बुडापेस्ट में हवाखोरी करके वापस आए तीन महीने से थोड़ा अधिक समय बीत चुका है। इन तीन महीनों में कहीं हवाखोरी तो छोड़िए, घर से भी अधिक निकलना नहीं हुआ है, दफ़्तर के काम में इतना व्यस्त हो गया कि चार-पाँच घंटे सोना और फिर काम में लग जाना, वीकेन्ड को तो भूल ही जाओ! थोड़ा बहुत समय मिलता तो ब्लॉग नाम का कीड़ा काटता, पढ़ने से अधिक लिखकर अपनी फ्रसट्रेशन (frustration) का इलाज किया जाता। छह महीने के काम को तीन महीने में करना वाकई पागलपन है। अब मामला थोड़ा संयत होने लगा है, कल शाम को सॉफ़्टवेयर में एक और बग (bug) का समाधान निकाला, लेकिन अब आलस्य आ रहा था, घड़ी देखी तो जाना कि रात हो गई है, अब सोमवार को पैबंद (patch) लगाया जाएगा यह सोच बॉस को स्टेटस रिपोर्ट ईमेल करने जा रहा था। मन सोच रहा था कि चलो अब कम से कम दो दिन आराम मिलेगा, वीकेन्ड है कहीं नहीं जाना है इसलिए पूर्ण रूप से आराम किया जाएगा और फिर रविवार शाम को एक बंगाली मित्र ने अपने दौलतखाने पर तशरीफ़ लाने का न्यौता दिया है, वहाँ दुर्गा पूजा के लिए लग चुके पंडाल देखे जाएँगे, फोटू ली जाएँगी, एक से बढ़कर एक सजी धजी बंगाली सुन्दरियाँ होंगी….., तो ले जाएँगे तशरीफ़ वहाँ!! 😎

यह सब सोच मन थोड़ा प्रसन्न था और रिलैक्स मूड में आ रिया था कि तभी मानो यमदूत की भांति बॉस मेसेन्जर (messenger) पर प्रकट हुआ। मैंने सोचा कि चलो ईमेल की ज़हमत बची, अब यहीं इसको स्टेटस ठेल दिया जाए और जान छुड़ाई जाए। लेकिन निर्मम धोबी की भांति बॉस ने मेरी उन निर्मल कल्पनाओं की ऐसी की तैसी कर डाली, कहा कि ये नौटंकी नहीं चलेगी, सप्ताहांत पर बैठो और काम करो। मैंने कहा कि यार दिमाग का दही न करो, तुम साले खुद पिछले तीन माह से बिज़नेस टूर पर हो लेकिन साथ में अपनी गर्लफ्रेन्ड को टाँगे घूम रहे हो, वो बेचारी अपने ऑफिस का काम हमारी तरह रिमोटली (remotely) कर रही है और वो यह भी जानती है कि किसी धोबी की तरह तुम मुझसे कैसे निर्मम व्यवहार करते हो, बेचारी कुछ दिन पहले ही तो मुझसे अफ़सोस ज़ाहिर कर रही थी इस बात का!! कम से कम इतना सोचो कि मेरी तो कोई गर्लफ्रेन्ड भी नहीं है तुम्हारे कारण कि तुम मुझे अपना गधा समझना बंद करो तो मैं कहीं बाहर निकलूँ, सोशलाइज़ (socialise) करूँ तो कुछ बात बनने की संभावना हो। 😥 तो इस बात पर बॉस का दिल थोड़ा पसीजा, जैसे हिन्दु माइथॉलोजी (mythology) में ऋषि मुनि आदि किसी को शाप दे बाद में उसकी अवधि कम कर देते थे उसी तरह बॉस ने फरमाया कि ज़्यादा काम मत करना, पैबन्द लगा के ये मामला फाइनल करो और आगे क्लाइंट को अपडेट खिसकाओ, बाकी काम सोमवार को कर लेंगे। 😕

क्या सोच रहा था और क्या हो गया, अच्छा होता कि मैं पहले ही ईमेल करके निकल लिया होता, ईमेल की ज़हमत बचाने के चक्कर में ये तो मामला उल्टा पड़ गया!! तो बस इसी शॉक (shock) में मैं बैठा था कि ये क्या ऽऽ हो गया ऽऽ कि मन में आया कि अभी थोड़ा समय है, बाद में सोएँगे पहले ज़रा ब्लॉग पढ़ लिए जाएँ!! फीड रीडर में कई सारी बिना पढ़ी पोस्ट जमा हो चुकी थीं, एक-२ कर निपटानी थी। तो इधर ब्लॉग पढ़ रहे थे उधर विनोद मिश्रा चैट पर द्वार खटखटा दिए। न जानने वालों को बता दिया जाए कि विनोद को भी मेरी तरह नारद पर काम करने के लिए जीतू भाई ने बंधुआ मज़दूर की भांति पकड़ा था। 😉 आज बेशक नारद के मामले में हम दोनों ही बेरोज़गार हैं लेकिन अपनी पहचान वहीं से हुई थी। पिछले कुछ समय से विनोद को उसकी कंपनी ने लंदन में पटका हुआ है तो जनाब वहीं इंग्लिस्तान में मौज कर रहे हैं।

बहरहाल, विनोद से काफ़ी समय बाद बात हो रही थी, तो चर्चा विन्डोज़ मोबाइल से शुरु हुई, मैं एचटीसी (HTC) के शीघ्र आने वाले एक झकास से फोन का वीडियो देख रहा था और इधर विनोद ने अपनी विन्डोज़ मोबाइल के प्रति नापसंद ज़ाहिर की जो कि सब खामखा के पूर्वाग्रह पर आधारित है। और इस तरह होते-२ चर्चा डेस्कटॉप ऑपरेटिंग सिस्टम पर आ गई, विनोद ने विन्डोज़ को जमकर गालियाँ दी और मैंने विनोद के पसंदीदा मैक और उसकी निर्माता एप्पल को जी भरकर कोसा, हज़ार खामियाँ गिनाई। हम दोनों ही अड़े हुए थे, कोई कॉमन ग्राउँड नहीं मिल रहा था, आखिरकार चर्चा का रूख लिनेक्स पर मुड़ा और कॉमन ग्राउँड मिल गया, यह हम दोनों को पसंद भी है और इसकी जानकारी भी है, तो आगे की चर्चा इसी पर चलती रही। इधर मैं विनोद के साथ चर्चा/बहस आदि करने के साथ-२ ब्लॉग पढ़ने का कार्य भी निपटाता जा रहा था, टिप्पणी देने लायक कुछ लगा नहीं था इसलिए कहीं टिप्पणी नहीं करी, अधिकतर अंग्रेज़ी के ही तकनीकी ब्लॉग थे। फोटोग्राफ़ी वाले ब्लॉग नहीं पढ़े, उनको पढ़ने के लिए थोड़ी और फुर्सत चाहिए। तभी विनोद ने पूछा कि मुझे सोना नहीं है क्या, देखा तो पाया कि साढ़े चार बज गए थे। लो कल्लो बात, ब्लॉग पढ़ने में और बतियाने में ऐसा समय व्यतीत हुआ कि पता ही नहीं चला, सोचा कि चलो अब सो जाएँगे थोड़ी देर में, थोड़े से ब्लॉग और बचे हैं उनको भी निपटा लिया जाए लगे हाथ।

ब्लॉग पोस्ट काफ़ी जमा हो गई थी एक सप्ताह की, लगता है सब्सक्रिप्शन (subscription) और कम करने होंगे, लोग कुछ अधिक ही छापने लगे हैं। छापने में कुछ लगता तो है नहीं, माल-ए-मुफ़्त दिल-ए-बेरहम वाला हिसाब किताब है!! अब जब फीड रीडर की साफ़ सफ़ाई हो गई, ब्लॉग पोस्ट निपटा दी गई तो न जाने मन में क्या खुरक मची, सोचा अभी थोड़ी देर में निद्रा डार्लिंग से मिलेंगे, पहले हिन्दी में अपने नाम को ज़रा गूगलवा पर सर्चिया के देखा जाए कि क्या हालचाल हैं। पुरानी यादें ताज़ा हुई, भूतकाल में हुई मारकुटाई की यादें, अपने लिए शुभचिंतकों द्वारा प्रशंसा में बांधे गए लंबे पुलों की यादें। कुछेक नई बातें पढ़ी जो पहले नोटिस में नहीं आई थी और कुछ ऐसी चीज़ें जो पहले नहीं पढ़ी थी। ऐसे में ही पुराणिक जी का एक कथन पढ़ा एक ब्लॉग पोस्ट पर तो मन में आया कि नहीं यह सत्य नहीं है और इस पर आवाज़ बुलन्द होनी चाहिए।


साभार Dan Morelle

क्या था वह? बेसब्र न हों जनाब, अगली पोस्ट में उसको ठेला जाएगा साथ ही अपने उनीन्दिया विचार सजगता के साथ परोसे जाएँगे, सब कुछ एक ही शो में देख लेंगे तो कैसे काम बनेगा, कुछ इस गरीब का भी सोचिए!! 😉 अब आप यह पढ़ रहे हैं तो अपन निद्रामग्न हैं, आखिर जब आप सो रहे थे तो हम जाग रहे थे इसलिए अब अपन निद्रा डार्लिंग से रुबरु हैं, हमारा भी कोई हक है आखिर!! बाकी का हाल तो अगली पोस्ट में बाँचा जाएगा। अब यह पोस्ट भी उनीन्दी हालत में ठेली गई है इसलिए कोई आशा निराशा आदि न रखें!! 😉