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दिवाली की आतिशबाज़ी…..


October 16th, 2009 at 07:07 am | 7 Comments
Fireworks

कल दीपावली है, दीपों का त्यौहार है। अब इस पर अधिक क्या कहना, बहुत लोग पहले ही बहुत कुछ कह चुके हैं, किताबों में पहले ही छप चुका है। पर इस दिन पर दो तरह के लोग मिल जाते हैं – एक वो जो आतिशबाज़ी के सख्त खिलाफ़ होते हैं और दूसरे वो जो हद से अधिक आतिशबाज़ी के पक्ष में होते हैं। और जब दोनों तरह के लोग अपना प्रोपोगेन्डा (propaganda) मेरे को पढ़ाते हैं तो मैं दोनों ही तरह के लोगों को कहता हूँ कि भाड़ में जाओ।

काहे? क्योंकि दोनों ही एक्सट्रीम एंड (extreme end) वाले केस होते हैं, या तो बिलकुल ही आतिशबाज़ी न करो और यदि करो तो बस करते ही रहो। यह क्या बात हुई? अमां अति हर चीज़ की बुरी होती है, जो भी करो कंट्रोल में रहकर करो जी!!

ऐसे मामले पर कुछ स्टाईलिश स्नॉब टाइप लोग भी मिल जाते हैं अपनी स्नॉबरी करते हुए। एक नॉन रेजीडेन्ट इंडियन साहब को सुना, बोले भारतीय आतिशबाज़ी से दिवाली का सत्यानाश कर देते हैं और इसी कारण वे दिवाली पर भारत नहीं आते। तो अमां मत आओ न, किसी पर एहसान कर रहे हो क्या? हू केयर्स? आपके न आने पर दिवाली नहीं मनाई जाती क्या? आप रहो जहाँ हो, वहाँ जब किसी उत्सव में आतिशबाज़ी हो तो जाना देखने और फोटो खींचने, वही आपको अच्छी लगेगी।

Crackers

लेकिन हमारे यहाँ भी तो लोग कम नहीं, पिले रहते हैं पटाखे चलाते हुए। मेरे मोहल्ले में ही बहुतेरे हैं ऐसे, रात एक-दो बजे तक भी लगे रहेंगे। उनका वश नहीं चलता या यूँ कह लो कि इतना ज्ञान नहीं अन्यथा वे तो कैफ़ीन (caffeine) की गोलियाँ खाकर रात भर जागें और बिना थके सारी रात पटाखे चलाते रहें!!

ठीक है माना बहुत कंसर्न (concern) हैं पर्यावरण इत्यादि को लेकर भी लेकिन किसी भी समस्या का हल एक्सट्रीम एंड पर जाकर नहीं हो सकता। लोग यदि अपने को काबू में रखें, थोड़े ही पटाखे चलाएँ, थोड़ी ही आतिशबाज़ी करें तो इससे पर्यावरण को पहुँचने वाली क्षति भी कम होगी और लोगों की दीपावली भी मन जाएगी।

अब अपन दीपावली पर न ही पटाखे चलाते हैं न ही आतिशबाज़ी छोड़ते हैं, पिछले कई वर्षों से नहीं की है (स्कूल के समय में ही छोड़ दिया था मोह) और आगे भी फिलहाल करने का कोई इरादा नहीं है, लेकिन यह मेरा अपना चुनाव है न कि किसी की जबरन पिलाई घुट्टी। दीपावली कौन कैसे मनाता है यह उस पर निर्भर है, हम तो सिर्फ़ अनुरोध ही कर सकते हैं कि मॉडरेशन रखी जाए, अति न की जाए।

दीपावली के दीप


आप सभी को मंगलमयी शुभ दीपावली। :)

 
 
आतिशबाज़ी की फोटो साभार eyesplash Mikul, पटाखे की फोटो साभार Dilip Muralidaran तथा दीपों की फोटो साभार m4r00n3d – तीनो फोटो क्रिएटिव कॉमन्स लाइसेन्स (Creative Commons License) के अंतर्गत


द कॉन्टीनेन्टल ब्रेकफास्ट…..


October 7th, 2009 at 07:07 am | 10 Comments

कुछ अरसा पहले मैंने अपने घर के नज़दीक स्थित ज्ञानी के अड्डे पर हुआ चॉकलेट आईस्क्रीम और नए मुल्लाओं का वाकया बयान किया था (यदि आपने नहीं पढ़ा है तो एक बार अवश्य पढ़ लें, मौज की मौज और कंटेक्सचुअल अर्थ भी समझ आएगा)। उसके अंत में मैंने ज़िक्र एक साहब और कॉन्टीनेन्टल खाने का किया था, आज मन में आया कि वो किस्सा भी बाँच दिया जाए। :)

क्रॉसौं - Croissant

कुछ अरसा पहले की बात है, मैं एक बरिस्ता में बैठा एक मित्र की प्रतीक्षा कर रहा था। पास ही की टेबल पर दो संभ्रांत दिखने वाले परिवार बैठे थे। वे लोग क्या बातचीत कर रहे थे यह याद नहीं लेकिन उनमें एक फैशनेबल अंकल अपनी ही उम्र के लगने वाले दूसरे अंकल से वार्तालाप के दौरान बोले कि उनको तो सुबह का नाश्ता कॉन्टीनेन्टल स्टाईल ही पसंद है यानि कि मक्खन लगे टोस्ट, दो अंडों का ऑमलेट और चाय। प्रायः आप किसी भी रेस्तरां/होटल में जाएँगे तो कॉन्टीनेन्टल नाश्ते के नाम पर यही मिलता है। पाँच सितारा होटलों के अतिरिक्त मैंने कहीं भी असली कॉन्टीनेन्टल नाश्ता मिलते नहीं देखा। हो सकता है कि आपकी उत्सुकता हो कि होता क्या है कॉन्टीनेन्टल ब्रेकफास्ट (continental breakfast)। जो नहीं जानते हैं उनके लिए बता देना बेहतर समझता हूँ कि कॉन्टीनेन्टल का अभिप्राय यहाँ पश्चिमी योरोप (ब्रितानिया के अतिरिक्त, मेनलैन्ड योरोप) है। अब मैं उन फैशनेबल अंकल की अक्ल पर तरस इसलिए खा रहा था कि उनको रत्तीभर भी ज्ञान नहीं कि टिपिकल (typical) कॉन्टीनेन्टल ब्रेकफास्ट क्या होता है। :roll:

दरअसल कॉन्टीनेन्टल ब्रेकफास्ट हल्का नाश्ता होता है (यदि फुल इंग्लिश/ऑयरिश/स्कॉटिश नाश्ते से तुलना की जाए) – इसमें कॉफ़ी (प्रायः काली), जूस, और क्रॉसौं (croissants) या पेस्ट्री (pastries) होते हैं। यह इंग्लिश ब्रेकफास्ट (english breakfast), ऑयरिश ब्रेकफास्ट (irish breakfast), स्कॉटिश ब्रेकफास्ट (scottish breakfast) अथवा अमेरिकी ब्रेकफास्ट (north american breakfast) जितना फुल नहीं होता।

ऐसे ही लोगों को अंग्रेज़ी नाश्ते के बारे में भी बहुत गलतफहमी रहती है, चाय और टोस्ट को ही अंग्रेज़ी नाश्ता समझते हैं। एक पारम्परिक फुल इंग्लिश ब्रेकफास्ट में निम्न आईटम होती हैं:

फुल इंग्लिश ब्रेकफास्ट - full english breakfast
  • बेकन (bacon) – सूअर का नमकीन मांस
  • अंडे – पोच्ड (poached) या फ्राईड (fried)
  • टोस्ट
  • ग्रिल किए या तले हुए टमाटर
  • बेक्ड बीन्स (baked beans)
  • सॉसेज (sausage)
  • चाय

वैसे साथ में ब्लैक पुडिंग (खून में पकाया मांस) भी होती है लेकिन यह निश्चित आईटम नहीं होती, जगह-२ पर निर्भर करता है, इंग्लैंड के कुछ भागों में इंग्लिश ब्रेकफास्ट में यह शामिल होती है। इसी तरह साथ में पिसे हुए उबले आलू (mashed potatoes) भी हो सकते हैं।

अब यदि स्कॉटिश ब्रेकफास्ट की बात की जाए तो परंपरागत नाश्ता तो दलिया (porridge) है लेकिन फुल स्कॉटिश ब्रेकफास्ट में अंडे, बेकन, सॉसेज, स्कॉटिश स्टाइल ब्लैक पुडिंग, हैग्गीस (haggis) और पोटैटो स्कोन्स (potato scones) भी आ जाते हैं।

इसी प्रकार अमेरिकी नाश्ते में प्रायः टोस्ट, बेकन, अंडे, हैश ब्राऊन्स (hash browns), और जूस अथवा कॉफी होते हैं। मेरी जानकारी अनुसार इसमें परम्परागत या फुल का कोई चक्कर नहीं होता। ;)

 
अब इसी कारण मुझे ऐसे होटल वालों पर कोफ़्त होती है कि लिखते कुछ हैं मेनू में और परोसते कुछ और ही हैं। :tdown: और उन फैशनेबल अंकल जैसे लोगों की अक्ल पर तरस आता है जो सिर्फ़ नेम ड्रॉपिंग करना ही जानते हैं, जबकि वास्तव में पता धेले का नहीं होता कि क्या कह रहे हैं। न जाने क्यों लोग अपनी अक्ल की सीमा से अधिक शो ऑफ़ (show off) करते हैं। ऐसा करने से वे अपनी ही बेवकूफ़ी ज़ाहिर करने का खतरा मोल लेते हैं, क्योंकि जिसके सामने शो ऑफ़ कर रहे हैं यदि वह जानकार व्यक्ति हुआ तो क्या इज़्ज़त रह जाएगी शो ऑफ़ करने वाले व्यक्ति की? :roll: अब ऐसे ही ज्ञान जी आईसक्रीम वाली पोस्ट पर अपने साथी अफ़सर की कॉफ़ी वाला किस्सा बताए थे, खामखा उनके साथी अफ़सर की किरकिरी हुई!! :D

 
 
क्रॉसौं की फोटो साभार roboppy तथा इंग्लिश ब्रेकफास्ट की फोटो साभार peasap – दोनों फोटो क्रिएटिव कॉमन्स लाइसेन्स (Creative Commons License) के अंतर्गत


अथ्‌ श्री बड्डे कथा…..


September 29th, 2009 at 07:07 am | 8 Comments

….. कटा नहीं – “कथा”, सोच समझ के पढ़िएगा, पुराण नहीं है!! इसलिए बाँचने के लिए भी कुछ अधिक मसौदा नहीं है। वो तो अनूप जी अपने बड्डे का हाल बतलाए कि क्या साजिश वगैरह हुई और कैसे वो जेब ढीली करने से बचे तो लगे हाथ मैंने पूछ लिया कि ये मोबाइल की साजिश क्या कनपुरियों में ही होती है (क्योंकि जीतू भाई के साथ भी हुई इसी महीने) या फिर यह सितंबरी लालाओं के साथ ही होता है। अब यदि कनपुरियों की बात है तो अपन इतने नहीं टेन्शनियाते लेकिन यदि सितंबरी लालाओं पर ही यह मार पड़ती है तो अपना टेन्शनियाना जायज़ है क्योंकि इन्हीं दोनों महानुभावों की ही भांति अपन भी सितंबरी लाल हैं। वैसे यदि अपने साथ साजिश होती तो मोबाइल की न होती, अपना हाल तो यूँ है कि यदि दो-तीन साल में नया मोबाइल फोन ले भी लिया जाए तो माता जी हड़का देती हैं कि काहे खामखा फिजूल खर्च किया जब पुराने मोबाइल पर कॉल सही तरीके से आ जा रही थी!! ;)

वैसे एक रोचक बात यह देखने वाली है कि जीतू भाई, अनूप जी और मेरे जन्मदिन लगातार तीन सप्ताह में एक के बाद एक आते ही हैं, साथ ही सप्ताह के एक ही दिन भी पड़ते हैं, यानि कि ठीक सात-२ दिन के अंतराल के बाद। तो यदि जीतू भाई का जन्मदिन बुधवार को पड़ेगा तो अनूप जी का भी बुधवार को पड़ेगा और मेरा भी बुधवार को ही पड़ेगा, हा हा हा!! :D

खैर, तो अनूप जी अपने प्रश्न को तो टाल गए, बोले रूपा बनियान के माफ़िक यह भी अंदर की बात है, तुमको न बताएँगे!! और साथ में पूछ लिए कि अपने बारे में बताओ बड्डे कैसा कटा तो अपन सोचे कि चलो एक पोस्ट इसी पर ठेल देते हैं। अब जैसा कि पहले भी बयान किया, आजकल अपनी ट्यूब खाली है, भरने की प्रतीक्षा है और इसी कारण बड़बड़ाने के लिए मसौदा नहीं मिलता है। तो अब यदि कोई चीज़ अपने आप ही चलकर पास आ जाए और बड़बड़ाने का मौका दे तो उस मौके को छोड़ना बहुत ज़ालिमाना स्वभाव हो जाएगा, इसलिए अपन भी थाम लिए दोनों हाथों और पैरों से पकड़कर, कि अब तो बड़बड़ा के ही रहेंगे, चाहे बड़बड़ाने के लिए कुछ गर्म मसाला और चंकी चाट मसाला न हो, चाहे नमक मिर्च से ही काम चलाना पड़े, लेकिन बड़बड़ाएँगे अवश्य, आखिर इस ब्लॉग पर सबसे अधिक बड़बड़ाए ही हैं तो क्या इज़्ज़त रह जाएगी यदि स्वयं ही चलकर आए मौके को छोड़ दिया जाए!! :D

हाँ तो अपने बड्डे के बारे में बाँचने के लिए कुछ अधिक नहीं है, साधारण ही दिन बीतता है। सिल्वर जुबली पिछली बार मना लिए थे और इस बार गोल्डन जुबली के लिए लाईन में लग गए हैं। अनूप जी तो बता ही चुके हैं कि वे माशाल्लाह किला फतह करने के निकट हैं, 2013 में वो किला फतह कर लेंगे!! :D

इधर रात को बारह बजने में आधा घंटा बाकी था, यानि कि ऑफिशियल बड्डे वाला दिन आने में समय था उधर एक अनजान नंबर से फुनवा आया और पूछा गया कि क्या अमित बोल रहे हैं। मैंने उत्तर दिया कि जी हाँ हम ही बोल रहे हैं तो फिर दूसरा प्रश्न पूछा गया कि क्या कल आपका जन्मदिन है। अब मुझे आश्चर्य हुआ कि भई नंबर पहचाना हुआ नहीं है, न ही आवाज़ पहचानी हुई और ये जनाब हमारा जन्मदिन जानते हैं। मैंने पूछा तो नाम सिर्फ़ “पाबला” बताया गया, एक बार को तो दिमाग में आया ही नहीं कि कौन साहब हैं लेकिन फिर कुछ और बात करने पर दिमाग में घंटी बजी कि ये हिन्दी ब्लॉगजगत के श्री बी.एस.पाबला हैं। वे बोले कि मेरे जन्मदिन की शुभकामना देती ब्लॉग पोस्ट लिख लिए हैं लेकिन एक बार कन्फर्म करना बेहतर जाना कि पता तो कर लें कि जन्मदिन कल ही है कि नहीं। मैंने कन्फर्म किया और उन्होंने अग्रिम ही शुभकामनाएँ दे दीं और भविष्य में संपर्क बनाए रखने की बात के साथ वह वार्तालाप समाप्त हुआ। इधर बारह बजे और उधर फेसबुक, ईमेल, मोबाइल लघु संदेश आदि द्वारा मित्रों और परिचितों की शुभकामनाएँ आनी शुरु हो गई।

जन्मदिन अपने यहाँ कोई खास तरीके से नहीं मनाया जाता। बचपन में अवश्य शौक रहा करता था कि अपना जन्मदिन मनाया जाए, लेकिन अम्मा (अपनी दादी जी को मैं और चचेरे भाई यही कहकर संबोधित किया करते थे) ने मना कर रखा था कि अपने यहाँ लड़कों के जन्मदिन नहीं मनाए जाते। तो माता जी मेरा मन रखने के लिए जन्मदिन से पहले दिन टॉफ़ियाँ और पेन्सिल दिलवा देती थीं कि अगले दिन क्लास में सहपाठियों को वह बाँट के बड्डे मना लिया जाए और शाम को घर पर फैमिली डिनर हो जाया करता था जिसमें सभी मामा-मामियाँ और मौसी की शिरकत हो जाया करती थी और अपन भी खुश हो जाते थे कि अपना बड्डे सेलीब्रेट हो गया। चूंकि बड्डे नहीं मनाया जाता इसलिए केक काटने का भी रिवाज़ नहीं, माता जी उसकी जगह सूजी का हलवा बना दिया करती थीं (आटे का हलवा भी अपने को पसंद है लेकिन सूजी का हलवा अधिक पसंद है)।

जब बड़े हो गए तो यह चलन भी धीरे-२ कम होता गया, क्लास में टॉफ़ियाँ बांटना बंद हुआ, कुछ खास मित्रों को कैन्टीन ले जाकर वहाँ समोसे ब्रेड-पकौड़े और पेप्सी की दावत दे दी जाती थी। इसके लिए माता जी अलग से पैसे नहीं देती थीं, अपनी ही जेब से रोकड़ा देना पड़ता था। वह बात अलग है कि बाद में मौका देख पिता जी से वसूली की जाती थी। :D

पर एक चीज़ जो बचपन से कायम है वह यह कि माता जी मेरे हर जन्मदिन पर मंदिर में ले जाकर पंडित जी द्वारा पूजा करवाती हैं। अब पूजा अर्चना में अपनी ऐसी कोई आस्था है नहीं, जब ईश्वर में ही नहीं है तो ज़ाहिर है कि ईश्वर अर्चना में भी नहीं होगी। लेकिन माता जी का मन रखने के लिए चला जाता हूँ कि यदि इससे उनके मन को शांति मिलती है तो अपने को कोई दिक्कत नहीं क्योंकि अपना कोई नुकसान तो हो नहीं रहा।

तो इस बार का भी बड्डे एज़ यूज़युअल साधारण दिन ही की भांति बीता; मित्रों, परिचितों और परिवार वालों से शुभकामनाएँ और आशीष मिले, मन्दिर में जाकर पूजा करवाई गई और शाम को हर जन्मदिन की भांति पूरी छोले और खीर का भोग लगाया गया।

कॉलेज के समय से ही मेरी कुछ ऐसी प्रवृत्ति हो गई कि जन्मदिन वाले दिवस मैं एकांत और शांत रहना पसंद करता हूँ, कहीं आना जाना नहीं और न ही परिवार के सदस्यों के अतिरिक्त किसी से मिलना जुलना। यार-दोस्त यदि दावत की फरमाईश करते हैं तो अगले दिन या आने वाले सप्ताहांत पर उनको दावत दे दी जाती है, जन्मदिन पर नहीं। ऐसा स्वभाव क्यों हुआ इसका कारण मुझे नहीं पता लेकिन ऐसा ही मन को अच्छा लगता है, वर्ष में एक शांत दिन गारंटी के साथ। :tup:

 
 
हलवे की फोटो साभार mtsn, क्रिएटिव कॉमन्स लाइसेन्स (Creative Commons License) के अंतर्गत


नया वर्ष…..


September 23rd, 2009 at 08:20 am | 10 Comments


 

जब हम दुनिया में आते हैं तो यह सोच रोते हैं कि हम मूर्खों की इस दुनिया में आ गए।

— विलियम शेक्सपीयर

अंधकार से हमें क्या काम, सूर्यमुखी की ही भांति देखें हम भी प्रकाश की ओर कि वही है उन्नति का मार्ग। बस यही है प्रण इस नए वर्ष का।


दूरदर्शन के पचास वर्ष और खोती प्रासंगिकता


September 17th, 2009 at 07:07 am | 6 Comments

पंकज ने बताया कि दूरदर्शन के पचास वर्ष हो गए हैं और वह अपनी स्वर्ण जयंति मना रहा है। इसी के चलते पंकज ने दूरदर्शन के स्वर्ण काल के कुछ लोकप्रिय कार्यक्रमों की सूचि छापी है और कहा कि दूरदर्शन आज अपनी प्रासंगिकता खो रहा।

मैं समझता हूँ कि दूरदर्शन ने आऊट ऑफ़ डेट होना और बोर करना बीस साल पहले ही शुरु कर दिया था लेकिन उस समय लोग इसलिए झेल रहे थे कि निजी चैनल नहीं थे, केबल टीवी नब्बे के दशक में आया और शुरुआती दिनों में महंगा था। लेकिन जैसे-२ उसके दाम नीचे आते गए और लोगों को मज़ा आना शुरु हुआ वैसे-२ उसकी पैठ बढ़ने लगी और दूरदर्शन की ग्राहकी कम होती गई।

दुख की बात यह है कि निजी चैनलों के पास अपनी गुणवत्ता बढ़ा के ग्राहक बढ़ाने के लिए जो मोटिवेशन था (मुनाफ़ा) वह दूरदर्शन के पास नहीं था, सरकारी चैनल है आखिर, नुकसान में भी जाए तो क्या फर्क पड़ता है, किसी की नौकरी पर थोड़े ही बन आएगी और न ही चैनल बंद होगा।

अस्सी के दशक में दूरदर्शन पर कई लोकप्रिय और कालजयी टीवी सीरियल प्रसारित हुए लेकिन नब्बे के दशक में दूरदर्शन ने आगे बढ़ने के स्थान पर बेकार बदमज़ा टीवी शो ही दिखाए, पैसा खर्च नहीं करना चाहते थे अच्छे सीरियलों पर जो कि फिर निजी चैनलों के पास चले गए। एक कोशिश इन्होंने पुराने लोकप्रिय सीरियलों के पुनः प्रसारण द्वारा भी की लेकिन वह भी खास कामयाब न हुई!!

वाकई अफ़सोस होता है कि वह चैनल जिसकी कभी बाज़ार में 100% पकड़ थी, एकाधिकार था, उसका आज यह हाल है कि कदाचित्‌ ही कोई उसको अपनी इच्छा से देखता होगा!!

 
 
फोटो साभार autowitch, क्रिएटिव कॉमन्स लाइसेन्स (Creative Commons License) के अंतर्गत