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थकेले विज्ञापनों का टॉर्चर…..


November 2nd, 2009 at 07:07 am | 13 Comments

मैं प्रायः टेलीविज़न नहीं देखता हूँ, कभी यदि कोई दिलचस्प चीज़ दिखाई जा रही हो या कोई फिल्म आ रही हो जो अपने पास न हो तो देख लेता हूँ। अभी एकाध दिन पहले यूटीवी मूवीज़ (UTV Movies) पर अमिताभ बच्चन और शशि कपूर की फिल्म “नमकहलाल” आ रही थी। यह मेरी पसंदीदा फिल्मों में है तो देखने बैठ गया। फिल्म के दौरान विज्ञापन अपने को पसंद नहीं लेकिन टीवी चैनल पर तो आते ही हैं इसलिए झेलने पड़ते हैं, परन्तु कई विज्ञापन तो ऐसे वाहियात होते हैं कि उनको झेलना टॉर्चर लगता है।

एक विज्ञापन कई बार आया, मैक्स न्यू यॉर्क लाइफ़ इंश्योरेन्स का। विज्ञापन यूँ है कि एक लाडले को माता-पिता ट्रेन में छोड़ने आते हैं, सामान वगैरह रखवा देते हैं, लाडले की तरह उससे व्यवहार किया जा रहा है। उसके बाद पीछे से वाचक द्वारा बतलाया जाता है कि जब अपने दूर हो जाते हैं तो उनकी फ़िक्र बढ़ जाती है, इसलिए मैक्स न्यू यॉर्क प्रस्तुत करते हैं जीवन बीमा पॉलिसियाँ ताकि आप अपनों के हमेशा साथ रहें। अब मुझे यह समझ नहीं आया कि दूर जाने की चिंता का जीवन बीमा पॉलिसी से क्या मतलब है? जीवन बीमा तो मरने के बाद मिलता है, क्या चिंता उससे दूर हो जाएगी??!! किसी सामान का बीमा नहीं हो रहा है कि वह टूट फूट जाए तो बीमे की रकम से नया सामान खरीद लिया जाएगा!! :roll: और यदि आर्थिक सुरक्षा का भी प्रश्न है तो यहाँ कैसे फिट बैठता है यह समझ नहीं आता, कमाऊ पिता लाडले (और कदाचित्‌ फिलहाल बेरोज़गार) बेटे को छोड़ने आया है (ज़ाहिर है कि चिंता माता पिता को ही हो रही है, बेटा तो इस खामखा के लाड़ से असहज लग रहा है एक सहयात्री लड़की के सामने), उसकी बेटे के दूर जाने की चिन्ता जीवन बीमा से कैसे दूर होगी? और उसके बाद एक और अहमकाना हरकत, पिता बेटे को केले देता है और माँ कहती है कि खा लेना पेट साफ़ रहेगा। क्या इस विज्ञापन की पटकथा लिखने वाले को यह नहीं ज्ञात कि केले कब्ज़ करते हैं, दस्त लगे हों तो उसमें केले खाने से लाभ होता है, पेट साफ़ करने के लिए केले नहीं खाए जाते!! :roll:

ऐसे ही थकेले विज्ञापन मुझे बीएसएनएल के लगते हैं दीपिका पादुकोण वाले। एक लूज़र से दिखने वाले बंदे को उसकी खूबसूरत बीवी उलाहने देती है कि कभी फिल्म नहीं दिखाते, दफ़्तर में उसके बॉस उससे खफ़ा रहते हैं। ऐसे में वो अपना दुखी थोबड़ा लेकर दीपिका पादुकोण के पास जाता है जो उसको बीएसएनएल का मोबाइल देती है और वो बंदा लूज़र से हीरो बन जाता है। घर में बीवी खुश हो जाती है कि पति मोबाइल पर फिल्म दिखा रहा है, दफ़्तर में बॉस खुश हो जाते हैं कि बंदा समय पर काम करता है। वाह! टोटली फालतू विज्ञापन!! क्या फालतू है इसमे यह बताना ही समय की बर्बादी है।

ऐसे ही न जाने कितने विज्ञापन आते हैं जो कि टोटली ऊपरी माले के दीवालिएपन को दर्शाते हैं। मुझे यह समझ नहीं आता कि हमारे यहाँ की विज्ञापन कंपनियों में आईडियों की कंगाली का दौर क्यों आ गया है। इन्हीं कंपनियों ने भूतकाल में एक से बढ़कर एक बढ़िया विज्ञापन बनाए हैं, कई कंपनियाँ आज भी बनाती हैं लेकिन अधिकतर वहीं सड़े गले बेतुके विज्ञापन बना रही हैं। क्या इन विज्ञापनों के क्रिएटिव डॉयरेक्टर और स्क्रिप्ट लिखने वाले यह भूल जाते हैं कि विज्ञापन का उद्देश्य उत्पाद की बिक्री है न कि कोई फैली हुई फैन्सी कहानी दिखाना। उत्पाद को बढ़िया तरीके से पेश करना होता है लेकिन इस तरह कि वो दर्शक को वास्तविक तो लगे ही पर अहमकाना न लगे!!

एयरटेल के विज्ञापन काफ़ी अच्छे होते हैं, एकाध अपवाद को छोड़ दें तो वे बढ़िया बने हुए होते हैं और उत्पाद को अच्छे से दिखलाते हैं। बीएसएनएल का जो अकबर बीरबल वाला विज्ञापन है वह भी अच्छा है, वह बिलकुल सीधे और सरल तरीके से दर्शक को संदेश देता है कि बीएसएनएल का नेटवर्क बढ़िया है और नेटवर्क प्रॉबलम नहीं आती, यानि कि अपने माल को वह सही तरीके से दर्शक को बेच रहा है।

कदाचित्‌ यह बात सही है कि दुर्गन्ध में ही सुगन्ध की औकात पता चलती है, बेकार विज्ञापनों में ही बढ़िया विज्ञापन को एप्रीशिएट किया जा सकता है!!

13 Comments

Nishant


क्या आपके टूथपेस्ट में नमक है!?

मर्द होकर लड़कियों वाली फेयरनेस क्रीम लगाते हो!?

खुजली करने वाले, बी-टेक्स लगा ले. बी-टेक्स लगा के तू अपनी, दाद-खाज खुजली मिटा ले. ओये-ओये!


काजल कुमार


उसी विज्ञापन को रोज़-रोज़ घिसते रहने से भी वह बदबू देने लगता है


Pankaj Bengani


थकेले विज्ञापनों वाली आपकी बात सही है. हालाँकि मुझे मैक्स न्यूयार्क लाइफ इंसु. वाला विज्ञापन बेहद पसंद है.

लेकिन हाँ अच्छे विज्ञापनों की कोई कमी नही है. और मैं नही मान सकता कि देश की एड एजेंसियों के पास रचनात्मकता की कमी है.

ओग्लिवी और परसेप्ट के बनाए विज्ञापन मुझे हमेशा से पसंद आते रहे हैं.

वोडाफोन का कोई भी विज्ञापन देख लो. मजा हे आएगा. ज़ुज़ु तो क्या कहने.

और वह रंग वाला.. :)


सागर नाहर


कुछेक विज्ञापनों को छोड़ दें तो ज्यादातर विज्ञापन फालतू दिखते हैं, कई विज्ञापनों में महिलाओं की जरूरत न होते हुए भी जबरन महिला को विज्ञापन में घसीटा जाता है। :grin:
वैसे कई विज्ञापन आज भी अच्छे आते हैं, जैसे मेघा गुप्ता वाला रंग सोचे नहीं जाते…
और हां अमितजी, केले वाली बात गलत नहीं है, केले आसानी से पच जाते हैं इसलिये केले खाने से पेट साफ रहता ह। :grin:


Gyan Dutt Pandey


विज्ञापन तो बाजार ड्रिवन है। जब माल नहीं बिकेगा तो विज्ञापन के क्रियेटिव शूरमाओं की दुकान स्वत: बन्द होनी चाहिये! :)


esha


mughe ajkal serial se jayada ache vigyapan lagtey hai kyuki kuch adds itne ache hotey hai ki unhe baar baar dekhne ka man hota hai. jaise ki vodafone ka juju vala add, surf excel ka daag achee hai etc. par is baat ko bi ni nakara ja sakata ki kuch add bahot jhilau hote hai. par jyadatar ache hote hai


amit


निशांत बाबू, फेयरनेस क्रीम और बीटेक के विज्ञापन कम से कम वाहियात तो नहीं लगते क्योंकि वो अपने माल का बयान सीधे शब्दों में कर रहे हैं, स्क्रिप्ट कम से कम वाहियात तो नहीं है।
 
पंकज, मैक्स न्यू यॉर्क लाइफ़ के जिस विज्ञापन की बात मैं कर रहा हूँ वही तुमको पसंद है? क्या पसंद आया उसमें? अपने माल का विज्ञापन उसमें बेतुके ढंग से कर रहे हैं इसलिए मुझे वाहियात लगा। तुमको किस लिए अच्छा लगा यह जानने की उत्सुकता है। :) हाँ अच्छे विज्ञापन भी हैं, इस बात को मैंने नहीं नकारा। वोडाफोन और उससे पहले हच के विज्ञापन बढ़िया होते थे, एशियन पेन्ट का विज्ञापन “रंग सोचे नहीं देखे जाते हैं” भी काफ़ी अच्छा है और पूरा प्रभाव डालता है।
 
सागर जी, केले पच तो जाते हैं लेकिन पेट साफ़ रहने के लिए आवश्यक होता है कि जो अंदर गया वह बाहर भी आए। अब केले अंदर तो चले जाते हैं लेकिन बाहर आने की प्रक्रिया को विलंबित करते हैं, इसलिए पेट साफ़ रखने में उतने सहायक सिद्ध नहीं होते, ऐसी ही अपनी जानकारी है! :D
 
ज्ञान जी, यदि सिर्फ़ विज्ञापन के दम पर ही दुकानें चल रही होती तो ऐसा हो सकता था, लेकिन विज्ञापन मेरे ख्याल से सिर्फ़ एक हद तक ही बिक्री को प्रभावित करते हैं। बिक्री को प्रभावित करने वाले कई अन्य कारण भी होते हैं इसलिए खराब विज्ञापन के चलते बिक्री कम या बंद हो जाएगी ऐसा सोचना ज़रा अटपटा लगता है। ऐसा होता तो मेरे ख्याल से कई कंपनियों की अभी तक ऐसी कि तैसी फिर चुकी होती (खैर यह सिर्फ़ मेरा विचार है जो कि गलत भी हो सकता है)। :)


Nishant


अमितजी, मैंने टूथपेस्ट में नमक और फेयरनेस क्रीम वाले विज्ञापन का ज़िक्र इसलिए किया क्योंकि मैं इन प्रोडक्ट से इत्तेफाक नहीं रखता.
बी-टेक्स वाला विज्ञापन मेरा फेवरिट है. सीधे सरल कैची जिंगल से यह प्रोडक्ट की विशेषता बताता है.

मेरी जानकारी में केले जल्दी पचकर पेट साफ़ कर देते हैं. इसीलिए बच्चा यदि बटन जैसी चीज गटक जाये तो उसे केले खिलाये जाते हैं. कोई बदमाश जब सोने की चैन गटक जाता है तो पुलिस भी उसे केले खिलाती है. शर्त यह है की केले पके होने चाहिए. कच्चे केले कब्ज करते हैं.


gaurav


jahan tak bsnl ke vigyapan ki baat hai , woh sarkari paise ki barbadi hai kisi ne jugad se bsnl ki ad banane ka contract le liya , usne deepika par paise laga diye par baki paise bacha gaya


gaurav


mr amit visiting your blog for the past couple of months , there is freshness in the writeup and its realistic , i,ve bookmarked it , though would like to say that the post about continental food showed arrogance ,we all have our passions and some special knowledge . not many people are aware of meaninng of continental breakfast and i really enjoyed reading about it,but u overdid things in your writeup


amit


निशांत बाबू, बात यहाँ प्रोडक्ट से इत्तेफ़ाक रखने या न रखने की नहीं है, बात यहाँ किसी भी उत्पाद/सेवा के विज्ञापन की है कि क्या वह वाहियात है या वाकई अपने उत्पाद के लिए कारगर है। तो विज्ञापन के रूप में टूथपेस्ट और क्रीम के विज्ञापन कम से कम वाहियात नहीं हैं, अपने उत्पाद की खूबियाँ सीधे और सरल तरीके से बताते हैं। इन उत्पादों से इत्तेफ़ाक मैं भी नहीं रखता और न ही इनको प्रयोग करता हूँ लेकिन इनके विज्ञापनों को वाहियात नहीं समझता। उसी तरह देखें तो मैं एमटीएनएल की सेवा प्रयोग करता हूँ लेकिन उनके विज्ञापनों को कभी भी कोई खास न पाया। इसी तरह कोल्ड ड्रिंक में थम्स अप और माऊनटेन ड्यू दोनों ही पसंद हैं लेकिन इन दोनों के विज्ञापन वाहियात ही लगते हैं। :)


amit


Gaurav, thanks for your compliments & criticism. No one is perfect & arrogance is one of the many traits that human beings possess in varying amounts. :) However I’d just say that I was not trying to be arrogant in that post, its just that I was expressing my annoyance about people who act like they are the biggest know-it-alls, show off in big way & yet they hardly know anything about stuff on which they are showing off. I know that not everyone can have knowledge about everything & that is exactly my point – why show off & act like a know-it-all when you don’t have knowledge about something. :)

I would recommend that you read this post as well which preceded the post on continental food in context, perhaps you’ll see what I was trying to point out. :)


प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI


भइये ! बहुत दिनों बाद आया …सो मुआफी !!
आया था डिजिटल कैमरों की खोज में तो सोचा कला-चर्चा को आगे बढाता चलू!

केला सुपाच्य होता है जैसा कि कहा जा रहा है …पर वह पेट में पाचन उपरान्त मल को बांधता हैं ….और इसीलिए पतले दस्त की परिस्थिति में इसे खिलाया जाता है |
बाकी मैं तो चला …..आपका पुरालेखागार खोजने !!


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