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Archive for the ‘यादें’ Category


अथ्‌ श्री बड्डे कथा…..


September 29th, 2009 | 8 Comments

….. कटा नहीं – “कथा”, सोच समझ के पढ़िएगा, पुराण नहीं है!! इसलिए बाँचने के लिए भी कुछ अधिक मसौदा नहीं है। वो तो अनूप जी अपने बड्डे का हाल बतलाए कि क्या साजिश वगैरह हुई और कैसे वो जेब ढीली करने से बचे तो लगे हाथ मैंने पूछ लिया कि ये मोबाइल की साजिश क्या कनपुरियों में ही होती है (क्योंकि जीतू भाई के साथ भी हुई इसी महीने) या फिर यह सितंबरी लालाओं के साथ ही होता है। अब यदि कनपुरियों की बात है तो अपन इतने नहीं टेन्शनियाते लेकिन यदि सितंबरी लालाओं पर ही यह मार पड़ती है तो अपना टेन्शनियाना जायज़ है क्योंकि इन्हीं दोनों महानुभावों की ही भांति अपन भी सितंबरी लाल हैं। वैसे यदि अपने साथ साजिश होती तो मोबाइल की न होती, अपना हाल तो यूँ है कि यदि दो-तीन साल में नया मोबाइल फोन ले भी लिया जाए तो माता जी हड़का देती हैं कि काहे खामखा फिजूल खर्च किया जब पुराने मोबाइल पर कॉल सही तरीके से आ जा रही थी!! ;)

वैसे एक रोचक बात यह देखने वाली है कि जीतू भाई, अनूप जी और मेरे जन्मदिन लगातार तीन सप्ताह में एक के बाद एक आते ही हैं, साथ ही सप्ताह के एक ही दिन भी पड़ते हैं, यानि कि ठीक सात-२ दिन के अंतराल के बाद। तो यदि जीतू भाई का जन्मदिन बुधवार को पड़ेगा तो अनूप जी का भी बुधवार को पड़ेगा और मेरा भी बुधवार को ही पड़ेगा, हा हा हा!! :D

खैर, तो अनूप जी अपने प्रश्न को तो टाल गए, बोले रूपा बनियान के माफ़िक यह भी अंदर की बात है, तुमको न बताएँगे!! और साथ में पूछ लिए कि अपने बारे में बताओ बड्डे कैसा कटा तो अपन सोचे कि चलो एक पोस्ट इसी पर ठेल देते हैं। अब जैसा कि पहले भी बयान किया, आजकल अपनी ट्यूब खाली है, भरने की प्रतीक्षा है और इसी कारण बड़बड़ाने के लिए मसौदा नहीं मिलता है। तो अब यदि कोई चीज़ अपने आप ही चलकर पास आ जाए और बड़बड़ाने का मौका दे तो उस मौके को छोड़ना बहुत ज़ालिमाना स्वभाव हो जाएगा, इसलिए अपन भी थाम लिए दोनों हाथों और पैरों से पकड़कर, कि अब तो बड़बड़ा के ही रहेंगे, चाहे बड़बड़ाने के लिए कुछ गर्म मसाला और चंकी चाट मसाला न हो, चाहे नमक मिर्च से ही काम चलाना पड़े, लेकिन बड़बड़ाएँगे अवश्य, आखिर इस ब्लॉग पर सबसे अधिक बड़बड़ाए ही हैं तो क्या इज़्ज़त रह जाएगी यदि स्वयं ही चलकर आए मौके को छोड़ दिया जाए!! :D

हाँ तो अपने बड्डे के बारे में बाँचने के लिए कुछ अधिक नहीं है, साधारण ही दिन बीतता है। सिल्वर जुबली पिछली बार मना लिए थे और इस बार गोल्डन जुबली के लिए लाईन में लग गए हैं। अनूप जी तो बता ही चुके हैं कि वे माशाल्लाह किला फतह करने के निकट हैं, 2013 में वो किला फतह कर लेंगे!! :D

इधर रात को बारह बजने में आधा घंटा बाकी था, यानि कि ऑफिशियल बड्डे वाला दिन आने में समय था उधर एक अनजान नंबर से फुनवा आया और पूछा गया कि क्या अमित बोल रहे हैं। मैंने उत्तर दिया कि जी हाँ हम ही बोल रहे हैं तो फिर दूसरा प्रश्न पूछा गया कि क्या कल आपका जन्मदिन है। अब मुझे आश्चर्य हुआ कि भई नंबर पहचाना हुआ नहीं है, न ही आवाज़ पहचानी हुई और ये जनाब हमारा जन्मदिन जानते हैं। मैंने पूछा तो नाम सिर्फ़ “पाबला” बताया गया, एक बार को तो दिमाग में आया ही नहीं कि कौन साहब हैं लेकिन फिर कुछ और बात करने पर दिमाग में घंटी बजी कि ये हिन्दी ब्लॉगजगत के श्री बी.एस.पाबला हैं। वे बोले कि मेरे जन्मदिन की शुभकामना देती ब्लॉग पोस्ट लिख लिए हैं लेकिन एक बार कन्फर्म करना बेहतर जाना कि पता तो कर लें कि जन्मदिन कल ही है कि नहीं। मैंने कन्फर्म किया और उन्होंने अग्रिम ही शुभकामनाएँ दे दीं और भविष्य में संपर्क बनाए रखने की बात के साथ वह वार्तालाप समाप्त हुआ। इधर बारह बजे और उधर फेसबुक, ईमेल, मोबाइल लघु संदेश आदि द्वारा मित्रों और परिचितों की शुभकामनाएँ आनी शुरु हो गई।

जन्मदिन अपने यहाँ कोई खास तरीके से नहीं मनाया जाता। बचपन में अवश्य शौक रहा करता था कि अपना जन्मदिन मनाया जाए, लेकिन अम्मा (अपनी दादी जी को मैं और चचेरे भाई यही कहकर संबोधित किया करते थे) ने मना कर रखा था कि अपने यहाँ लड़कों के जन्मदिन नहीं मनाए जाते। तो माता जी मेरा मन रखने के लिए जन्मदिन से पहले दिन टॉफ़ियाँ और पेन्सिल दिलवा देती थीं कि अगले दिन क्लास में सहपाठियों को वह बाँट के बड्डे मना लिया जाए और शाम को घर पर फैमिली डिनर हो जाया करता था जिसमें सभी मामा-मामियाँ और मौसी की शिरकत हो जाया करती थी और अपन भी खुश हो जाते थे कि अपना बड्डे सेलीब्रेट हो गया। चूंकि बड्डे नहीं मनाया जाता इसलिए केक काटने का भी रिवाज़ नहीं, माता जी उसकी जगह सूजी का हलवा बना दिया करती थीं (आटे का हलवा भी अपने को पसंद है लेकिन सूजी का हलवा अधिक पसंद है)।

जब बड़े हो गए तो यह चलन भी धीरे-२ कम होता गया, क्लास में टॉफ़ियाँ बांटना बंद हुआ, कुछ खास मित्रों को कैन्टीन ले जाकर वहाँ समोसे ब्रेड-पकौड़े और पेप्सी की दावत दे दी जाती थी। इसके लिए माता जी अलग से पैसे नहीं देती थीं, अपनी ही जेब से रोकड़ा देना पड़ता था। वह बात अलग है कि बाद में मौका देख पिता जी से वसूली की जाती थी। :D

पर एक चीज़ जो बचपन से कायम है वह यह कि माता जी मेरे हर जन्मदिन पर मंदिर में ले जाकर पंडित जी द्वारा पूजा करवाती हैं। अब पूजा अर्चना में अपनी ऐसी कोई आस्था है नहीं, जब ईश्वर में ही नहीं है तो ज़ाहिर है कि ईश्वर अर्चना में भी नहीं होगी। लेकिन माता जी का मन रखने के लिए चला जाता हूँ कि यदि इससे उनके मन को शांति मिलती है तो अपने को कोई दिक्कत नहीं क्योंकि अपना कोई नुकसान तो हो नहीं रहा।

तो इस बार का भी बड्डे एज़ यूज़युअल साधारण दिन ही की भांति बीता; मित्रों, परिचितों और परिवार वालों से शुभकामनाएँ और आशीष मिले, मन्दिर में जाकर पूजा करवाई गई और शाम को हर जन्मदिन की भांति पूरी छोले और खीर का भोग लगाया गया।

कॉलेज के समय से ही मेरी कुछ ऐसी प्रवृत्ति हो गई कि जन्मदिन वाले दिवस मैं एकांत और शांत रहना पसंद करता हूँ, कहीं आना जाना नहीं और न ही परिवार के सदस्यों के अतिरिक्त किसी से मिलना जुलना। यार-दोस्त यदि दावत की फरमाईश करते हैं तो अगले दिन या आने वाले सप्ताहांत पर उनको दावत दे दी जाती है, जन्मदिन पर नहीं। ऐसा स्वभाव क्यों हुआ इसका कारण मुझे नहीं पता लेकिन ऐसा ही मन को अच्छा लगता है, वर्ष में एक शांत दिन गारंटी के साथ। :tup:

 
 
हलवे की फोटो साभार mtsn, क्रिएटिव कॉमन्स लाइसेन्स (Creative Commons License) के अंतर्गत


बुडापेस्ट – एक सफ़रनामा – भाग ३


April 10th, 2009 | 4 Comments

लानती बात है कि पिछला भाग नवंबर 2008 में लिखा था और अब पाँच महीने बाद जाकर यह तीसरी कड़ी लिखने का होश आया है!! खैर देर आए दुरूस्त आए!! ;)

….. पिछले भाग से आगे

रविवार 22 जून को सुबह सवेरे अलॉर्म बजते ही आँख खुल गई, तकरीबन नौ-दस घंटे की नींद ली थी और अपने को बहुत तरोताज़ा महसूस किया, दुर्लभ क्षण लगा क्योंकि आलस्य की मौजूदगी का एहसास नहीं हुआ। :D सुबह का नाश्ता हॉस्टल की ओर से फोकटी होता था, बुफ़े (Buffet) टाइप। ब्रेड, कॉर्न फ्लेक्स, दूध, कॉफ़ी इत्यादि रसोई में टेबल पर रखा होता था, जितना मर्ज़ी खाओ पियो और मौज करो। तो नाश्ते के साथ-२ इमेल इत्यादि जाँच ली और बैकअप के लिए फोटो कैमरे के कार्ड से पेन ड्राइव में स्थानांतरित कर ली। हॉस्टल में एक और लाभ यह था कि यदि तीन दिन या अधिक की बुकिंग है तो कपड़ों की धुलाई मुफ़्त थी। लेकिन एक पंगा अभी भी था और वह यह कि पिछले रोज़ बेल्ट नहीं मिली थी और वह अति आवश्यक थी। तो इसलिए सबसे पहले बेल्ट ढूँढ के उसको लेने की सोची।

ट्रॉम पकड़ न्युगाती पॉल्याउद्वार (Nyugati pályaudvar) यानि पश्चिमी रेलवे स्टेशन पहुँचा और उसके बगल में मौजूद बुडापेस्ट के सबसे बड़े मॉल वेस्टेन्ड सिटी सेन्टर (Westend City Center) में दाखिल हुआ। मॉल काफ़ी बड़ा था लेकिन गुड़गाँव नोएडा आदि के मॉलों के सामने टिक सके ऐसा न लगा! मॉल में घुसते ही कुछ दुकानें छोड़ मर्दाना कपड़ों आदि की एक दुकान दिख गई और वहाँ चमड़े की एक साधारण लुक्स वाली (डिज़ाइनर नहीं) बेल्ट भी मिल गई। जर्मन ब्रांड थी, दाम पड़ा कोई आठ हज़ार चार सौ फोरिन्ट (तकरीबन चौबीस सौ रूपए), मजबूरी थी और मामला अर्जेन्ट था इसलिए कुछ कर नहीं सकते थे और अपना उल्लू कटा के उसको ले लिया गया।

अब कम के कम एक टेन्शन समाप्त हुई थी, इसलिए इधर-उधर घूमने फिरने पर ध्यान दिया गया। मॉल में एक चक्कर लगा के बाहर आ गया और मेट्रो के भूमिगत स्टेशन की ओर बढ़ गया और वहाँ से एम2 मेट्रो पकड़ के दीआक टर्मिनल (Deák Ferenc tér) पहुँचा। एक बात जो नोटिस की वह यह थी कि मॉल में प्राय: हर चीज़ महँगी थी। मॉल में आधे लीटर पानी की बोतल छह सौ फोरिन्ट (तकरीबन एक सौ सत्तर रूपए) में मिल रही थी जबकि दीआक टर्मिनल से बाहर आकर बाजू की एक फलों की दुकान से मैंने उसी ब्रांड की दो लीटर की पानी की बोतल ढाई सौ फोरिन्ट (तकरीबन सत्तर रूपए) में खरीदी। यहीं दीआक टर्मिनल के सामने ही एक गिरजाघर है जहाँ से अगले दिन शाम का वॉकिंग टूर चालू होना था, तो इस तरफ़ आने का मुख्य मकसद तो जगह देखना था।


( इस फोटो को अन्य रूप और बड़े आकार में यहाँ देखें )


तत्पश्चात एक दिशा निर्धारित की और उस ओर चल पड़ा। जिस ओर से आ रहा था उस दिशा में संत स्टीफ़न का गिरजाघर था जो कि अगले दिन के शाम के टूर में देखा जाना था और जिस दिशा में मैं जा रहा था उस तरफ़ एक अन्य गिरजाघर था जो कि टूर के दौरान नहीं देखा जाना था इसलिए बेहतर था कि उसको पहले देख लिया जाए।

ईसाई धर्म प्रभुत्व वाले देशों में प्रायः उनके इतिहास, संस्कृति, कला आदि के लंबे सफ़र के बारे में जानने का बढ़िया ज़रिया गिरजाघर ही होते हैं। भारत में तो मंदिरों मस्जिदों के अतिरिक्त किले महल आदि भी इतिहास के लंबे सफ़र के दौरान हुए विभिन्न बदलावों की कहानी बयान करते हैं लेकिन योरोप के देशों में प्रायः किले महल उतना अधिक बयान नहीं करते जितना वहाँ के गिरजागर करते हैं क्योंकि जितने कलात्मक कार्य गिरजाघरों में होते थे उतने कहीं अन्य नहीं होते थे।

यह गिरजाघर छोटा था और इसमें मरम्मत का कार्य चल रहा था, इसलिए इसको अंदर से देखना न हो पाया, बस बाहर से ही फोटू लेकर अपन वापस दीआक चौक की ओर बढ़ चले। चलते-२ एक और बात यह देखी कि मुख्य सड़क से हट मकानों के बीच से जाने वाली गलियाँ और सड़कें छोटी थीं लेकिन उन पर खड़ी की गई गाड़ियाँ तमीज़ के साथ एक सीधी कतार में किनारे पर थीं, अपने यहाँ की तरह बेतरतीब आड़ी तिरछी नहीं थीं।


दीआक चौक पार कर संत स्टीफ़न के गिरजाघर की ओर बढ़ चला तो सड़क पार करते ही एक कम्यूनिस्ट काल की ग्रे रंग की इमारत नज़र आई जिसके बारे में अगले दिन शाम की टूर गाईड ने बताया कि वह पहले बस टर्मिनल हुआ करती थी। उस इमारत के भूमितल वाला भाग खुला और खाली था, कदाचित पार्किंग आदि करने के लिए। वहाँ कुछ आवारा किस्म के दिखने वाले लड़के अपनी-२ साईकिलों के साथ बैठे थे और कूल लगने का पूरा प्रयत्न करते हुए सुट्टे मार रहे थे!! इमारत के बाजू में एक हरा भरा एक छोटा सा पार्क था जहाँ रविवार होने के कारण अच्छी खासी चहल पहल थी, एक तरण ताल था जिसके किनारे पर बैठे लोग पानी में पैर डाल आराम से बैठे आपस में बतिया रहे थे। पार्क की सतह के नीचे एक ओपन एयर रेस्तरां भी था जिसकी कुर्सियों पर बैठे लोगों में बीयर आदि के दौर चल रहे थे।


थोड़ी देर वहाँ एक पेड़ की छाँव में मौजूद बेन्च पर बैठ आराम किया और उसके बाद दीआक चौक के बाजू से जाती एक अन्य सड़क पर बढ़ चला जो कि फैशन स्ट्रीट के नाम से जानी जाती है। अब क्या कहें, किन्हीं आला लोगों को लगा होगा कि लंदन की बांड स्ट्रीट (Bond Street) और पैरिस की रूआ दु फाऊबर्ग सेंट ऑनउहरे (Rue du Faubourg Saint-Honoré) के मुकाबले की जगह बुडापेस्ट में भी होनी चाहिए जहाँ बड़े-२ और एक से बढ़कर एक महँगे फैशन हाऊसों की दुकानें हों फैशनेबल और महँगे लिबास आदि बेचने के लिए।


फैशन की इसी चाहत के चलते नवंबर 2007 में निर्माण आरंभ हुआ फैशन स्ट्रीट (Fashion Street) का जो कि मार्च 2008 के आसपास निपटा होगा, वैसे मुझे नहीं लगा कि निर्माण/मरम्मत पूर्णतया समाप्त हो गया था, क्योंकि कुछेक जगह काम चलता दिखाई दिया। जितनी दुकानें थीं वे भी कम न थीं, एक से बढ़कर एक हाईफाई लिबास और अन्य सामान जैसे कि बीस हज़ार पाँच सौ फोरिन्ट (तकरीबन पाँच हज़ार आठ सौ) की एक टी-शर्ट या एक लाख पाँच हज़ार फोरिन्ट (तकरीबन तीस हज़ार रूपए) का एक बैग!! अपन तो बस ऐसी दुकानों और उनके ऐसे सामान को देख कर अचरज ही कर सकते थे और चकाचौंध हो सकते थे, फोटू नहीं लिए कि कहीं कोई उसके लिए थाम न ले!! :D

टहल टहलाकर शाम को वापस हॉस्टल पहुँचा। मेरी डॉर्मिटरी में से एक बंदा चला गया था और उसकी जगह एक वियतनामी व्यक्ति आकर ठहरा था। उससे बातचीत हुई तो पता चला कि वह अपने दफ़्तर के कार्य से जर्मनी में था और छुट्टियाँ मनाने बुडापेस्ट आया था। उसका नाम न्यूयेन थान हा (Nguyên Thanh Hà) था। मेरे बंक बेड (bunk bed) के नीचे वाले बंक और बाजू वाले बंक पर दो स्विस कन्याएँ थीं जिनसे बातचीत के दौरान पता चला कि वे स्विट्ज़रलैन्ड के फ्रेन्च भाषी इलाके से थीं, उनकी अंग्रेज़ी अधिक अच्छी नहीं थी और वे पूर्वी योरोप के भ्रमण पर निकली थीं।

डॉर्मिटरी के तीसरे और अंतिम बंक बेड पर नीचे न्यूज़ीलैन्ड (New Zealand) की एक कन्या थी जो कि पूर्वी योरोप के भ्रमण पर थी और उसके ऊपर वाले बंक पर शनिवार को एक अन्य कन्या थी लेकिन रविवार को वह चली गई थी और उसकी जगह एक जर्मन अंकल आ गए थे जो कि पचपन वर्ष की उम्र से अधिक थे तथा जर्मनी के म्यूनिक (Munich) शहर से बुडापेस्ट तक के तकरीबन एक हज़ार किलोमीटर के सड़क के रास्ते पर साइकिल चला के आए थे!! मैं अचरज भर गया, वाकई मन में जो बात ठान ली जाए और इरादों में दम हो तो कोई कार्य कठिन नहीं!! :)

रात्रि हो आई तो मैंने और वियतनामी सहयात्री ने भोजन कर आने की सोची, सप्ताहांत के कारण हॉस्टल के आसपास अधिकतर रेस्तरां आदि बंद थे, हॉस्टल के मैनेजर क्रिस ने जिस लोकल रेस्तरां के बारे में बताया था जहाँ हंगरियन खाना मिल जाएगा वह रेस्तरां काफ़ी भटकने के बाद भी हम को नहीं मिला तो हम दोनों ने सोचा कि यह अगले दिन आदि देख लेंगे और फिलहाल काम चलाने के लिए वेस्टेन्ड सिटी सेन्टर पहुँचे और वहाँ हंगरियन जंक फूड खाया गया। जो चीज़ ली थी उसका नाम तो ध्यान नहीं, माग्यार भाषा में कुछ अजीब सा नाम था जो तुरंत ही दिमाग से उतर गया था, बस इतना याद है कि बावर्ची के सुझाव पर उसको लिया गया था और वह फ्रेन्च फ्राई और चिकन का कुछ मिला जुला रूप था जिसके ऊपर सलाद आदि की ड्रेसिंग थी और साथ में एक बड़े गिलास में कोका कोला दी गई थी!! वह जो भी था स्वाद में बुरा नहीं था लेकिन बिना मसाले का सिर्फ़ नमक डला खाना था। उस समय भूख अधिक लग रही थी इसलिए स्वाद पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया।


खाने के बाद हम लोग मॉल की उस भूमिगत मंज़िल पर थोड़ा बहुत टहले, और उसके बाद टहलते हुए वापस हॉस्टल आ गए। अगले दिन सोमवार सुबह हम दोनों ने बुडा के किले जाने का निश्चय किया, वहाँ हाऊस ऑफ़ हंगरियन वाइन्स (House of Hungarian Wines) भी था और चूंकि मेरे पास बुडापेस्ट कार्ड था तो इसलिए फोकट में वाइन चख सकने की सुविधा थी और वाइन की खरीद पर पंद्रह प्रतिशत की छूट। :D साथ ही यह अलग बात पता थी कि बुडा किला देखने में काफ़ी अच्छा था, मथायस चर्च (Matthias Church) भी वहीं था और मछुआरे का बुर्ज (Fisherman’s Bastion) भी वहाँ था।

 
क्रमशः


वह मासूमियत …..


March 23rd, 2009 | 4 Comments

कुकुर नामक जीव से मुझे बचपन से ही लगाव रहा है, कदाचित्‌ इसलिए कि छुटपन में दो कुत्तों का साथ रहा है – एक अम्मा (अपनी दादी जी को मैं यही कहता था) का पाला हुआ शैतान रॉकी था और एक नानी जी के यहाँ भोला (और कभी नटखट) शेरू। रॉकी के साथ मेरा अधिक समय नहीं बीता, और वह जल्दी ही चल बसा था लेकिन शेरू के साथ मैं काफ़ी खेला। छुट्टियों में जब अधिक समय के लिए नानी जी के घर जाना होता तो शाम को शेरू के साथ खेलना होता, छुट्टी का दिन होता तो सबसे छोटे वाले मामा जी (पूरे घर में उनको शेरू सबसे अधिक प्रिय था, लाए भी वे ही थे उसको जब वह छोटा सा पिल्ला था) भी बाग में साथ चलते और गेंद अथवा फ्रिसबी फेंक शेरू के साथ खेलते। सोसाइटी के सभी बच्चे (और बड़े भी) शेरू से डरते कि कहीं काट न ले (मिक्स्ड अलसेशियन जाती का था शेरू) और मैं उनके डर पर अचरज करता कि कितने डरपोक हैं, शेरू से डरने वाली कोई बात न थी, वह तो बहुत ही भोला था और यदि कोई अंजान व्यक्ति पास आता तो थोड़ा गुर्रा देता था मात्र चेतावनी के तौर पर। कितने ही बच्चों का डर मैंने भगाया जब उनको आराम से शेरू का सिर सहलाने देता, यह शेरू को बहुत पसंद था और वह इसका आनंद लेने के लिए सदैव तैयार रहता, जमीन पर पसर जाता अपनी मुंडी नीचे करके और पास में यदि कोई भी घर का व्यक्ति हो तो किसी से भी सिर सहलवा लेता। तेरह-चौदह वर्ष की आयु में जब शेरू चल बसा तो मुझे बहुत दुख हुआ था, मैं भी तब इतनी ही उम्र का था और ऐसा लगा था कि मानो एक प्यारा मित्र बिछड़ गया, प्यारा मित्र ही तो था शेरू!!

हमारा घर जिस गली में है उसमें दो कुकुर (एक नर और एक मादा) तथा दो पिल्ले वास करते हैं। इधर मोहल्ले में हर गली आदि में कम से कम एक कुकुर तो है ही, सबके इलाके बंटे हुए हैं। कुछ दिनों से सामने वाले दूसरे मोहल्ले से 2-3 कुकुरों का एक गुंडा दल इधर आने लगा है और इधर वाले कुकुर उनको देख हल्ला कर देते हैं। गली के मुहाने पर लगा द्वार बंद भी होगा और गुंडे कुकुर उसके बाहर भी होंगे तो भी अपने लोकल कुकुर भौंक-२ के आसमान सिर पर उठा लेते हैं। अपन शांतिप्रिय स्वभाव वाले हैं इसलिए बेवजह का हल्ला पसंद नहीं। और ये कुकुर तो दिन-रात कुछ देखते ही नहीं, हमारे घर के बाहर मोर्चा जमा के बैठ जाते हैं और सुबह 3 या 4 बजे ही मोर्चा खोल देते हैं, जैसे ही गुंडे कुकुर दिखाई दिए वैसे ही मोर्चा खुल जाता है!! उस समय बहुत गुस्सा आता है, मन करता है कि डंडे से जमकर इन नामुरादों की सेवा कर दी जाए, लेकिन अभी तक इस ख्याल को अंजाम देने के लिए मन नहीं माना। लोकल कुकुरों में अपना कुछ डर है इसलिए घर के बाहर की बत्ती जला उनको ज़ुबानी खड़का दो तो अपनी कीर्तन मंडली को लेकर भाग जाते हैं और बाकी की रात्रि चैन से कट जाती है!

आज सुबह-२ ऐसे ही घर से बाहर निकला तो अपनी गली का कुकुर और उसका पिल्ला नज़र आए, घर के बाहर ही विराजमान थे क्योंकि मेरी माता जी भी बाहर ही थी और वे आशा कर रहे थे कि आज तो समय से पहले उनको माता जी नाश्ता दे देंगी!! ;) पिल्ले के चेहरे से जैसी मासूमियत टपक रही थी उसने मुझे शेरू की याद दिला दी। शेरू भी मुझको बिलकुल ऐसे ही मासूम भोली नज़र से देखता था! मन किया कि इस पिल्ले की फोटू ले ली जाए, तो झट से कैमरा निकाल मैं बाहर आया। मुझे कैमरे के साथ देखा तो पिल्ला अपनी पिछली टाँगों पर आराम से बैठ गया ताकि मैं उसका पोर्ट्रेट ले सकूँ। भोली नज़र है पिल्ले की लेकिन है समझदार, अपने आप ही पोज़ बना लिया फोटू खिंचवाने के लिए! :) और मैं सोच रहा था कि रात को यही कमबख्त पिल्ला सबसे तेज़ भौंक के रात्रि की शांति भंग करेगा और मैं उसको पुनः गलियाऊँगा!!


कॉमिक्स से उपन्यास तक…..


February 12th, 2009 | 8 Comments

उपन्यास….. इनको पढ़ना पहली बार तब हुआ जब मैं चौथी या पाँचवीं कक्षा में था। उस समय जिस स्कूल में था वहाँ तो पुस्तकालय के नाम पर एक दड़बा टाइप कमरा था जहाँ कम से कम हम लोगों का प्रवेश वर्जित था। उन दिनों मैं कॉमिक्स पढ़ा करता था। छुट्टियों में नानी जी के घर आया हुआ था तब की बात है, एक दिन मौसी अपने कॉलेज के पुस्तकालय से प्रेमचन्द के दो उपन्यास – गोदान और गबन – लाईं अपने पढ़ने के लिए। एक तो वे पहले से ही पढ़ना आरंभ कर चुकीं थीं तो कौतुहलवश दूसरे को मैंने पढ़ना आरंभ किया, कौन सा पहले पढ़ा यह ध्यान नहीं लेकिन अंत-पंत दोनों पढ़े। उसके बाद सेवासदन और मानसरोवर भी पढ़े, माँ और मौसी हैरानी से देखते थे कि कैसे पढ़ पा रहा हूँ ऐसे गंभीर उपन्यास लेकिन मुझे समझ में यह नहीं आता कि वे इनको इतना हाई-फाई क्यों मानते थे, एक कहानी ही थी और कुछेक चीज़ों को छोड़ सब समझ आ ही रहा था मुझे, मैं तो मात्र एक कहानी के रूप में ही उनको पढ़ रहा था। प्रेमचन्द के चार उपन्यास पढ़ डाले लेकिन लेखन स्टाईल मुझे पसंद नहीं आया, कहानियाँ रोचक न लगीं!!

छठी कक्षा में स्कूल बदला, अब बड़े और औकात वाले स्कूल में दाखिला दिलाया गया था, वहाँ पुस्तकालय बड़ा था, ढेर सारी किताबें थीं, इतनी किताबें मैंने कभी एक जगह नहीं देखीं थी!! पता चला कि सप्ताह में एक पीरियड में हम लोग पुस्तकालय में जाया करेंगे, एक सप्ताह हिन्दी के पीरियड में और एक सप्ताह अंग्रेज़ी के पीरियड में। हिन्दी वाले पीरियड में हिन्दी की कोई भी पुस्तक ले सकते हैं और अंग्रेज़ी वाले पीरियड में अंग्रेज़ी की एक पुस्तक, एक बार में एक ही किताब ले जाने दी जाएगी!! अब स्कूल की किताबों के अतिरिक्त मेरा पाला सिर्फ़ कॉमिक्स से ही पड़ा था या फिर उन कुछ गिनी चुनी टॉलस्टॉय (Tolstoy) आदि की कहानी की किताबों से जो पिताजी ने लाकर दीं थी। इसलिए शुरुआत में थोड़ी असमंजस की स्थिति थी कि क्या लिया जाए, कौन सी किताब लें। साथियों से सुझाव माँगे गए, एक मित्र जी.आई.जो (G.I.Joe) की किताब ले रहा था तो उसने मुझे भी वैसी ही एक किताब थमा दी और बता दिया कि कैसे उसको पढ़ा जाता है। दरअसल वह पुस्तकें एक खेल भी होती थीं, हर पन्ना आदि पढ़ने के बाद निश्चय करना होता था कि पात्र आगे क्या करेंगे और उसके अनुसार पन्ने के अंत में दिए विकल्पों में से एक को चुन निर्धारित पन्ने पर जाना होता था आगे की कहानी के लिए, यदि पाठक सही निर्णय लेता है स्थिति के अनुसार तो वह मिशन के अंत में विजयी होगा अन्यथा हार जाएगा। शुरु में इनको पढ़ने में बहुत मज़ा आता था।

इधर हिन्दी की कक्षा में अध्यापिका ने प्रेमचन्द का ज़िक्र पता नहीं किस बात पर छेड़ा कि वह आधुनिक काल के एक महान उपन्यासकार थे तो मैंने कहा कि मैंने पिछले वर्ष उनके चार उपन्यास पढ़े थे जो कि बिलकुल बोर थे। अध्यापिका के लिए हम सभी नए विद्यार्थी थे इसलिए वह किसी को अधिक न जान पाईं थी, तो उन्होंने सोचा कि मैं खामखा की फेंक रहा हूँ और डपट के मुझे बिठा दिया गया!! इधर कुछ समय बाद एक अन्य सहपाठी ने कहा कि बच्चों की किताबें पढ़नी बंद करूँ और उसने जी.आई.जो (G.I.Joe) की जगह मेरे हाथ में हार्डी ब्वॉयस (Hardy Boys) का एक उपन्यास थमा दिया, तो तब मैंने हार्डी ब्वॉयस के उपन्यास पढ़ने आरंभ किए!! ये किरदार मुझे भा गए, कहानियाँ इनकी रोचक लगने लगीं!!

हार्डी ब्वॉयस के उपन्यासों का रोग तीन वर्ष रहा – कक्षा सात, आठ और नौ तक!! इस दौरान हाल यह था कि अंग्रेज़ी की या हिन्दी की कक्षा में मैं पीछे बैठ जाता और टेबल के नीचे रखकर भी उपन्यास पढ़ता, घर वापसी जाते समय बस में पढ़ता, घर में तो खैर पढ़ता ही था। मज़े की बात यह रही कि कभी कक्षा में उपन्यास पढ़ते हुए पकड़ा नहीं गया!! ;) स्कूल के पुस्तकालय में मौजूद जब सभी हार्डी ब्वॉयस के उपन्यास पढ़ डाले तो उनको बाज़ार से खरीदना आरंभ किया। आठवीं कक्षा में था तब घर बदल लिया गया था और रिहाइश के लिए मौजूदा इलाके में पधार चुके थे, इधर के बड़े बाज़ार में एक खटिया पर एक मद्रासी व्यक्ति किताबें लगाता था, विदेशी उपन्यासों की देशी नकल भी और पुराने उपन्यास भी। तो इसी से रेट सैट किया गया, बीस रूपए में वह हार्डी ब्वॉयस का एक पुराना सेकन्ड हैन्ड उपन्यास देता और दस रूपए में वापस ले लेता, चाहे जितने मर्ज़ी समय बाद वापस करो। तो जो उपन्यास मुझे खासा पसंद आता उसको मैं रख लेता बाकी सभी पढ़-पढ़कर निकालता रहता।

कॉमिक्स वाले किस्से के अंत में मैंने ज़िक्र किया था कि जिससे उस समय कॉमिक्स लाता था उससे हुए मतभेद को लेकर कॉमिक्स पढ़ने का सिलसिला रूक गया था। तो जिस समय मैंने उन मद्रासी बाबू से हार्डी ब्वॉयस के उपन्यास लेने आरंभ किए थे उस समय इस लड़के से परिचय नहीं हुआ था, लेकिन कुछ समय बाद इसकी दुकान का भी पता चला जो कि उसी बाज़ार में अंदर को थी। अब चूंकि यह लड़का ज़रा स्याना था तो इसलिए यह हार्डी ब्वॉयस के उपन्यास पचास रूपए में देता था, तो मैंने उसके रेट को मान लिया लेकिन सैटिंग यह की गई कि चालीस रूपए में उपन्यास वापस लेना होगा जिसको उसने मान लिया। वह सोच रहा था कि मेरे को मूर्ख बना रहा है लेकिन असलियत जान लेता तो अपने बाल नोच लेता। क्यों? वह इसलिए कि मैं बाहर बैठे मद्रासी बाबू से बीस रूपए में हार्डी ब्वॉयस का उपन्यास लेता, उसको आराम से पढ़ता और फिर उसी उपन्यास को मद्रासी बाबू को वापस देने की जगह उस लड़के को चालीस रूपए में दे आता, जिसके बदले कभी उससे रोकड़ा लिया जाता तो कभी कोई दूसरा हार्डी ब्वॉयस का उपन्यास!! अब इसी को तो कहते हैं – आम के आम गुठलियों के दाम!! :D

खैर, नौवीं कक्षा में आने पर स्तर थोड़ा और बढ़ गया था – इस समय अगाथा क्रिस्टी (Agatha Christie) के उपन्यास, खासकर हर्क्यूल पॉयराट (Hercule Poirot) वाले उपन्यास, पढ़ने आरंभ कर दिए। नौवीं कक्षा में आने का एक लाभ यह मिला था कि पुस्तकालय जाने की सप्ताह की बंदिश समाप्त हो गई थी, कभी भी पुस्तकालय जा सकते थे और दो किताबें ला सकते थे, किसी मित्र का कार्ड खाली हुआ तो उस पर भी ले आने की छूट थी। तो नियम से मैं रोज़ाना एक या दो उपन्यास ले जाता और अगले दिन उनको लौटा के दूसरे लेता। और इधर घरवाले परेशान रहते कि लड़का हर समय उपन्यासों में लगा रहता है, स्कूल में जब था तब तो डपट दिया जाता लेकिन कॉलेज में आने के बाद डाँट पड़नी कम हो गई, पढ़ाई हो जाती और इम्तिहान में नंबर आ जाते, तो कैसे उपन्यास पढ़ने से रोका जाए!! लेकिन कॉलेज में आते-२ उपन्यासों का सिलसिला धीरे-२ कम होता गया, कॉलेज पास कर निकला तो सीधे ही नौकरी लगी और उस समय तो सुबह जल्दी जाना और रात देर से आना, पढ़ने का समय ही नहीं मिलता था। कुछ समय बाद दूसरी कंपनी में नौकरी बदली तो समय निकलने लगा और धीरे-२ कर थोड़ा बहुत उपन्यास पठन पुनः आरंभ हुआ।

अब आज भी समय मिलता है तो सप्ताह आदि लगकर उपन्यास समाप्त कर दिया जाता है, लेकिन पढ़ने की जो गति स्कूल के दिनों में थी वह आज नहीं रही है। स्कूली दिनों में रोज़ाना एक या दो उपन्यास निपटा दिए जाते थे, ग्यारवीं कक्षा तक आते-२ पुस्तकालय के सभी उपन्यास पढ़ डाले थे, लेकिन आज सप्ताह दस दिन में उपन्यास समाप्त होता है तो बड़ी बात लगती है!! खैर, उस समय अन्य कोई खास काम नहीं होता था, आजकल ब्लॉगिंग जैसे कीड़े भी पाल रखे हैं तो उनको भी थोड़ा समय चाहिए!!


बुडापेस्ट – एक सफ़रनामा – भाग २


November 3rd, 2008 | 9 Comments

….. पिछले भाग से आगे

हॉस्टल वालों की ओर से भेजे गए व्यक्ति की फिएट पुन्टो (Fiat Punto) में सवार हो अपन हॉस्टल की ओर बढ़े चले जा रहे थे। सड़कें काफ़ी चौड़ी और सपाट थी, दिल्ली के सड़क से सजे गड्ढे नहीं नज़र आए, आधे घंटे की उस सवारी में मैं प्रतीक्षा करता रहा कि अब झटका लगेगा, अब कोई गड्ढा आएगा, लेकिन सड़क निकलती जा रही थी और मुझे टेन्शन होते जा रही थी कि क्या वाकई गाड़ी सड़क पर चल रही है!! मन में आशंका हुई कि कहीं इस गाड़ी में बड़े बोस साहब का सस्पेन्शन (suspension) सिस्टम तो नहीं लगा जो गाड़ी में बैठे लोगों को गड्ढे का एहसास ही न होने देता हो, मन में आया कि ड्राईवर से पूछ लूँ लेकिन फिर यह सोच के रह गया कि अभी तो वह एक रिसर्च प्रोजेक्ट ही है इसलिए प्रोडक्शन में न आया होगा। कौतूहल था ही इसलिए खिड़की से बाहर भी सब देख रहा था, जगह-२ बड़े-२ विज्ञापन वाले होर्डिंग दिखाई दे जाते, कोई मोबाइल फोन बेचने का होता तो कोई गाड़ी का, एक समानता जो उन सब में देखी वह यह कि सभी विज्ञापन माग्यार (Magyar) भाषा में थे, अंग्रेज़ी में कोई न दिखा। और तो और, सड़क चौराहों आदि पर लगे निर्देश आदि भी सभी माग्यार भाषा में थे!! कुछ लोग इसको निज भाषा प्रेम कहेंगे जो कि गलत नहीं है लेकिन यह साथ ही साथ पर्यटन के लिए बुरा है, पर्यटकों से माग्यार भाषा की समझ की अपेक्षा करना निरी मूर्खता से अधिक नहीं। इस लिहाज़ से दिल्ली बहुत अच्छी है जहाँ पर्यटक भटक न जाएँ इसका पूरा ख्याल रखा हुआ है और सड़कों आदि पर दिशा निर्देश वगैरह हिन्दी के साथ-२ अंग्रेज़ी में भी हैं!!

बहरहाल, आधे घंटे में हम लोग ऐबॉरिजनल हॉस्टल (Aboriginal Hostel) पहुँच गए जो कि पेस्ट में रॉकोज़ी गली (Rackozi Utca) के ट्रॉम स्टॉप के पास ही स्थित है। हॉस्टल में उस दिन मैनेजर की ड्यूटी क्रिस (Chris) की थी जिसको मैंने अपना ऑनलाईन किए गए आरक्षण की रसीद दिखाई और वह मुझे मेरी डॉर्मिटरी (Dormitory) में ले गया। आगे बढ़ने से पहले हवाई अड्डे से हॉस्टल लाने वाले ड्राईवर को सौ फोरिन्ट (लगभग तेतीस रूपए) की बक्शीश देकर विदा किया। बुडापेस्ट का यह रिवाज़ है कि वहाँ सेवा आदि देने वाला हर व्यक्ति बक्शीश की अपेक्षा करता है, न देने को अभद्र समझा जाता है!! यह हॉस्टल एक अपार्टमेन्ट बिल्डिंग में स्थित है जो कि बहुत ही शांत थी, मानो ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे पूरी इमारत में कोई रहता ही न हो!! इस हॉस्टल में मिलने वाली एक खासियत यह थी कि इंटरनेट प्रयोग मुफ़्त था जो कि काफ़ी अच्छी बात थी (काहे यह आगे बताते हैं), वाई-फाई (WiFi) भी था कि यदि कोई अपना लैपटॉप लाया हो तो प्रयोग कर ले और हॉस्टल के दो कंप्यूटर मौजूद ही थे। मैं अपनी लोनली प्लैनेट (Lonely Planet) की बुडापेस्ट गाइडबुक और योरोप ऑन अ शूस्ट्रिंग (Europe on a Shoestring) खोल के बैठ गया ताकि दिमाग में सूचि बना ली जाए कि उस दिन क्या करना है। मार्ग आदि जाँचने के लिए बुडापेस्ट हवाई अड्डे पर हंगरिअन पर्यटन के काउंटर (जहाँ से बुडापेस्ट कार्ड लिया) से लिए गए बड़े नक्शे को देखने की सोची लेकिन तभी पता चला कि वो दो फोकटी नक्शे और बुडापेस्ट पर छपी पुस्तिकाएँ तो गाड़ी में ही रह गए और वो बंदा तो जा चुका था कब का!! तो जाकर क्रिस से बात की, उसने मुझे यात्रियों के लिए रखे हुए फोकटी नक्शों में से एक दे दिया, उस पर देखने योग्य स्थान भी बता दिए और उन तक कैसे पहुँचा जाए यह भी बताया। और भी अन्य आम जानकारी मैंने क्रिस से हासिल की जैसे कि ट्रॉम, मेट्रो और बस में टिकट कैसे लगती है, कौन से रंग वाली ट्रॉम और मेट्रो कहाँ जाती है इत्यादि।

बुडापेस्ट में ट्रॉम, मेट्रो और बसों का ज़रा अलग सिस्टम है। दो ट्रॉम लाइन हैं, तीन लाइन मेट्रो की हैं (दिल्ली में भी अभी तीन लाइन हैं मेट्रो की) और बसें तो खैर आम हैं। इन सब में एक ही टिकट चलती है और टिकट अलग-२ मूल्य की नहीं वरन्‌ एक ही मूल्य की है। यदि एक टिकट ली जाए तो वह ढाई सौ फोरिन्ट (लगभग सत्तर रूपए) की मिलती है, इसलिए दस टिकट की बुकलेट लेना बेहतर होता है क्योंकि वह तेइस सौ फोरिन्ट (लगभग छह सौ सत्तावन रूपए) की मिलती है यानि कि दो सौ फोरिन्ट की बचत होती है। टिकट आप या तो मेट्रो स्टेशन पर मौजूद टिकट काउंटर से खरीद सकते हैं या फिर ट्रॉम स्टॉप और मेट्रो स्टेशन आदि पर लगी स्वचालित मशीनों में फोरिन्ट के सिक्के डाल के खरीद सकते हैं। लेकिन मशीनों से एक-एक करके ही टिकट ले सकते हैं, दस टिकट की बुकलेट तो टिकट काउंटर से ही मिलती है। यदि आप बुडापेस्ट में सप्ताह भर हैं और यदि आपका बस, ट्रॉम अथवा मेट्रो में बीस या उससे अधिक बार जाना होगा तो सप्ताह भर के लिए पॉस बनवा लेना बेहतर होता है। सप्ताह का पॉस तकरीबन चार हज़ार फोरिन्ट (लगभग ग्यारह सौ सत्तर रूपए) का बनता है और उससे सप्ताह भर किसी भी बस, ट्रॉम और मेट्रो में असीमित यात्रा की जा सकती है। इसी तरह मासिक पॉस भी बनता है लेकिन उसके लिए फोटो दरकार होता है। ट्रॉम अथवा बस में कंडक्टर नहीं होता जो टिकट देखेगा, इनमें द्वार के पास ही एक मशीनी डब्बा लगा होता है जिसमें टिकट घुसा के स्टैम्प लगवाई जाती है। मेट्रो में प्लेटफॉर्म पर जाने से पहले द्वार पर ऐसे डब्बे लगे होते हैं जिनमें टिकट घुसा स्टैम्प करो और टिकट वापस खींच आगे बढ़ जाओ। इन तीनों में ही सादे लिबास में खूफ़िया पुलिस की भांति टिकट चैक करने वाले घूमते रहते हैं जो कहीं भी कभी भी किसी से भी टिकट माँग सकते हैं और यदि उस समय आपके पास उस समय की स्टैम्प लगी टिकट अथवा पॉस न हुआ तो तगड़ा जुर्माना लगा दिया जाता है!! अब क्योंकि मैंने 48 घंटे का बुडापेस्ट कार्ड बनवाया था तो उस कार्ड पर एक सहूलियत यह थी कि मैं मेट्रो, ट्रॉम और बस में असीमित यात्रा कर सकता था इसलिए पहले दो दिन की तो अपने को दिक्कत ही नहीं थी। :)

तीन-चार घंटे बाद मैंने तफ़रीह के लिए बाहर निकलने की सोची, अपने बैग में कैमरा, नक्शे आदि डाले और निकल पड़ा। हॉस्टल की इमारत से बाहर आकर आसपास का इलाका देखा तो जाना कि पूरा इलाका ही बहुत शांत है, कोई हल्ला-गुल्ला नहीं बिलकुल भी, एकदम सुनसान सा माहौल। सभी इमारतें स्लेटी और ग्रे रंग की पुरानी सी प्रतीत होती, बिलकुल ऐसी लग रही थीं जैसे द्वितीय विश्वयुद्ध के समय पर बनी किसी डॉक्यूमेन्टरी (Documentary) फिल्म से निकल आई हों जबकि वे सभी इमारतें कम्यूनिस्ट काल का प्रतीक हैं जिस दौरान एक से ढर्रे पर इमारतें बनती और सभी को गहरे स्लेटी या ग्रे रंग में रंग दिया जाता।

अब चूँकि मैं दस दिनों के लिए परदेस में था और ऑफिस के मोबाइल कनेक्शन पर इंटरनेशनल रोमिंग पर था इसलिए माँ जब मन चाहा तब फोन कर बात नहीं कर सकती थीं, इसलिए घर से निकलने से पहले हुक्म हुआ था कि मैं प्रतिदिन एक बार फोन करके अपने कुशलक्षेम की जानकारी दूँ!! माँ आखिर माँ होती है, इसलिए कभी-२ इतने लाड़ और फिक्र से खीज भी हो जाती है और कभी बहुत ही सुकून मिलता है। :) बहरहाल, अब हुक्म हुआ था तो बजाना ही था, मोबाइल से फोन करना बेवकूफ़ी होती, और सिक्का डाल पब्लिक फोन से बात करना भी। इसलिए एक अंतर्राष्ट्रीय फोन कार्ड लेना था, इस बारे में हॉस्टल में क्रिस से पूछा था तो उसने ईज़ीकार्ड (easycard) लेने का सुझाव दिया था क्योंकि उसका कॉलरेट सस्ता था। हॉस्टल से बाहर निकल कुछ दूरी पर मौजूद दुकान में पता किया तो उसके पास चार-पाँच तरह के कार्ड थे लेकिन इज़ीकार्ड न था और अन्य किसी के रेट मुझे जंचे नहीं। तो मैंने सोचा कि आगे कहीं अन्यत्र देखेंगे और मैं राकोज़ी ट्रॉम स्टॉप की ओर बढ़ गया और वहाँ से मैं बुडा शहर की ओर जाने वाली ट्रॉम में सवार हो गया।

बुडापेस्ट दरअसल दो शहरों को मिला के बना है, ठीक उसी तरह जिस तरह भारत की राजधानी दिल्ली सात शहरों को मिलाकर बनी। लेकिन दिल्ली के सात शहर अब लुप्त हो चुके हैं और अब सिर्फ़ उपनगर रह गए हैं, जबकि बुडापेस्ट में आज भी उसके दोनों शहरों की अपनी पहचान कायम है। बुडापेस्ट शहर बुडा और पेस्ट शहरों को मिला के बनता है और इसके बीच में से बहती है डैन्यूब नदी। डैन्यूब (Danube) नदी जर्मनी में ब्लैक फॉरेस्ट (Black Forest) से आरंभ होती है और दस देशों से होती हुई और 2850 किलोमीटर का सफ़र करती हुई ब्लैक सी (Black Sea) में विलीन हो जाती है। यही नदी बुडापेस्ट को दो भागों में बाँटती है, पूर्व में पेस्ट (Pest) तथा पश्चिम में बुडा (Buda) शहर। बुडा और पेस्ट को जोड़ने के लिए डैन्यूब पर नौ पुल हैं जिसमें कुछ ट्रेनों के लिए हैं और कुछ गाड़ियों के लिए।

तकरीबन पच्चीस मिनट लगे और वातानुकूलित ट्रॉम ने बुडा के आखिरी स्टॉप पर पहुँचा दिया। बुडा शहर पेस्ट से अलग ही लग रहा था, वहाँ चहल-पहल दिखाई दी। थोड़ा आगे बढ़ा तो एक साइबर कैफ़े का बोर्ड लगा दिखाई दिया तो मैं उसमें प्रवेश कर गया। वहाँ मौजूद महिला से फोन कार्ड के बारे में पता किया तो उसने मुझे उपलब्ध सभी कार्ड के पर्चे दे दिए जिन पर उन सभी के कॉल रेट छपे थे। उसने मुझसे पूछा कि मुझे कहाँ फोन करना है तो मैंने बताया कि मुझे भारत फोन करना है तो उसने एक कार्ड छाँट के निकाल दिया जिसका रेट कम था। मैंने एक हज़ार फोरिन्ट की कीमत का वह कार्ड खरीद लिया, उस पर भारत फोन करने का कॉल रेट बावन फोरिन्ट (लगभग पंद्रह रूपए) प्रति मिनट था। कॉर्ड लेकर मैं बाहर निकला और ट्रॉम स्टॉप पर लगे पब्लिक टेलीफोनों में से एक पर पहुँच घर फोन मिलाया। स्थानीय समयानुसार शाम के तकरीबन साढ़े चार बजे थे और दिल्ली में उस समय रात के लगभग नौ बज रहे थे, फोन पर मेरे सकुशल पहुँच जाने की बात सुन माँ ने चैन की साँस ली और फिर डाँटा कि फोन करने में इतनी देर क्यों लगाई!! लो कर लो बात, फिर पूरा प्रकरण विस्तार से समझाया जिसमें खामखा के तेरह मिनट खप गए, कार्ड में भारत फोन करने के लिए लगभग छह मिनट और बाकी थे इसलिए बात समाप्त कर फोन बंद किया।

अभी मैंने कहा कि यह एक बढ़िया बात थी कि हॉस्टल में मुफ़्त इंटरनेट उपलब्ध था। अब यह बढ़िया बात इसलिए थी कि बुडापेस्ट में साइबर कैफ़े भी महंगे हैं, इंटरनेट प्रयोग करने का औसत रेट तीन सौ फोरिन्ट प्रति घंटा था। अधिकतर जगहों पर तो मैंने तीन सौ से साढ़े चार सौ प्रति घंटे का रेट ही देखा, एक-दो जगह ही डेढ़ सौ फोरिन्ट प्रति घंटे का रेट दिखाई दिया।

आगे पैदल ही टहलने का इरादा था तो डैन्यूब पर बने मार्गरेट पुल की ओर जाती सड़क पर निकल लिया। थोड़ा आगे जाकर हाथियों के पूर्वज प्रागैतिहासिक (pre-historic) जीव मैमथ (Mammoth) की एक मूर्ती नज़र आई, पता चला कि उसके पीछे की इमारत शॉपिंग मॉल (Shopping Mall) मामूत प्रथम (Mammut I) है। मामूत (Mammut) अंग्रेज़ी के मैमथ के लिए माग्यार भाषा का शब्द है। उसी इमारत के बगल में एक उससे काफ़ी बड़ी इमारत दिखाई दी जो कि पता चला मामूत द्वितीय (Mammut II) है जो कि बुडा का सबसे बड़ा शॉपिंग मॉल है। दिखने में तो कोई खास बड़ी लग नहीं रही थी ये इमारत भी, इससे बड़े-२ शॉपिंग मॉल तो अपने यहाँ गुड़गाँव और नोएडा में हैं और ये लोग खामखा मैमथ का नाम बदनाम कर रहे हैं छोटी-मोटी चीज़ों के साथ जोड़ कर!! लेकिन सोचा कि अब जैसी भी है, अंदर से भी देख ही आते हैं, तो अपन अंदर हो लिए।


अंदर से भी मॉल कुछ खास नहीं था, बल्कि अंदर से तो मुझे और भी छोटा लगा वह। मैं कोई दुकान देख रहा था जहाँ सस्ती सी एक बेल्ट मिल जाए, अपनी बेल्ट मैं सामान में रखना भूल गया था और बिना बेल्ट पंगा हो जाता। लेकिन कोई दुकान काम की न दिखी, एक दुकान पर बेल्ट दिखी भी लेकिन वे सब डिज़ाइनर बेल्ट थीं जिन पर पता नहीं कैसी-२ कारीगरी की हुई थी, अपने को तो साधारण सी बेल्ट चाहिए थी। कुछ समय मॉल में टहल अपन वापस ट्रॉम स्टॉप पर आ गए और वापसी की ट्रॉम में सवार हुए। वापसी में ब्लाहा टर्मिनल (Blaha ter.) पर उतरा जो कि राकोज़ी वाले ट्रॉम स्टॉप से पहले वाला स्टॉप है और जो कि एक मेट्रो स्टेशन भी है। एक बात जो मैं पेस्ट में हर जगह देख रहा था वह यह कि लगभग सभी दुकानें आदि बंद थीं। यह तो बाद में पता चला कि सप्ताहांत पर दुकानें और रेस्तरां बंद होते हैं। सभी रेस्तरां बंद नहीं होते लेकिन मैंने कई बंद देखे। सड़क किनारे छोटे कैफ़े और अंतर्राष्ट्रीय रेस्तरां जैसे कि मैकडॉनल्ड, बर्गर किंग, सब वे, पिज़्ज़ा हट आदि खुले थे।

शाम के साढ़े छह बज रहे थे और भूख लग रही थी तो मैंने रात्रि भोजन कर लेने की सोची, हॉस्टल जाकर वापसी आने में आलस्य आता। बर्गर किंग (Burger King) का काफ़ी नाम सुना था, यह अमेरिकी रेस्तरां चेन है मैकडॉनल्ड की भांति जिसमें प्रसिद्ध अमेरिकी चीज़ बर्गर (American Cheese Burger) मिलता है (जिसमें बीफ़ की टिक्की लगी होती है)। तो ब्लाहा टर्मिनल के पास ही एक बर्गर किंग दिखा और अपन वहीं चले गए। अन्य चीज़ों की भांति खाना भी महंगा ही है बुडापेस्ट में। एक बर्गर, फ्रेन्च फ्राइज़ और कोक वाले कॉम्बो (Combo) के कोई तेरह सौ फोरिन्ट अदा किए (लगभग तीन सौ सत्तर रूपए) और सोचा कि अपना भारत बढ़िया है जहाँ ऐसा मांसाहारी कॉम्बो एक सौ तीस रूपए में आ जाता है!! बर्गर बहुत ही बेस्वाद और बद्‌मज़ा था। अब ऐसा नहीं है कि मैंने बीफ़ पहली बार खाया हो इसलिए पसंद नहीं आया, बीफ़ पहले भी खाया है और बद्‌मज़ा नहीं लगा लेकिन बर्गर किंग का बर्गर वाहियात था!!

बहरहाल खा पी कर अपन टहलते हुए वापस हॉस्टल पहुँचे। इमारत कें अंदर जाने के लिए द्वार पर लगे कीपैड (Keypad) पर पॉसवर्ड डालना पड़ता है, सही पॉसवर्ड पर ही द्वार खुलता है। पॉसवर्ड मुझे क्रिस ने पहले ही दे दिया था इसलिए कोई समस्या ही नहीं थी। हॉस्टल में जाकर देखा तो क्रिस के साथ एक और बंदा बतिया रहा था, परिचय हुआ तो पता चला उसका नाम फिल (Phil) है और वह भी क्रिस की तरह हॉस्टल में ही ड्यूटी देता है लेकिन उस दिन उसकी छुट्टी थी। मैं भी उनके साथ बतियाने लगा तो बातों में पता चला कि क्रिस एक ब्रिटिश नागरिक है और फिल पुर्तगाल का रहने वाला है।

कुछ देर क्रिस और फिल से बतियाने के बाद मैं अपनी डॉर्मिटरी में आ अपने बिस्तर पर पसर गया और अपने साथ लाई गई जे.आर.आर.टोल्किन (J.R.R.Tolkien) की द हॉब्बिट (The Hobbit) पढ़ने लगा जो कि लॉर्ड ऑफ़ द रिंग्स (Lord of the Rings) की कथा से पहले की कथा है। पढ़ते-२ समय बीता, नींद सी आने लगी तो किताब रख दी। बिस्तर के बगल में मौजूद खिड़की पर नज़र डाली तो पाया कि अंधेरा होने लगा था, घड़ी देखी तो जाना कि स्थानीय समय के अनुसार रात के साढ़े नौ बज रहे थे, यानि कि गर्मियों में रात नौ बजे तक सूर्यास्त नहीं होता!!

पिछले दो वर्षों में घर से दूर कई यात्राओं पर गया लेकिन कभी होमसिकनेस (Homesickness) महसूस नहीं हुई, कदाचित्‌ इसलिए कि हर बार भारत में ही यात्रा की अपने लोगों के बीच और मित्रों के साथ। जबकि इस बार अकेला था और एक अंजान जगह पर अंजान माहौल और अंजान लोगों के बीच जिनको न मैं समझता था और न जो मुझे समझते थे!! कदाचित्‌ इसलिए ही घर की दूरी खल रही थी। नींद आ रही थी तो मैंने सो जाना बेहतर समझा यह सोच कि अगले रोज़ नया दिन निकलेगा!! :)

 
अगले भाग में जारी …..


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