कल मैंने नैनोफिक्शन के विषय में लिखा था कि इस विधा में कथा को 55 शब्दों में ही समेटना होता है और उसके कुछ अन्य नियम भी बताए थे। यह नैनोफिक्शन अर्थात् पचपन शब्दिया कथा की विधा में मेरा पहला प्रयास है। एन्सी ने सही कहा था, वाकई कठिन कार्य है पचपन शब्दों में कथा को समेटना।

“स्त्री माँ बनने पर ही पूर्ण होती है”, माँ ने युवा होने पर समझाया था। वह माँ नहीं बन सकती थी, जान का खतरा था। पाँच वर्षों से सास उसे ताने दे रही थी।
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बेहोश होने से पहले नर्स ने बताया लड़का हुआ है। अब वह संपूर्ण स्त्री थी; चैन से सो सकती थी।
फोटो साभार paterjt, क्रिएटिव कॉमन्स लाइसेन्स (Creative Commons License) के अंतर्गत



7 Comments
अनूप शुक्ल
जय हो। हम भी लिखेंगे ये कहानी। नैनो वाली।
संजय बेंगाणी
क्या खूब…पचपनिया कथा. हम भी प्रयास करेंगे…
Aneesha
I have some tough competition now
Gyan Dutt Pandey
सास का ताना तो एक निमित्त है, अन्यथा स्त्री शायद स्वयं भी कण्डीशंड है और लड़का जनने में नारीत्व की सार्थकता मानती है।
लिहाजा ९ शब्द (“पाँच वर्षों से सास उसे ताने दे रही थी”)और काटे जा सकते हैं और तब भी कहानी पूर्ण रहेगी!
पंकज बेंगाणी
प्रथम प्रयास!
धांसू प्रयास. उत्तम.
Reema
nice!!
I had written a post on this topic sometime ago
http://opinionsandexpressions.wordpress.com/2008/12/12/2008/07/18/motherhood-necessity-or-choice/
amit
अनूप जी, अवश्य लिखिए, प्रतीक्षा रहेगी आपकी पचपनिया कथाओं की!



संजय भाई, अवश्य प्रयास कीजिए, एक तरह से दिमागी कसरत है, व्यक्ति के भाषा ज्ञान की जाँच हो जाती है कि कैसे वह कम शब्दों में अधिक बयान कर पाता है!
Ansy, you’re jesting me, right?
ज्ञान जी, बात तो आपकी सही है!
धन्यवाद पंकज, रीमा।