पिछला जो गाना अपने मोबाइल की रिंग बैक टोन/कॉलर ट्यून के रूप में सैट किया था वो माता जी को पसंद नहीं आया, बोलीं कि क्या रोता सा गाना लगा रखा है कुछ अच्छा सा खुशनुमा गीत लगाऊँ। तो मैं भी सोच में पड़ गया कि गाना तो बढ़िया है परन्तु जंच नहीं रहा, ऐसा एकाध मित्र ने भी कहा। तो अपन पुनः पहुँचे एमटीएनएल की प्लेट्यून्स वेबसाइट पर और लगा पुनः तलाशने किसी ढंग के गाने को। आजकल के जो नए गाने उसमें उपलब्ध हैं वो कुछ खास पसंद न आए तो पुराने गाने सुनने लगा। मन्ना डे, हेमंत कुमार और किशोर कुमार के कई गाने सुनने के बाद आखिरकार एक गाना पसंद आया हेमन्त कुमार का गाया हुआ सन् 1969 में आई फिल्म खामोशी का – तुम पुकार लो
तुम ऽऽऽ पुकार लो, तुम्हारा इंतज़ार है,
तुम ऽऽऽ पुकार लो।
ख़्वाब चुन रही है रात बेक़रार है,
तुम्हारा ऽऽ इंतज़ार है,
तुम ऽऽऽ पुकार लो।होंठ पे लिए हुए दिल की बात हम,
जागते रहेंगे और कितनी रात हम। – २
मुक़्तसर सी बात है तुम से प्यार है
तुम्हारा ऽऽ इंतज़ार है,
तुम ऽऽऽ पुकार लो।दिल बहल तो जाएगा इस ख्याल से,
हाल मिल गया तुम्हारा अपने हाल से। – २
रात ये क़रार की बेक़रार है,
तुम्हारा ऽऽ इंतज़ार है।
गुलज़ार साहब का लिखा हुआ यह गीत बहुत सुंदर है। उनके लिखे गए जो गीत मैंने अभी तक सुने हैं उनमें एक बात देखी है, बोल अधिक नहीं होते हैं और गीत छोटा ही होता है, जिस भी फिल्म के लिए लिखते हैं तो अधिक नहीं लिखते हैं लेकिन गीत सारे एक से बढ़कर एक बढ़िया और सुन्दर होते हैं – गोया मतलब यह है कि वे मात्रा से अधिक गुणवत्ता पर ध्यान देते हैं।
इस गाने का वीडियो आप यहाँ देख सकते हैं।
खैर, पंगा यह कि गाना यह भी खुशनुमा नहीं, तो इसलिए तलाशते हुए दूसरे गाने पर निगाह और कान गए, यह था सन् 1962 में आई विश्वजीत और वहीदा रहमान की फिल्म बीस साल बाद के गीत “हमको बेक़रार करके यूँ न जाईये” जो कि पुनः हेमन्त कुमार द्वारा गाया एक खूबसूरत गीत है जिसको शकील बदायुनी ने लिखा था।
बेक़रार करके हमें यूँ न जाईये,
आपको हमारी कसम लौट आईये। – २देखिए वो काली काली बदलियाँ,
ज़ुल्फ़ की घटा चुरा न लें कहीं,
चोरी चोरी आ के शोख बिजलियाँ,
आपकी अदा चुरा न लें कहीं,
यूँ कदम अकेले न आगे बढ़ाईये,
आपको हमारी कसम लौट आईये।बेक़रार करके हमें यूँ न जाईये,
आपको हमारी कसम लौट आईये।देखिए गुलाब की वो डालियाँ,
बढ़के चूम लें न आपके कदम। – २
खोए खोए भंवरें भी हैं बाग़ में,
कोई आपको बना न ले सनम,
बहकी बहकी नज़रों से खुद को बचाईये,
आपको हमारी कसम लौट आईये।बेक़रार करके हमें यूँ न जाईये,
आपको हमारी कसम लौट आईये।ज़िंदगी के रास्ते अजीब हैं,
इनमें इस तरह चला न कीजिए,
खैर है इसी में आपकी हुज़ूर,
अपना कोई साथी ढूँढ लीजिए,
सुन के दिल की बात न मुस्कुराईये,
आपको हमारी कसम लौट आईये।बेक़रार करके हमें यूँ न जाईये,
आपको हमारी कसम लौट आईये। – २
कॉलर ट्यून में इस गाने का सैम्पल सुनने के बाद ये इतना पसंद आया कि यूट्यूब पर इसका वीडियो खोजा और पूरा गाना सुना और देखा। ये गाना अपने को बहुत सही लगा, खुशनुमा का खुशनुमा भी है, तो इसको अब अपनी कॉलर ट्यून के रूप में सैट कर लिया।
आप इस गाने का वीडियो यहाँ देख सकते हैं।
कल रात यूँ ही एमटीएनएल (MTNL) प्लेट्यून वेबसाइट देख रहा था कि कोई ढंग का गाना वहाँ आ गया हो तो उसको अपनी रिंग बैक टोन (Ring Back Tone) के तौर पर सैट कर लूँ। रिंग बैक टोन वह होती है जो आपको तब सुनाई देती है जब आप किसी फोन नंबर को डायल करते हैं और कॉल मिलाए गए नंबर से कनेक्ट होती है। यह टोन फोन मिलाने वाले को अपने रिसीवर में तब तक सुनाई देती है जब तक दूसरे छोर पर फोन रिसीव नहीं किया जाता। अब मोबाइल ऑपरेटर आदि काफ़ी समय से डिफॉल्ट टोन की जगह गाना आदि सैट करने की सुविधा दे रहे हैं। मुझे कुछ ही समय पहले पता चला था कि मेरे मोबाइल सेवा प्रदाता, एमटीएनएल (MTNL), ने भी यह सेवा चालू कर दी है तो मैंने भी उस समय उपलब्ध सीमित सूचि में पसंद आए ओम शांति ओम के गाने “आँखों में तेरी अजब सी अजब सी अदाएँ हैं” सैट कर लिया था।
हाँ तो अब कल रात मैं देख रहा था कि कोई ढंग के गाने उपलब्ध हुए हैं कि नहीं तो सुनते-२ दो गाने ढंग के दिखे; स्व. किशोर कुमार द्वारा गाया “हम बेवफ़ा हरगिज़ न थे” और स्व. मो.रफ़ी द्वारा गाया “आज पुरानी राहों से कोई मुझे आवाज़ न दे”। गाने तो दोनों ही बढ़िया, किशोर कुमार द्वारा गाया गीत तो मैंने पहले भी कई बार सुना हुआ है लेकिन रफ़ी साहब द्वारा गाए गाने के जब मैंने बोल सुने तो मैं मोहित हो गया। हालांकि एमटीएनएल (MTNL) की वेबसाइट पर इस गाने की टोन सिर्फ़ एक मिनट की थी लेकिन वो गाने के मुखड़े ने ही मोह लिया। उसको तो खैर मैंने अपने मोबाइल के लिए सैट कर लिया कि अब कोई मुझे फोन मिलाएगा तो उसको यह गाना सुनाई दे, और मैं खोजने लगा कि यह पूरा गाना कहीं सुनने को मिल जाए तो आखिरकार यह गाना मिल गया। जब इस गाने को पूरा सुना तो शकील बदायुनी के लिखे इस गीत पर मुँह से अपने आप ही वाह-वाह निकल गया। पूरा गाना इसलिए यहाँ लिख रहा हूँ:
आज पुरानी राहों से कोई मुझे आवाज़ न दे,
दर्द में डूबे गीत न दे, ग़म का सिसकता साज़ न दे। – २बीते दिनों की याद थी जिनमें, मैं वो तराने भूल चुका,
आज नई मंज़िल है मेरी, कल के ठिकाने भूल चुका,
ना वो दिल ना सनम,
ना वो दीन धरम,
अब दूर हूँ सारे गुनाहों से।आज पुरानी राहों से कोई मुझे आवाज़ न दे…..
टूट चुके सब प्यार के बंधन, आज कोई ज़ंजीर नहीं,
शीशा-ए-दिल में अरमानों की आज कोई तस्वीर नहीं,
अब शाद हूँ मैं आज़ाद हूँ मैं, कुछ काम नहीं है आहों से।आज पुरानी राहों से कोई मुझे आवाज़ न दे,
दर्द में डूबे गीत न दे, ग़म का सिसकता साज़ न दे।जीवन बदला दुनिया बदली,
मन को अनोखा ज्ञान मिला,
आज मुझे अपने ही दिल में एक नया इंसान मिला,
पहुँचा हूँ वहाँ नहीं दूर जहाँ, भगवान भी मेरी निगाहों से।आज पुरानी राहों से कोई मुझे आवाज़ न दे…..
बहुत खूबसूरत गीत लिखा था और रफ़ी साहब ने गीत की पूरी इज़्ज़त रखते हुए उतनी ही खूबसूरती के साथ इसको गाया था। यह गाना सन् 1968 में आई दिलीप कुमार की फिल्म आदमी का है।
यदि आप यह गीत सुनना चाहते हैं तो इसे आप यहाँ सुन सकते हैं।
इसका वीडियो यूट्यूब पर यहाँ उपलब्ध है परन्तु लगता है कि यह वीडियो बीच में से कटा हुआ है या फिर हो सकता है कि इतना ही गाना फिल्माया गया हो और मूल गीत में से बीच के दो पैरा न फिल्माए गए हों। खैर, अब यह फिल्म सेवन्टीएमएम पर अपनी कतार में लगा दी है, जब आएगी तो देख के ही पता चलेगा कि फिल्म में पूरा गीत है कि नहीं।
पिछले सप्ताहांत, 29 और 30 सितंबर 2007, पर दिल्ली पर्यटन विभाग ने पंद्रहवें वार्षिक कुतुब उत्सव का आयोजन दिल्ली में कुतुब मीनार के पीछे मौजूद रामलीला मैदान में किया था। दो शाम के इस उत्सव में कुल पाँच संगीतमयी कार्यक्रम हुए और इसके पास (pass) सभी के लिए मुफ़्त में उपलब्ध थे। समय से इसके पास (pass) न प्राप्त कर पाने बावजूद भी मैं, योगेश और मदन इस आशा में शनिवार सांय तकरीबन छह बजे कुतुब मीनार पहुँच गए कि कदाचित् द्वार पर ही कुछ जुगाड़ हो जाए। किस्मत ज़ोरों पर थी, द्वार पर दिल्ली पर्यटन के स्टॉल पर से एक पास (pass) मिल गया और उसी पर हम तीनों को अंदर जाने दिया गया, अंदर कोई खास जनता नहीं पहुँची थी(कदाचित् भारत और ऑस्ट्रेलिया के क्रिकेट मैच के कारण) और हमको प्रैस वालों के लिए आरक्षित बीचो-बीच स्टेज के सामने मौजूद बढ़िया सीटें मिल गई। हमने सोचा था कि कदाचित् कैमरे अंदर नहीं ले जाने दिए जाएँगे, इसलिए चांस नहीं लिया और कैमरे नहीं लाए, लेकिन वहाँ पहुँच दिल्ली पर्यटन विभाग के एक अधिकारी से पता चला कि कैमरे वर्जित नहीं हैं।
पहला कार्यक्रम प्रसिद्ध संगीत समूह सिल्करूट (silkroute) के मोहित चौहान का था। अब मोहित ने गाया तो ठीक लेकिन उसने यह ध्यान नहीं दिया कि माइक ठीक से सैट नहीं है और इसी कारण बास (bass) अधिक है जिससे उसकी आवाज़ उतनी अच्छी नहीं लग रही थी। खैर किसी तरह उसका कार्यक्रम समाप्त हुआ तो उस शाम के दूसरे और अंतिम कव्वाली कार्यक्रम को प्रस्तुत करने आए एहसान भारती घुंघरूवाला। एहसान साहब का परिचय देते हुए परिचारिका ने बताया कि उनका नाम गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड (Guiness Book of World Records) में दर्ज है क्योंकि वे अपने मुँह से घुंघरुओं की आवाज़ निकाल सकते हैं। तकरीबन आधा घंटा एहसान साहब और उनके साथियों ने माइक को सैट करवाने में लगाया, उनको पता था कि माइक ठीक से सैट नहीं हैं और इस कारण कार्यक्रम का आनंद लोग नहीं उठा पाएँगे। बहरहाल, अब भीड़ थोड़ी अधिक हो गई थी, चौथाई सीटें जो खाली थीं वे तो भर ही गई थी, कुछेक लोग कुर्सियों के पीछे मौजूद घास पर भी बैठे थे। एक बार एहसान साहब का कार्यक्रम आरंभ हुआ तो बस मज़ा ही आ गया। थोड़ी देर बाद उन्होंने अपने मुँह से एक घुंघरू से लेकर चौरासी घुंघरूओं तक की आवाज़ निकाल के दिखाई, लोगों की फरमाइश के गानों पर (मुँह से) घुंघरू बजा के सुनाए। फिर अंत में उन्होंने सूफ़ी गायन का रस भी दिलवाया और प्रसिद्ध “दमा दम मस्त कलंदर” को भी गाकर सुनाया। मन झूम उठा, यह कार्यक्रम इस शाम का एकलौता बढ़िया कार्यक्रम था जिसने पास (pass) न होने के बावजूद पैंतीस किलोमीटर आने और इतना ही वापस जाने के कष्ट को सार्थक बनाया।
इधर एक मज़ेदार बात यह हुई कि परिचारिका कई बार घोषणा कर चुकी थी कि मैदान के दूसरे भाग में विभिन्न राज्यों के पकवानों के स्टॉल लगे हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं लेकिन जब योगेश ने जाकर देखा तो वहाँ सिर्फ़ पैटीज़ और नेसकैफ़े की चाय मिल रही थी!! कदाचित् परिचारिका के लिए यही पकवान होंगे या फिर हो सकता है कि सरकारी बाबुओं ने पकवान गलती से वहाँ भिजवाने के स्थान पर अपने घरों में भिजवा दिए होंगे!!
इधर कुछ लड़कों पर बारंबार क्रोध भी आया जो कि हमारे पीछे की पंक्ति में बैठे खामखा बीच-२ में बेकार का हल्ला (cat calling, booing) मचा रहे थे, मोहित चौहान के कार्यक्रम के दौरान मचा लिए तो ठीक लेकिन एहसान साहब के कव्वाली गायन के दौरान भी हल्ला कर रहे थे। या तो ये कुछ और ही अपेक्षा के साथ आए थे कि कुछ रंगारंग कार्यक्रम होगा या फिर टाइमपास के लिए आए थे, कुछ भी हो, मन कर रहा था कि उन सबका सिर फोड़ दिया जाए, खामखा दूसरों के रंग में भंग कर रहे थे!! उस समय दिल्ली पर्यटन विभाग वालों को कोसा कि उनको प्रवेश निशुल्क रखने की जगह कुछ मामूली सा शुल्क लगा देना चाहिए था, जैसे कि पचास रूपए प्रति पास (pass), एक पास (pass) पर चार-पाँच लोगों का प्रवेश, जिससे यह लाभ होता कि ऐरे गैरे लोग जिनको कार्यक्रम नहीं देखने थे वे नहीं आते, क्योंकि इंसानी फितरत है फ्री का माल देख ऐरे गैरे भी आ ही जाते हैं!! वैसे भी इस तरह के कार्यक्रम देखने आने वाले लगभग सभी लोग इनको देखने के लिए चालीस-पचास रूपए प्रति पास (pass) दे ही देते क्योंकि पैसे देकर इनको देखने वही जाते हैं जिनको वास्तव में रूचि है।
अगले दिन के लिए हमारे पास कोई पास (pass) न होने के बावजूद हमने फिर अपनी किस्मत आज़माने की सोची, उसी पास (pass) को अपने पास रख लिया और अगले दिन तो वैसे भी कैमरे और ट्रायपॉड (tripod) वगैरह के साथ आना था!!
अगले दिन कदरन अधिक भीड़ थी क्योंकि रविवार था, आखिरी दिन था, तीन कार्यक्रम थे और मैच भी नहीं था। हम लोग सवा छह बजे तक पहुँचे तब तक काफ़ी भीड़ हो चुकी थी। ट्रायपॉड तो हाथ में लिए ही थे, योगेश ने कहा कि मैं अपना कैमरा भी बाहर निकाल गले में टाँग लूँ ताकि द्वार पर मौजूद गार्ड को भ्रम हो जाए, लेकिन उसकी आवश्यकता ही नहीं पड़ी, उसने पास (pass) माँगा नहीं हमने दिखाया नहीं!!
अंदर पहुँचे तो देखा कि लगभग सभी सीट भर चुकी थी, हम पुनः प्रैस के लिए आरक्षित स्थान पर पहुँच गए, पीछे की एक पंक्ति में कुछ सीटें खाली दिखी तो वहाँ जम गए, ट्रायपॉड को उसके कवर से बाहर निकाल सैट किया और कैमरा निकाल उसपर लगाया। टीवी चैनल वाले हमारे आगे वाली पंक्ति में ही मौजूद थे, उन्होंने हमको भी प्रैस वाला ही समझा और एक कैमरामैन ने मुझे सुझाव दिया कि मैं उसके बाजू में ही ट्रायपॉड लगा लूँ क्योंकि थोड़ी देर बाद मेरे आगे कोई अन्य चैनल वाला आ गया तो मेरे को फोटो नहीं मिलेंगे। लेकिन उसके बगल में बैठी महिला को मैंने उनकी जगह से प्रैस के नाम की हूल देकर उठाना उचित न समझा, योगेश को कुछ पंक्तियाँ आगे दो कुर्सियाँ खाली दिखाई दीं तो अपन ने वो लपक लीं। पीछे बैठे लोगों को मेरे ट्रायपॉड से देखने में कष्ट न हो इसलिए मैंने थोड़ा साइड में ट्रायपॉड लगाया, कोने की सीट होने का फायदा मिल गया।
रविवार सांय पहला कार्यक्रम सुगातो भादुड़ी का था जिन्होंने तबले के साथ संगत कर मैन्डोलिन का संगीत सुनाया। स्टेज के आगे और कुर्सियों की सीमारेखा तक की पूरी कि पूरी भूमि हरे कालीन से ढकी हुई थी, मैं प्रथम पंक्ति के आगे अपना ट्रायपॉड लेकर स्टेज के सामने पहुँच गया ताकि एकाध अच्छा फोटो मिल जाए, वैसे तो जहाँ हम लोगों की सीट थी वहाँ से भी कैमरे के पूरे ज़ूम पर मैं आराम से फोटो ले सकता था लेकिन पास की फोटो फिर पास की होती है!!

( मैन्डोलिन बजाते हुए सुगातो भादुड़ी )
इधर मैंने अभी कुछ तस्वीरें ही ली थीं कि योगेश का फोन आ गया कि जल्दी वापस आऊँ। तो अपना ट्रायपॉड और कैमरा ले मैं वापस पहुँचा तो योगेश ने बताया कि अभी कुछ मिनट पहले पंगा हो गया था, कुछ पीछे की लगभग पूरी पंक्ति में चैनल वालों ने अपने-२ ट्रायपॉड खोल उनपर वीडियो कैमरे लगा रखे थे जिस कारण उनके पीछे बैठे लोगों को कुछ दिखाई नहीं दे रहा था और इसी बात को लेकर एक दर्शक एक कैमरामैन से उलझ पड़ा था। दर्शक सही थे कि उनको कुछ दिखाई नहीं दे रहा था लेकिन गलती चैनल वालों की भी नहीं थी, उन्होंने तो उसी स्थान पर कैमरे लगाए थे जो उनके लिए आरक्षित था, यह तो दर्शक खामखा वहाँ बैठे हुए थे। देखा जाए तो गलती दिल्ली पर्यटन वालों की थी, उनको सबसे पीछे एक कदरन उँचा सा स्टेज बना देना चाहिए था मीडिया के लिए ताकि वे किसी दर्शक के आगे न आएँ।
खैर सुगातो जी का कार्यक्रम समाप्त हुआ और बोर करने के लिए ज़ी टीवी पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम हीरो होन्डा सा रे गा मा पा के 2005 के फाइनलिस्ट अर्पिता मुखर्जी और हेमचंद्र स्टेज पर पधारे। इधर अर्पिता से सुर नहीं खींचा जा रहा था, बारंबार कोशिश करती लेकिन आवाज़ फटती महसूस कर छोड़ देती थी तो दूसरी ओर हेमचंद्र गायकी पर कम और टशन मारने पर अधिक ध्यान दे रहा था जिस कारण दोनों में से कोई काम ठीक से नहीं कर पा रहा था।
पूरे डेढ़ घंटे दोनों ने, एक-२ करके भी और साथ में भी, वाहियात गायन से पका दिया, उठकर जाने की बहुत बार सोची कि कहीं टहल आते हैं जब तक ये बेसुरे अपना आइटम समाप्त करते हैं, लेकिन नेता और सरकारी बाबू की तरह हमको भी कुर्सी छिन जाने का खतरा था इसलिए कहीं नहीं गए, यदि ओबीसी की तरह आरक्षण मिला हुआ होता तो आराम से कहीं टहल आते!!
मुझे यह सोच बार-२ आश्चर्य हो रहा था कि ये दोनों फाइनल राउंड में कैसे पहुँचे थे। मुझे अच्छी तरह याद है कि दो-ढ़ाई वर्ष पहले तक जब सा रे गा मा पा मेरे पिताजी देखते थे तो मैं भी देख लेता था और फाइनल क्या आखिर के सभी राउंडों में पहुँचने वाले प्रतियोगी एक से बढ़कर एक गायक हुआ करते थे!! लगता है कि या तो इनकी किस्मत तेज़ थी या फिर सा रे गा मा पा भी इंडियन आईडल आदि की भांति फटीचर प्रतियोगिता हो गई है जिसमें कोई भी ऐरा-गैरा नत्थू खैरा फाइनल राउंड तक पहुँच जाता है!!
बहरहाल, किसी तरह इन दोनों द्वारा किया जा रहा टॉर्चर समाप्त हुआ तो इस वर्ष के कुतुब उत्सव का अंतिम कार्यक्रम आरंभ हुआ जिसका हमें ही नहीं वरन् उपस्थित जनता को भी बड़ी बेसब्री से इंतज़ार था, भीड़ अब काफ़ी बढ़ गई थी, जितने लोग बैठे थे उससे अधिक सीट न मिल पाने के कारण खड़े थे और किस्मत वाले थे वे जो थोड़ा पहले आकर स्टेज और कुर्सियों की प्रथम पंक्ति के दरमयान खाली जगह पर कालीन पर ही आराम से बैठ गए थे। उत्सव के इस कार्यक्रम को पेश करने पाकिस्तान से तशरीफ़ लाए थे अपने भाई उस्ताद शराफ़त अली खान और अपने भतीजे शुजौत अली खान के साथ उस्ताद शफ़कत अली खान। उस्ताद शफ़कत अली खान का परिचय देते हुए (पिछले दिन से भिन्न) परिचारिका ने बताया कि उस्ताद शफ़कत अली खान के पुर्खे सम्राट अक़बर के दरबार में संगीतज्ञ थे और उस्ताद शफ़कत अली खान उनकी ग्यारवीं पीढ़ी के हैं तथा अधिकतर ख्याल और ठुमरी ही बजाते हैं।

( उस्ताद शफ़कत अली खान [बाएँ] और उस्ताद शराफ़त अली खान [दाएँ] )
उस्ताद शफ़कत अली खान ने शुरुआत सुर लगा के की, फिर अलग-२ गायकी बताई, कि भारत और पाकिस्तान में कैसे गाया जाता है, अफ़्गानिस्तान में कैसे गाया जाता है और ईरान तथा मध्य-पूर्व में कैसे झोल देकर गाया जाता है। उन्होंने अपना कार्यक्रम शुरु होने से पहले ही दर्शकों से गुज़ारिश कर दी थी कि एकाग्रता की आवश्यकता है इसलिए लोग-बाग़ खामोश रह गायन का आनंद लें और कोई हैरानी नहीं थी कि उनके गायन के दौरान लगभग खामोशी ही थी, बस बीच-२ में किसी अच्छे शेर के गायन पर तालियाँ बज उठती थीं। उस्ताद शफ़कत अली खान आदि द्वारा गाए गये एक गीत का लगभग संपूर्ण वीडियो यहाँ देखा जा सकता है।
उस्ताद शफ़कत अली खान के कार्यक्रम के दौरान ही मुझे पीछे दिखाई देती कुतुब मीनार के साथ एक पैनोरमा (panorama) लेने का विचार आया तो ट्रायपॉड पर लगे कैमरे को दाएँ से बाएँ घुमाते हुए पाँच फोटो ले डाली जिनसे यह निम्न पैनोरमा बना।

( इस फोटो को बड़े रूप में देखने के लिए यहाँ क्लिक करें )
पहले पैनोरमा के हिसाब से तो ठीक-ठाक ही बन गया, वैसे ये पैनोरमा कम और किसी एसएलआर (SLR) कैमरे से लिया गया वाइड एंगल फोटो अधिक लगता है!!
बहरहाल, उस्ताद शफ़कत अली खान का कार्यक्रम भी समाप्त हुआ और अपन अगले वर्ष के कुतुब उत्सव के बारे में सोचते हुए वापस लौट लिए। कुतुब उत्सव के अन्य फोटो यहाँ देखिए।
लगभग एक माह पहले मेरे इनबॉक्स में एक विज्ञापन वाली ईमेल आई। अब वैसे तो रोज़ ही कई सौ आती हैं लेकिन यह उन जैसी नहीं थी। यह इंडिया टुडे वालों की ओर से आई थी जिसमें उन्होंने मुझे इंडिया टुडे बुक क्लब की सदस्यता ऑफ़र की। शर्त यह थी कि उनके कैटालॉग में से मैं कोई भी दो पुस्तकें अथवा संगीत की सीडी खरीदूँ, वे मुझे उसी कैटालॉग में से मेरी पसंद की कोई चार पुस्तकें अथवा सीडी मुफ़्त में देंगे और साथ में सदस्यता भी जिसके अंतर्गत मैं भविष्य में हर खरीद पर छूट प्राप्त करूँगा।
अमूमन मैं इस तरह के विज्ञापन पढ़कर मिटा देता हूँ लेकिन मुझे कुछ रूचिकर लगा, उस समय मेरे पास थोड़ा खाली समय भी था, तो सोचा देख लेते हैं, यदि कोई काम की चीज़ नहीं लगी तो नहीं लेंगे। दिए गए पते पर पहुँच जो पुस्तकें देखी उनमें से मुझे अपनी रूचि की कोई भी नहीं लगी, लेकिन संगीत की कुछ सीडी पसंद आई। तो मैंने निम्न सीडी खरीदी:
और निम्न सीडी मुफ़्त उपहार में पसंद करीं:
वैसे तो ये सभी सीडी बहुत बढ़िया हैं, पूरे पैसे वसूल, लेकिन शिव कुमार शर्मा का तो मैं पंखा(हिन्दी में बोले तो ….. फ़ैन) हो गया। इससे पहले मुझे कभी इन संगीतकारों अथवा इनके संगीत में कोई रूचि नहीं रही लेकिन अभी 7-8 दिन पहले जब से ये सीडी आईं हैं तब से इन्हें ही बारंबार सुने जा रहा हूँ। The Elements – Water में शिव कुमार शर्मा ने वाकई बहुत अच्छा संगीत दिया है, उसके बाद मुझे सबसे अच्छी लगी वनराज भाटिया की The Elements – Earth जिसमें पहला संगीत ट्रैक At the Dawn of Creation बहुत ही अच्छा है। The Elements की शृंखला, जो कि पाँच तत्वों पर है, में एक सीडी रह गई जिसका नाम है The Elements – Space जिसका संगीत तबले के उस्ताद ज़ाकिर हुसैन ने दिया है। मैं इसे खोज रहा हूँ और आशा है कि जल्द ही यह मिल जाएगी।
अब जब शौक चढ़ा तो अगली बार जब मैं प्लैनेट-एम गया तो वहाँ से पंडित जसराज की “मियां तानसेन” ले आया जिसमें तानसेन के कई राग हैं। यह दो सीडी का पैक है जो मैंने अभी पूर्ण नहीं सुनी लेकिन जितना सुना है वह बहुत ही अच्छा लगा। थोड़े से अच्छे स्पीकर या हेडफोन हों और उस पर यह संगीत चला के सुना जाए और आँख बन्द कर बैठा जाए, आहा, स्वर्ग की सी अनुभूति होती है।
वाकई ये सभी आज के युग के तानसेन हैं।
अभी कुछ और ऐसी ही सीडी देखीं हैं, जल्द ही उनको प्राप्त कर संगीतमयी स्वर्ग के सुख की प्राप्ती करुँगा।