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Archive for March, 2008


….. और मच गई लूट


March 7th, 2008 | 3 Comments

नई टेक्नॉलोजी जब आती है तो कई बार विकल्पों के साथ आती है, कम से कम डाटा स्टोरेज और वीडियो स्टोरेज के मामले में ऐसा कहा जा सकता है। और जब एक ही चीज़ के भिन्न प्रकार हों तो होता है उनमें युद्ध – विजेता का हो जाता है एकाधिकार – क्योंकि एक से अधिक तलवारें एक म्यान में नहीं रह सकती।

कैसा युद्ध? अब मैंने तो सिर्फ़ पिछली बार के युद्ध के बारे में पढ़ा ही है क्योंकि अपन युद्ध के अंतिम दिनों में पैदा हुए थे और जब तक अपने को कुछ समझ आती तब तक युद्ध समाप्त हो चुका था। यह युद्ध था सोनी(Sony) और जेवीसी(JVC) के बीच वीडियो रिकॉर्डिंग फॉर्मेट(format) के कारण। सोनी(Sony) ने सन्‌ 1975 में निकाला बीटामैक्स (Betamax) का वीडियो कैसेट और उसके एक वर्ष बाद जेवीसी(JVC) ने निकाला अपना वीएचएस (VHS) वीडियो कैसेट। क्या किसी को याद आ रहा है कि विजयी कौन हुआ था? ;) लगभग एक दशक तक चली इस टेक्नॉलोजी की लड़ाई में आखिरकार जेवीसी(JVC) की तकनीक विजयी हुई और सोनी(Sony) का बीटामैक्स(Betamax) पिट गया। उसके बाद तकरीबन अगले एक दशक तक हर ओर वीएचएस(VHS) का राज रहा। डिजिटल टेक्नॉलोजी आई तो पहले आई वीडियो सीडी(Video CD) और फिर डीवीडी(DVD)। इस डीवीडी(DVD) में भी कई लोचे रहे, एक फॉर्मेट था DVD R+ और दूसरा DVD R- था, पर खैर इनके लोचे से आगे बढ़ते हैं।

डीवीडी(DVD) पर गाड़ी सही जा रही थी लेकिन स्टोरेज और क्वालिटी की बढ़ती माँग एक अंधे कुएँ की भांति है जिसको जितना पाटने का प्रयास करो वह उतना ही खाली दिखाई देने लगता है। तो 4.5GB की क्षमता वाली डीवीडी(DVD) की औकात से अधिक का कोई जुगाड़ चाहिए था जिसका उपाय प्रस्तुत करा तोशीबा(Toshiba) और सोनी(Sony) ने। दोनों ने अलग-२ उपाय प्रस्तुत करे; तोशीबा(Toshiba) का उपाय था एचडी-डीवीडी(HD-DVD) के रुप में जबकि सोनी(Sony) का उपाय था ब्लू-रे(Blu-Ray) डिस्क के रुप में। एक बात जो सोनी(Sony) ने जेवीसी(JVC) के साथ अपने पिछले युद्ध से सीखी थी वह यह कि अधिक क्षमता में दम-खम होता है। पिछली बार के युद्ध में सोनी(Sony) की हार का कदाचित्‌ एक मुख्य कारण यह भी था कि उसके बीटामैक्स(Betamax) कैसेट की क्षमता सिर्फ़ एक घंटे की थी जबकि जेवीसी(JVC) के वीएचएस(VHS) कैसेट की क्षमता तीन घंटे की थी। तो इस बार सोनी(Sony) पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतरा और छिड़ गई जंग।

तोशीबा(Toshiba) की एचडी-डीवीडी(HD-DVD) की क्षमता एक लेयर वाली डिस्क पर 15GB और दो लेयर वाली डिस्क पर 30GB थी। चूंकि इस बार सोनी(Sony) पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतरा था, तो उसने ब्लू-रे(Blu-Ray) डिस्क पर क्षमता एक लेयर वाली डिस्क पर 25GB और दो लेयर वाली डिस्क पर 50GB निकाली। इस बार भी पिछली बार की भांति खेमे बंट गए, कुछ हॉलीवुड स्टूडियो तोशीबा के साथ हो लिए तो कुछ सोनी के साथ। कम क्षमता का होते हुए भी तोशीबा की तकनीक का लाभ यह था कि वह सोनी की तकनीक से सस्ती थी; आखिरकार महंगाई और सोनी अब पर्यायवाची लगते हैं!! ;) हॉलीवुड के स्टूडियो जिस खेमे की ओर थे उसके फॉर्मेट में उन्होंने अपनी फिल्में बाज़ार में उतारनी शुरु की, सोनी के प्लेयर महंगे थे और तोशीबा के सस्ते। लेकिन इस बार पलड़ा सोनी की ओर धीरे-२ झुकता जा रहा था और बाज़ी तोशीबा के हाथों से निकलती जा रही थी। आखिरकार तोशीबा के ताबूत में आखिरी कील ठोकी वार्नर ब्रदर्स (Warner Bros.) ने जब यह नामी और बड़ा स्टूडियो दल बदल सोनी की ओर चला गया। इसके साथ ही तोशीबा को समझ आ गया कि जंग खत्म हो गई है और सोनी जीत चुका है, तो उसने अपनी हार और एचडी-डीवीडी को रद्द करने की घोषणा कर दी। यानि कि अब अगली पीढ़ी का फॉर्मेट सोनी का ब्लू रे होगा।

अब यहाँ तक तो ठीक है पर वो लूट वाली क्या बात है? तो जनाब मामला यूँ है कि तोशीबा के हाथ खड़े करते ही ईबे(ebay) जैसे बाज़ारों में एकाएक ही एचडी-डीवीडी प्लेयरों और फिल्मों की एचडी-डीवीडी की बाढ़ आ गई है; इससे पहले कि सबको पता चले कि यह टेक्नॉलोजी कूड़े के डब्बे की ओर अग्रसर है, विक्रेता अपने माल के जितने मिल सकें उतने पा लेना चाहते हैं, क्योंकि भागते चोर की लंगोट ही अच्छी!! ;) तो यही कारण है कि जिन एचडी-डीवीडी फिल्मों की एक डिस्क 30 डॉलर में बिक रही थी वैसी ही तीन नई डिस्क 300 डॉलर में बिक रहे एचडी-डीवीडी प्लेयर के मॉडल के साथ अब ईबे(ebay) पर 79 डॉलर में जा रही हैं। यानि कि जो माल पहले लगभग 400 डॉलर की औकात का था वह अब कीमत के पाँचवें हिस्से में जा रहा है। और यह पुराने इस्तेमाल किए हुए माल का दाम नहीं है वरन्‌ एकदम नए सील लगे माल का दाम है!! :-o ऐसे ही 500 डॉलर में बिकने वाला तोशीबा का एक अन्य एचडी-डीवीडी प्लेयर अब लगभग 150 डॉलर में बिक रहा है। इसी प्रकार जिन एचडी-डीवीडी फिल्मों की एक डिस्क 30 डॉलर में बिक रही थी वे अब 6 से 8 डॉलर में बिक रही हैं।

और ऐसा भी नहीं है कि इनको खरीदने वाला कोई नहीं है, इनको खरीदने वालों में लूट मची हुई है और ये सब धड़ाधड़ बिक रहा है। कोई पूछे तो क्यों बिक रहा है? जब उस चीज़ की किस्मत में कूड़े का डिब्बा लिखा जा चुका है, उसके रचयिता तक ने उससे हाथ झाड़ लिए हैं तो क्यों लोग उस चीज़ को हाथो-हाथ ले रहे हैं? खरीदने वालों में दो तरह के लोग हैं; पहले वे हैं जिन तक अभी इस युद्ध के अंत की खबर ही नहीं पहुँची है और वे सोच रहे हैं कि आखिरकार उनकी किस्मत का छप्पर फट गया है, दूसरे वे लोग हैं जिनको युद्ध की समाप्ति का पता तो है पर वे इस लूट में अपना लाभ देख रहे हैं। पहले प्रकार को तो जाने दीजिए, लेकिन दूसरे प्रकार का क्या? इसमें उनका क्या लाभ? तो जनाब मामला यूँ है कि एक्सक्लूसिव अनुबंधों के कारण जो स्टूडियो जिस खेमे में था वह सिर्फ़ उसी के फॉर्मेट में अपनी फिल्में निकाल रहा था। तो यानि कि जो तोशीबा के खेमे में था वह अपनी फिल्मों की हाई डेफिनिशन(High Definition) डिस्क सिर्फ़ एचडी-डीवीडी में निकाल रहा था। अब तो वैसे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि अब तो उन स्टूडियों की फिल्में भी ब्लू-रे में आएँगी लेकिन आते-आते आएँगी जिसमें कुछ समय लगेगा। तो संग्रहकर्ताओं के लिए यह एक अच्छा मौका है सस्ते में अपने संग्रह के लिए फिल्मों की हाई डेफिनिशन(High Definition) डिस्क जुगाड़ने का। कोरियाई एलेक्ट्रॉनिक्स निर्माता एलजी(LG) ने कुछ समय पहले अपना एक प्लेयर निकाला था जो कि एचडी-डीवीडी तथा ब्लू-रे दोनों ही चला सकता था, तो वह प्लेयर जिनके पास है उनको तो कोई फर्क पड़ेगा ही नहीं और वे तो आराम से कौड़ियों के दाम मिलती फिल्मों की एचडी-डीवीडी खरीद सकते हैं, आखिरकार एचडी-डीवीडी तो अब साधारण डीवीडी(DVD) से भी सस्ते दाम में मिल रही हैं। 8)

लेकिन असल कष्ट तो उन लोगों को होगा जिन्होंने एचडी-डीवीडी प्लेयर खरीद रखे हैं पहले से महंगे दामों में, और दर्द होगा माइक्रोसॉफ़्ट एक्सबॉक्स(Microsoft XBox) के लिए एचडी-डीवीडी प्लेयर और एचडी-डीवीडी गेम डिस्क लेकर बैठे वीडियो गेम के रसियों को। जब माइक्रोसॉफ़्ट ब्लू-रे के प्लेयर निकालेगा एक्सबॉक्स(XBox) के लिए तो उनको उसे पाने के लिए पुनः रोक़ड़ा लगाना होगा।

और सोनी? सोनी की तो बन आई है, पिछली बार की हार से सीखे सबक कदाचित्‌ इस बार काम आए, तभी ज़्यादा औकात वाला फॉर्मेट लाए और जमकर पब्लिसिटी की उसकी, नतीजन इस बार विजयी रहे।


ब्लॉगों की गली में टॉप 100 ब्लॉग


March 6th, 2008 | 18 Comments

यह ब्लॉगस्ट्रीट क्या है जी? किस तरह के ब्लॉगों की गली है? भारतीय ब्लॉगों की गली है या हर तरफ़ के ब्लॉगों की? इसकी एक शीर्ष के 100 ब्लॉगों की सूची है और एक 100 सबसे अधिक प्रभावशाली ब्लॉगों की

अब इसकी 100 सबसे अधिक प्रभावशाली ब्लॉगों की सूची में तो न अपन हैं और न ही कोई अन्य हिन्दी ब्लॉग, पर शीर्ष के 100 ब्लॉगों की सूची में मेरा ब्लॉग भी है और अन्य तीन हिन्दी ब्लॉग भी हैं। हिन्दी का जो ब्लॉग सबसे ऊपर है वह है रवि जी का ब्लॉग 32वें स्थान पर, उसके बाद 62वें स्थान पर विराजमान है समीर जी की उड़नतश्तरी, तत्पश्चात 82वें स्थान पर है मेरा वर्डप्रैस.कॉम वाला ब्लॉग, और अंतिम हिन्दी ब्लॉग है 83वें स्थान पर अक्षरग्राम

क्या हुआ, कैसे आया आदि मुझ से न पूछना, मुझे तो इस वेबसाइट का पता भी न था तो इस पर अपना ब्लॉग लिस्ट कराना और टॉप की सूची में कोई जुगाड़ बिठाने का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता!! ;)


ठग बैंक और उनके धोखेबाज़ कर्मचारी


March 5th, 2008 | 7 Comments

अजय के अनुभव के बारे में जाना कि कैसे एबीएन ऐमरो (ABN Amro) बैंक के कर्मचारियों ने उनको ठगा। यह पढ़ मुझे लगता है कि अच्छा ही है कि मैंने हर बार एबीएन ऐमरो (ABN Amro) से फोन आने पर कॉल डिसकनेक्ट की। अभी कुछ दिन पहले ही उनके कॉलसेन्टर से फोन आने शुरु हुए थे कि कार्ड ले लो वगैरह और फिर आखिरकार मुझे कड़क होकर यह कहना पड़ा कि आइन्दा यदि फोन आया तो हैरेसमैन्ट (harassment) की शिकायत पुलिस में दर्ज करवा दूँगा। यह धमकी देने के बाद फोन आने बंद हुए।

लेकिन अजय के साथ घटे इस धोखाधड़ी के वाकये को पढ़ मुझे अभी कुछ महीने पहले का वह वाकया याद आया जब अमेरिकन एक्सप्रैस बैंक (American Express Bank) के एक ठग ने मुझे चूना लगाने का प्रयास किया था। हुआ यूँ कि एक दिन फोन आया और दूसरी तरफ़ से एक मोहतरमा मीठी आवाज़ बनाते हुए बोली कि वह अमेरिकन एक्सप्रैस बैंक से बोल रही है और वे लोग मुझे अपने बैंक का क्रेडिट कार्ड (Credit Card) मुफ़्त में देना चाहते हैं जिसका आजीवन कोई शुल्क नहीं है, क्या वह अपने एक्ज़ीक्यूटिव को भेज दे। मैंने सोचा कि ले लेते हैं, क्या हर्ज़ है, कलेक्शन में अमेरिकन एक्सप्रैस का भी कार्ड आ जाएगा, तो मैंने कह दिया कि भेज दें अपने विक्रेता को!! ;) 8)

आश्चर्य की बात कि तीस मिनट के भीतर ही उनका बंदा आ पहुँचा, एक सरदार जी पधारे। कार्ड के बारे में जानकारी प्राप्त करने के उद्देश्य से मैंने पूछा कि कार्ड पर कितना बिल बिठाना होगा साल का कि वह निशुल्क रहे तो सरदार जी ने कहा कि न्यूनतम साठ हज़ार रुपए का बिल ही बिठाना होगा सालाना। अमेरिकन एक्सप्रैस जैसा बैंक और सिर्फ़ इतनी सी माँग? इतने बुरे दिन आ गए क्या इनके भी? यह सोच मैंने उनसे कहा कि मेरे को कार्ड का ब्रोशर (brochure) दिखाएँ क्योंकि यह मुझे पता था कि इन लोगों की बातों पर कभी सीधे-२ विश्वास नहीं करना चाहिए, इनकी ज़ुबान की कोई कीमत नहीं होती सिर्फ़ लिखित रुप में कही बात की कीमत होती है। ब्रोशर पर नज़र गई तो मामला साफ़ हो गया, उसमें एक कोने पर नीचे बहुत ही बारीक अक्षरों में लिखा था कि सालाना कम से कम एक लाख बीस हज़ार रूपए की बिलिंग (billing) कार्ड पर होनी अनिवार्य है अन्यथा सालाना शुल्क देना होगा। यह मैंने उन सरदार जी को दिखाया और पूछा कि इसका क्या मतलब है तो उन्होंने हैरानी दिखाई(घटिया अभिनय था, मैं उससे भी ज़्यादा बेहतर हैरान होकर दिखा सकता था) और कहा कि उनका विश्वास करूं वो गलत छपा हुआ है और सिर्फ़ साला साठ हज़ार ही चढ़ाने होंगे कार्ड पर। मैंने उनसे कहा कि अपने क्रेडिट कार्ड विभाग के कॉल-सेन्टर में फोन लगाएँ और मेरी बात किसी ऐसे व्यक्ति से कराएँ जिसको इसकी जानकारी हो। फोन उन्होंने उन्हीं मोहतरमा को लगाया जिनका मुझे फोन आया था और उन मोहतरमा ने भी आश्वासन देने का प्रयास किया कि सालाना साठ हज़ार रूपयों की ही बिलिंग दरकार है और ब्रोशर पुराना है।

अब तक मुझे विश्वास हो चुका था कि ये कमबख्त कमीशन और अपनी नौकरी बचाने के चक्कर में धोखा दे कार्ड बेचने वालों में से एक हैं तो मैंने भी तय कर लिया कि समय तो खराब हो ही गया है इन मोहतरमा की क्लास लेनी पड़ेगी। :evil: तो मैंने मोहतरमा से कहा कि ब्रोशर पुराना है तो मुझे नया दिखाएँ; किसी भिखारी की बात नहीं है वरन्‌ अमेरिकन एक्सप्रैस जैसे बड़े बैंक की बात है जो कि बदलाव होने पर नया प्रोमोशनल (promotional) माल तुरंत छपवाते हैं, तो मोहतरमा टालने का प्रयत्न करने लगी और फिर आश्वस्त करने का प्रयास करने लगीं। :roll: इस पर मैंने कहा कि मोहतरमा की ज़ुबान की क्या कीमत है वह बताएँ। कल को बैंक की तरफ़ से मुझे फ़रमान आ जाता है कि आपने साठ हज़ार की बिलिंग की जबकि आपको सवा लाख की करनी थी तो इसलिए शुल्क दीजिए तो क्या मोहतरमा अपनी जेब से देंगी? और यदि जो मोहतरमा कह रही हैं वो बात सच है तो क्या मोहतरमा लिखित रूप से दे सकती हैं यह बात? इस पर पुनः मोहतरमा ने मना किया कि लिखित तो नहीं दे सकती लेकिन आश्वासन देने लगीं कि उनकी बात सही है। इस पर मैंने सारी खीज मोहतरमा पर निकाल दी कि आखिर वे कहाँ की फन्ने खाँ हैं कि उनकी मैं उस बात पर विश्वास कर लूँ जिसे वो सिर्फ़ मौखिक रूप से दे रही हैं और जिसको लिखित रूप में देने में उनको हुज्जत है। आखिरकार मैंने कहा कि ज़्यादा स्यानापन न दिखाएँ, फोन कॉल रिकॉर्ड कर मैं उन पर धोखेबाज़ी का मुकदमा भी ठोक सकता हूँ, और यह कह मैंने फोन बंद किया। सरदारजी चुपचाप मेरी ओर देख रहे थे तो उनको भी मैंने यह कह चलता किया कि मुझे कार्ड वगैरह नहीं लेना इसलिए पतली गली से कट लें। :-x

ऐसे बहुत से लोगों के अनुभव सुने/पढ़े हैं जहाँ वे इस तरह के झांसे में आ जाते हैं और बाद में पछताते हैं। इसका सीधा सा कारण यह है कि वे फाइन प्रिंट नहीं पढ़ते और इन धोखेबाज़ों के चंगुल में आ जाते हैं।

क्या आपके साथ भी ऐसा कोई वाकया घटा है?


लेट्स कनेक्ट


March 4th, 2008 | 2 Comments
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पहले तो साथी ब्लॉगर अजय जैन को उनकी पहली किताब – लेट्स कनेक्ट: यूज़िंग लिंक्डइन टू गेट अहेड एट वर्क (Let’s Connect: Using Linkedin to get ahead at work) – छपने पर बधाई। आज की तारीख़ में लिंक्डइन (Linkedin) सबसे अधिक प्रसिद्ध प्रोफेशनल नेटवर्किंग (professional networking) वेबसाइट है। यहाँ प्रोफेशनल से मेरा अर्थ व्यवसायिक है। इससे पहले और बाद में अभी तक जितनी भी नेटवर्किंग वेबसाइट आई हैं वे या तो सोशल नेटवर्किंग(social networking) वेबसाइट हैं(जहाँ आप मित्र बनाते हैं एवं पुराने मित्रों के संपर्क में रहते हैं) अथवा डेटिंग वेबसाइट(dating website) हैं। लिंक्डइन (Linkedin) एक ऐसी वेबसाइट आई जिसका मकसद जीवन के कामकाज़ी आयाम में नेटवर्किंग कराना है, यहाँ आप अपनी प्रोफाइल बना अभी तक के अपने काम-काज़ी जीवन का अनुभव का ब्यौरा डालते हैं, यानि कि एक तरह से अपना रिज़्यूमे (Resumé) डालते हैं, अपने मित्रों, परिचितों तथा (वर्तमान एवं भूतकाल के)सहकर्मियों आदि का नेटवर्क बनाते हैं। इसी तरह के अपने तथा मित्रों आदि के नेटवर्क से होते हुए कोई आपको नौकरी देने की पेशकश कर सकता है या आपको सह-भागी बना किसी काम की पेशकश भी कर सकता है।

आज की तारीख में लिंक्डइन (Linkedin) के लगभग डेढ़ करोड़ प्रयोक्ता हैं, दुनिया भर के प्रोफेशनल इस नेटवर्क पर एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। आलम यह है कि माइक्रोसॉफ़्ट के संस्थापक बिल गेट्स की भी इसमें रुचि है और वे इसे प्रमोट भी कर रहे हैं। एशिया-प्रशांत क्षेत्र (asia pacific region) में इसके सबसे अधिक प्रयोक्ता भारत से हैं। हालांकि लिंक्डइन (Linkedin) पर हर तेइस मिनट में एक प्रयोक्ता बढ़ता है फिर भी बहुतों को इस वेबसाइट का अपने करियर के लिए सही प्रयोग करना नहीं आता।

तो अजय की किताब यहाँ कहाँ फिट बैठती है? अजय की किताब यूँ फिट बैठती है कि इसमें अजय ने बताया है कि लिंक्डइन (Linkedin) का कैसे अपने लाभ के लिए प्रयोग किया जा सकता है। क्या वाकई ऐसा है? पता नहीं, मैं अभी नहीं जानता कि अजय के द्वारा लिखी यह किताब कैसी है। कल ही समीक्षा के लिए इसकी एक प्रति मुझे प्राप्त हुई है, तो इसको पढ़कर ही इसकी समीक्षा प्रस्तुत करूँगा कि यह किताब कैसी है और कितने पानी में है। 8)

वैसे एक बात यह तो तय है कि लिंक्डइन (Linkedin) एक बहुत ही कारगर टूल साबित हो सकता है यदि उसका प्रयोग सही तरीके से किया जाए तो। अपने अनुभव से बता रहा हूँ, उस पर अपनी प्रोफाइल डालने के 3 सप्ताह में ही मुझे नौकरी के 2 ऑफर मिले थे जो कि थोड़ी आश्चर्यजनक बात थी मेरे लिए क्योंकि इससे यही लगा कि काम-काज़ के सिलसिले में नेटवर्क करने के लिए यह वेबसाइट वाकई सही है। :)


ई है हमार नया अड्डा


March 2nd, 2008 | 16 Comments

कोई सवा दो वर्ष पहले, अक्तूबर 2005 में, मैंने वर्डप्रैस.कॉम पर अपना ब्लॉग उस समय रजिस्टर किया था जब वह बाज़ार में आई नई सेवा थी और उस समय की अन्य नई सेवाओं की भांति बिना न्योते के उस पर भी खाता नहीं बनाया जा सकता था। तब मैंने भी अपना ईमेल पता वहाँ कतार में लगाया था और कुछ समय बाद मुझे वह गोल्डन टिकिट मिला था जिससे मैंने वहाँ वह ब्लॉग बनाया था। उस समय इरादा तो उस पर कुछ करने का नहीं था सिवाय कुछ टैस्टिंग आदि करने के कि देखें वह क्या बला है और कितना अच्छा है। लेकिन फिर देवेन्द्र पारिख के हिन्दी राइटर का पता चला तो मैंने सोचा कि चलो एक ब्लॉग हिन्दी में बना लें, हिन्दी लिखने का अभ्यास जो दसवीं कक्षा के बाद छूट गया था वह वापस आ जाएगा, और यह सोच मैंने एक माह बाद अपना वह प्रथम हिन्दी ब्लॉग आरंभ किया था।

पता ही नहीं चला कैसे ये सवा दो साल बीत गए और मैं वहाँ पर लिखता रहा, हिन्दी ब्लॉगरों की बिरादरी का हिस्सा बना, साथी ब्लॉगरों का स्नेह भी मिला और गालियाँ भी मिली। :)

उस ब्लॉग पर 208 पोस्ट लिखीं जिन पर अभी तक 1750 से अधिक टिप्पणियाँ आ चुकी हैं। अब काफ़ी सोच विचार के बाद निर्णय लिया है कि वह दुकान बढ़ा दी जाए। जितना चला उतना अच्छा था, उसमें मज़ा आया, विचार तो मैं काफ़ी समय से कर रहा था पर आज मन बना ही लिया है। पर मैं ब्लॉगिंग नहीं छोड़ रहा ना ही लोगों को अपनी नज़र से दुनिया दिखाने का ख्याल तजा है!! बस यह निर्णय लिया है कि उस ब्लॉग को वर्डप्रैस.कॉम के फोकटी ठिकाने से आखिरकार अपने डोमेन पर स्थानांतरित कर दिया जाए और यह है उस ब्लॉग का नया ठिकाना। :)

तो अब से मेरी नज़र से दुनिया देखिए इस नए नवेले नए रुप में उभरे ब्लॉग पर। जिन लोगों ने इस ब्लॉग की फीडबर्नर वाली फीड को सब्सक्राइब किया हुआ है या ईमेल द्वारा सब्सक्रिप्शन लिया हुआ है उनको इस बदलाव से कोई फर्क नहीं पड़ेगा, बाकी सभी से गुज़ारिश है कि अपने-२ बुकमार्क आदि अपडेट कर लें और इस नए अड्डे पर आवाजाही बनाए रखें। :)


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