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Archive for the ‘फ़ालतू बड़बड़’ Category


क्यों खरीदें ऐसी हिन्दी की किताबें…..


June 25th, 2010 | 13 Comments

हिन्दी साहित्य के हिमायती और अंग्रेज़ी को कोसने वाले काफ़ी लोग बहस के लिए कहते हैं कि लोग अपनी भाषा की कद्र नहीं करते, अंग्रेज़ी के उपन्यास आदि 400-500 रूपए में भी ले लेते हैं जबकि हिन्दी उपन्यासों का इतना दाम नहीं देना चाहते। आज रिलायंस टाइम आऊट में जाना हुआ; यह रिलायंस की रिटेल चेन के बुकस्टोर्स का नाम है जहाँ किताबें, संगीत और फिल्मों की सीडी-डीवीडी आदि मिलती हैं। मैं ऐसे ही हिन्दी साहित्य वाले भाग में विचर रहा था कि बाबू देवकीनंदन खत्री के उपन्यास “भूतनाथ” पर नज़र पड़ी। दरिया गंज के इंडिया बुक हाऊस ने यह वाला संस्करण छापा है, लगभग पाँच सौ पन्नों की किताब और कीमत लगभग पाँच सौ रूपए। पाँच सौ रूपए अधिक नहीं हैं लेकिन इस संस्करण के लिए मैं पचास रूपए से अधिक देना नहीं पसंद करूँगा। क्यों? किताब का कलेवर बेकार है, कागज़ कोई बढ़िया नहीं लगा हुआ, छपाई बिलकुल ऐसी है जैसी सड़क की पटरी पर मिलने वाले 20-30 रूपए के उपन्यासों की होती है। तो जब किताब की गुणवत्ता ऐसी है तो क्यों मैं पब्लिक डोमेन में मौजूद कहानी पर छपी किताब के पाँच सौ रूपए दूँ? ऐसा भी नहीं है कि बाबू देवकीनंदन खत्री के उपन्यासों पर कॉपीराइट है और उसकी रॉयल्टी प्रकाशक को अदा करनी पड़ती हो!! पब्लिक डोमेन में मौजूद अंग्रेज़ी के उपन्यास सौ-सौ रूपए में बिकते हैं और उनका कागज़ और छपाई इससे कई गुणा बेहतर होती है!!

बात हिन्दी की भी नहीं है, ऐसी किताब किसी भी भाषा में हो मैं उसका ऐसा मूल्य कदापि चुकाना पसंद नहीं करूँगा!!

 
पुनश्चः - मैं सभी हिन्दी किताबों को ऐसा नहीं बता रहा हूँ, केवल कुछ ऐसी किताबों के बारे में बात कर रहा हूँ जो कि इस तरह खरीददार के उत्साह पर पानी उड़ेल देती हैं। अन्य भाषाई किताबों की भांति हिन्दी किताबें भी एक से अधिक प्रकाशक छापते हैं और ये हर प्रकार के कलेवर आदि में आती हैं। उनमें से कुछेक ऐसी होती हैं जिनका दाम तो ऊँचा होता है लेकिन कलेवर बदमज़ा और कागज़ तथा छपाई रद्दी होती है।


बाघ-चीते बचाने, अर्थ ऑवर मनाने का बेतुकापन…..


March 29th, 2010 | 22 Comments

देश का राष्ट्रीय पशु, बाघ, लगभग विलुप्त होने को है, सिर्फ़ 1411 बाघ बचे हैं देश में। क्या यह आपको जाना पहचाना लग रहा है? यदि हाँ तो वह इसलिए कि मोबाइल सेवा प्रदाता एयरसेल (aircell) ने मुहीम चलाई हुई है सबको इस विषय में अवगत कराने की। भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान कैप्टेन कूल धोनी, जो कि एयरसेल के ब्रैंड एम्बैसेडर हैं, भी टीवी के विज्ञापन में चिंता जतलाते दिख जाते हैं। एक नेक मुहीम है, बाघ की वाकई रक्षा होनी चाहिए, सिर्फ़ इसलिए नहीं कि वह राष्ट्रीय पशु है परन्तु इसलिए कि वह प्रकृति की धरोहरों में से एक है और हम मनुष्यों के कारण विलुप्त होने की कगार पर है!! परन्तु जिस तरह यह अभियान चलाया जा रहा है उससे बाघ बच जाएँगे क्या? एक विज्ञापन में फिल्म अभिनेता कबीर बेदी कहते हैं कि आईये ब्लॉग लिखें चिंता जतलाएँ। मैं ब्लॉगों और सोशल मीडिया की शक्ति को नहीं नकार रहा हूँ लेकिन मैं यह सोच रहा हूँ कि क्या ब्लॉग लिखने से बाघों का कत्ल-ए-आम थम जाएगा? जो शिकारी स्मगलर आदि बाघों का शिकार कर रहे हैं वे ब्लॉग पढ़ते हैं क्या? या उनको कोई फर्क पड़ता है कि ब्लॉगों आदि पर क्या लिखा है?


इसलिए मुझे इस विषय में संशय है क्योंकि या तो यह अभियान बिना अधिक सोच के चलाया जा रहा है या फिर जनहित की मुहीम की आड़ में प्रमोशन का एक तरीका मात्र है। जनहित अभियान के ज़रिए अपना लाभ करना कोई बुरा कार्य नहीं, प्राइवेट कंपनी है और मुनाफ़ा चाहिए तभी आगे भी ऐसे अभियान जारी रह सकेंगे। लेकिन अभियान की कोई सेन्स तो बननी चाहिए!! बेतुके अभियान से क्या जनहित होगा? क्या यह जस्ट फॉर द सेक ऑफ़ इट किया जा रहा है?

अब बात करें अर्थ ऑवर (Earth Hour) की। अर्थ ऑवर के पीछे मामला यह है कि प्रत्येक वर्ष एक दिन एक घंटा शाम के समय लोगों से अपने घरों आदि की बिजली बंद करने को कहा जाता है, विश्व भर के शहरों में स्थानीय समय अनुसार। काहे ऐसा किया जाता है? अब इस शगूफ़े के पीछे फिलॉसोफ़ी यह है कि एक घंटा यदि हर व्यक्ति अपने-२ घर की बिजली बंद कर दे तो इससे बिजली की बचत होगी, कार्बन फुटप्रिंट कम होगा। अपन कदाचित्‌ मूढ़ हैं क्योंकि अपने को यह चीज़ कम से कम भारत जैसे देश में बेतुकी और हास्यप्रद लगती है। परसों अर्थ ऑवर वाले दिन रवि जी ने इस पर एक पहलू के मद्देनज़र अपने विचार रखे, इधर कल दीप (अंग्रेज़ी लिंक) ने भी अपने ब्लॉग पर बतलाया कि क्यों इस तरह के अभियान भारत में बेतुके हैं। दरअसल हम भेड़ों की तरह आँख मूँद किसी भी चीज़ को मानने के लती (जी हाँ लत ही तो लग गई है) हो गए हैं। परसों अपनी ट्विट्टर स्ट्रीम में देखा किसी ने कुछ ऐसा कहा:

भारत में एक घंटा बिजली बंद कर बिजली बचाने को कहना ऐसा है जैसे किसी कुपोषण के शिकार को यह कहना कि वह एक समय का भोजन न करे क्योंकि अमेरिकी खा-खा कर मोटापे का शिकार हो रहे हैं

अब यह किसने कहा यह मुझे याद नहीं, खोजने की कोशिश करी लेकिन यह ट्वीट नहीं मिली। बहरहाल, ट्वीट चोट करती हुई है और अर्थ ऑवर की भांति सेन्सलेस नहीं है।

परसों शाम मैं नज़दीक ही मौजूद मामा जी के घर गया तो वहाँ ऐसे ही ज़िक्र आया और मामी जी ने कहा कि साढ़े आठ बज रहे हैं बिजली बंद कर देनी है। मुझे पता था लेकिन फिर भी मैंने पूछा कि क्यों करनी है तो वे बोलीं कि अर्थ ऑवर है। मैंने पूछा कि उससे क्या होगा तो मामा जी ने कहा कि बिजली बचेगी और कार्बन फुटप्रिंट कम होगा। इस पर मैंने फिर उत्तर दिया कि हमारे या पूरे इलाके के या पूरी दिल्ली के बिजली बंद कर देने से पॉवर स्टेशन बिजली बनानी बंद नहीं करेंगे, तो कार्बन फुटप्रिंट में ऐसी कोई कमी नहीं आएगी। यहाँ (भारत में) तो वैसे ही जितनी बिजली पैदा होती है वह पूरी नहीं पड़ती, बहुत सी जगहों पर कई-२ घंटों तक रोज़ाना अर्थ ऑवर मनाया जाता है।

दूसरी बात यह कि यदि बिजली प्रयोग नहीं की जाती तो वह भी नुकसान है क्योंकि बिजली को संजो के नहीं रखा जा सकता, जितनी बनती है उतनी प्रयोग होनी आवश्यक है अन्यथा बर्बाद जाएगी, और कार्बन फुटप्रिंट तो फिर भी उतना ही बढ़ेगा। यह पानी या अनाज आदि नहीं है कि यदि सरप्लस है तो उसको स्टोर करके रख लिया बाद में काम आ जाएगा!! और ऐसा भी नहीं है कि यदि बिजली कम प्रयोग हो रही है तो एकदम से पॉवर स्टेशन बिजली बनानी कम कर देंगे। वे ऐसे रियल टाइम एडजस्टमेंट पर नहीं चलते, एक निश्चित सीमा होती है और उतनी ही बिजली प्रति मिनट घंटे दर घंटे उत्पन्न की जाती है। और ऐसा भी नहीं है कि यदि एक इलाके के लोग एक घंटे के लिए बिजली बंद कर देंगे तो वह बिजली दूसरे इलाके में पहुँच जाएगी जहाँ लोड शेडिंग की जा रही है। इसलिए यह सब चोंचले अमेरिका और योरोप आदि में उचित लगते हैं जहाँ चौबीसों घंटे बिना रुकावट बिजली आती है और नाराज़ होकर जाती नहीं है!! भारत जैसी जगहों पर यह आडम्बर एक वाहियात मज़ाक ही है और कुछ नहीं।

और यदि बिजली बचानी ही है और अपना बिल भी कम करना है तो उसके लिए बिजली व्यर्थ न की जाए। साल में एक दिन एक घंटा बिजली बंद कर बचाने की सोचना वैसे ही है जैसे नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली का हज को जाना!! बिजली बचाओ, अपने प्रतिदिन के जीवन में यह आचरण लाओ कि जहाँ व्यर्थ बिजली का प्रयोग हो रहा है उसको रोको। यदि किसी कमरे में बैठे हो और रोशनी की आवश्यकता नहीं है तो ट्यूब आदि बंद कर दो, किसी कमरे में यदि कोई नहीं है तो वहाँ ट्यूब पंखे आदि बंद कर दो, कंप्यूटर पर काम नहीं है तो उसको बंद कर दो और यदि नहीं कर सकते तो कम से कम स्क्रीन को बंद कर दो। इस तरह की आदत को नित्य जीवन में ढालने से बहुत फर्क पड़ता है, बिजली बचेगी और महीने का बिजली का बिल आने पर भी फर्क नज़र आएगा।

 
 
चीते की फोटो साभार law_keven और अर्थ ऑवर की फोटो साभार aussiegall, क्रिएटिव कॉमन्स लाइसेन्स (Creative Commons License) के अंतर्गत


हिपोक्रिट से सेल्फ़ राईटियस


January 21st, 2010 | 5 Comments

व्यक्ति कोई भी हो, पुरुष हो या स्त्री, हर मनुष्य में हिपोक्रिटिक (hypocritic) भावना मिल ही जाती है। अब मेरे एक मित्र का मानना है यदि व्यक्ति संपन्न पारिवारिक पृष्ठभूमि से नहीं आया हो (आयी भी हो सकती है लेकिन फॉर द सेक ऑफ़ पोस्ट, एक कॉमन लिंग लेकर “आया” ही प्रयोग करते हैं) तो उसका बर्ताव अधिकतर समय सेल्फ़ राईटियस (self righteous) की रेखा पार करता है। अब यदि व्यक्ति सेल्फ़ राईटियस की सीमा पार करता है तो हिपोक्रिट (hypocrite) भी काफ़ी हो जाता है, सूडो (pseudo) हो जाए तो भी कोई बड़ी बात नहीं। लेकिन अपने मित्र से मैं इस बात पर सहमत नहीं कि यह मामला उनके साथ अधिक होता है जिनकी संपन्न पारिवारिक पृष्ठभूमि नहीं। मैंने संपन्न पारिवारिक पृष्ठभूमि से आए लोगों में भी ऐसी भावनाएँ देखी हैं, इसलिए मैं स्वयं कम से कम इस तरह जनरलाइज़ (generalize) नहीं कर सकता क्योंकि मैं समझता हूँ कि इस मनोविज्ञान को समझने जितनी जानकारी और समझ फिलहाल मुझमें नहीं है।

काफ़ी समय हो गया, एक मिड्डल एज की मोहतरमा की बातें कान में पड़ी थी। कोई समारोह था या शादी-विवाह का अवसर था यह नहीं याद। वह मोहतरमा न केवल सेल्फ़ राईटियस जान पड़ीं बल्कि फीमेल शोवनिस्ट (female chauvinist) भी जान पड़ीं। बात-२ में वे अपने साथ खड़ी अन्य महिलाओं पर यह इंप्रेस (impress) करना न भूलतीं कि वे कितनी पढ़ी लिखी हैं, स्नातक के बाद स्नातकोत्तर भी किया हुआ था। मानो कितना बड़ा क़िला फतह किया हो!! :roll: खैर, तो वो बता रहीं थी कि कैसे उन्होंने पड़ोसी के घर में अपनी पड़ोसन के लड़के को पॉर्न फिल्म (porn film) देखते हुए पकड़ा और उसके बाद उन्होंने अपनी राय दी कि सभी लड़के ऐसे कमीने होते हैं कि नंगी तस्वीरों में ही घुसे रहते हैं, मतलब लड़कों/पुरुषों की जात ही ऐसी है!! फिर वे जब वापस स्व प्रशंसात्मक ढर्रे पर लौटीं तो व्यक्त करने लगीं कि कैसे उनकी पढ़ने की राह में रोड़े थे, भाई इत्यादि कहते कि लड़की है अधिक पढ़ नहीं पाएगी, स्कूल कॉलेज में ऐसा होता था इत्यादि।

यह सब सुन मैं इस सोच में पड़ गया कि कभी यह मोहतरमा मेल शोवनिस्म (male chauvinism) से घृणा करतीं थी, उसकी शिकार थीं और आज ये स्वयं एक हिपोक्रिट और शोवनिस्ट बन गई हैं – जीवन वाकई एक चक्र है!! उनका मत था कि लड़कियाँ सीधी-साधी होती हैं और लड़के पैदायशी कमीने और बदमाश होते हैं। मैं यह सोच रहा था कि उनको यदि कुछ लड़कियों के बारे में बता देता और जैसी बातें और आचरण वे खुले आम करती थीं वह बता देता तो उन मोहतरमा के दिल को कदाचित्‌ धड़का लग जाता। ठीक है माना कि मोहतरमा उस ज़माने से और उस परिवेश से नहीं आईं थी कि जहाँ लड़कियों को अधिक पढ़ाने पर ज़ोर दिया जाता था और उन्होंने काफ़ी संघर्ष किया था लेकिन यह कोई कारण नहीं शोवनिस्म का और जनरलाइज़ कर पूरे पुल्लिंग समुदाय को कमीना समझने का!! यह प्रश्न उनके पढ़े लिखे दिमाग में न आया कि जिन पॉर्न फिल्मों और नंगी तस्वीरों आदि को देखने के कारण वे लड़कों को कमीना बतला रहीं थी उन फिल्मों और तस्वीरों में मुख्य किरदार किसका होता है, लड़के का या लड़की का?!! ज़माना कहाँ निकल गया है और वह मोहतरमा पता नहीं कौन से ज़माने की सोच-विचारों को लिए जी रही थीं कि लड़कियाँ तो सीधी होती हैं लड़के ही कमीने होते हैं!!

उस समय से आज तक कई लोगों से मिलना हुआ है, कई को हैलो हाय से थोड़ा अधिक जानने का अवसर मिला है और उनमें से कई शोवनिस्ट मिले हैं – स्त्री भी और पुरुष भी। मज़ेदार बात यह है कि उनकी सोच, उनके विचार एक शोवनिस्ट के ही हैं लेकिन उनमें से कोई भी अपने को सेक्सिस्ट (sexist) नहीं मानता/मानती क्योंकि उनका सेल्फ़ राईटियस दिमाग उनको समझाता है कि वे एक आम आदमी/स्त्री हैं जो कि सेक्सिस्म (sexism) जैसी टुच्ची भावनाओं से परे है। ऐसे लोग सूडो (pseudo) होते हैं, अपने को समझते और दिखाते कुछ हैं लेकिन होते कुछ और ही हैं। और ऐसे लोगों की सबसे बड़ी कमज़ोरी यह होती है कि ये इस गफ़लत में जीते हैं कि ये सबसे ज़्यादा स्याने हैं और लोगों को मूर्ख बना रहे हैं – लेकिन फिर वह कहावत है ना सेर को सवा सेर मिलने वाली!!


थकेले विज्ञापनों का टॉर्चर…..


November 2nd, 2009 | 13 Comments

मैं प्रायः टेलीविज़न नहीं देखता हूँ, कभी यदि कोई दिलचस्प चीज़ दिखाई जा रही हो या कोई फिल्म आ रही हो जो अपने पास न हो तो देख लेता हूँ। अभी एकाध दिन पहले यूटीवी मूवीज़ (UTV Movies) पर अमिताभ बच्चन और शशि कपूर की फिल्म “नमकहलाल” आ रही थी। यह मेरी पसंदीदा फिल्मों में है तो देखने बैठ गया। फिल्म के दौरान विज्ञापन अपने को पसंद नहीं लेकिन टीवी चैनल पर तो आते ही हैं इसलिए झेलने पड़ते हैं, परन्तु कई विज्ञापन तो ऐसे वाहियात होते हैं कि उनको झेलना टॉर्चर लगता है।

एक विज्ञापन कई बार आया, मैक्स न्यू यॉर्क लाइफ़ इंश्योरेन्स का। विज्ञापन यूँ है कि एक लाडले को माता-पिता ट्रेन में छोड़ने आते हैं, सामान वगैरह रखवा देते हैं, लाडले की तरह उससे व्यवहार किया जा रहा है। उसके बाद पीछे से वाचक द्वारा बतलाया जाता है कि जब अपने दूर हो जाते हैं तो उनकी फ़िक्र बढ़ जाती है, इसलिए मैक्स न्यू यॉर्क प्रस्तुत करते हैं जीवन बीमा पॉलिसियाँ ताकि आप अपनों के हमेशा साथ रहें। अब मुझे यह समझ नहीं आया कि दूर जाने की चिंता का जीवन बीमा पॉलिसी से क्या मतलब है? जीवन बीमा तो मरने के बाद मिलता है, क्या चिंता उससे दूर हो जाएगी??!! किसी सामान का बीमा नहीं हो रहा है कि वह टूट फूट जाए तो बीमे की रकम से नया सामान खरीद लिया जाएगा!! :roll: और यदि आर्थिक सुरक्षा का भी प्रश्न है तो यहाँ कैसे फिट बैठता है यह समझ नहीं आता, कमाऊ पिता लाडले (और कदाचित्‌ फिलहाल बेरोज़गार) बेटे को छोड़ने आया है (ज़ाहिर है कि चिंता माता पिता को ही हो रही है, बेटा तो इस खामखा के लाड़ से असहज लग रहा है एक सहयात्री लड़की के सामने), उसकी बेटे के दूर जाने की चिन्ता जीवन बीमा से कैसे दूर होगी? और उसके बाद एक और अहमकाना हरकत, पिता बेटे को केले देता है और माँ कहती है कि खा लेना पेट साफ़ रहेगा। क्या इस विज्ञापन की पटकथा लिखने वाले को यह नहीं ज्ञात कि केले कब्ज़ करते हैं, दस्त लगे हों तो उसमें केले खाने से लाभ होता है, पेट साफ़ करने के लिए केले नहीं खाए जाते!! :roll:

ऐसे ही थकेले विज्ञापन मुझे बीएसएनएल के लगते हैं दीपिका पादुकोण वाले। एक लूज़र से दिखने वाले बंदे को उसकी खूबसूरत बीवी उलाहने देती है कि कभी फिल्म नहीं दिखाते, दफ़्तर में उसके बॉस उससे खफ़ा रहते हैं। ऐसे में वो अपना दुखी थोबड़ा लेकर दीपिका पादुकोण के पास जाता है जो उसको बीएसएनएल का मोबाइल देती है और वो बंदा लूज़र से हीरो बन जाता है। घर में बीवी खुश हो जाती है कि पति मोबाइल पर फिल्म दिखा रहा है, दफ़्तर में बॉस खुश हो जाते हैं कि बंदा समय पर काम करता है। वाह! टोटली फालतू विज्ञापन!! क्या फालतू है इसमे यह बताना ही समय की बर्बादी है।

ऐसे ही न जाने कितने विज्ञापन आते हैं जो कि टोटली ऊपरी माले के दीवालिएपन को दर्शाते हैं। मुझे यह समझ नहीं आता कि हमारे यहाँ की विज्ञापन कंपनियों में आईडियों की कंगाली का दौर क्यों आ गया है। इन्हीं कंपनियों ने भूतकाल में एक से बढ़कर एक बढ़िया विज्ञापन बनाए हैं, कई कंपनियाँ आज भी बनाती हैं लेकिन अधिकतर वहीं सड़े गले बेतुके विज्ञापन बना रही हैं। क्या इन विज्ञापनों के क्रिएटिव डॉयरेक्टर और स्क्रिप्ट लिखने वाले यह भूल जाते हैं कि विज्ञापन का उद्देश्य उत्पाद की बिक्री है न कि कोई फैली हुई फैन्सी कहानी दिखाना। उत्पाद को बढ़िया तरीके से पेश करना होता है लेकिन इस तरह कि वो दर्शक को वास्तविक तो लगे ही पर अहमकाना न लगे!!

एयरटेल के विज्ञापन काफ़ी अच्छे होते हैं, एकाध अपवाद को छोड़ दें तो वे बढ़िया बने हुए होते हैं और उत्पाद को अच्छे से दिखलाते हैं। बीएसएनएल का जो अकबर बीरबल वाला विज्ञापन है वह भी अच्छा है, वह बिलकुल सीधे और सरल तरीके से दर्शक को संदेश देता है कि बीएसएनएल का नेटवर्क बढ़िया है और नेटवर्क प्रॉबलम नहीं आती, यानि कि अपने माल को वह सही तरीके से दर्शक को बेच रहा है।

कदाचित्‌ यह बात सही है कि दुर्गन्ध में ही सुगन्ध की औकात पता चलती है, बेकार विज्ञापनों में ही बढ़िया विज्ञापन को एप्रीशिएट किया जा सकता है!!


भारतीयता नहीं है आपमें…..


October 22nd, 2009 | 12 Comments

अभी कुछ दिन पहले मैंने आमतौर पर समझने जाने वाले कॉन्टीनेन्टल नाश्ते और असली कॉन्टीनेन्टल ब्रेकफास्ट के फ़र्क को बताते हुए पोस्ट ठेली थी, साथ ही फुल इंग्लिश ब्रेकफास्ट, स्कॉटिश ब्रेकफास्ट, आदि के बारे में भी बताया कि इनमें किन आईटमों की मौजूदगी रहती है। तो हुआ यूँ कि एक साहब ने इस ब्लॉग पर मौजूद संपर्क करने वाले फॉर्म का प्रयोग कर मुझे एक ईमेल लिखा। ईमेल की भाषा कड़क थी, क्या लिखा वह तो नहीं छाप रहा पर मोटे तौर पर उस संदेश का आशय मुझ पर लानत फलानत भेजना था कि अपने देश के नाश्ते मुझे पसंद नहीं आते और मैं शान से अपने को भारतीय कहते हुए फिरंगियों के नाश्ते करता हूँ और अपनी शेखी अपने ब्लॉग पर बखारता हूँ। किसने ऐसा लिखा उसको छोड़िए, नाम फर्ज़ी था, अपने को जानने की इच्छा भी नहीं कौन साहब हैं, यहाँ तो बात सिर्फ़ आशय की करते हैं।

तो यदि बताए गए नाश्तों की बात करें तो मैंने कॉन्टीनेन्टल ब्रेकफास्ट और फुल इंग्लिश ब्रेकफास्ट (बिना ब्लैक पुडिंग) को आज़माया हुआ है। तो क्या उससे मेरी भारतीयता कम हो जाती है? या यह साबित हो जाता है कि मुझे ये पसंद हैं? और पसंद से भारतीयता कम होती है? खैर इस पर बाद में आएँगे, पहले भारतीय नाश्तों और खानों की बात करें।

उत्तर भारतीय नाश्ते की आईटमों की बात की जाए तो जो परंपरागत नाश्ते की आईटमें हैं जैसे की समोसे, कचौरी, अपने को बहुत पसंद हैं, लेकिन सुबह के नाश्ते के लिए मुफ़ीद आईटम नहीं हैं। ये चीज़ें प्रायः शाम के समय ही चाय आदि के साथ ली जाती हैं।

समोसा - Samosa
कचौरी - Kachori


मेरी बात की जाए तो मैं सुबह के समय नाश्ते में कोई एक निश्चित आईटम नहीं लेता हूँ, चीज़ों में बदलाव होता रहता है जैसे कि आलू/प्याज़ के परांठे, पोहा, चीज़ टोस्ट विद टोमैटो, नूडल्स, मैक्रोनी, कॉर्न फ्लेक्स, दलिया आदि। आमतौर पर मैं नाश्ते वाला जीव नहीं हूँ यदि घर पर होता हूँ तो। मैं बारह-एक बजे सीधे ही भोजन करने में यकीन रखता हूँ या कुछ लोग उसको ब्रंच (brunch) भी कह सकते हैं।

पोहा - Poha
मैक्रोनी - Macaroni


यदि अपने मित्र संतोष या किसी अन्य मित्र के साथ सुबह सवेरे कहीं घूमने या फोटोग्राफ़ी करने जाना होता है और वापसी में कर्नाटका भवन की ओर से आ रहे होते हैं तो नाश्ता वहीं पर इडली, वड़ा, सांबर और ताज़े जूस का होता है।

इडली - Idli
वड़ा - Vada


खाने में देखा जाए तो मुझे सबसे अधिक उत्तर भारतीय खाना बेहद पसंद है। गुजराती और दक्षिण भारतीय खाना भी बेहद पसंद वाली श्रेणी में ही आता है। पर साथ ही मुझे चीनी और थाई खाना भी काफ़ी पसंद है। योरोपियन खाने से इतना कोई लगाव नहीं है; पिछले वर्ष हंगरी जाना हुआ था तो वहाँ की पाककला के कुछ नमूनों से परिचय हुआ था, खाना अच्छा था लेकिन ऐसा कोई खास नहीं कि अपनी पसंदीदा वाली लिस्ट में उसको शामिल किया जाए। हाँ, वहाँ की सोपरोनी बीयर और व्हाईट वाइन (तोकाए आस्ज़ू – tokaji aszu) अपने को बेहद पसंद आई। :D इसके अतिरिक्त योरोपीय खानों में कुछ अंग्रेज़ी और कुछ इतालवी खानों से थोड़ा तवारुफ़ हुआ है अन्यथा अभी फ्रेन्च, जर्मन, डैनिश आदि पाककलाओं से अनजान ही हैं।

खैर, यह तो बात हुई नाश्तों और खानों की, अब बात यदि आशय की करी जाए, और वह भी ऐसे वैसे आशय की नहीं वरन्‌ उस आशय की करते हैं जो भारतीयता के उस गुमनाम ठेकेदार का मेरे विषय में था। कोई मुझे बताए कि किसी विदेशी पाककला की ओर रुझान होने से व्यक्ति देशद्रोही, स्व सभ्यता द्रोही हो जाता है क्या??!! हालांकि मेरा ऐसा रुझान नहीं है लेकिन एक पल को मान लिया जाए तो क्या भारतीयता की कमी आ जाएगी क्या मुझमें या किसी अन्य व्यक्ति में?! क्या किसी व्यक्ति की भारतीयता का पैमाना उसका खान-पान है?

ये जो ठेकेदार साहब हैं, मेरा अनुमान है कि ये अपने दफ़्तर धोती-कुर्ता पहन और गमछा टाँग कर तो नहीं जाते होंगे!! बाबुओं की भांति पैंट कमीज़ सूट बूट पहन जाते होंगे। तो क्या उस योरोपीय परिधान में उनकी भारतीयता कुंदन समान दमक उठती है? ऐसे लोगों की अक्ल पर तरस भी नहीं आता, बिना अक्ल और फटी हुई किस्मत के रोगी होते हैं ये, एक बार तो मन में यही आया कि “ब्लडी लूज़र” कह बात ही खत्म की जाए क्योंकि ऐसे दुखियाए लोगों के मानसिक दीवालिएपन का पूरा सार इन दो शब्दों में समा जाता है।


आपका क्या विचार है?

 
 
समोसे की फोटो साभार Kirti Poddar, कचौरी की फोटो साभार mynameisharsha, पोहे की फोटो साभार ampersandyslexia, मैक्रोनी की फोटो साभार Salihan.com, इडली की फोटो साभार SearchYogi, वड़े की फोटो साभार Pabo76, कुकुर का कार्टून साभार Anirudh Koul – सातों फोटो क्रिएटिव कॉमन्स लाइसेन्स (Creative Commons License) के अंतर्गत


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