैं। :)

5 Comments

paramjitbali


बहुत बढिया! :tup: सुन्दर पोस्ट लिखी है।ज्ञान वर्धक।


राजीव जैन


बहुत ही रोचक लगी यह लघुकथा
संदेश
भी तगडा
आशावादी बनिए


amit


धन्यवाद परमजीत जी और राजीव जी।

राजीव जी, यह ज़िंदगी का सबसे बड़ा सबक है कि आशावादी ही जीवन से संघर्ष कर पाते हैं, जो आशावादी नहीं होते वे संघर्ष नहीं कर पाते। :)


Shrish


Hmm, Nice. This story reminds me of “The last leaf”.


amit


केड़ी “आखिरी पत्ती”? :?:


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