द ग्रेट इंडियन ड्रामा …..
तमाशा….. नौटंकी….. सब को पसंद है, पर भारतीयों से अधिक किसी को पसंद है ऐसा मुझे नहीं लगता!! कहीं भी कुछ भी कोई बात हो, भारतीय लोग मजमा लगा नौटंकी देखने के लिए खड़े हो जाते हैं, उनके पास करने को कोई काम नहीं होता, कदाचित् दुनिया में सबसे अधिक वेल्ले लोग हम भारतीय ही हैं!!
कैसे?
कुछ वर्ष पूर्व की बात है, इधर घर के पास एक मंदिर है और उसके बाहर सड़क किनारे एक नाली है। एक रोज़ सामान से लदी लॉरी गुज़र रही होगी कि किसी कारणवश उसकी बायीं ओर के अगले और पिछले पहिए नाली में चले गए और वह वहाँ पर फंस गई। निकल नहीं सकी तो ड्राईवर उसको वहीं छोड़ के चला गया होगा, अगले दिन उसको निकालने क्रेन आई। क्रेन वाले सामान को उतार कर लॉरी को नाली से निकालने का प्रयत्न कर रहे थे और आलम यह था कि आजू बाजू की सभी दुकान वाले आदि और सड़क पर चलते लोग घेरा बनाकर तमाशा देखने के लिए खड़े हो गए कि मानो क्रेन लॉरी को नाली से बाहर न निकाल रही हो वरन् किसी फिल्मी हसीना का आईटम चल रहा हो!! सभी लोग ऐसी रूचि से उस रंगारंग कार्यक्रम को देख रहे थे कि जितनी रूचि से तो उन्होंने ज़िन्दगी में कदाचित् ही कुछ देखा होगा। और बेतकल्लुफ़ी से ऐसे खड़े थे जैसे दुनिया जहान में उनको इससे अधिक महत्वपूर्ण कोई काम ही नहीं था!!
अभी कुछ महीने पहले की बात है, शाम का समय था, अंधेरा घिर चुका था और मैं रिंग रोड पर होते हुए दिल्ली हाट की ओर जा रहा था। नारायणा के बाद से धौला कुँआ तक का रास्ता उस समय एकदम मक्खन की भांति होता है, कोई ट्रैफिक नहीं होता और सड़क भी चकाचक है, यानि कि आराम से फटाफट वह 2-3 किलोमीटर का रास्ता कट जाता है। इस रास्ते के बीच में सिर्फ़ एक ट्रैफिक सिग्नल पड़ता है बरार स्कवेयर का। उस दिन बरार स्कवेयर पर धौला कुँआ वाले रास्ते पर बहुत अधिक ट्रैफिक जाम था, घिसट-२ कर गाड़ियाँ आगे बढ़ रही थी। थोड़ा आगे जाने पर देखा कि 4-5 गाड़ियों के आगे की सड़क बिलकुल खाली है, जाम लोगों की तमाशबीनी की बीमारी के कारण लगा था। पूछने पर पता चला कि एक बन्दा ऑटोरिक्शा में जा रहा था और उसका किसी बात पर ऑटोरिक्शा वाले से झगड़ा हो गया और सवारी ने ऑटोरिक्शा वाले के एक झापड़ रसीद कर दिया। अब वे दोनों उसी पर लड़ रहे थे, लेकिन ऑटोरिक्शा वाले में इतनी समझ थी कि उसने सड़क किनारे ऑटोरिक्शा खड़ा कर लड़ने की सोची। आदत से मजबूर कुछ पैदल लोग (हालात और अक्ल दोनों से) घेरा बना खड़े हो गए थे तमाशा देखने और सभी गाड़ी वाले आदि भी अपनी गाड़ियाँ आदि रोक वही तमाशा देख रहे थे और नौटंकी को 3-4 मिनट देखने के बाद ही आगे बढ़ रहे थे। इन गाड़ी वाले तमाशबीनों के कारण आधा किलोमीटर लंबा जाम लगा हुआ था। यह किसने कहा कि गाड़ी वाले पैदल नहीं होते, अक्ल से तो वे भी पैदल हो सकते हैं!!
इस नौटंकी के कुछ ही दिन बाद की बात है मैं रिंग रोड से होते हुए नोएडा जा रहा था। इस बार हुआ यूँ कि आश्रम चौक वाले पुल पर चढ़ा तो लंबा जाम दिखा। मैंने सोचा कि यहाँ तो जाम होना आम बात है लग गया होगा, क्या बड़ी बात। खिसक-२ धीरे-२ आगे बढ़ते हुए बीस मिनट बाद जब पुल के बीच पहुँचा तो देखा कि एक गाड़ी वाले ने अपने आगे वाली गाड़ी को ठोक दिया होगा हल्का सा, आगे वाली गाड़ी की पीछे की बत्तियाँ टूट गई थी, दोनों गाड़ियाँ सड़क के बाजू में एक ओर खड़ी थीं और पुलिस की जिप्सी भी खड़ी थी और पुलिस वाले उन गाड़ी वालों से बात कर रहे थे। और लोग? लोगों की वही तमाशबीनी की आदत, वे अपनी गाड़ियाँ जबरन घसीटते हुए चला रहे थे कि तमाशा भी देख लें कि क्या हो रहा है!!
और अब?
न्यूज़ चैनल मजे ले लेकर चटखारे लगा मुम्बई में होटल ताज और होटल ट्राईडेन्ट का हाल ऐसे दिखा रहे थे जैसे कि कोई बहुत बड़ी नौटंकी चल रही हो, किसी फिल्म की शूटिंग चल रही हो। एक चैनल पर तो बकायदा रनिंग कमेन्ट्री चल रही थी कि मानो जैसे क्रिकेट का मैच चल रहा हो!! इन लोगों के लाईव प्रसारण और रिपोर्टरों की कमेन्ट्री आदि को देख सुन मन में तो एक से एक ऐसे अलंकार आ रहे थे इन लोगों को देने के लिए जैसे कि मैंने ज़िन्दगी में किसी को नहीं दिए होंगे, लिख भी देता यहाँ परन्तु शिष्टाचार का तकाज़ा ऐसा करने नहीं देता!!
और लोगों का क्या कहें, दिल्ली हो या मुम्बई, हैं तो भारतीय ही!! तो वहाँ ताज और ट्राईडेन्ट और नारिमन हाऊस के बाहर भी लोग मजमा लगा के खड़े थे जैसे कोई नौटंकी चल रही हो या किसी फिल्म की शूटिंग। उनको इतनी अक्ल नहीं कि वहाँ नौटंकी नहीं चल रही और यदि आतंकवादियों ने किसी खिड़की आदि से बाहर गोलियाँ चलाई तो उनको भी लग सकती हैं, वे तो बस खड़े हो तमाशे का मज़ा ले रहे थे।
लोगों की क्या कहें, पुलिस वाले भी तो वैसे ही समझदार थे। वैसे तो कुछ बन पड़ता नहीं पुलिस से (इस पर बड़बड़ किसी अगली पोस्ट में), उनके अफ़सरों को इतनी अक्ल नहीं थी कि इन तीन इमारतों के आसपास के इलाके में कर्फ्यू जैसा कुछ लगा दें ताकि लोग इन इमारतों के पास न आएँ। इमारतों के पास बैरिकेड तो लगा दिए कि कोई आगे न जा सके लेकिन इतनी समझ नहीं कि आने ही न दें तो बेहतर रहेगा, कोई तमाशा नहीं हो रहा था कि लोग बाग़ वहाँ मजमा लगा खड़े मौज ले रहे थे, आनंद ले रहे थे!!
यही हमारी भारतीय मानसिकता है, हम लोग सबसे बड़े तमाशबीन हैं। दूसरे का घर फुँकता है तो हम तमाशा देखते ही हैं हमारा अपना घर फुँक जाए तो हम उस पर भी खड़े हो तमाशा देखते हैं!! लानत है, लक्ख लक्ख लानत है!!



7 Comments
नितिन
“कदाचित् दुनिया में सबसे अधिक वेल्ले लोग हम भारतीय ही हैं” सत्य वचन!!
और इसी वजह से पूरी दुनिया हमारा तमाशा बना रही है
वाहे गुरू दा खालसा
और इसकी इंतहा देखनी हो तो विलास राव देशमुख अपने बच्चो और रामू के साथ वहा पिकनिक स्पोट पर जब घूमन एगये थे तब देखो . क्या खिलखिला कर ठाहके लगा रहे थे . मजे ले रहे थे और उनका वो हरामजादा उल्लू का पट्ठा हिजडा ग्रहमंत्री हस हस कर बता रहा था कि ये छोटी मोटी घटना है बडी तो तब होती जब वो पाच हजार लोगो को मरते या फ़िर मलिका के पैर मे मोच आ जाती
पंकज बेंगाणी
अमित बाबु,
क्या राजनेता क्या ये पत्रकार सबने अपनी भद पिटवा ली है. मुम्बई हमले ने सबकी कलई खोल दी है.
इस हमले ने वह कर दिखाया जो आजतक नहीं हुआ. बेशर्म राजनेताओं को मुँह छिपाना पड रहा है और विनोद दुआ जैसे पत्रकारों जिनको “भारत माता की जय” हिन्दू नारा लगता है, की भी किरकिरी हो चुकी है.
ghughutibasuti
तमाशा देखते देखते हम भी तमाशा बन गएँ हैं ।
घुघूती बासूती
amit
हाँ तो उन लोगों का क्या दोष, जनता तो है ही भेड़ बकरी। जब ऐसे लोगों को जनता चुनेगी तो परिणाम भी भुगतना पड़ेगा ना, इसलिए भुगत रहे हैं!! अधिकतर जनता मूढ़ होती है, उसको इतनी अक्ल नहीं होती कि किसे चुनना चाहिए किसे नहीं, जो ज़्यादा चमक दिखला दे उसी को चुन लेती है। मूढ़ जनता को इतना भी भान नहीं होगा कि यहाँ प्रशासन की कोई गलती है, वे तो बस न रोकी जा सकने वाली घटना समझ भुला देगी और अन्य प्रांतों की जनता सोचेगी कि उनको क्या फर्क पड़ता है क्योंकि उनके यहाँ तो कुछ हुआ नहीं!!
पंकज, मैं नहीं समझता कि ऐसा कुछ हुआ है जो पहले से नहीं हुआ पड़ा। इन दोनों प्रकार के जीवों की असलियत लोगों को पहले से ही पता है लेकिन वे लोग संख्या में कम हैं। बहुमत उन लोगों का है जिनके पल्ले अब भी बात नहीं पड़ने वाली, तो इसलिए मामला सिफ़र ही रहेगा!!
LOVELY
अभी मेरे मन में जो बात आ रही है उसका इससे संबंध सीधा तो नही बनता ..पर कभी -कभी सोंचती हूँ काश हमारे देश में भी द्विदलिए पद्धति होती ..ओह!! यह क्या सोंच लिया मैंने ..इससे तो लोकतंत्र की आत्मा ही मर जाती ..मेरे पास उन लोगों को कुछ भी बोलने के लिए शब्द नही जो दारू और मुर्गा खाकर उम्मीदवारों का चयन करतें हैं ..बस और क्या कहूँ.जिम्मेदार हम भी (ही) है
amit
लवली जी, ज़िम्मेदार हम तो हैं ही क्योंकि प्रतिनिधियों को हम ही चुनते हैं, इसलिए यह शर्मनाक बात हो जाती है कि आधे से अधिक लोग लुभाने वाले व्यक्ति को चुनते हैं बिना यह सोचे कि चुन लेने के बाद उनकी क्या गति होगी और जिन लोगों का समझ से थोड़ा बहुत वास्ता होता है उनमे बहुत से लोग वोट ही नहीं डालते और बहुत ही सहूलियत के साथ बाद में सरकार को गालियाँ देते हैं!!
और द्विदलीय पद्धति से आत्मा नहीं मरती लोकतंत्र की, अमेरिका में भी दो ही दल हैं और लोकतंत्र है। लोकतंत्र लोगों से होता है, जब लोग ही काबिल नहीं तो क्या द्विदलीय पद्धति और क्या बहुदलीय पद्धति, सब धरी रह जाती हैं!!