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Archive for the ‘Movies’ Category


आईस एज: डाएनासोरों का उदय


July 10th, 2009 | 9 Comments

कल आईस एज 3 (Ice Age 3) अर्थात्‌ “आईस एज: डाएनासोरों का उदय” (Ice Age: Dawn of the Dinosaurs) देखी। इस फिल्म की प्रतीक्षा तो थी लेकिन मन में एक शंका यह भी थी कि कहीं यह दूसरे भाग, यानि कि आईस एज 2 (Ice Age 2), की भांति बेकार न साबित हो क्योंकि दूसरे भाग ने निराश किया था। अधिकतर यही देखा है कि फिल्म के सीक्वेल (sequel) प्रायः बढ़िया नहीं होते, पहली फिल्म की लोकप्रियता का अधिक लाभ उठाने के लिए जबरन बनाए गए होते हैं। लेकिन इस फिल्म ने सारी शंकाओं पर पानी फेर दिया, फिल्म मस्त और चकाचक है। काफ़ी समय बाद ऐसी फिल्म देखी जिसे देख लगा कि टिकट पर खर्च किए गए सवा दो सौ रूपए पूरी तरह वसूल हुए। :tup:

तीन सप्ताह पूर्व एन्जल्स एण्ड डीमन्स (Angels & Demons) देखी थी, फिल्म ठीक ठाक थी, कम से कम द डा विन्ची कोड (The Da Vinci Code) से तो लाख टके बेहतर थी क्योंकि इसमें कहानी को भगाया नहीं गया था खामखा, जिसने उपन्यास न भी पढ़ा हो उसको समझ आ जाए ऐसी थी। पिछले सप्ताह टर्मिनेटर सॉल्वेशन (Terminator Salvation) देखी लेकिन उससे पूरी आशा थी कि फिल्म में स्पेशल इफेक्ट्स (special effects) के अतिरिक्त कुछ खास देखने को नहीं होगा, जैसा कि हर टर्मिनेटर (Terminator) फिल्म में अब तक हुआ है, क्रिश्चियन बेल (Christian Bale) की मौजूदगी से कोई फर्क नहीं पड़ा क्योंकि अदाकारी के लिए अधिक जगह ही न थी।

लेकिन आईस एज 3 (Ice Age 3) ने मन प्रसन्न किया, फिल्म में एनिमेशन (animation) तो बढ़िया है ही, साथ ही मज़ेदार और हास्यजनक भी है, सीरियस होकर इस फिल्म को देखा ही नहीं जा सकता!! ऐली (Ellie) का किरदार पिछले भाग में भी बढ़िया लगा था और इसमें भी बढ़िया लगा, नए किरदार के रूप में बक (Buck) भी पसंद आया, बाकी आईस एज शृंखला में अपना ऑलटाईम पसंदीदा किरदार तो प्रागैतिहासिक सेबरटुथ्ड बिल्ली (Sabre-toothed Cat) डिएगो (Diego) है! :)

वैसे यह फिल्म थ्री डी (3D) में देखने की सोच रहा था लेकिन यहाँ आसपास सिर्फ़ गुड़गाँव के पीवीआर एम्बियन्स प्रीमियर (PVR Ambience Premiere) में ही यह लगी थी और मार पड़े पीवीआर (PVR) वालों की वेबसाइट बनाने वाले फटीचर को कि कल वहाँ सीट बुक करवाते समय पंगा पड़ गया और सीट बुक न हुई। पंगे के बारे में एक अलग पोस्ट में ज़िक्र करूँगा।

इस फिल्म की कहानी बहुत जबरदस्त नहीं है, लेकिन इसको फिल्माया इस तरीके से गया है कि फिल्म मस्त बनी है। डॉयलाग, स्क्रीनप्ले तथा ओवरऑल एक्ज़ीक्यूशन (overall execution) मस्त है जिसके कारण फिल्म भी मस्त है। यदि आपने यह फिल्म नहीं देखी है और एक बढ़िया फिल्म देखना चाहते हैं तो इसको देख डालिए।

रेटिंग पूछी जाए तो मैं इसको 4/5 की रेटिंग दूँगा। :tup:


स्लमडॉग करोड़पति और प्रतिभा विहीन अमिताभ बच्चन


January 17th, 2009 | 15 Comments

अभी कुछ दिन पहले हल्ला सुना एक फिल्म के बारे में, नाम स्लमडॉग मिलियनेयर (Slumdog Millionaire)। यह एक फिल्म है जो कि एक अंग्रेज़ ने बनाई है कि कैसे एक स्लम में पला बड़ा हुआ लड़का एक “कौन बनेगा करोड़पति” टाइप के कार्यक्रम में जीत की कगार पर पहुँच जाता है और सब उसकी इस उपलब्धि से सन्न रह जाते हैं। जिन लोगों ने फिल्म देख ली उनसे सुनने/पढ़ने में आया कि फिल्म बहुत ही धांसू है, फिल्म ने अवार्ड वगैरह भी जीत लिया!! आने वाले शुक्रवार, 23 जनवरी को यह फिल्म भारत में “स्लमडॉग करोड़पति” के नाम से हिन्दी में रिलीज़ हो रही है। मैं भी सोच रहा था कि शायद मैं भी देख आऊँगा सिनेमा पर क्योंकि मैं भी उन लोगों में हूँ जिन्होंने इंटरनेट से पॉयरेटिड कॉपी डाउनलोड कर नहीं देखी है और सिनेमा में देखने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। मैं प्रतीक्षा नहीं कर रहा, मूड हुआ तो देख आएँगे और यदि जानने वालों से खास समीक्षा नहीं मिली तो नहीं देखेंगे, कोई बड़ी बात नहीं है!!

अब हुआ यूँ कि इस फिल्म पर श्री अमिताभ बच्चन ने अपने ब्लॉग पर लिखा (इस फिल्म पर लिखी पंक्तियों का अनुमानित अनुवाद दे रहा हूँ, अंग्रेज़ी में लिखी असल पंक्तियों के लिए आप श्री अमिताभ की ब्लॉग पोस्ट पढ़ सकते हैं)

यदि स्लमडॉग मिलियनेयर एक प्रयास है भारत को एक तीसरी श्रेणी का विकसित हो रहा मुल्क बता उसका गंदा पिछवाड़ा दिखाने का और भारतीय देशभक्तों को पीड़ा पहुँचाने का तो यह ज्ञात होना चाहिए कि यह गंदा पिछवाड़ा सबसे अधिक विकसित देशों में भी है।

इस बात से ज़ाहिर है कुछ लोगों का कुछ हिल गया, और उनमें से एक हैं कोई निरपल धालीवाल (Nirpal Dhaliwal) जिन्होंने ब्रिटिश अख़बार गार्जियन (Guardian) में अमिताभ बच्चन को बिन दिमाग का बताते हुए लिखा कि अमिताभ बच्चन ने भी अपनी दो कौड़ी की राय इस फिल्म के बारे में दे डाली। धालीवाल के अनुसार बॉलीवुड में मौजूद अन्य प्रतिभा विहीन लोगों की ही भांति अमिताभ बच्चन भी इस बात से गुस्से में जल उठे हैं कि हालिया समय में भारत पर बनने वाली सबसे बेहतरीन फिल्म को एक गोरे फिरंगी ने बनाया है, एक ब्रिटिश ने बनाया है!! उनके मुताबिक बहुत से भारतीय इस बात से नाराज़ होंगे कि एक पश्चिमी समाज के व्यक्ति को भारत की भारतीयों से अधिक जानकारी है!! और फिर आगे ये धालीवाल साहब अमिताभ बच्चन और उनकी हालिया पश्चिमी सिनेमा की फिल्म द लास्ट लीयर (The Last Lear) पर आते हुए अमिताभ बच्चन के असफ़ल और टुच्चे अभिनय पर प्रकाश डालते हैं। ऐसा लगता है कि अमिताभ बच्चन को कोसने के लिए ही पूरा लेख लिखा गया हो। मैंने वह फिल्म नहीं देखी इसलिए मेरी उस पर कोई राय नहीं है।

लेकिन कोई उन धालीवाल को बताए कि मियां जिस तरह मूर्खता किसी की बपौती नहीं उस तरह जानकारी तथा ज्ञान भी किसी की बपौती नहीं। किसी ग्रन्थ में नहीं लिखा है कि कोई विदेशी भारत को भारतीयों से अधिक नहीं जान सकता!! आम भारतीय को तो पड़ोसी के घर का भी नहीं पता होता कि वहाँ क्या हो रहा है; हाँ मल्लिका शेरावत आदि के बारे में पता हो सकता है कि वहाँ क्या हो रहा है। भई आम आदमी आम होता है, मेहनत करता है और अपना परिवार चलाता है, नून तेल लकड़ी में लगा रहता है।

धालीवाल महोदय के अनुसार अस्सी प्रतिशत भारतीय सौ रूपए से कम दिहाड़ी कमाते हैं और चालीस प्रतिशत पचास रूपए से कम दिहाड़ी पाते हैं। दुनिया के सबसे गरीब लोगों में एक तिहाई भारतीय हैं, मुम्बई में छब्बीस लाख बच्चे सड़कों या स्लम में रहते हैं और चार लाख वेश्यावृत्ति में लिप्त हैं। लेकिन धालीवाल के अनुसार ये लोग मुख्यधारा बॉलीवुड से गधे के सिर के सींगों की भांति गायब हैं।

च च च!! तरस आता है धालीवाल पर और उनकी बुद्धि पर। कदाचित्‌ वे समझते हैं कि वे बेहतर फिल्में बना सकते हैं और अमिताभ बच्चन से अक्ल और अभिनय प्रतिभा में बीस हैं। हो सकता है कि ऐसा हो, कोई बड़ी बात नहीं है, हर सेर के लिए सवा सेर होता ही है। पर मैं तो धालीवाल की ओर से यह शुक्र मना सकता हूँ कि वे फिल्में नहीं बनाते। यदि धालीवाल फिल्में बनाने के धंधे में होते तो कंगले हुए पड़े होते और डॉन लोग अपने पैसे की उगाही के लिए इनके पीछे पड़े होते (वे फिल्में फाईनेन्स करते हैं ना, नहीं?) क्योंकि इनकी बनाई फिल्में फ्लॉप ही होती!! कदाचित्‌ धालीवाल साहब यह नहीं जानते कि फिल्म बनाना एक धंधा है, किसी भी अन्य धंधे की भांति। फिल्म बनाने वाले भी अपनी बनाई फिल्म से मुनाफ़ा कमाना चाहते हैं पैसा कमाना चाहते हैं ठीक उसी तरह जिस तरह धालीवाल एक फालतू लेख लिख के कमा रहे हैं।

बॉलीवुड आदि की फिल्में सिनेमा में देखने सिर्फ़ वही सौ रूपए से भी कम रोज़ाना कमाने वाले लोग नहीं जाते। जो जाते हैं वो अपनी ही हालत फिल्म में क्यों देखेंगे पैसा खर्च करके? ये सब तो वो फ्री फोकट में रोज़ाना अपने आसपास अपने मोहल्ले में देखते ही हैं, यह उनके जीवन की कहानी है, तो उसको पर्दे पर नकली रूप में देखने के लिए वो वह पैसा क्यों खर्चेंगे जिससे वो एक-दो वक्त का खाना खा सकते हैं या नारंगी, अंगूरी अथवा कोई अन्य देशी दारू की बोतल ले सकते हैं!! उनको मनोरंजन चाहिए और वे मिडल क्लॉस और अमीरों की दुनिया में तीन घंटे के लिए खो जाना चाहते हैं, उनको सन्नी दिओल के जबड़ा तोड़ने (और भी बहुत कुछ तोड़ने) वाले घूँसे देखने पसंद हैं, उनको शाहरूख खान और सलमान खान को सेक्सी अभिनेत्रियों के साथ अर्ध नग्न गाना गाता हुआ देखना पसंद है, वे हसीन बालाओं को देखते हुए कुछ समय के लिए अपने आप को और अपनी दरिद्र दुनिया को भूल मायावी संसार में खो जाना चाहते हैं।

और जो बाकी बीस प्रतिशत लोग हैं सौ रूपए रोज़ाना से अधिक कमाने वाले, वे सिनेमा में सौ-दो सौ रूपए का टिकट लेकर स्लम गरीबी आदि क्यों देखना चाहेंगे?? वे भी अपने मनोरंजन के लिए सिनेमा जाते हैं ताकि अपनी गर्लफ्रेन्ड अथवा परिवार के साथ कुछ समय का मनोरंजन पाकर तीन घंटे के लिए वास्तविक दुनिया से दूर हो सकें। स्लम देखना है तो उसके लिए पैसा क्यों खर्च करेंगे, वह तो वे अपनी हाऊसिंग सोसायटी के पीछे बनी जे.जे.कॉलोनी अथवा झुग्गियों की बस्ती में जाकर भी देख सकते हैं फ्री फोकट में, उसमें क्या मज़ा है? गरीबी, लोगों की दरिद्र फटेहाल हालत देखकर किसी सैडिस्ट (Sadist) का ही मनोरंजन हो सकता है न कि किसी ठीक मानसिक हालत वाले व्यक्ति का। यही कारण है कि ऐसी फिल्में नहीं चलती और इसलिए ऐसी फिल्मों का अभाव है। धालीवाल ऐसी फिल्म बनाएँ तो वे भी किसी स्लम में ही झुग्गी डाले नज़र आएँगे जहाँ उनकी झुग्गी की शोभा बढ़ाने के लिए उनकी फ्लॉप फिल्मों को मिले नेशनल अवार्ड आदि तो होंगे लेकिन खाने की उनकी थाली रिक्त होगी, अवार्ड को चाट के पेट की क्षुधा नहीं शांत होती!! :)

मैं कोई बॉलीवुड का खासा प्रशंसक नहीं हूँ, और मैं यह भी कहूँगा कि हालिया समय में फालतू फिल्में ही आ रही हैं जिनको देखने के लिए मैं अपना समय और पैसे बर्बाद नहीं करता, कुछेक अच्छी फिल्में आती हैं यदा कदा जो मैं समझता हूँ कि मेरे देखने लायक हैं जैसे पिछले वर्ष सितंबर में रिलीज़ हुई फिल्म अ वेडनेसडे (A Wednesday)।

लेकिन यदि जीवन की सच्चाई के नाम पर स्लम आदि दिखाने के लिए फिल्म बनती है जस्ट फॉर द सेक ऑफ़ इट तो मैं यकीनन उसको नहीं देखूँगा क्योंकि मैं फिल्में मनोरंजन के लिए देखता हूँ जीवन की सच्चाई के पाठ पढ़ने के लिए नहीं और न ही मानसिक यातना झेलने के लिए। मैं क्यों स्लम देखना चाहूँगा? हर किसी के जीवन में उसकी अपनी कठिनाईयाँ कम नहीं होती, मेरे जीवन में भी हैं मेरे पड़ोसी के जीवन में भी हैं, तो मैं क्यों स्लम देख अपने को मानसिक यातना पहुँचाऊँ? बुरी हालत देख मन को कोई सुकून नहीं पहुँचेगा क्योंकि मैं सैडिस्ट नहीं हूँ और तमाशबीन नहीं हूँ तो इसलिए वह मेरे लिए तमाशा भी नहीं होगा। मन में पीड़ा होगी ऐसा जीवन जी रहे लोगों को देख के यह कदाचित्‌ एक संभावना है, कहने वाले वैसे मुझे स्टोन हार्टिड स्काऊन्ड्रल.. अथवा पत्त्थर दिल कमीना.. भी कहते हैं।

यह मेरे व्यक्तिगत विचार हैं, हो सकता है कुछ अन्य लोग भी इनसे इत्तेफ़ाक रखते हों और ऐसी भी संभावना है कि बहुत से लोग इनसे इत्तेफ़ाक नहीं रखते हों। लेकिन मैं धालीवाल के लिखे इस लेख को बेतुका और फालतू ही मानता हूँ – धालीवाल को फिल्म में और डॉक्यूमेन्टरी में और रियैलिटी शो में फर्क पता होना चाहिए। ब्रिटेन में भी स्लम हैं, तो क्या वहाँ के फिल्मकारों को वे नहीं दिखते? हॉलीवुड (Hollywood) जेम्स बांड की अत्याधुनिक फिल्में बनाता है, साइंस फिक्शन बनाता है, सुपर हीरो वाली फिल्में बनाता है, एलियन्स पर फिल्में बनाता है, उनको अमेरिका के स्लमों और पिछड़े इलाकों में रह रहे अंडर प्रिविलेज्ड लोगों आदि की जानकारी नहीं है क्या? मैं नहीं समझता कि इस फिल्म को बनाने वाले ब्रिटिश फिल्मकार डैनी बॉयल (Danny Boyle) अथवा इस फिल्म की कहानी को उपन्यास के रूप में लिखने वाले विकास स्वरूप कोई स्टेटमेन्ट प्रस्तुत करना चाह रहे थे। उनको एक कहानी में संभावना नज़र आई और उनकी वह कहानी चल पड़ी!! तो धालीवाल को इतना सेन्टीमेन्टल होने की कोई आवश्यकता नहीं है। वे स्वयं फिल्म बनाने का प्रयास कर सकते हैं अपने अनुसार जो उनको लगे कि बॉलीवुड वालों के वश की बात नहीं है और ऐसी दो-तीन फिल्मों को बना लेने के बाद धालीवाल से पूछा जा सकेगा कि कैसे हैं उनके हाल!! :)

वैसे एक बात गौर करने लायक है कि ब्रिटिश अख़बार गार्जियन का स्तर गिर रहा है या पहले ही ऐसा गिरा हुआ था कि ऐसे आंडू पांडू लेख उसमें छपने लगे हैं। या फिर सारे ही समझदार लोग उसके लिए लिखते हैं? इसी अख़बार में अभी हाल ही में एक मोहतरमा अरुणधती राय ने भी अपनी बकवास राय छापी थी और अब यह फालतू समय बर्बादी का लेख। एक से बढ़कर एक समझदार लोग यहीं बसे हुए दिखाई देते हैं, जिनको कोई और नहीं पूछता उनको गार्जियन छापता है, जय हो! :)


क्वानटम ऑफ़ सोलेस


December 2nd, 2008 | 10 Comments

क्वानटम ऑफ़ सोलेस (Quantum of Solace) 6 नवंबर को भारत में रिलीज़ हुई, अमेरिका से पहले यह भारत में रिलीज़ हुई इससे कई लोगों की बाछें खिल गई। ऑफिशियली यह जेम्स बांड की बाईसवीं फिल्म है और पिछली फिल्म कसीनो रोयाल (Casino Royale) का अगला भाग है। तो बुकमाईशो पर मॉर्निंग शो की टिकट बुक करवाई (दिन के शो के मुकाबले पचास रूपए कम लगे) और रिलीज़ के अगले ही दिन यानि कि शनिवार 7 नवंबर को पहुँच गए फिल्म देखने।

कसीनो रोयाल के बारे में मैंने लिखा था कि फिल्म की कहानी ठीक ठाक है, सुन्दर जगहों पर फिल्माया गया है लेकिन नए नवेले बांड बने अभिनेता डेनिएल क्रेग का अभिनय कुछ खास न था। इस नई फिल्म क्वानटम ऑफ़ सोलेस में ठीक इसका विपरीत हुआ लगा। इस फिल्म में लोकेशन फालतू सी थीं क्योंकि उनको कहानी में फिट बैठाना था और कहानी का क्या कहें, मैंने इससे वाहियात कहानी वाली शायद ही कोई बांड फिल्म देखी हो (मैंने लगभग सभी बांड फिल्म देख रखी हैं एक-दो को छोड़ जिनको शीघ्र ही देखा जाएगा)!! सिर्फ़ एक बात जो इस फिल्म में अच्छी लगी वह थी डेनिएल क्रेग का अभिनय जो कि पिछली फिल्म के मुकाबले काफ़ी बेहतर लगा, डेनिएल ने काफ़ी मेहनत की है ऐसा साफ़ दिखाई दिया। अभिनय सधा हुआ था और एक खास बात इस फिल्म की यह लगी कि बांड का किरदार शो ऑफ़ (show off) करने की अपेक्षा काम पूरा करने की सोच लिए दिखा। इससे पहले ऐसा मैंने सिर्फ़ बीसवीं बांड फिल्म डाई अनदर डे (Die Another Day) में देखा था जिसमें बांड के किरदार को मेरे अभी तक के सबसे अधिक पसंदीदा बांड अभिनेता पियर्स ब्रॉसनेन ने निभाया था।

खैर, इस फिल्म पर आएँ तो बहुत ही वाहियात सी कहानी लिए हुए है। एक अमेरिकन कंपनी और उसका मालिक दक्षिण अमेरिकी देश बोलिविया के पानी पर कब्जे के चक्कर में होता है ताकि उस देश को ऊँचे दाम पर पानी बेच सके। इसके लिए वह एक तड़ीपार किए गए फौजी जनरल की मदद करता है ताकि जनरल देश की सत्ता पर काबिज़ हो सके और फिर जनरल से पानी खरीदने के करार पर दस्तखत करने को कहता है। जब जनरल आनाकानी दिखाता है तो विलेन जनरल को धमकाता है कि यदि दस्तखत नहीं किए तो जनरल का सहयोगी खुद जनरल को गोली मार देगा और मजबूरन जनरल दस्तखत कर देता है। मुझे यह समझ नहीं आया कि यदि विलेन इतना ही ताकतवर था तो इस जनरल को सत्ता पर बिठाकर क्या लाभ स्वयं अपना ही कोई बंदा क्यों नहीं बिठा दिया जो विलेन की सभी बातें आराम से मानता?? और बोलिविया जैसे फटीचर देश के पानी पर काबिज़ होकर कौन सी दौलत पाने की फिराक में था जब वह देश और उसकी जनता खुद ही गरीबी का शिकार है?? :roll:

कुल मिलाकर इस फिल्म के बारे में कहने को कुछ नहीं है, मामला एकदम बकवास और पैसे की बर्बादी दिखा। कहानी किसी नौसिखिए फालतू कहानीकार द्वारा लिखी गई जान पड़ी, लोकेशन आदि कहानी के साथ फिट बिठाई हुई थीं। इस फिल्म में भी पिछली फिल्म की ही भांति गैजेट्स आदि नहीं दिखाए गए हैं जिनसे कोई खास फर्क नहीं पड़ता। मुझे याद नहीं इससे पहले किसी बांड फिल्म में बांड गर्ल को कम ग्लैमरस दिखाया गया हो लेकिन इस वाली फिल्म में एक नया यह भी दिखा कि बांड गर्ल बनी यूक्रेनियन सुन्दरी ओल्गा कुरल्येन्को की सुन्दरता को दबा के कम ग्लैमरस दिखाया गया है। :tdown:

मैंने तो इस बात का शुक्र मनाया कि मॉर्निंग शो देखा और पचास रूपए बचा लिए वर्ना 115 की जगह 160 रूपए खर्च होते दिन वाले शो में। कायदे से तो मॉर्निंग शो वाले 115 रूपए भी बर्बाद ही गए इस फिल्म पर!!

रेटिंग की कहें तो मैं इसको पाँच में से सिर्फ़ एक अंक दूँगा और वह भी डेनिएल क्रेग के सुधरे हुए अभिनय के लिए जो कि इस फिल्म में अकेली अच्छी चीज़ दिखी, अन्यथा यह फिल्म पाँच में से शून्य की ही हकदार है!! :tdown:


द डार्क नाइट


July 29th, 2008 | 6 Comments

कॉमिक्स पढ़ने वालों, कार्टून अथवा फिल्में आदि देखने वालों में कदाचित्‌ ही ऐसा कोई होगा जिसने बॉब केन (Bob Cane) के प्रसिद्ध शाहकार बैटमैन (Batman) के बारे में न पढ़ा/सुना हो। सुपर हीरो बिरादरी में बहुत ही कम इक्के-दुक्के ऐसे सुपर हीरो हैं जिनके पास कोई सुपर पॉवर नहीं है और बैटमैन उनमें से एक है। यह सुपर हीरो अपनी शारीरिक शक्ति, हाथों की लड़ाई की दक्षता, अपने तेज़ दिमाग और वैज्ञानिक उपकरणों की सहायता से अपराध और अपराधियों के दिलो दिमाग पर हौव्वा बनता है। यही कारण है कि सुपर हीरो जमात में यह मेरा सबसे अधिक मनपसंद सुपर हीरो है। :) :tup:

18 जुलाई को आखिरकार लंबी प्रतीक्षा के बाद क्रिस्टोफर नोलन की बैटमैन शृंखला की अगली फिल्म “द डार्क नाइट” (The Dark Knight) रिलीज़ हुई। यह फिल्म मई में रिलीज़ होनी थी जैसा कि इसके शुरुआती ट्रेलर (trailer) में दिखाया था पर दो माह यह फिल्म लेट हो गई। अब अपने को बहुत बेसब्री से इस फिल्म की प्रतीक्षा थी और इत्तेफ़ाक की बात रही कि जिस दिन यह रिलीज़ हुई उसी दिन दोपहर को लगा कि सांय काल मेरे पास दो-तीन घंटे का खाली समय होगा। तुरंत बुकमाईशो पर देखा कि घर के आसपास यह फिल्म कहाँ लगी है, इत्तेफ़ाक ही रहा कि घर से मात्र 6-7 किलोमीटर की दूरी पर ही स्थित एक सिनेमा पर यह फिल्म लगी थी और सांय काल के प्रथम शो में कुछ सीटें खाली थीं। बस यह देख अपना दिल गार्डन-२ हो गया और तुरंत फिल्म की टिकट बुक करवा ली।

इस कड़ी की पिछली फिल्म के अंत में जोकर (Joker) का वर्णन आ गया था तो अपेक्षित था कि इस फिल्म में विलेन जोकर होगा जैसे कि पिछली फिल्म में रास-अल-घूल (Ra’s-al-Ghul) था। कहानी एक तरह से वहीं से आगे बढ़ती दिखती है जहाँ पिछली फिल्म में छोड़ी गई थी, यानि कि गॉथम शहर (Gotham City) में अपराध का बोलबाला है और बैटमैन तथा पुलिस में उसका साथी लूटेनेन्ट जिम गॉर्डन (Lieutenant Jim Gordon) अपराध के खिलाफ़ जंग छेड़ देते हैं और माफ़िया बॉसों का जीना दुश्वार कर देते हैं; रात में माफ़िया सरगना बैटमैन के खौफ़ के कारण बाहर नहीं निकलते और दिन में गॉर्डन का डर उन्हें बाहर निकलने नहीं देता। इधर ये दोनों लड़ाई के मामले में जंग छेड़े हुए थे उधर नए-२ डिस्ट्रिक्ट एटोर्नी (District Attorney) बने हार्वी डेन्ट (Harvey Dent) और उसकी सहयोगी तथा ब्रूस वेन (Bruce Wayne) यानि कि बैटमैन की बचपन की मित्र रेचल डॉस (Rachel Dawes) ने कानून की भूमि पर माफ़िया बॉसों का जीना दुश्वार कर रखा होता है क्योंकि पहले की तरह कानून की गिरफ़्त से आराम से छूट जाने वाले अपराधी इन दोनों की बदौलत सीधे जेल जा रहे होते हैं। जहाँ कल तक शहर पर माफ़िया बॉसों की हुकूमत चलती थी वहीं आज उनको बैटमैन, गॉर्डन और डेन्ट से तीन तरफ़ा मार ऐसी पड़ रही होती है कि उनके लिए बचने की कोई जगह नहीं रहती। हालात ऐसे हो जाते हैं कि माफ़िया बॉसों की हालत डेस्परेशन तक पहुँच जाती है और तब रोल आता है जोकर का, एक पागल सिरफिरा मसखरा जुनूनी दयाहीन अपराधी, जो माफ़िया बॉसों की आधी दौलत के बदले बैटमैन को ठिकाने लगाने की पेशकश करता है जिसे माफ़िया बॉस ठुकरा देते हैं क्योंकि कोई भी अपनी आधी दौलत नहीं देना चाहता इस काम के लिए। परन्तु कोई अन्य रास्ता न देख आखिरकार माफ़िया बॉस मान जाते हैं और जोकर को बैटमैन की सुपारी दे डालते हैं। फिर खेल शुरु होता है जोकर का जिसमें वह बैटमैन को आत्मसमर्पण पर मज़बूर करने के लिए पूरे शहर में ज़लज़ला ले आता है जिसमें जान और माल दोनो का ही भारी नुकसान होता है, दहशत का ऐसा नंगा नाच होता है जो कि किसी सुपर हीरो फिल्म में शायद ही दिखाया गया हो, आम लोगों के साथ-२ कई पुलिस वालों, यहाँ तक कि पुलिस कमिश्ननर की भी जान चली जाती है।

पूरा शहर बैटमैन के आत्मसमर्पण के लिए चिल्ला रहा होता है, जहाँ हार्वी डेन्ट शहर का हीरो होता है वहीं लोग बैटमैन को कोस रहे होते हैं कि उसकी वजह से उन सबकी जोकर ने वाट लगाई हुई होती है। एक पल ऐसा आता है कि ब्रूस वेन (Bruce Wayne) आत्मसमर्पण करने की ठान लेता है, उसका वफ़ादार नौकर और सहयोगी अल्फ्रेड उसे समझाता है कि बैटमैन को यह सब सहन करना होगा क्योंकि हालात सुधरने से पहले बुराई की चोटी तक तो पहुँचने ही थे और सवेरा अवश्य होगा। इधर हार्वी डेन्ट भी लोगों को समझा रहा होता है कि बैटमैन को जोकर के हवाले कर देने से कोई लाभ नहीं होगा क्योंकि डेन्ट ना चाहते हुए भी यह मानता है कि इस तुरत फुरत अपराध के नाश में बैटमैन का बहुत बड़ा अद्वितीय योगदान है। सभी माफ़िया बॉसों आदि को जेल में डालने के लिए डेन्ट ने माफ़िया सरगनाओं के जिस अकाउंटेन्ट की सहायता ली होती है उसका हांगकांग से अपहरण करके बैटमैन ने ही गॉथम की पुलिस को सौंपा होता है, एक ऐसा काम जो उनमें से कोई और नहीं कर सकता था।

फिर क्या होता है? यह तो आप फिल्म देखकर ही जानिए। फिल्म के अंत में जब जोकर पकड़ा जाता है तो वो कुबूल करता है कि बैटमैन को वाकई भ्रष्ट नहीं किया जा सकता, उसको कितना ही उकसा लो कितना ही प्रताड़ित कर लो लेकिन वो ज़ाती तौर पर बदला नहीं लेता और जोकर जैसे मुजरिम की भी जान नहीं लेता।

इस फिल्म में बैटमैन के एक बहुत ही करीबी की मृत्यु हो जाती है, उस करीबी व्यक्ति की जिसने ब्रूस वेन को यह समझाया था कि कानून मरा नहीं है और खुद के लिए बदला लेना और इंसाफ़ करना दो अलग-२ चीज़े हैं, ऐसी बातें जिन्होंने आगे चलकर ब्रूस को बैटमैन बनकर अपराध के खिलाफ़ लड़ने और हर मुजरिम को कानून द्वारा सज़ा दिलवाने के लिए प्रेरित किया।

हार्वी डेन्ट एक मुजरिम बन जाता है, जानने वाले जानते होंगे कि हार्वी डेन्ट ही अपराधी टू फेस (Two Face) होता है। लोगों के हौसले हार्वी डेन्ट की काली करतूतों के कारण पस्त न हो जाएँ इसके लिए बैटमैन कमिश्नर गॉर्डन को इस बात के लिए मना लेता है कि वह डेन्ट द्वारा किए गए खून बैटमैन के सिर मढ़ दे ताकि लोगों के विश्वास और हौसले को ठेस न पहुँचे। और इधर गॉर्डन पुलिस मुख्यालय के ऊपर लगे बैट सिग्नल (Bat Signal) (बैटमैन को मदद के लिए बुलाने का एक ज़रिया) को नष्ट करता है उधर बैटमैन को पकड़ने के लिए पुलिस की तलाश शुरु हो जाती है, जिन पाँच लोगों की हत्याओं का दोष बैटमैन ने अपने ऊपर लिया होता है उसमें दो पुलिस वाले भी होते हैं। इधर पुलिस बैटमैन के पीछे निकलती है उधर गॉर्डन का पुत्र पूछता है कि बैटमैन क्यों भाग गया जब उसने कुछ गलत किया ही नहीं, तो उत्तर में गर्व मिश्रित दुख के साथ गॉर्डन कुबूलता है कि पुलिस अब बैटमैन का पीछा करेगी, वह हीरो नहीं है बल्कि गॉथम शहर का एक संरक्षक है, एक चौकस रखवाला, द डार्क नाइट (the dark knight)। :tup:

अमूमन होता है कि फिल्मों के ट्रेलर बहुत बढ़िया होते हैं जो कि फिल्म के बारे में अति उत्साहित कर देते हैं और फिल्म बाद में फुस्स ही निकलती है। लेकिन बैटमैन की इस फिल्म के बारे में मैंने उल्टा ही महसूस किया, इसके ट्रेलरों ने फिल्म के बारे में खास उत्साहित नहीं किया था, फिल्म देखने से पहले मन में एक तरफ़ यह भी आशंका घेरे हुए थी कि कहीं फिल्म फुस्स न निकल जाए जब ट्रेलरों में ही कोई खास दम नहीं था। परन्तु फिल्म ने सारी आशंकाओं को चकनाचूर कर दिया और मैं यह विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि अभी पिछले कुछ वर्षों में बनी सुपर हीरो फिल्मों में यह अभी तक की सबसे बढ़िया फिल्म है। अभी तक सुपर हीरो फिल्मों में स्पाइडरमैन की ही फिल्में टॉप पर थीं लेकिन मैं समझता हूँ कि इस फिल्म ने स्पाइडरमैन की अभी तक की आई तीनों फिल्मों को उठाकर नीचे फेंक दिया है, वे इसके सामने कहीं भी नहीं टिकती। ऑयरन मैन (Iron Man) का तो इससे कोई मुकाबला ही नहीं है और सुपरमैन (Superman) की जो अभी हाल ही में वापसी हुई थी उसका बैटमैन की इस फिल्म से मुकाबला करना इस बैटमैन फिल्म की बेइज़्ज़ती होगी। :tup:

कहने की आवश्यकता नहीं कि यह फिल्म दूसरी सुपर हीरो फिल्मों को ही नहीं वरन्‌ अन्य फिल्मों को भी चारों खाने चित्त करती है। और इसका प्रमाण बॉक्स ऑफिस पर इसकी सफ़लता भी है, पहले दिन ही इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस के पूर्व रिकॉर्ड तोड़ डाले और पाँच दिन के अंदर-२ बीस करोड़ डॉलर की कमाई कर डाली। :tup:

कलाकारों की बात की जाए तो पिछली फिल्म की भांति इस फिल्म में भी क्रिस्टियन बेल (Christian Bale) ने बैटमैन तथा ब्रूस वेन के किरदार में काफ़ी अच्छा अभिनय किया है। अल्फ्रेड (Alfred) बने माइकल केन (Michael Caine) और लूशियस फ़ॉक्स (Lucius Fox) बने मॉर्गन फ्रीमैन (Morgan Freeman) के अभिनय के तो कहने ही क्या, दोनो मास्टर हैं और फिल्म में अपने किरदारों को मिले कम समय में भी दोनों ने शानदार अभिनय किया है। पुलिस लूटेनेन्ट (और बाद में कमिशनर) गॉर्डन (Lieutenant Gordon) को इस फिल्म में पिछली फिल्म के मुकाबले अभिनय का अधिक स्कोप मिला जिसे पिछली बार ही की तरह गैरी ओल्डमैन (Gary Oldman) ने बखूबी अदा किया है, वह एक बढ़िया अभिनेता हैं। :tup:

कई लोग इस फिल्म के बारे में इसलिए भी उत्सुक दिखे क्योंकि यह अभिनेता हीथ लेजर (Heath Ledger) की आखिरी फिल्म है, इस वर्ष जनवरी में हीथ की मृत्यु हो गई। लेकिन मुझे जोकर बने हीथ का अभिनय ऐसा कुछ खास नहीं लगा, जोकर का किरदार काफ़ी पॉवरफुल है और हीथ के साधारण अभिनय ने काफ़ी अधिक गुंजाइश छोड़ दी। :tdown: एक अन्य किरदार का अभिनय जो मुझे फालतू लगा वह है रेचल डॉस बनी मैग्गी गायलेनहॉल (Maggie Gyllenhaal) जिसने बिलो पार (below par) अभिनय कर पूरे किरदार की वाट लगा दी। :tdown: पिछली फिल्म में रेचल डॉस बनी केटी होम्स (Katie Holmes) ने भी कोई खास अभिनय नहीं किया था पर वह फिर भी मैग्गी के अभिनय के मुकाबले ठीक ठाक ही था। मुख्य किरदारों में एकलौता स्री किरदार और उसकी भी ऐसी वाट लगना – वाकई बहुत अफ़सोसजनक है। लेकिन खुशी की बात है कि इनके बेकार अभिनय से ओवरऑल फिल्म की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा और फिल्म एकदम चकाचक बन पड़ी है।

यदि आप एक अच्छी थ्रिलर फिल्म देखना चाहते हैं जो आपको एक पल के लिए भी चैन से न बैठने दे और पूरे समय उत्सुक और उत्साहित रखे तो यह फिल्म अवश्य देख आईये। मेरे अनुसार यह फिल्म पाँच में से पौने पाँच की रेटिंग की अधिकारी है। जैसे ही इस फिल्म की डीवीडी रिलीज़ होती है वैसे ही तुरंत उसकी एक प्रति मेरे कलेक्शन में जाएगी, यह फिल्म रखने योग्य है। :cool: :tup:
 
रेटिंग: 4.75 / 5


अब मोबाइल फोन पर बुक कराएँ सिनेमा की टिकट…..


May 19th, 2008 | 3 Comments

अभी कुछ दिन पहले ऑयरन मैन की समीक्षा के दौरान मैंने बुकमाईशो.कॉम के मोबाइल सॉफ़्टवेयर का ज़िक्र किया था कि कैसे मैंने बिना कंप्यूटर के बाज़ार में बैठे हुए मोबाइल फोन पर फिल्म की टिकट बुक करवाई थी। यह पहला वाक्या था जब मैंने मोबाइल पर टिकट बुक करवाई थी।

फिल्म देखने जाना हो तो अभी तक सिनेमा जाकर हाथों हाथ टिकट ली जाती थी, अमूमन टिकट मिल ही जाया करती थी। पहले से एडवांस में टिकट मैंने आखिरी बार आमिर खान की फिल्म “लगान” के लिए ली थी जब एक सप्ताह बाद की टिकट बुक कराने के लिए सिनेमा पर एक घंटा कतार में खड़ा रहना पड़ा था!! :eek: उसके बाद कभी एडवांस में सिनेमा से टिकट लेने का इत्तेफ़ाक नहीं हुआ।

इंटरनेट की पैठ बढ़ी, पास में क्रेडिट कॉर्ड आया तो फिल्म देखने जाने के लिए पीवीआर (PVR) के सिनेमाओं में ही जाने लगे। कारण? कारण यह कि पीवीआर ही अकेला सिनेमा था जिसकी वेबसाइट पर बुकिंग की सुविधा थी। टिकट बुकिंग के साथ-२ अपनी मनपसंद सीट चुनने की भी सुविधा मिलती थी, सिनेमा का एक नक्शा दिखा दिया जाता और उसमें मौजूद खाली सीटों में से अपनी पसंद की सीट चुन लेते और क्रेडिट कॉर्ड से भुगतान कर देते। बुकिंग होने पर एक कन्फर्मेशन नंबर मिल जाता और मोबाइल पर एसएमएस (SMS) के रुप में भी आ जाता, इससे होता यूं कि सिनेमा(जिसकी टिकट बुक करी) पर जाकर नंबर और क्रेडिट कार्ड(जिससे बुकिंग करी थी) दिखाना होता और टिकट मिल जाती सिनेमा में प्रवेश के लिए, सीट तो पहले से ही बुक हो चुकी थी।

फिर लगा कि कब तक सिर्फ़ पीवीआर तक ही बंधे रहेंगे, और कोई क्यों नहीं ऑनलाईन बुकिंग का जुगाड़ देता!! तब नेटवर्क18 (Network18) वालों की वेबसाइट बुकमाईशो.कॉम (BookMyShow.com) आई जिस पर सिर्फ़ पीवीआर ही नहीं कई अन्य सिनेमाओं की भी टिकट बुक करने की सुविधा मिली। अब अपना मामला सिर्फ़ पीवीआर तक ही सीमित न रहकर अन्य सिनेमाओं में भी फैला। बढ़िया बात यह इनकी कि दिल्ली और आसपास ही नहीं वरन्‌ भारत के कई शहरों में मौजूद सिनेमाओं की टिकट बुक कराने की सुविधा यह वेबसाइट दे रही है।

लेकिन अपने को संतुष्टि नहीं थी, जैसा शाहरुख़ खान कहते नज़र आते हैं, अपन भी “थोड़ा और विश करते”। :D फिर जल्द ही बुकमाईशो.कॉम के मोबाइल सॉफ़्टवेयर का लिंक उसी की वेबसाइट पर देखा और उसको डाउनलोड कर मोबाइल फोन में स्थापित कर लिया।

इस मोबाइल सॉफ़्टवेयर को डाल लो और मोबाइल में यदि जीपीआरएस (GPRS) आदि द्वारा इंटरनेट की सुविधा है तो कंप्यूटर की भी आवश्यकता नहीं, कहीं भी बैठे-२ पूरे भारत में मौजूद कई सिनेमाओं में से किसी की भी टिकट बुक करवाई जा सकती है।

टिकट बुक करना भी काफ़ी आसान है। सॉफ़्टवेयर चालू होते ही आपसे पूछता है कि आपने क्या करना है, आप टिकट खरीदने के विकल्प को चुनते हैं तो आपसे पूछेगा कि किस चीज़ की टिकट बुक करनी है – फिल्म की, नाटक की या कॉन्सर्ट की। फिल्म वाला विकल्प चुनते ही वह आपके पहले से चुने हुए शहर में चल रही फिल्मों की सूचि दिखाता है, जैसे मेरे में दिल्ली की दिखाता है। यदि आपको किसी और शहर के सिनेमा की करानी है तो आप विकल्पों में से उस शहर को चुनिए और आपको उस शहर में चल रही फिल्मों की सूचि दिखेगी।

जिस फिल्म को आपने देखना है उसको चुनते ही आपको उस फिल्म को दिखा रहे सिनेमाओं की सू़चि और तारीख़ दिखने लगेगी। आप जिस तारीख़ को जिस सिनेमा में फिल्म देखना चाहते हैं उसका चुनाव करेंगे तो चुने गए सिनेमा में कितने बजे के शो हैं उनकी सूचि प्रस्तुत होगी जिसमें से मनमाफ़िक शो को चुनने के बाद आपको जितनी प्रकार की सीटें मौजूद हैं उनकी सूचि दिखाई जाएगी(दाम के साथ) और फिर आपसे पूछा जाएगा कि आपको कितनी टिकट बुक करानी हैं। यदि आपके पास डिस्काउंट कूपन है तो उसका नंबर डालने का विकल्प इसके बाद आता है, तथा तत्पश्चात सॉफ़्टवेयर मोबाइल की स्क्रीन पर सिनेमा का नक्शा प्रस्तुत करेगा, और आप अपनी मर्ज़ी की सीट चुन सकते हैं, नक्शे में यह अंकित किया हुआ होता है कि स्क्रीन किस तरफ़ है और सभी सीटें भी अंकित की गई होती हैं, जो सीटें बिक चुकी हैं वह अलग से अंकित होती हैं और आप उनको नहीं चुन सकते। सीटें चुनने के बाद अगली स्क्रीन पर भुगतान की सुविधा होती है, बस आप अपने क्रेडिट कार्ड का नंबर इत्यादि भरें और बुकमाईशो.कॉम वाले आपके कार्ड पर चार्ज कर लेंगे।

इस सबके बाद आपको स्क्रीन पर बुकिंग नंबर दिखा दिया जाएगा और एसएमएस द्वारा भी आपको भेज दिया जाएगा। सीट बुक हो चुकी इसलिए कोई टेन्शन नहीं, फिल्म शुरु होने से 10 मिनट पहले पहुँच आराम से बुकिंग नंबर दिखा टिकट हासिल की जा सकती है, घंटे भर पहले पहुँच टिकट हासिल करने के लिए लाइन में लगने का कोई झंझट नहीं। :tup:

इस तरह या कंप्यूटर पर वेबसाइट खोल टिकट बुक कराने का मुझे एक सबसे बड़ा लाभ यह नज़र आता है कि जल्दी पहुँचने अथवा लाइन में लगने की सिरदर्दी तो जाती ही है, सीट भी अपनी पसंद की बुक की जा सकती है अन्यथा बुकिंग काउंटर वाले को कितना बता दो कि कैसी सीट चाहिए लेकिन अधिकतर हमेशा दाएँ-बाएँ की बेकार सी ही सीट मिलती थी, बीच की और पीछे वाली बढ़िया सीटें वे लोग देते ही नहीं थे!!

इन लोगों का अभी सभी सिनेमाओं से गठबंधन नहीं हुआ है, इसलिए कई सिनेमा ऐसे हैं जिन पर जाकर ही टिकट लेनी पड़ती है, लेकिन धीरे-२ आशा है कि उन सिनेमाओं की भी ऑनलाईन बुकिंग होनी शुरु हो जाएगी। दिल्ली में भी कुछेक सिनेमा ऐसे हैं जिनकी ऑनलाईन बुकिंग नहीं होती, तो जब तक नहीं होती तब तक अपन तो उनसे दूर ही हैं! ;)


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