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दूरदर्शन के पचास वर्ष और खोती प्रासंगिकता


September 17th, 2009 at 07:07 am | 6 Comments

पंकज ने बताया कि दूरदर्शन के पचास वर्ष हो गए हैं और वह अपनी स्वर्ण जयंति मना रहा है। इसी के चलते पंकज ने दूरदर्शन के स्वर्ण काल के कुछ लोकप्रिय कार्यक्रमों की सूचि छापी है और कहा कि दूरदर्शन आज अपनी प्रासंगिकता खो रहा।

मैं समझता हूँ कि दूरदर्शन ने आऊट ऑफ़ डेट होना और बोर करना बीस साल पहले ही शुरु कर दिया था लेकिन उस समय लोग इसलिए झेल रहे थे कि निजी चैनल नहीं थे, केबल टीवी नब्बे के दशक में आया और शुरुआती दिनों में महंगा था। लेकिन जैसे-२ उसके दाम नीचे आते गए और लोगों को मज़ा आना शुरु हुआ वैसे-२ उसकी पैठ बढ़ने लगी और दूरदर्शन की ग्राहकी कम होती गई।

दुख की बात यह है कि निजी चैनलों के पास अपनी गुणवत्ता बढ़ा के ग्राहक बढ़ाने के लिए जो मोटिवेशन था (मुनाफ़ा) वह दूरदर्शन के पास नहीं था, सरकारी चैनल है आखिर, नुकसान में भी जाए तो क्या फर्क पड़ता है, किसी की नौकरी पर थोड़े ही बन आएगी और न ही चैनल बंद होगा।

अस्सी के दशक में दूरदर्शन पर कई लोकप्रिय और कालजयी टीवी सीरियल प्रसारित हुए लेकिन नब्बे के दशक में दूरदर्शन ने आगे बढ़ने के स्थान पर बेकार बदमज़ा टीवी शो ही दिखाए, पैसा खर्च नहीं करना चाहते थे अच्छे सीरियलों पर जो कि फिर निजी चैनलों के पास चले गए। एक कोशिश इन्होंने पुराने लोकप्रिय सीरियलों के पुनः प्रसारण द्वारा भी की लेकिन वह भी खास कामयाब न हुई!!

वाकई अफ़सोस होता है कि वह चैनल जिसकी कभी बाज़ार में 100% पकड़ थी, एकाधिकार था, उसका आज यह हाल है कि कदाचित्‌ ही कोई उसको अपनी इच्छा से देखता होगा!!

 
 
फोटो साभार autowitch, क्रिएटिव कॉमन्स लाइसेन्स (Creative Commons License) के अंतर्गत

6 Comments

समीर लाल’उड़न तश्तरी वाले’


अफसोस स्वभाविक है..जो भी वक्त के साथ नहीं चला, उसका यही हश्र होता है.


pankaj bengani


ऐसा है अमित कि जहाँ सरकारी तामझाम होगा वहाँ सत्यानाश होना तय है. दूरदर्शन के कर्ता धर्ता कोई जमाने में “महान” “समाजसेवा” करते थे. लेकिन उन्हें पता नही चला कि समय कितनी तेजी से बीत रहा है. समय के साथ खुद को ढालना उन्हें आया नहीं.

अन्य देशों के सरकारी चैनल भी देखें हैं मैने वे तो इतने बोरिंग नहीं होते. यहाँ तक कि जब 6-7 साल पहले पीटीवी केबल पर आता था तो वह भी डीडी 1 से बेहतर था.


संजय बेंगाणी


फिलहाल तो रूकावट के लिए खेद है! :)


Gyan Dutt Pandey


दूरदर्शन ने प्रासंगिकता खोई? हमें तो पूरा टेलीवीजन माध्यम अप्रासंगिक लगने लगा है। ऑफकोर्स मालिम है कि हम माइनॉरिटी में हैं!


Gyan Dutt Pandey


दूरदर्शन ने प्रासंगिकता खोई? हमें तो पूरा टेलीवीजन माध्यम अप्रासंगिक लगने लगा है। ऑफकोर्स, मालुम है कि हम माइनॉरिटी में हैं! :(


amit


पंकज, मैंने भी कदाचित्‌ कुछ ऐसा ही कहा। हमारे यहाँ सरकारी कंपनी हो तो उसको नफ़े नुकसान से कोई मतलब नहीं होता क्योंकि मुलाज़िमों का वेतन और बोनस तो समय पर ही मिलता है, बढ़िया काम का भी कोई खास लाभ नहीं क्योंकि पदोन्नति और वेतन में बढ़ोत्तरी भी काम से नहीं वरन्‌ सीनीयोरिटी अथवा जुगाड़ से ही होती है। :(
 
ज्ञान जी, मेरा विचार भी कुछ ऐसा ही है इसलिए कुछेक वर्ष पूर्व टेलीविजन देखना मैंने बंद कर दिया था। अब तो कभी कार्टून देखना हो या कोई फिल्म आ रही हो जिसकी सीडी/डीवीडी अपने पास नहीं तो ही टेलीविजन देखना होता है! :)


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