
अडोबी हवा यानि कि अडोबी एयर (Adobe AIR), पर ये हवा है कैसी? तो मामला ये है जनाब कि ये है अडोबी वालों का नया शगूफ़ा, एयर बोले तो अडोबी इंटीग्रेटिड रनटाइम (Adobe Integrated Runtime)। अब इसकी तकनीकी पेचीदगियों में मत जाईये, बस इतना समझिए कि यह माइक्रोसॉफ़्ट के डॉट नेट रनटाइम (Microsoft .NET Runtime) की तरह है। बस इस रनटाइम को डाउनलोड(तकरीबन 11 मेगाबाइट) कर इंस्टॉल कीजिए और आपके कंप्यूटर पर इसके लिए बने सभी सॉफ़्टवेयर चलने लगेंगे। माइक्रोसॉफ़्ट का डॉट नेट तो सिर्फ़ उन्होंने विन्डोज़ के लिए निकाला लेकिन अडोबी वालों का कोई अपना ऑपरेटिंग सिस्टम तो है नहीं इसलिए उन्होंने सबके लिए निकाल दिया – विन्डोज़ के लिए भी और सेब के मैक के लिए भी। लिनक्स वालों को अभी कदाचित् प्रतीक्षा करनी पड़ेगी क्योंकि लिनक्स वाला वर्ज़न अभी इन लोगों ने रिलीज़ नहीं किया है पर जल्दी ही करने का विचार रखते हैं।
अब वो सब तो ठीक है लेकिन इसका फायदा क्या है? इसका फायदा यह है कि इस पर चलने वाले सुन्दर जुगाड़ आपको मिलेंगे। अडोबी के अनुसार यह प्रयास है इंटरनेट के जुगाड़ों को ब्राउज़र से बाहर निकाल सीधे ही डेस्कटॉप पर लाने का, यानि कि अभी तक जो इंटरनेटिया सेवाएँ आदि आप ब्राउज़र में चला प्रयोग करते थे उनको सीधे ही आपके डेस्कटॉप पर लाया जाए, ब्राउज़र वगैरह का झंझट ही खल्लास।
यह रनटाइम अडोबी की तरफ़ से फोकटी है, ठीक फ्लैश प्लेयर की भांति, तो उसको इंस्टॉल कर लीजिए। इसका अधिकारिक पहला वर्ज़न यहाँ से डाउनलोड करें। इसके अधिकतर सॉफ़्टवेयर अभी इस वर्ज़न पर काम नहीं करते क्योंकि यह हाल ही में रिलीज़ हुआ, तो उस स्थिति से बचने और सॉफ़्टवेयर चलाने के लिए आप इस इसका बीटा-3 इंस्टॉल कर सकते हैं।

कर लिया इंस्टॉल? तो आईये चलते हैं आगे हवाई सफ़र पर। सफ़र के पहले पड़ाव पर देखते हैं ट्वहिर्ल (twhirl) को जो कि ट्विट्टर (twitter) के लिए एक जुगाड़ है। अब यह ट्विट्टर क्या है यदि आपके दिमाग में यह प्रश्न उठ रहा है तो रवि जी का साल भर पहले लिखा यह लेख अवश्य पढ़ें। उस लेख के लगभग साल भर बाद यानि कि पिछले महीने जीतू भाई को सपना आया कि ट्विट्टर क्या होता है तो उन्होंने भी अपनी पोस्ट ठेल दी, तो उनकी पोस्ट भी देख लीजिएगा(नहीं तो दिल्ली आते ही मुझे डंडा देंगे कि उनकी पोस्ट का ज़िक्र क्यों नहीं किया, ही ही ही)।
हाँ तो अब आप साहबान ट्विट्टर के बारे में जान ज्ञानी लोगों की श्रेणी में आ गए हैं तो अपन चलते हैं ट्वहिर्ल (twhirl) पर जो कि अडोबी की हवा पर उड़ने वाला ट्विट्टर का एक जुगाड़ है। अब वैसे तो ट्विट्टर गूगल की चैट पर सैट कर आराम से प्रयोग कर सकते हैं, अपने अंग्रेज़ी ट्विट्टर का उसमें ही प्रयोग करता हूँ, लेकिन यदि एक से अधिक ट्विट्टर खाते हैं तो क्या कीजिएगा? तो अपने हिन्दी ट्विट्टर को अपडेट करने के लिए मैं जुगाड़ देख रहा था तो यह ट्वहिर्ल मिला। यह दिखने में बहुत सुन्दर लगा, साधारण सा बिना ताम-झाम वाला जुगाड़ जो ठीक किसी चैट वाले जुगाड़ की भांति दिखता है। ट्वहिर्ल में चूंकि आप अपनी पसंद का फाँट सैट कर सकते हैं तो इसलिए आप यूनिकोड फाँट चुन के हिन्दी तो देख सकते हैं परन्तु समस्या यह है कि इसमें आप हिन्दी सीधे नहीं लिख सकते। बराह आदि से तो आप इसमें लिख ही नहीं पाएँगे, यदि इंडिक आईएमई का प्रयोग करते हैं तो इसमें जबरन हिन्दी लिख तो लेंगे लेकिन वह कचरे में बदल कर ही ट्विट्टर पर जाएगी, यानि कि सीधे नहीं लिख सकते।
परन्तु यह यूनिकोड सपोर्ट करता है, तो आप हिन्दी किसी अन्य जगह लिख(जैसे नोटपैड) और वहाँ से कॉपी कर इसमें चिपकाएँगे तो हिन्दी सही दिखेगी भी और सही पोस्ट भी हो जाएगी। दिक्कत वाला काम है लेकिन आशा है कि आने वाले नए वर्ज़न में शायद यह समस्या हल हो जाए और सीधे हिन्दी लिखने का जुगाड़ हो जाए, यह समस्या रिपोर्ट कर दी है।

इसके अतिरिक्त कोई अन्य हवाई जुगाड़ मुझे नहीं मिला जिसमें हिन्दी कॉपी-पेस्ट से भी चलती हो, यानि कि यूनिकोड वाला जुगाड़ फिलहाल यही है। बहरहाल, यदि आप इस कॉपी-पेस्ट के जनजाल में नहीं पड़ना चाहते और ट्विट्टर पर हिन्दी में लिखना चाहते हैं तो बिल्लू दी खिड़की यानि कि माइक्रोसॉफ़्ट विन्डोज़ (Microsoft Windows) वालों के लिए एक सही जुगाड़ है विट्टी (witty) जिसको चलाने के लिए डॉट नेट होना आपके कंप्यूटर पर आवश्यक है – डॉट नेट का नवीनतम वर्ज़न 3.5 यहाँ से डाउनलोड करें।
यदि आपके पास पहले से डॉट नेट है या आपने अब इंस्टॉल कर लिया है तो बस विट्टी को डाउनलोड करिए और इंस्टॉल कीजिए। यह ट्विट्टर के लिए एक सही जुगाड़ है और बढ़िया बात यह कि अभी तक मैंने जितने जुगाड़ देखे हैं उनमें यह अकेला है जिसमें बिना किसी मशक्कत के हिन्दी सीधे ही टाइप भी हो जाती है और पोस्ट भी हो जाती है, दिखती तो खैर है ही।
चूंकि इसका अडोबी की हवा से कोई लेना-देना नहीं है इसलिए इसकी बात यहाँ करना अप्रासंगिक है पर अब जब बात निकल ही आई तो मैंने सोचा कि ट्विट्टर के लिए इस जुगाड़ के बारे में भी बता ही दिया जाए!!
अस्वीकरण (disclaimer): इस लेख में प्रदान की गई जानकारी की कोई गारंटी नहीं है, यह जैसी है वैसी ही दी जा रही है। यहाँ मौजूद जानकारी को प्रयोग अपनी ज़िम्मेदारी पर करें। किसी भी नुकसान के लिए लेखक की कोई ज़िम्मेदारी नहीं होगी।
अभी हाल ही में चिट्ठाकार गूगल समूह में एन्टीवॉयरस पर चर्चा का गर्म दौर रहा जिस दौरान फोकट के एन्टीवॉयरस जुगाड़ों के बारे में भी बात हुई और कौन सा अच्छा है कौन सा बेकार इस पर भी चर्चा हुई। लगभग ढ़ाई वर्ष पहले मैंने डिजिट ब्लॉग पर इंटरनेट पर सुरक्षित विचरण के लिए सरवाइविंग ऑनलाईन (surviving online) नाम से तीन भाग की एक शृंखला लिखी थी जिसमें स्पैम (spam), फिशिंग (phishing), वॉयरस (virus) आदि पर और उनसे बचने के जुगाड़ों के विषय में लिखा था; इसके तीनों भाग आप यहाँ पढ़ सकते हैं – भाग 1, भाग 2 और भाग 3 (तीनों अंग्रेज़ी में हैं)। वह शृंखला ज्ञानवर्धन के उद्देश्य से लिखी गई थी इसलिए उसमें मुख्यतः वैसी ही जानकारी है, फोकट के जुगाड़ों का भी उल्लेख है लेकिन मुख्य फोकस वे नहीं थे।
तो चिट्ठाकार समूह में हुई हाल ही की चर्चा से मन में आया कि बिल्लू दी खिड़की यानी माइक्रोसॉफ़्ट विन्डोज़ (Microsoft Windows) के लिए फोकट के एन्टीवॉयरस जुगाड़ों पर एक पोस्ट ठेल दी जाए ताकि लोग बाग़ वॉयरस नाम की टेन्शन से दूर रहें।
वैसे तो फोकट के छोटे-बड़े नए-पुराने एन्टीवॉयरस सॉफ़्टवेयर कई हैं लेकिन यहाँ मैं मुख्यतः सिर्फ़ 6 एन्टीवॉयरस सॉफ़्टवेयरों को सूचिबद्ध कर रहा हूँ। तो देखते हैं कौन-२ से योद्धा मैदान में हैं (किसी खास क्रम में नहीं):
इन 6 फोकट एन्टीवॉयरस सॉफ़्टवेयरों की कुछ सुविधाओं की तुलना निम्न है:

इनके अतिरिक्त भी निम्न फोकटी एन्टीवॉयरस सॉफ़्टवेयर हैं जिनको आप विकल्प के तौर पर देख सकते हैं:
आशा है कि बिल्लू दी खिड़की यानि कि माइक्रोसॉफ़्ट विन्डोज़ (Microsoft Windows) प्रयोग करने वाले लोगों के लिए यह सूचि लाभकारी रहेगी। यदि आपने इनमें से किसी एन्टीवॉयरस सॉफ़्टवेयर या किसी अन्य फोकटी एन्टीवॉयरस सॉफ़्टवेयर को प्रयोग किया है तो अपने अनुभव यहाँ अवश्य बाँटें।
कभी-२ ऐसा हो जाता है कि कोई व्यक्ति ईमेल भेजना किसी को चाहता है और गलती से भेज किसी अन्य को देता है। मैं स्पैम या विज्ञापन वाली ईमेलों की बात नहीं कर रहा, मैं ईमानदार गलती की बात कर रहा हूँ। जैसे कुछ समय पहले मुझसे हुआ था, पंकज भाई को ईमेल भेज रहा था लेकिन गलती से किसी अन्य का ईमेल टाइप हो गया और उन साहब को चला गया। उनका जवाबी ईमेल आया कि जिसमें उन्होंने कहा कि मैं शायद किसी और को ईमेल भेज रहा था और उनको भेज बैठा तो मुझे गलती का एहसास हुआ और उनसे माफ़ी माँग पंकज भाई को ईमेल पुनः भेजा। यह गलती हुई एक जैसे लगने वाले ईमेल पते के कारण। फोन पर यह आम बात होती है, रांग नंबर लग जाता है और आ भी जाता है।
बहरहाल, मेरे ईमेल पते पर कई बार ऐसे ही रांग नंबर वाले ईमेल आते रहते हैं जिनमें कभी-२ रोचक से ईमेल आ जाते हैं। जैसे एक बार एक ईमेल आया जो किसी ने अपने किसी मित्र को भेजा होगा लेकिन गलत ईमेल पता प्रयोग करने के कारण मेरे पास आ गया जिसमें विश्व की 10 सबसे महंगी गाड़ियों की तस्वीरें थी, जिसे रोचक जान तस्वीरों सहित मैंने परिचर्चा में भी पोस्ट किया था। तो ऐसे ही आज एक रांग नंबर वाली ईमेल मिली है जिसमें एक बहुत ही अच्छी (अति)लघु कहानी है जिसका हिन्दी अनुवाद यहाँ दे रहा हूँ ताकि अन्य लोग भी सबक लें:
दो बीमार व्यक्ति हस्पताल के एक ही कमरे में थे। उनमें से एक का बिस्तर कमरे की एकलौती खिड़की के पास था और उसको प्रतिदिन एक घंटा बैठने की अनुमति थी। दूसरा व्यक्ति गंभीर रुप से बीमार था इसलिए हर समय बिस्तर पर ही पड़ा रहता था क्योंकि हिल-डुल नहीं सकता था। वे दोनों रोज़ घंटों तक बतियाते, अपने घर-परिवार की बातें करते, अपनी-२ नौकरियों की बातें करते, सेना में दोनों ने कुछ समय बिताया था तो अपने उन दिनों की बातें करते।
रोज़ जब खिड़की के पास वाला व्यक्ति उठकर बैठता तो वह दूसरे व्यक्ति को खिड़की के बाहर का नज़ारा बयान कर अपना समय व्यतीत करता। वह उसको खिड़की के बाहर सड़क के दूसरी ओर स्थित बाग के बारे में बताता, उसमें मौजूद तालाब के बारे में बताता, बाग में शाम को खेल रहे बच्चों और टहल रहे युगल जोड़ों के बारे में बताता, बाग में मौजूद सुन्दर फूलों के बारे में बताता। दूसरा व्यक्ति रोज़ के उस एक घंटे के लिए जीने लगा, प्रतिदिन वह आने वाले उस एक घंटे की प्रतीक्षा करता जब उसके मस्तिष्क को उस कमरे की कैद से से मुक्ति मिलेगी और वह बाहरी दुनिया के बारे में जान सकेगा। जैसे-२ वह वर्णन सुनता वैसे-२ वह आँखें बंद कर उसकी कल्पना अपने मस्तिष्क में करता और उसको प्रतीत होता कि वह स्वयं उन दृश्यों को देख रहा है। इस तरह कुछ माह बीत गए।
एक दिन सुबह नर्स उन दोनों का नाश्ता लाई तो उसने पाया कि खिड़की के पास वाला मरीज़ अपनी रात्रि की निद्रा में ही चल बसा है। उसे दुख हुआ, दूसरे व्यक्ति को भी दुख हुआ क्योंकि वह इन बीते महीनों में उसका मित्र बन गया था। आखिरकार उसके शव को वहाँ से हटा दिया गया तो उस व्यक्ति ने नर्स से अनुरोध किया कि उसको खिड़की के पास वाला बिस्तर दे दिया जाए। नर्स ने उस व्यक्ति को उसके कहे अनुसार दूसरे बिस्तर पर शिफ़्ट करा दिया।
धीरे-२, दर्दभरे प्रयासों के बाद इंच-२ कर वह व्यक्ति थोड़ा सा उठा ताकि वह अपनी आँखों से खिड़की के बाहर की दुनिया देख सके, वह दुनिया जिसके बारे में वह अभी तक सुनता और अपनी कल्पना की आँखों से जिसको देखता आया था। लेकिन खिड़की से बाहर देखते ही उसकी आशाओं पर पानी फिर गया, खिड़की के बाहर उसको सिर्फ़ एक सफ़ेद दीवार नज़र आई और उसके अतिरिक्त कुछ न नज़र आया। जब नर्स पुनः आई तो उसने उससे पूछा कि यह खिड़की के बाहर दीवार कैसे आई, कल तक तो वहाँ से सुन्दर बाग दिखता था जिसके बारे में वह दूसरा व्यक्ति रोज़ बताता था। इस पर नर्स ने आश्चर्य दिखाते हुए बताया कि इस खिड़की के सामने की दीवार तो शुरु से ही है, हो सकता है कि दूसरा व्यक्ति सिर्फ़ हौसला अफ़ज़ाई के लिए उसको वह बाग आदि का वर्णन सुनाता हो।
यह लघु कथा डूबते को तिनके का सहारा होता है वाली कहावत को चरितार्थ करती है कि कैसे आशा की एक ज्योती हौसला बनाए रखती है, ठीक वैसे जैसे इस कथा में खिड़की के पास वाला व्यक्ति गंभीर रुप से बीमार दूसरे व्यक्ति को बाग आदि का झूठा वर्णन कर उसके मन में जीवन के प्रति आस बंधाता रहा, बीमार व्यक्ति रोज़ उस एक घंटे के लिए जीने लगा और धीरे-२ स्वस्थ हुआ। खुशी बाँटने से बढ़ती ही है कम नहीं होती, किसी के ग़म में शरीक हो आप उसके ग़म को थोड़ा कम कर सकते हैं लेकिन किसी के साथ आप अपनी खुशी बाँट उसे अपने से दोगुणी खुशी दे सकते हैं।
परसों बताए रहे कि अपनी कॉमिक्स की लत की शुरुआत कैसे हुई।
पर हालात उस समय इतने भी बुरे नहीं हुए थे, शुरुआती दौर था, संक्रमण धीरे-२ बढ़ रहा था। अब मन में होता कि जेब खर्च बचाओ, होली-दीवाली पर जो पैसे मिलते उनको भी बचाओ और फिर सस्ते में पुरानी कॉमिक्स लाओ। डॉयमण्ड के चाचा चौधरी, बिल्लू, पिंकी और राजन इकबाल को जल्द ही विदा कह आगे बढ़े, तुलसी कॉमिक्स से उन दिनों तीन किरदार आते थे रेगुलर – जम्बू, तौसी और अंगारा।

तुलसी कॉमिक्स उपन्यासकार वेद प्रकाश शर्मा का प्रकाशन थी शायद और यह जम्बू किरदार भी जिसमें दिमाग मनुष्य का लगा था और जो बाकी रोबॉट था और सुपर-हीरो था, सबकी वाट लगा सकता था। इसको कुछ समय तक पढ़ा लेकिन मज़ा न आया तो इसे भी पढ़ना छोड़ दिया। अन्य किरदार था तुलसी का – तौसी – जो कि पाताल लोक में नागलोक का राजा और इच्छाधारी सर्प था। इसकी कॉमिक्स में मज़ा आता था, बाद में इसके बेटे का किरदार भी आया लेकिन पता नहीं क्यों इसकी अधिक कॉमिक्स नहीं आई। तुलसी का तीसरा और अंतिम किरदार जो मैंने पढ़ा वह था अंगारा जिसे कि किसी वैज्ञानिक ने अलग-२ जानवरों के तत्वों से बनाया था, चमड़ी जिसकी गैंडे की थी जिस पर गोलियाँ बेअसर थीं, शक्ति हाथी की थी, फुर्ती चीते की थी और आँखें गिद्ध की थी। यानि कि जेनेटिक्स का कुछ फ्यूचरिस्टिक सा कमाल था, सोचने में बेशक वाहियात लगे लेकिन इसकी कॉमिक्स पढ़ने में खूब मज़ा आता था!!
इसी समय में परिचय हुआ मनोज कॉमिक्स के किरदार राम-रहीम की जोड़ी से जो कि मनोज कॉमिक्स में इकलौता किरदार था जो मुझे पसंद आया।
खैर, अब इनसे आगे बढ़ अपन आए राज कॉमिक्स पर। राज कॉमिक्स में मुख्य किरदार थे बांकेलाल, भोकाल, नागराज और सुपर कमांडो ध्रुव; बाकी के किरदार इन्होंने बाद में समय के साथ जोड़े। सीधे-२ समझ आता था कि नागराज की प्रेरणा स्पाईडरमैन से मिली और सुपर कमांडो ध्रुव का प्रेरणा स्रोत बैटमैन रहा।

एक अन्य किरदार जो याद आ रहा है जिसको राज कॉमिक्स में बाद में बंद कर दिया गया वह था अश्वराज, अश्वलोक का सम्राट इच्छाधारी अश्व। इसकी कॉमिक्स शुरु में अच्छी आती थी लेकिन स्टोरीलाइन बाद में कुछ ज़्यादा ही वाहियात हो गई जिसके कारण कदाचित् इसकी कॉमिक्स आनी बंद हो गई। खैर तो अपन राज कॉमिक्स में बांकेलाल, भोकाल, नागराज और सुपर कमांडो ध्रुव की कॉमिक्स पढ़ने लगे। मोहल्ले के अन्य रसिया लड़कों से कॉमिक्स अदल-बदल के भी पढ़ते। उस रेहड़ी वाले से पता नहीं कितनी ही कॉमिक्स लाकर पढ़ी, जो कुछ ज़्यादा ही पसंद आती वह अपने पास रख लेता अपने कलेक्शन में और बाकी वापस चली जाती उसके पास। जल्द ही उसकी सारी पुरानी कॉमिक्स का कोटा समाप्त हो गया, यानि कि मैंने पढ़ डाला; तो अब एक ही मार्ग बचा दिखाई दिया, नई कॉमिक्स खरीदने का!! पापा जिस किताब वाले से अपनी पत्रिकाएँ लाते उसके पास नई कॉमिक्स के सैट तो आते लेकिन जल्दी नहीं आते थे!! फिर दूसरी गली में कुछ लड़कों से दोस्ती हुई, उनमें एक मेरी ही तरह कॉमिक्स का रसिया था तो उसने बताया कि यदि कॉमिक्स का नया सैट रिलीज़ होते ही चाहिए तो रेलवे स्टेशन के अंदर प्लैटफॉर्मों पर मौजूद बुक-स्टॉलों पर जाया करूं क्योंकि उनके पास माल जल्दी आता है।
अब मेरे घर से नई दिल्ली रेलवे स्टेशन कोई एक-डेढ़ किलोमीटर था सिर्फ़, परन्तु जाने में हिचक थी। एक दिन उस लड़के के साथ शाम को लगभग तीन-चार बजे मैं निकल लिया, पैदल ही हम लोग स्टेशन उस ओर से पहुँचे जहाँ डाक आदि और कारगों वगैरह जमा होता था आगे ट्रेनों में चढ़ने के लिए। जिस द्वार से यात्री बाहर आते थे उस द्वार से हम चुपके से अंदर खिसक गए क्योंकि उस समय वहाँ टिकट चैक करने वाला नहीं खड़ा था। अंदर पहुँच पहले ही प्लैटफॉर्म पर एक बड़ा सा बुक स्टॉल था जिसके पास कई सारी कॉमिक्स थीं, नया सैट भी उसके पास आ गया था जो कि अपने मोहल्ले के किताब वाले के पास नहीं आया था, तो उससे नई कॉमिक्स ले ली गई। उसके बाद तो मैं अकेला ही चला जाता और कॉमिक्स ले आता था।
यह सब तो ठीक परन्तु नई कॉमिक्स महंगी आती थीं, आठ रुपए की पतली वाली और सोलह रुपए की मोटी वाली आती थी, और जेबखर्च था कि महंगाई के साथ बढ़ा नहीं था, तो इसलिए जुगाड़ भी करने पड़ते थे। शाम के समय किसी दूसरी ओर के प्लैटफॉर्म पर जाता जहाँ अधिक भीड़ न होती और बुक स्टॉल पर तो दुकानदार के अतिरिक्त कोई होता ही नहीं। वहाँ कॉमिक्स के बंडल में कॉमिक्स छांटने के बहाने द्रुत गति से कॉमिक्स पूरी ही पढ़ डालता, उस समय तक तो माशा-अल्लाह पढ़ने की स्पीड इतनी हो गई थी कि जितनी देर में दुकानदार को शक होता उससे पहले ही अपन कॉमिक्स पढ़ डालते और फिर एकाध कॉमिक्स छांट के उलट-पलट के देखता और वापस आ जाता। जब खरीदता तब भी यही जुगाड़ लगाया जाता, एक कॉमिक्स खरीदी तो उसके साथ एक वहीं पढ़ भी ली जाती। अब दुकानदार इतना बेवकूफ़ तो था नहीं, ताड़ ही गया जल्दी ही, लेकिन चूंकि मैं कॉमिक्स खरीदता भी था तो उसको कोई आपत्ति नहीं थी यदि वहीं खड़े-२ एकाध पढ़ भी लेता हूँ तो(वो समझता था कि मैं सिर्फ़ थोड़ी सी पढ़ के देख रहा हूँ कि कॉमिक्स अच्छी है कि नहीं)!!
कॉमिक्स की कीमत कम करने का भी जुगाड़ निकाल लाया, दूसरे मोहल्ले में एक किताब वाले को सैट किया, उसको नई नकोर कॉमिक्स मैं पढ़ के कॉमिक्स के तीन चौथाई मूल्य पर बेच देता था, थोड़ा महंगा सौदा पड़ता लेकिन फिर भी सही था, कम से कम पूरी कीमत तो अपनी जेब से न जाती थी, तो फालतू कॉमिक्स जो खास पसंद न आती वो उसको बेच देता था।
स्कूल की छुट्टी होने पर नानी जी के घर जाता तो वहाँ भी कॉमिक्स चाहिए थी, तो वहाँ भी एक कॉमिक्स का जुगाड़ देखा, एक अंकल शाम को दुकान खोलते थे और उनके पास पुरानी कॉमिक्स किताबों आदि का खूब ढेर था तो उनसे किराए पर कॉमिक्स लाकर खूब पढ़ी!! जब उन्होंने दुकान बढ़ा दी तो एक अन्य दुकान ढूँढी कॉमिक्स के लिए ताकि जब भी नानी जी के घर जाऊँ तो कॉमिक्स की कमी न खले।
जब मैं सातवीं या आठवीं कक्षा में था तब उस समय मेरे पास मोहल्ले में कॉमिक्स का सबसे बड़ा कलेक्शन था, तकरीबन डेढ़ हज़ार नई-पुरानी कॉमिक्स जिनको मैंने लगभग चार सालों में इकट्ठा किया था!!
लेकिन फिर कुछ कॉमिक्स चूहे कुतर गए, घर बदला तो कई सारी फट गई। नानी जी के घर के पास घर लिया तो इधर जिससे कॉमिक्स किराए पर लाता था उसको कई सारी कॉमिक्स बेच दी, मन बहुत दुखी हुआ था उस समय लेकिन रखने की जगह नहीं थी और फटवाने से अच्छा था कि उनको ऐसे व्यक्ति को दे दिया जाए जो कम से कम थोड़ी तो उनकी कद्र करेगा। कुछेक कॉमिक्स आज भी घर में कहीं किसी कोने में एक बोरे में दबी पड़ी होंगी क्योंकि सभी तो मैंने ठिकाने नहीं लगाई थीं।
मेरा कॉमिक्स पढ़ने का सिलसिला 2003-2004 में बंद हुआ। उस समय मैं जिससे कॉमिक्स किराए पर लाता था वह लड़का(लगभग मेरी ही उम्र का था) कुछ ज़्यादा ही स्याना बनता था अपने को(जबकि उसको मैंने कई बार शेन्डी लगाई थी, कैसे यह फिर कभी) और किराए के औने-पौने दाम अपनी मर्ज़ी से लगाने लगा था, इसी गड़बड़ पर आखिर एक दिन उससे मेरी बहस हो गई और मैंने उसके पास जाना ही बंद कर दिया। अभी हाल ही में एक अन्य स्टॉल पर एक अंकल जी से पत्रिकाएँ आदि लेता हूँ तो उन्होंने कॉमिक्स रखनी शुरु की तो पढ़ने का सिलसिला फिर चल निकला है, जब वे कॉमिक्स लाते हैं तो अपन भी पढ़ लेते हैं!!
चिट्ठाकार गूगल समूह में कॉमिक्स की बात क्या चली कि सभी को अपने दिन याद आ गए। इससे पहले तकरीबन दो साल पहले प्रतीक बाबू ने अपने अड्डे पर पोस्ट ठेल के सबको दिन याद दिलाए थे। पर इस बार तो यह शायद मियादी बुखार की तरह फैले, जीतू भाई और रवि जी अपने-२ अड्डों पर पोस्ट ठेल चुके हैं, एक मैंने भी यहाँ यह ठेल दी है, आगे पता नहीं कौन-२ चपेट में आता है।
हाँ तो अब जीतू भाई तथा रवि जी तो ठहरे बुजुर्ग लोग, बाबा आदम के ज़माने की बातें बता रहे हैं इंद्रजाल कॉमिक्स आदि की(अपने टैम में तो न इंद्र शेष रहे न ही उनका जाल) तो मेरे जैसे छोकरों को भी पढ़ मज़ा आ गया कि अपने टैम में ये लोग कैसे-२ कांड(रवि जी तो शरीफ़ इंसान हैं, सिर्फ़ जीतू भाई) किए रहे!!
खैर, अपन भी इनके बाद के समय के हैं तो कम तो किसी हालत में न थे।

तो हुआ यूँ कि मेरे को कॉमिक्स का पहली बार पता चला जब मैं तीसरी कक्षा में पढ़ता था; तब तक मैं बहुत सीधा-साधा था और बुरी लतों(जैसे कॉमिक्स पढ़ना) का कोई अनुभव न होने के कारण उल्टी-सीधी हरकतों से बचा हुआ था। एक दिन कॉमिक्स का पता चला(अब याद नहीं कैसे) कि ये अख़बार में आती हैं तो अख़बार में उनको देखता, पढ़ने में तो कोई इतनी रुचि नहीं थी तो सिर्फ़ चित्र देख समझता था कि क्या है। फिर पता चला कि घर के पास वाले एक दुकानदार का लड़का अपनी कॉमिक्स किराए पर देता है, तो जाकर पचास पैसे प्रति कॉमिक की किराए दर पर एक-दो कॉमिक्स घर लाया, किस किरदार की थी यह पता नहीं बस पन्ने उलटने लगा। माँ ने कहा भी कि ये क्या लाया हूँ और बिना पढ़े क्यों पन्ने पलट रहा हूँ तो डाँट से बचने के लिए कह दिया कि सब समझ आ रहा है। एक बार लाकर दोबारा मन न हुआ कॉमिक्स लाने का; आखिर रोज़ का एक रुपया जेबखर्च मिलता था सिर्फ़ और उसमें ऐसे कॉमिक्स पढ़ डाली तो कैसे चलता, टॉफी कहाँ से आती फिर, क्योंकि तीसरी कक्षा में आते ही जेबखर्च मिलना शुरु हुआ था और माँ ने बाज़ार में टॉफियाँ आदि दिलाना लगभग बंद कर दिया था(पहले ही यह कह कम दिलाती थीं कि दांत खराब हो जाएँगे)। पापा के साथ अलग बात थी, उनके साथ कभी बाज़ार निकल लेता था(बहुत मेहनत का और कष्टकारी काम था, छुट्टी वाले दिन सुबह-२ सात बजे उठ के जाना पड़ता था क्योंकि वे उसी समय जाते थे) तो फिर चॉकलेट से कम में तो टलता ही न था!!
खैर, एक दिन चाचा चौधरी की एक कॉमिक्स मोहल्ले के किसी लड़के से पढ़ने को मिल गई, मोटी डाइजेस्ट थी, तो उसे पढ़ा। पढ़कर मज़ा आया तो बचाए हुए जेबखर्च में से पैसे खर्च कर किराए पर चाचा चौधरी, पिंकी, बिल्लू की कॉमिक्स पढ़ने लगा, पर उस दुकानदार के लड़के के पास अधिक कॉमिक्स नहीं थी और जल्द ही वह अपने लिए बेकार हो गया, आजू-बाजू कोई अन्य कॉमिक्स न बेचता था न ही किराए पर देता था।
कुछ दिन बाद दुविधा का समाधान तब हुआ जब मैं और मोहल्ले का एक लड़का थोड़ी दूर दूसरे मोहल्ले में घूम रहे थे और एक रेहड़ी पर दुकान लगाए व्यक्ति को देखा जो कि हर तरह का सामान बेच रहा था – कंघी, शीशे, रुमाल, चेन, पर्स आदि। उसके पास कॉमिक्स दिखी तो उससे बात की, उसने किराए पर देने से साफ़ मना कर दिया, पुरानी कॉमिक्स उसके पास थीं जिनको वो सस्ते में देने को तैयार था। मरते क्या न करते, उससे एकाध कॉमिक्स खरीद ली। उसने आश्वासन दिया कि जब हम इनको पढ़ लें तो उसको ये कॉमिक्स वापस कर सकते हैं, दो रुपए प्रति कॉमिक्स वह काट के वापस ले लेगा और बदले में दूसरी कॉमिक्स दे देगा, यह सुन हमने राहत की सांस ली।
अगले कुछ महीनों में डॉयमण्ड कॉमिक्स के किरदार चाचा चौधरी, पिंकी, बिल्लू, ताऊजी, राजन इकबाल और फौलादी सिंह पढ़े। फौलादी सिंह कुछ सुपरमैन टाइप किरदार था जिसकी साइंस फिक्शन कॉमिक्स होती थी जिनमें विलेन हमेशा कोई न कोई परग्रही ऐलियन होता था। इसका जोड़ीदार होता था लम्बू नाम का किरदार जो कि साइज़ में इतना छोटा था कि एक हथेली पर खड़ा हो जाए पर जिसके शरीर का घनत्व इतना था कि पूछो ही मत!!
इनको वैज्ञानिक शक्तियाँ देने वाले और इनके सहायक थे एक प्रोफेसर साहब और ये लोग एक टापू पर अपना मुख्यालय बनाए हुए थे।

ऐसे ही एक अन्य किरदार जो पसंद था उनका नाम था ताऊजी। इनकी कॉमिक्स में थोड़ा जादू-टोना होता था, ताऊजी भी तंतर-मंतर के जानकार थे और पास में था एक जादुई डंडा जो अच्छे अच्छों को डंडा दे सकता था। ताऊजी के साइडकिक का नाम याद नहीं आ रहा पर उसकी दाढ़ी खूब लंबी हो सकती थी, जादुई थी और कटती नहीं थी किसी चीज़ से। सोचो यदि इस दाढ़ी के बालों का प्रयोग पतंग उड़ाने के लिए किया जाता तो होती किसी की मजाल कि पतंग काट हमें “आई वो काटा” कह जाता!!
खैर, तो अपन उस रेहड़ी वाले से कॉमिक्स लाते रहे, लेकिन दो रुपए प्रति कॉमिक्स देना बहुत भारी लगता था तो उसका जुगाड़ यह निकाला गया कि साथ के अन्य लड़कों को कॉमिक्स पढ़ाई जाती और उनसे हर कॉमिक्स के लिए एक अठन्नी ली जाती, इससे हमारे दो रुपए वसूल हो जाते क्योंकि तीन-चार लड़कों को तो पढ़ा ही देते थे। लेकिन ये पढ़ाने का सिलसिला ज़्यादा न चला तो उसके बाद पैसे अपनी जेब से ही दिए, इसलिए जेबखर्च में पैसे बचाने की आदत डाली। घर में यदि माँ से कॉमिक्स के पैसे माँगता तो डर था कि पापा से न कह दें और यदि पापा को कह दिया तो पापा ने सीधा कान के नीचे एक ज़ोरदार बजाना था और बोलना था
कमबख्त, पढ़ाई लिखाई होती नहीं और कॉमिक्स में लगा रहता है
और फिर कहीं हफ़्ते भर के लिए घर से निकलना बंद न हो जाए, बस यही सोच सिहरन दौड़ जाती बदन में और इसलिए न माँ से पैसे माँगे और पापा से तो कहने का मतलब ही नहीं था। अब ऐसा भी नहीं था कि पापा से पिटाई ही होती थी, पापा का मामला ज़रा एक्सट्रीम केस वाला था, गलत बात(उनकी नज़र में) पर जहाँ पिटाई तुरंत होती थी(गालियाँ बोनस में) वहीं मूड में होते थे तो फरमाईश भी जल्दी पूरी होती थी, यानि कुछ-२ कह लो भोले भंडारी शिव की तरह – नाराज़ हुए तो तांडव और खुश हुए तो मुँह माँगा वरदान, इसलिए पापा से मैं कुछ उनका मूड देखकर ही बोलता था, फरमाईश पूरी हो या न हो लेकिन पिटाई करवाने का मैं खास तमन्नाई नहीं होता था।
तो ऐसे ही एक बार की बात है, छुट्टी का दिन था और शाम को पापा बाज़ार जा रहे थे तो मैं भी उनके साथ हो लिया, वे अपने किताब-मैगज़ीन वाले के पास पहुँचे अपनी महीने की पत्रिकाएँ और उपन्यास लेने तो मेरी नज़र जम्बू की (नई)कॉमिक्स पर पड़ी तो बस वहीं ज़िद पकड़ ली कि कॉमिक्स दिलवाई जाए। अब पापा मूड में थे(तभी तो मैं उनके साथ बाज़ार आया था) इसलिए थोड़ी ज़िद में पसीज गए और उस शाम मैं घर वापस बहुत खुशी-२ आया कि नई कॉमिक्स मिल गई और मेरी जमापूंजी में भी कोई कमी नहीं आई, माँ ने कॉमिक्स देखी तो उनकी भृकुटी चढ़ी और पापा से जवाब तलबी हुई कि काहे कॉमिक्स दिलाई तो पापा ने भी कंधे उचका दिए जैसे बोलना चाह रहे हों कि क्या करता ये तो वहाँ पसर गया था और लिए बिना टल नहीं रहा था!!
अरे, बतियाते-२ इतना समय हो गया पता ही नहीं चला!! चलिए इस बारे में अगले भाग में आगे बतियाएँगे, प्रतीक्षा कीजिए। किस्सा-ए-कॉमिक्स यहाँ जारी है।