पाकिस्तानी हॉकी टीम के कोच शाहिद अली खान साहब चिंतित हैं कि नई दिल्ली में हो रहे हॉकी विश्वकप में उनकी टीम को संतोषजनक सुरक्षा नहीं दी जा रही है (यहाँ पढ़िए)। मन में ऐसा आता है कि पूछें कि जनाब आपको सुरक्षा की काहे आवश्यकता, अब अल-कायदा या आपके कोई अन्य बंधु बम वगैरह फोड़ेंगे तो आपको तो पहले से इत्तला कर देंगे, आपको थोड़े ही न टेन्शन लेने की आवश्यकता है!!

फिर मन में आता है कि नहीं ऐसा सोचना उचित नहीं होगा, अब सभी पाकिस्तानी थोड़े ही आतंकवादी हैं, उधर भी बम वगैरह फटते हैं, आतंकवादी पुलिस चौकियों आदि पर कब्ज़ा कर लेते हैं, तो ऐसा कहना तो ज़्यादती होगी। फिर मन में ख्याल आता है कि पूछ लें कि जनाब क्या आपको वैसी सुरक्षा दी जाए जैसी बेचारी श्रीलंका की क्रिकेट टीम को दी गई थी, क्या वह आपके हिसाब से माकूल रहेगी?!
ऐसा क्यों? इसलिए क्योंकि खान साहेब तुलना कर रहे थे कि जैसी सुरक्षा उनको दी जा रही है वैसी टंटपुंजियों वाली सुरक्षा तो पाकिस्तान में भी देते हैं। मेरे ख्याल से खान साहेब सुरक्षा या अन्य किसी विषय पर अहमकाना टिप्पणी करने के स्थान पर अपनी टीम और उसके खेल पर ध्यान दें तो बेहतर होगा, देखा नहीं भारतीय टीम ने कैसे पहले मैच में कल उनको धोया, ऐसे तो धोबी भी कपड़े नहीं धोता!!
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विश्व 20-20 मुकाबले में इंगलैंड ने भारत को बाहर का रास्ता दिखाया और इसी के साथ क्रिकेटिया मूढ़ लोगों की बकवास शुरु हो गई….. यानि कि कप्तान धोनी को गालियाँ और हार को धोनी के माथे मढ़ना। रोने वाले रो रहे हैं कि सहवाग को नहीं खिलाया इसलिए हार गए। बेवकूफ़ों को इतनी अक्ल नहीं है कि उसको चोट लगी हुई है इसलिए धोनी ने उसको बाहर बिठाया हुआ है, चोट यदि विकट हो गई तो फिर सहवाग लंबे समय के लिए बाहर हो लेगा। लेकिन मूढ़ लोगों को यह बात समझ नहीं आती, उनकी सुनो तो सहवाग ने अकेले ही मैच जीत लेना था, जैसे सहवाग न हुआ हनुमान का प्रहार हो गया कि जिसको पड़ा उसका बोलोराम हुआ!! सहवाग को लेकर धोनी की जान को रोने वाले कदाचित् पिछले ही महीने समाप्त हुए आईपीएल (IPL) और उसमें सहवाग के जलवों को भूल रहे हैं, कितनी तोप चलाई थी सहवाग ने उसमें कोई बताए ज़रा!!
और जो लोग सहवाग को लेकर धोनी की जान को नहीं रो रहे वे उसकी बल्लेबाज़ी को लेकर रो रहे हैं। आजकल लोग धोनी की जान को वैसे ही रोते हैं जैसे पहले सौरव गांगुली और सचिन तेन्दुलकर की जान को रोते थे। मैच के बाद धोनी ने कहा कि खराब बल्लेबाज़ी के कारण उनकी हार हुई है, बात लगभग दुरुस्त है, 150 रन का लक्ष्य कोई कठिन लक्ष्य नहीं था। इस बात को लेकर लोग रो रहे हैं कि धोनी को शर्म आनी चाहिए कि सिर्फ़ उसकी बल्लेबाज़ी खराब थी। अब कोई मुझे बताए कि बाकी किस बल्लेबाज़ ने तोप चलाई!!
गौतम गंभीर – 26 गेंदों में 26 रन
रोहित शर्मा – 8 गेंदों में 9 रन
सुरेश रैना – 5 गेंदों में 2 रन
रवीन्द्र जडेजा – 35 गेंदों में 25 रन
युवराज सिंह – 9 गेंदों में 17 रन
महेन्द्र सिंह धोनी – 20 गेंदों में 30 रन
युसुफ़ पठान – 17 गेंदों में 33 रन
अमां धोनी कप्तान है कोई सुपरमैन नहीं है कि जब भी बाकी टीम आँख मूंद खड्डे में गिर जाए तो उनको बाहर निकल लाए। उसकी बल्लेबाज़ी को रोने से पहले यह तो बताओ कि दूसरा कौन सा खिलाड़ी तोप चला गया? गंभीर फेल हुआ, रोहित शर्मा मानो बल्लेबाज़ी भूल गया है, सुरेश रैना मानो नया-२ बल्ला पकड़ना सीखा है, रवीन्द्र जडेजा ने तो कदाचित् भारतीय टीम में अपने करियर का गला घोंट दिया है, युवराज की तो आदत ही है एक मैच में ठोक ठाक के स्कोर मारने की और फिर अगले दस पंद्रह मैचों में फुस्स होने की जब तक टीम से निकाले जाने की नौबत न आ जाए!! और उधर दूसरी ओर गेंदबाज़ी में इशांत शर्मा का तो लगता है कि गेंदबाज़ी का हुनर बालों में था, बाल क्या कटवाए, सितारे गर्दिश में आ गए जो हर मैच में अपनी धुलाई करवा रहा है!!

लेकिन इन सभी को कोई नहीं रोएगा, रोया हमेशा कप्तान की जान को ही जाता है यह भारतीयों का एकमात्र नियम है। अगर जीत मिलती है तो जिसने रन मारे या विकेट लिए वह हीरो है लेकिन यदि हार गए तो कप्तान निकम्मा और $%^# हो जाता है। फिर चाहे वह मोहम्मद अज़हरूद्दीन हो या सचिन तेन्दुलकर, सौरव गांगुली हो या महेन्द्र सिंह धोनी, हर हार का ज़िम्मेदार कप्तान ही होता है।
सौरव गांगुली को रोने वाले और अब धोनी को रोने वाले यह नहीं जानते कि गांगुली के रूप में वर्षों बाद एक बढ़िया कप्तान भारतीय क्रिकेट टीम को मिला था जो कि वास्तव में कप्तानी के लायक था और यह उसने साबित भी किया था (भारतीय क्रिकेट इतिहास में सबसे अधिक सफ़ल कप्तान)। गांगुली के जाने के बाद मानो ग्रहण लग गया था जो राहुल द्रविड़ की चंपू कप्तानी का दौर चला, शनि की दशा भारी थी!! अनिल कुंबले के समय टीम थोड़ी संभली (टैस्ट मैचों में) और वहीं दूसरी ओर धोनी ने एकदिवसीय टीम को वापस जीत के लिए भूखा शेर बनाया!!
मैं यह नहीं कहता कि धोनी की गलती यहाँ नहीं है, कदाचित् उसको इशांत शर्मा को बिठा के प्रवीण कुमार को मौका देना चाहिए था, पिछले मैच में भी रूद्र प्रताप सिंह को इशांत शर्मा की जगह खिलाया जा सकता था, आखिर आर.पी.सिंह अच्छी फॉर्म में है और यह उसने कल भी दिखा दिया। लेकिन सारा का सारा दोष धोनी के सिर मढ़ देना मुझे व्यक्ति के मूढ़ होने का सूचक जान पड़ता है!!
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अभी दिल्ली डेयरडेविल्स के रॉयल चैलेन्जर्स बंगलोर से हारने के कारण आईपीएल (IPL) में टीमों की हालत अब रोचक हो गई है। सभी टीमों के एक मैच बाकी हैं और सिर्फ़ तीन टीम ऐसी हैं जो चैन की सांस ले सकती हैं। एक दिल्ली डेयरडेविल्स हैं जो चैन की सांस ले सकते हैं फिलहाल क्योंकि सेमी फाइनल में पहुँच चुके हैं और दूसरी ओर कोलकाता नाईट राईडर्स तथा मुम्बई इंडियंस हैं जो इसलिए चैन की सांस ले सकते हैं कि एक बार फिर सेमी फाइनल में जगह बनाने से पहले ही उनकी हवा निकल गई!!
बाकी सभी पाँच टीमों में अभी मारा मारी होनी बाकी है और यकीनन अगले चार मैच नॉकआऊट (knockout) मुकाबले जैसे होंगे।
कल के मैच में राजस्थान रॉयल्स का कोलकाता से जीतना आवश्यक है यदि उनको सेमी फाइनल में बर्थ चाहिए। जीतने के बाद उनको प्रार्थना करनी होगी कि उनके बाद वाले मैच में पंजाब हार जाए क्योंकि यदि पंजाब जीत गई तो राजस्थान की भैंस पानी में चली जाएगी। इधर चेन्नई सुपर किंग्स काफ़ी हद तक सुरक्षित हैं क्योंकि यदि वे कल पंजाब से हार गए तो भी सेमी फाइनल में स्थान बना सकते हैं, उनका रन रेट राजस्थान से काफ़ी अच्छा है इसलिए राजस्थान जीतने के बाद चुनौती न दे पाएगा।
उसके बाद परसों का पहला मैच किसी की सेहत पर कोई फर्क न डालेगा, मुम्बई जीत के भी कुछ न उखाड़ लेगी और दिल्ली हार भी गई तो उसका कुछ न बिगड़ेगा। लेकिन उसके बाद वाला मैच पुनः नॉकआऊट (knockout) मुकाबला होगा दक्कन चार्जर्स और रॉयल चैलेन्जर्स बंगलोर के बीच, जो जीता वही सिकन्दर… यानि सेमी फाइनल के अंदर!!
मैं क्या चाहता हूँ? मैं चाहता हूँ कि कल राजस्थान रॉयल्स और चेन्नई सुपर किंग्स जीत जाएँ, कोलकाता बाहर है ही और पंजाब भी बाहर हो जाए। चेन्नई आराम से जीत सकती है यदि तमीज़ से खेले और बचकानी बेवकूफ़ियाँ न करे वरना पंजाब की टीम ढोल बना के बजा देगी उनको। उसके बाद परसों दिल्ली और मुम्बई के मैच को तेल लगाओ, उसके अगले मैच में दक्कन चार्जर्स की जीत होनी चाहिए ताकि बंगलोर भी बाहर हो!! दक्कन चार्जर्स के साथ पिछले कुछ मैचों में दिक्कत ये आ रही है कि उनके बल्लेबाज़ों की जमी जमाई जोड़ी के टूटते ही आने वाले बाकी बल्लेबाज़ों को वापस जाने की जल्दी होती है। अमा उनके डगआऊट में तो न ही प्रीति बैठती है और न ही शिल्पा, जाने की जल्दी काहे होती है यह समझ नहीं आता!!
नैया पार लगाने की ज़िम्मेदारी फिर रोहित शर्मा पर होती है लेकिन तुरुप का इक्का हर बार नहीं चल सकता जैसा कि पिछले मैच में इरफ़ान पठान ने साबित किया था!! इसलिए ये लोग भी तमीज़ से खेलें तो सेमी फाइनल तक आराम से जा सकते हैं।
कुछ दिन पहले रमण कौल जी ने ट्विट्टर पर पूछा था कि दर्शक आईपीएल (IPL) में किसी टीम को अपनी श्रद्धा के लायक कैसे समझते हैं तो मैंने उत्तर दिया था कि मैं तो पंजाब और बंगलोर की टीम के अतिरिक्त सभी को पसंद करता हूँ और मुकाबलों का मज़ा लेता हूँ।
पंजाब और बंगलोर भी बाहर हो जाएँ तो अपने को खुशी होगी, क्योंकि सिर्फ़ प्रीति और ब्रेट ली की खातिर तो पंजाब को सपोर्ट नहीं न करेंगे और बंगलोर की चीयरलीडर्स अपने को अब भी पसंद नहीं।
कोलकाता ने तो इस बार भी मुँह कसैला कर दिया और मुम्बई पुनः ज़रा सी झलक दिखला के रह गई!!
यदि आपको क्रिकेट अथवा आईपीएल (IPL) में रूचि नहीं है तो आप निम्न पोस्टों में मेरी घुम्मकड़ी के दौरान लिए गए कुछ फोटो देखिए। यदि क्रिकेट अथवा आईपीएल (IPL) में रूचि है तो भी इन पोस्टों को देख सकते हैं, कोई मनाही नहीं है!!
वैसे ये सभी फोटो जब लिए गए थे उस समय अपने को फोटू लेने की कोई खास अक्ल नहीं थी, अब भी नहीं है लेकिन तब से अब तक कुछ तो ज्ञान में इजाफ़ा हुआ है!
हज़ार समझदार देखे, मैककलम भी देखा!! पता नहीं क्या सोचकर गांगुली की जगह उसको कप्तान बनाया। एक तो कोलकाता नाईट राईडर्स टीम वैसे ही माशाल्लाह है जो जीत के निकट पहुँचती नहीं और जो कभी जीत के निकट पहुँच जाए तो कप्तान मैककलम अपने धर्मात्मा होने का परिचय देते हुए विपक्षी टीम को मैच उपहार में दे देते हैं। कुछ दिन पहले सुपर ओवर में मेन्डिस से गेंदबाज़ी करवा के राजस्थान रॉयल्स को मैच उपहार में दे दिया था और अभी रॉयल चैलेन्जर्स बंगलोर की चैम्पियन टीम को मैच क्रिस गेल की मार्फ़त तश्तरी में सजा के दे दिया!! यकीन नहीं आता कि कोई इतना दिलदार भी हो सकता है!!
और लगता है कोच जॉन ब्यूकैनन अभी ऑस्ट्रेलियाई टीम से हटाए जाने के सदमे से ही नहीं उबरे हैं। वैसे ऐसी चैम्पियन टीम और धर्मात्मा कप्तान के होते कोच क्या कर लेगा यदि वह कुछ करना ही न चाहता हो?!! सारे ऑस्ट्रेलियाई कोच ऐसे घस्सी होते हैं क्या? पहले चैपल और अब ब्यूकैनन!!
गांगुली बाबू भी सोच रहे होंगे कि न जाने उनकी कुंडली में ऑस्ट्रेलिया दोष कब समाप्त होगा, पहले चैपल राहू बन भिनभिनाया और अब ब्यूकैनन केतु बना है!!

परसों आईपीएल (IPL) का दूसरा संस्करण दक्षिण अफ्रीका में शुरु हुआ, पहला मैच था मुम्बई इंडियंस (Mumbai Indians) और चेन्नई सुपर किंग्स (Chennai Super Kings) के बीच। लेकिन मैच के बीच में रोचक वाकया यह हुआ कि मुम्बई इंडियंस की बल्लेबाज़ी चल रही थी और इसी बीच एक काला कुकुर (आम भाषा में बोले तो… कुत्ता) मैदान में भागता हुआ आ गया। अब चूंकि कुकुर के गले में लाल पट्टा बंधा था इसलिए वह आवारा तो नहीं था, ज़ाहिर सी बात है कि किसी का पालतू था, लेकिन उसकी मालकिन कहीं नज़र नहीं आई।
अब कुकुर आ गया सो आ गया, ई मा कौन सी बड़ी बात है। बड़ी बात अपने को यह लगी कि उस कुकुर के कारण दस बारह मिनट खेल रूका रहा, पहले पाँच मिनट तो किसी को समझ न आ रहा था कि किया क्या जाए। इस मामले में अपना इंडिया बढ़िया है, यदि कोई कुकुर मैदान में आ जाता है तो उसके पीछे दो हवलदार भी दौड़ते हुए आ जाते हैं और डंडा वगैरह देकर पाँच मिनट में कुकुर को मैदान से बाहर कर देते हैं और खेल पुनः आरंभ हो जाता है। लेकिन दक्षिण अफ्रीका में मैदान पर लगता है पुलिसिए या सिक्योरिटी वाले होते नहीं और होते हैं तो उनको सिचुएशन हैन्डल करना नहीं आता। कुकुर मैदान पर इधर उधर टहलता रहा लेकिन किसी को समझ न आ रहा था कि क्या किया जाए। इसी बीच सुपर किंग्स के कप्तान धोनी ने कुकुर को गेंद दिखाई कि कदाचित् गेंद लपकने के लिए कुकुर मैदान से बाहर चला जाए लेकिन कुकुर को गेंद में कोई रूचि नहीं थी!!
आखिरकार एक स्पेशलिस्ट मोहतरमा आईं और कुकुर को बिस्कुट खिलाए गए और यह रिश्वत लेने के बाद ही कुकुर महाराज टले और खेल आरंभ हुआ!! लो कल्लो बात, इनएफिशियेन्सी (Inefficiency) की भी कोई हद होती है, जो काम यहाँ एक डंडे में हो जाता वो काम करने के लिए वहाँ कितने झंझट!! भारतीय क्रिकेट बोर्ड को चाहिए कि दक्षिण अफ्रीका के मैदान कर्मचारियों के लिए सेमिनार आदि करवाए जिसमें ट्रेनिंग दी जाए कि मैदान में यदि कुकुर अथवा कोई और अवांछनीय जीव आ जाए तो उसको कैसे बाहर कर सिचुएशन को कम समय में एफिशियेन्टली (Efficiently) और किफ़ायती रूप से कंट्रोल में लाया जाए।
साथ ही यदि कुकुर की मालकिन मिले तो बोर्ड को चाहिए कि उस पर मुकदमा ठोके। अब बताओ यह कहाँ कि रीत हुई कि मैच दिखाने कुकुर को साथ ले आए और फिर उसके बाद उसको पागल सांड की भांति छुट्टा छोड़ दिया इधर-उधर भटकने के लिए!!
इधर कुछ पुरानी पोस्ट देख रहा था तो पिछली यात्राओं के ट्रेवलॉग दिखे, यादें ताज़ा हो गई। तो ऐसी एक यात्रा का ट्रेवलॉग आप भी देखें।
कुकुर का मूल चित्र साभार: जूलियन