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Archive for the ‘Satire’ Category


भारतीयता नहीं है आपमें…..


October 22nd, 2009 | 12 Comments

अभी कुछ दिन पहले मैंने आमतौर पर समझने जाने वाले कॉन्टीनेन्टल नाश्ते और असली कॉन्टीनेन्टल ब्रेकफास्ट के फ़र्क को बताते हुए पोस्ट ठेली थी, साथ ही फुल इंग्लिश ब्रेकफास्ट, स्कॉटिश ब्रेकफास्ट, आदि के बारे में भी बताया कि इनमें किन आईटमों की मौजूदगी रहती है। तो हुआ यूँ कि एक साहब ने इस ब्लॉग पर मौजूद संपर्क करने वाले फॉर्म का प्रयोग कर मुझे एक ईमेल लिखा। ईमेल की भाषा कड़क थी, क्या लिखा वह तो नहीं छाप रहा पर मोटे तौर पर उस संदेश का आशय मुझ पर लानत फलानत भेजना था कि अपने देश के नाश्ते मुझे पसंद नहीं आते और मैं शान से अपने को भारतीय कहते हुए फिरंगियों के नाश्ते करता हूँ और अपनी शेखी अपने ब्लॉग पर बखारता हूँ। किसने ऐसा लिखा उसको छोड़िए, नाम फर्ज़ी था, अपने को जानने की इच्छा भी नहीं कौन साहब हैं, यहाँ तो बात सिर्फ़ आशय की करते हैं।

तो यदि बताए गए नाश्तों की बात करें तो मैंने कॉन्टीनेन्टल ब्रेकफास्ट और फुल इंग्लिश ब्रेकफास्ट (बिना ब्लैक पुडिंग) को आज़माया हुआ है। तो क्या उससे मेरी भारतीयता कम हो जाती है? या यह साबित हो जाता है कि मुझे ये पसंद हैं? और पसंद से भारतीयता कम होती है? खैर इस पर बाद में आएँगे, पहले भारतीय नाश्तों और खानों की बात करें।

उत्तर भारतीय नाश्ते की आईटमों की बात की जाए तो जो परंपरागत नाश्ते की आईटमें हैं जैसे की समोसे, कचौरी, अपने को बहुत पसंद हैं, लेकिन सुबह के नाश्ते के लिए मुफ़ीद आईटम नहीं हैं। ये चीज़ें प्रायः शाम के समय ही चाय आदि के साथ ली जाती हैं।

समोसा - Samosa
कचौरी - Kachori


मेरी बात की जाए तो मैं सुबह के समय नाश्ते में कोई एक निश्चित आईटम नहीं लेता हूँ, चीज़ों में बदलाव होता रहता है जैसे कि आलू/प्याज़ के परांठे, पोहा, चीज़ टोस्ट विद टोमैटो, नूडल्स, मैक्रोनी, कॉर्न फ्लेक्स, दलिया आदि। आमतौर पर मैं नाश्ते वाला जीव नहीं हूँ यदि घर पर होता हूँ तो। मैं बारह-एक बजे सीधे ही भोजन करने में यकीन रखता हूँ या कुछ लोग उसको ब्रंच (brunch) भी कह सकते हैं।

पोहा - Poha
मैक्रोनी - Macaroni


यदि अपने मित्र संतोष या किसी अन्य मित्र के साथ सुबह सवेरे कहीं घूमने या फोटोग्राफ़ी करने जाना होता है और वापसी में कर्नाटका भवन की ओर से आ रहे होते हैं तो नाश्ता वहीं पर इडली, वड़ा, सांबर और ताज़े जूस का होता है।

इडली - Idli
वड़ा - Vada


खाने में देखा जाए तो मुझे सबसे अधिक उत्तर भारतीय खाना बेहद पसंद है। गुजराती और दक्षिण भारतीय खाना भी बेहद पसंद वाली श्रेणी में ही आता है। पर साथ ही मुझे चीनी और थाई खाना भी काफ़ी पसंद है। योरोपियन खाने से इतना कोई लगाव नहीं है; पिछले वर्ष हंगरी जाना हुआ था तो वहाँ की पाककला के कुछ नमूनों से परिचय हुआ था, खाना अच्छा था लेकिन ऐसा कोई खास नहीं कि अपनी पसंदीदा वाली लिस्ट में उसको शामिल किया जाए। हाँ, वहाँ की सोपरोनी बीयर और व्हाईट वाइन (तोकाए आस्ज़ू – tokaji aszu) अपने को बेहद पसंद आई। :D इसके अतिरिक्त योरोपीय खानों में कुछ अंग्रेज़ी और कुछ इतालवी खानों से थोड़ा तवारुफ़ हुआ है अन्यथा अभी फ्रेन्च, जर्मन, डैनिश आदि पाककलाओं से अनजान ही हैं।

खैर, यह तो बात हुई नाश्तों और खानों की, अब बात यदि आशय की करी जाए, और वह भी ऐसे वैसे आशय की नहीं वरन्‌ उस आशय की करते हैं जो भारतीयता के उस गुमनाम ठेकेदार का मेरे विषय में था। कोई मुझे बताए कि किसी विदेशी पाककला की ओर रुझान होने से व्यक्ति देशद्रोही, स्व सभ्यता द्रोही हो जाता है क्या??!! हालांकि मेरा ऐसा रुझान नहीं है लेकिन एक पल को मान लिया जाए तो क्या भारतीयता की कमी आ जाएगी क्या मुझमें या किसी अन्य व्यक्ति में?! क्या किसी व्यक्ति की भारतीयता का पैमाना उसका खान-पान है?

ये जो ठेकेदार साहब हैं, मेरा अनुमान है कि ये अपने दफ़्तर धोती-कुर्ता पहन और गमछा टाँग कर तो नहीं जाते होंगे!! बाबुओं की भांति पैंट कमीज़ सूट बूट पहन जाते होंगे। तो क्या उस योरोपीय परिधान में उनकी भारतीयता कुंदन समान दमक उठती है? ऐसे लोगों की अक्ल पर तरस भी नहीं आता, बिना अक्ल और फटी हुई किस्मत के रोगी होते हैं ये, एक बार तो मन में यही आया कि “ब्लडी लूज़र” कह बात ही खत्म की जाए क्योंकि ऐसे दुखियाए लोगों के मानसिक दीवालिएपन का पूरा सार इन दो शब्दों में समा जाता है।


आपका क्या विचार है?

 
 
समोसे की फोटो साभार Kirti Poddar, कचौरी की फोटो साभार mynameisharsha, पोहे की फोटो साभार ampersandyslexia, मैक्रोनी की फोटो साभार Salihan.com, इडली की फोटो साभार SearchYogi, वड़े की फोटो साभार Pabo76, कुकुर का कार्टून साभार Anirudh Koul – सातों फोटो क्रिएटिव कॉमन्स लाइसेन्स (Creative Commons License) के अंतर्गत


द कॉन्टीनेन्टल ब्रेकफास्ट…..


October 7th, 2009 | 10 Comments

कुछ अरसा पहले मैंने अपने घर के नज़दीक स्थित ज्ञानी के अड्डे पर हुआ चॉकलेट आईस्क्रीम और नए मुल्लाओं का वाकया बयान किया था (यदि आपने नहीं पढ़ा है तो एक बार अवश्य पढ़ लें, मौज की मौज और कंटेक्सचुअल अर्थ भी समझ आएगा)। उसके अंत में मैंने ज़िक्र एक साहब और कॉन्टीनेन्टल खाने का किया था, आज मन में आया कि वो किस्सा भी बाँच दिया जाए। :)

क्रॉसौं - Croissant

कुछ अरसा पहले की बात है, मैं एक बरिस्ता में बैठा एक मित्र की प्रतीक्षा कर रहा था। पास ही की टेबल पर दो संभ्रांत दिखने वाले परिवार बैठे थे। वे लोग क्या बातचीत कर रहे थे यह याद नहीं लेकिन उनमें एक फैशनेबल अंकल अपनी ही उम्र के लगने वाले दूसरे अंकल से वार्तालाप के दौरान बोले कि उनको तो सुबह का नाश्ता कॉन्टीनेन्टल स्टाईल ही पसंद है यानि कि मक्खन लगे टोस्ट, दो अंडों का ऑमलेट और चाय। प्रायः आप किसी भी रेस्तरां/होटल में जाएँगे तो कॉन्टीनेन्टल नाश्ते के नाम पर यही मिलता है। पाँच सितारा होटलों के अतिरिक्त मैंने कहीं भी असली कॉन्टीनेन्टल नाश्ता मिलते नहीं देखा। हो सकता है कि आपकी उत्सुकता हो कि होता क्या है कॉन्टीनेन्टल ब्रेकफास्ट (continental breakfast)। जो नहीं जानते हैं उनके लिए बता देना बेहतर समझता हूँ कि कॉन्टीनेन्टल का अभिप्राय यहाँ पश्चिमी योरोप (ब्रितानिया के अतिरिक्त, मेनलैन्ड योरोप) है। अब मैं उन फैशनेबल अंकल की अक्ल पर तरस इसलिए खा रहा था कि उनको रत्तीभर भी ज्ञान नहीं कि टिपिकल (typical) कॉन्टीनेन्टल ब्रेकफास्ट क्या होता है। :roll:

दरअसल कॉन्टीनेन्टल ब्रेकफास्ट हल्का नाश्ता होता है (यदि फुल इंग्लिश/ऑयरिश/स्कॉटिश नाश्ते से तुलना की जाए) – इसमें कॉफ़ी (प्रायः काली), जूस, और क्रॉसौं (croissants) या पेस्ट्री (pastries) होते हैं। यह इंग्लिश ब्रेकफास्ट (english breakfast), ऑयरिश ब्रेकफास्ट (irish breakfast), स्कॉटिश ब्रेकफास्ट (scottish breakfast) अथवा अमेरिकी ब्रेकफास्ट (north american breakfast) जितना फुल नहीं होता।

ऐसे ही लोगों को अंग्रेज़ी नाश्ते के बारे में भी बहुत गलतफहमी रहती है, चाय और टोस्ट को ही अंग्रेज़ी नाश्ता समझते हैं। एक पारम्परिक फुल इंग्लिश ब्रेकफास्ट में निम्न आईटम होती हैं:

फुल इंग्लिश ब्रेकफास्ट - full english breakfast
  • बेकन (bacon) – सूअर का नमकीन मांस
  • अंडे – पोच्ड (poached) या फ्राईड (fried)
  • टोस्ट
  • ग्रिल किए या तले हुए टमाटर
  • बेक्ड बीन्स (baked beans)
  • सॉसेज (sausage)
  • चाय

वैसे साथ में ब्लैक पुडिंग (खून में पकाया मांस) भी होती है लेकिन यह निश्चित आईटम नहीं होती, जगह-२ पर निर्भर करता है, इंग्लैंड के कुछ भागों में इंग्लिश ब्रेकफास्ट में यह शामिल होती है। इसी तरह साथ में पिसे हुए उबले आलू (mashed potatoes) भी हो सकते हैं।

अब यदि स्कॉटिश ब्रेकफास्ट की बात की जाए तो परंपरागत नाश्ता तो दलिया (porridge) है लेकिन फुल स्कॉटिश ब्रेकफास्ट में अंडे, बेकन, सॉसेज, स्कॉटिश स्टाइल ब्लैक पुडिंग, हैग्गीस (haggis) और पोटैटो स्कोन्स (potato scones) भी आ जाते हैं।

इसी प्रकार अमेरिकी नाश्ते में प्रायः टोस्ट, बेकन, अंडे, हैश ब्राऊन्स (hash browns), और जूस अथवा कॉफी होते हैं। मेरी जानकारी अनुसार इसमें परम्परागत या फुल का कोई चक्कर नहीं होता। ;)

 
अब इसी कारण मुझे ऐसे होटल वालों पर कोफ़्त होती है कि लिखते कुछ हैं मेनू में और परोसते कुछ और ही हैं। :tdown: और उन फैशनेबल अंकल जैसे लोगों की अक्ल पर तरस आता है जो सिर्फ़ नेम ड्रॉपिंग करना ही जानते हैं, जबकि वास्तव में पता धेले का नहीं होता कि क्या कह रहे हैं। न जाने क्यों लोग अपनी अक्ल की सीमा से अधिक शो ऑफ़ (show off) करते हैं। ऐसा करने से वे अपनी ही बेवकूफ़ी ज़ाहिर करने का खतरा मोल लेते हैं, क्योंकि जिसके सामने शो ऑफ़ कर रहे हैं यदि वह जानकार व्यक्ति हुआ तो क्या इज़्ज़त रह जाएगी शो ऑफ़ करने वाले व्यक्ति की? :roll: अब ऐसे ही ज्ञान जी आईसक्रीम वाली पोस्ट पर अपने साथी अफ़सर की कॉफ़ी वाला किस्सा बताए थे, खामखा उनके साथी अफ़सर की किरकिरी हुई!! :D

 
 
क्रॉसौं की फोटो साभार roboppy तथा इंग्लिश ब्रेकफास्ट की फोटो साभार peasap – दोनों फोटो क्रिएटिव कॉमन्स लाइसेन्स (Creative Commons License) के अंतर्गत


April 29th, 2009 | 6 Comments

हज़ार समझदार देखे, मैककलम भी देखा!! पता नहीं क्या सोचकर गांगुली की जगह उसको कप्तान बनाया। एक तो कोलकाता नाईट राईडर्स टीम वैसे ही माशाल्लाह है जो जीत के निकट पहुँचती नहीं और जो कभी जीत के निकट पहुँच जाए तो कप्तान मैककलम अपने धर्मात्मा होने का परिचय देते हुए विपक्षी टीम को मैच उपहार में दे देते हैं। कुछ दिन पहले सुपर ओवर में मेन्डिस से गेंदबाज़ी करवा के राजस्थान रॉयल्स को मैच उपहार में दे दिया था और अभी रॉयल चैलेन्जर्स बंगलोर की चैम्पियन टीम को मैच क्रिस गेल की मार्फ़त तश्तरी में सजा के दे दिया!! यकीन नहीं आता कि कोई इतना दिलदार भी हो सकता है!! :roll:

और लगता है कोच जॉन ब्यूकैनन अभी ऑस्ट्रेलियाई टीम से हटाए जाने के सदमे से ही नहीं उबरे हैं। वैसे ऐसी चैम्पियन टीम और धर्मात्मा कप्तान के होते कोच क्या कर लेगा यदि वह कुछ करना ही न चाहता हो?!! सारे ऑस्ट्रेलियाई कोच ऐसे घस्सी होते हैं क्या? पहले चैपल और अब ब्यूकैनन!! :roll: गांगुली बाबू भी सोच रहे होंगे कि न जाने उनकी कुंडली में ऑस्ट्रेलिया दोष कब समाप्त होगा, पहले चैपल राहू बन भिनभिनाया और अब ब्यूकैनन केतु बना है!! :roll:


दूसरों के ईमेल – इनकी बपौती


September 27th, 2008 | 12 Comments

अक्सर होता है कि मित्र और परिचित लोग ऐसे ईमेल भेजते हैं जो उन्होंने एकसाथ कई लोगों को भेजे होते हैं। एक मित्र सर्कल में तो ईमेल सामने रहें (यानि कि सब प्राप्तकर्ताओं को अन्य लोगों के ईमेल दिखाई दें) तो चल जाता है, क्योंकि वहाँ तो प्रायः सभी एक दूसरे से परिचित होते हैं और एक दूसरे के ईमेल उनके पास होते ही हैं। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि जो ईमेल आया वह पचास अन्य लोगों को भी गया है और भेजने वाले के अतिरिक्त प्राप्तकर्ता कदाचित्‌ ही किसी को जानता हो। ऐसे में श्रेयस्कर यही होता है कि भेजने वाला सभी को ब्लाइंड कार्बन कॉपी (BCC) भेजे ताकि किसी भी व्यक्ति को अन्य प्राप्तकर्ता का ईमेल न पता चले।

ऐसा क्यों श्रेयस्कर होता है?

ऐसा इसलिए बेहतर होता है क्योंकि इससे सभी प्राप्तकर्ता अन्य प्राप्तकर्ताओं द्वारा भेजे जाने वाले स्पैम से सुरक्षित रह सकते हैं, कम से कम उस ईमेल के कारण उनको ईमेल स्पैम नहीं आएगा। स्पैम? जी हाँ ईमेल स्पैम (Email Spam)!! ऐसा इसलिए क्योंकि कुछ लोग कुछ ज़्यादा ही समझदार होते हैं, वे यह समझते हैं कि उनको ऐसे जितने भी ईमेल आते हैं उनमें मौजूद तमाम ईमेल पते उनकी बपौती हैं, विज्ञापन देने के बिलबोर्ड (Billboard) हैं जहाँ वे अपने विज्ञापन भी ठोक सकते हैं!! :mad:

Spam - स्पैम

अभी हाल ही में ऐसा हुआ कि एक परिचित ने मेरे व्यवसायिक ईमेल पते पर ऐसी ईमेल भेजी। वह ईमेल पता मैं अब प्रयोग में नहीं लाता हूँ क्योंकि वह उन दिनों का है जब मैं कुछ वर्ष पहले कॉलेज के दिनों में फ्रीलांसिंग करता था। मैंने इन परिचित से अनुरोध किया कि मेरे दूसरे ईमेल पते पर ईमेल भेज लें, उस पते पर न भेजें। उन्होंने तुरंत इस बात पर कान नहीं धरा और पुनः वैसी एक ईमेल उस पते पर ठोक दी। मैंने पुनः अनुरोध किया, इस बार उन्होंने कान धर दिया इस पर लेकिन पंगा तो अब हो चुका था। उन्होंने जिन लोगों को ईमेल भेजी उनमें एक महानुभाव ऐसे ही लोगों में शामिल जो यही समझ रखते हैं कि आने वाली सभी ईमेल में मौजूद पते उनके विज्ञापनों को भेजने के लिए बने-बनाए ग्राहक हैं, आखिर जब किसी अन्य की ऐसी ईमेल पा रहे हैं तो इनकी क्यों नहीं पा सकते, चाहे बेशक वे किसी से भी परिचित न हों। कदाचित्‌ इसी को कहते हैं न जान न पहचान मैं तेरा मेहमान!! ऐसे लोगों को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि जिसको वे ईमेल भेज रहे हैं विज्ञापन वाली वह उनका परिचित है कि नहीं, बस भेजनी है तो भेजनी है, यानि कि स्पैम करना है तो करना ही है, आखिर दूसरों के ईमेल विज्ञापन दिखाने के बिलबोर्ड हैं, उनके बाप का माल है!! :mad:

यदि अभी तक नहीं पहचाने हैं तो मैं बताए देता हूँ, ये स्पैमर साहब कवि हैं, हिन्दी कवि हैं, और हिन्दी में ही ऑनलाईन ब्लॉग रूपी कोई पत्रिका चलाते हैं!! और फिर कवि लोग सोचते हैं कि जन साधारण उनको गलियाता क्यों है!! :roll: अमां लोगों को खामखा ताबड़तोड़ स्पैम करोगे तो लोग गलियाएँगे नहीं तो क्या आरती उतारेंगे?!! ऐसे कुछ कवियों के कारण पूरी कवियों की बिरादरी बदनाम होती है!!

इन साहब से निपटना कोई कठिन कार्य नहीं था, न ही इनको समझाने की ज़रूरत मैंने समझी कि ऐसे ईमेल न भेजें, समझाया उनको जाता है जो थोड़ी समझ अपनी भी रखते हों। क्योंकि व्यवसायिक ईमेल पता है और अपने ही सर्वर पर है तो सिर्फ़ इतना करना पड़ा कि सर्वर की ईमेल सैटिंग में जाकर इस ईमेल पते को ब्लैकलिस्ट (Blacklist) कर दिया ताकि अब यदि इस ईमेल पते से कोई भी ईमेल आयी तो वह अपने आप ही साफ़ हो जाएगी, इनबॉक्स (Inbox) में आएगी ही नहीं!! ज़्यादा आफ़त आई तो अपने ईमेल खाते को व्हाईटलिस्ट (Whitelist) सैटिंग पर डाल दिया जाएगा जिससे होगा यह कि कुछ चुनिन्दा ईमेल पतों से ही ईमेल आ सकेंगे, बाकी के सभी ईमेल अपने आप साफ़ हो जाएँगे। यह एक एक्सट्रीम (extreme) कदम हो जाएगा लेकिन अपने ईमेल इनबॉक्स के लिए हो रहे युद्ध को जीतने के लिए कुछ भी चलेगा, मेरा ईमेल इनबॉक्स किसी के बाप-दादा की जागीर नहीं कि कोई भी ऐरा-गैरा नत्थू खैरा अपनी कविता अथवा ब्लॉग आदि के विज्ञापन भेजेगा तो उसको बर्दाश्त किया जाएगा।

वैसे कुछ लोग बड़े फंटूश होते हैं, उनको समझा लो कितना ही कि भई थोक के भाव लोगों को ईमेल करने हैं तो ब्लाइंड कार्बन कॉपी भेजो, जिनको भेज रहे हो उनका ज़रा ख्याल करो, अपनी ही रोटी मत सेंको सिर्फ़, लेकिन ऐसे लोगों के कान पर जूँ नहीं रेंगती, कुछ पल्ले नहीं पड़ता और ढीठों की भांति पिले रहते हैं उसी ढर्रे पर!!

अभी कुछ समय पहले तक जीमेल सेवा खुद ऐसे लोगों की सहायक थी। जीमेल में यह दिक्कत थी कि जिस किसी को भी ईमेल भेजी उसकी ईमेल अपने आप ही कॉन्टेक्ट सूचि में संचित हो जाती थी। और कुछ लोगों को ऐसी बीमारी होती है कि अपनी हर नई ब्लॉग पोस्ट, कविता आदि को या फिर किसी अन्य व्यक्ति से मिले बेकार के ईमेल फॉर्वर्ड को अपनी पूरी कॉन्टेक्ट सूचि को भेज देते हैं। एक-दो या दस-बीस को नहीं वरन्‌ सौ-दो सौ लोगों को एक बार में भेज देते हैं!! जाने कैसी यह स्पैम पिपासा है जो हर ईमेल के प्राप्त होते ही भड़क उठती है!! :roll:

ईमेल शिष्टाचार यह होता है कि आप किसी अपरिचित को खामखा ही ईमेल न भेजें, विज्ञापन वाली तो कभी नहीं। यदि किसी परिचित को भी अपने किसी विज्ञापन की ईमेल भेजते हैं और यदि वे आपत्ति उठाते हैं तो उसके बाद उनको कभी विज्ञापन वाली ईमेल न भेजें। बिना दूसरे व्यक्ति की कद्र किए आपको यह अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए कि कोई आपकी कद्र करेगा।

 
क्या आप ईमेल शिष्टाचारी हैं? या क्या आप दूसरों के ईमेल को अपने घर की खेती समझ उनको विज्ञापन ठोकते रहते हैं? :twisted:


नाम के दीवाने और फैशन के मारे…..


September 10th, 2008 | 19 Comments

यह आज की बात नहीं है, सालों से ऐसा होता आया है कि सिर्फ़ फैशनेबल लगने के लिए लोग किसी चीज़ का अनुसरण करने लग जाते हैं चाहे वह चीज़ उनकी समझ के दायरे से कोसों दूर हो। लेकिन अभी पिछले कुछ वर्षों में महानगरों में यह चलन कुछ खासा बढ़ते देखा है। जैसे-२ कॉस्मोपॉलिटन (Cosmopolitan) टाइप के समाज का दायरा बढ़ता जा रहा है, जैसे-२ अधिक व्यय करने के सामर्थ्य वाले मध्यम वर्ग का विकास होता जा रहा है वैसे-२ इन भेड़ चाल चलने वालों की तादाद बढ़ती जा रही है। जहाँ पहले एकाध ही कोई नज़र आता था वहीं आजकल ये लोग हर गली नुक्कड़ पर चरने निकले भेड़-बकरियों के झुंड की भांति जुगाली करते मिल जाते हैं।

लेकिन घबराने की कोई बात नहीं, ये आपको नुकसान नहीं पहुँचाते, मात्र अपनी समझ और हरकतों से आपका मनोरंजन करते हैं। हाँ ऐसा अवश्य है कि इनमें से कई स्नॉब (Snob) स्नॉबरी करते भी मिल जाएँगे। लेकिन उन स्नॉब लोगों को यदि एक बार को नज़रअंदाज़ कर दिया जाए तो बाकी की यह जमात अन्य लोगों के लिए सर्कस के जोकर का कार्य करती है। ऐसा नहीं है कि ये लोग उछल-कूद करते मिल जाएँगे, या किसी जानवर आदि का खेल दिखाते मिलेंगे, इनकी हरकतें कुछ मौन मनोरंजन कराती हैं जिसे आपकी बुद्धि ताड़ जाएगी, आप मन ही मन मुस्कुराएँगे लेकिन अपनी मुस्कुराहट ज़ाहिर नहीं करेंगे क्योंकि ऐसा करना सभ्य न माना जाएगा और दूसरे व्यक्ति को यह भान हो गया तो वह आप पर बरस भी सकता है कि आप उसकी खिल्ली उड़ा रहे हैं जबकि कार्य स्वयं वो ऐसा कर रहा हो। ;)


( फोटो साभार – ताहमिद )

अभी दो-तीन दिन पहले की बात है, मैं घर के पास ही स्थित ज्ञानी के अड्डे (Gianis) पर आईसक्रीम (Ice Cream) लेने गया। वहीं एक युवा जोड़ा आया, नवाब साहब अपनी तूफ़ान-ए-हमदम के साथ चॉकलेट (Chocolate) आईसक्रीम का लुत्फ़ उठाने के तमन्नाई थे। उनकी गुल-ए-गुलज़ार ने कहीं सुना/पढ़ा होगा कि चॉकलेट आईसक्रीम यदि सिनफुल (sinful) न हो तो फिर चॉकलेट आईसक्रीम खाने का लाभ ही क्या। तो बस उन्होंने अपने आफ़ताब-ए-नज़र को अपनी सिन (sin) करने की तमन्ना बताई और साहब आ पहुँचे काऊँटर पर आईसक्रीम के बारे में पूछने। जैसा कि परिचित लोग सभी जानते हैं, खान-पान की जगहों के बारे में और उनके मेनू के बारे में मुझे काफ़ी जानकारी रहती है, कुछ अपने अनुभव से और कुछ साथी लोगों के अनुभव से। तो उन्होंने जब काऊँटर पर बैठे व्यक्ति पर एक असली चॉकलेटी आईसक्रीम की तमन्ना ज़ाहिर की तो आदत से मजबूर मैंने उनको मशवरा थमा दिया कि “बेल्जियन चॉकलेट” आईसक्रीम (Belgian Chocolate Ice Cream) को आज़माएँ, इससे अधिक चॉकलेटी आईसक्रीम ज्ञानी के अड्डे पर नहीं मिलेगी। तो उन साहब और उनकी मल्लिका-ए-जिग़र ने मेरे सुझाव को आज़मा के देखने की चाहत से “बेल्जियन चॉकलेट” आईसक्रीम का सैंपल लिया एक चमच्च में और उसको भी आधा-२ चख के देखा कि जान लें कि आईसक्रीम लेने लायक है कि नहीं। दोनों ने आईसक्रीम को चखते ही ऐसे मुँह बिचका दिया जैसे मानो किसी ने कुनैन की गोली का चूर्ण बना के जबरन उनकी हलक से नीचे उतार दिया हो बिना पानी के!! ;)

क्या हुआ? अब हुआ यूँ कि वे असली चॉकलेटी आईसक्रीम की तमन्ना ज़ाहिर किए थे और मैंने जो आईसक्रीम बताई वह असली चॉकलेट आईसक्रीम माफ़िक ही थी, नाममात्र को मीठा और पूरा चॉकलेट का स्वाद, आहा!! :D गुल ने टिप्पणी दी कि बहुत कड़वी है और गुलबानों से तो कुछ कहते ही न बना और वे सिर हिलाते वापस काऊँटर के पास दीवार पर टंगे बड़े मेनू (menu) की ओर आ गए कोई स्ट्रॉबरी आदि की आईसक्रीम लेने। अंत में उन्होंने कौन सी आईसक्रीम के साथ सिन (sin) किया यह मुझे नहीं पता क्योंकि तब तक मेरी खरीदी आईसक्रीम पैक हो गई थी और मैं वहाँ रुकने का वैसे भी कोई तमन्नाई नहीं था।


( फोटो साभार – डारविन )

ये एक नमूना है उस भेड़चाल वाले वर्ग का जिनका चॉकलेट ज्ञान कैडबरी की डेरी मिल्क (Dairy Milk) तक ही सीमित है और जो अमिताभ बच्चन के समझाए समझते हैं कि मिठाई और चॉकलेट में कोई फर्क नहीं है। वैसे अमिताभ अंकल का कहना भी सही है, जब चॉकलेट डेरी मिल्क हो तो वाकई मिठाई और चॉकलेट में कोई फर्क नहीं होता क्योंकि डेरी मिल्क चॉकलेट कम और चीनी अधिक होती है!! असल में चॉकलेट की छवि डिप्रेशन कम करने वाली है, मन में एक नई आशा जनने वाली है लेकिन डेरी मिल्क खा के तो किसी भी थर्टी प्लस को डिप्रेशन हो जाता है कि कमबख्त डॉयबिटीज़ (Diabetes) न हो जाए!! :twisted:

लेकिन कुछ भी कहो, उस भेड़चाल चलने वाले जोड़े का असली चॉकलेट आईसक्रीम से साक्षात्कार देखना मज़ेदार रहा, अंग्रेज़ी में कहें तो इट वाज़ क्वाइट अम्यूज़िंग। :D इन लोगों के व्यवहार पर हँसी इसलिए आती है कि ये लोग जो नहीं हैं वह होने का दिखावा करते हैं और फिर मुँह के बल सबके सामने गिरते हैं। आवश्यकता ही क्या है आपको भेड़चाल चलने की? जो हैं वह अपने आप को दिखाने में लोगों को शर्म क्यों होती है? कदाचित्‌ अपने प्रति किसी हीन भावना (inferiority complex) के कारण।

कुछ समय पहले ऐसे ही एक साहब मिले थे जिनका मामला कॉन्टीनेन्टल खाने का था, वह किस्सा यहाँ पढ़ें:cool:


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