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डिजिटल टेक्नॉलोजी से लैस, अत्याधुनिक जेलखाना


January 20th, 2006 at 03:43 am | No Comments

नीडरलैंड में इस सप्ताह एक नया जेलखाना खुल रहा है जिससे टेक्नॉलोजी की महक आती है। यदि आप अंग्रेज़ी पढ़ सकते हैं, तो इसके बारे में पढ़िए डिजिट ब्लॉग पर!! क्षमा करें परन्तु मेरे पास हिन्दी अनुवाद का समय नहीं है। :)

इस अत्याधुनिक जेल के पीछे सोच तो अच्छी है, पर जो प्रणाली/प्रबन्ध जेल में अभी हैं, क्या वे पर्याप्त हैं? मेरे अनुसार तो नहीं हैं, पर यह एक शुरुआत है, एक नया चलन है और मैं पूर्ण विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि यह प्रयोग बहुत आगे तक जाएगा!! :)


कलयुग …..


January 16th, 2006 at 03:00 pm | 9 Comments

कलयुग ….. टू हैल एण्ड बैक(अर्थात नर्क से वापसी)

फ़िल्म का शीर्षक तो ज़ोरदार लगा, इसलिए किसी स्टार भूमिका के न होने के बाद भी देख ही ली। है तो लाक्षणिक बॉलीवुड फ़िल्म लेकिन फ़िर भी कथा थोड़ी हट कर लगी। जिन लोगों ने यह नहीं देखी तो उन्हे बता दूँ कि कथा कुछ इस प्रकार है कि हीरो कुनाल खेमू अपनी नई नवेली दुलहन के साथ मधुचंद्र के लिए एक होटल में जाता है जहाँ आशुतोष राणा के कहने पर स्वागत कर्मचारी उन्हे हनीमून सुईट दे देता है जिसमे कैमरे छुपा रखें होते हैं और उनकी सुहागरात की पूरी फ़िल्म उतार ली जाती है। आशुतोष राणा एक दलाल की भूमिका में हैं जोकि एक विदेश में स्थापित देसी अश्लील वेबसाईट के लिए सुहागरात मनाने आए जोड़ों की चुपके से फ़िल्म उतार कर बेचता है। फ़िर वही लोग हीरो और उसकी पत्नी को पुलिस के हाथों पकड़वा देते हैं ताकि उन्हें मुफ़्त की लोकप्रियता मिल सके। अपने हीरो की बीवी आत्महत्या कर लेती है, पर हीरो जेल से जमानत पर छूट जाता है और विदेश में उन लोगों का सर्वनाश करने पहुँच जाता है जिन्होंने उसके जीवन को नर्क बना दिया। जैसा कि अपेक्षित होता है, वो सबकी छुट्टी कर देता है। ;)

परन्तु मैं यहाँ फ़िल्म का पुनरवलोकन नहीं कर रहा। इस दौरान मैं कुछ और ही सोच रहा था, और वह यह कि अश्लील साहित्य का कारोबार कितना बड़ा है और उससे भी बड़ा है अश्लील चलचित्रों(फ़िल्मों) का कारोबार। सिर्फ़ अमेरिका में ही यह कई अरब डॉलर का सालाना कारोबार है, और जगहों की तो पूछिए ही मत। अब बात यह भी है कि सभी लड़के या लड़कियाँ इसमें स्वेच्छा से नहीं शामिल होते हैं, कईयों को मजबूर किया जाता है और बहुत से तो बिके हुए गुलाम होते हैं। फ़िल्म में बताया गया है कि इन्सानी खरीद फ़रोख्त का कारोबार, हथियारों और नशीली दवाओं(ड्रग्स) के कारोबार के बाद, दुनिया में सबसे बड़ा कारोबार है।

कहने को इन्सानों को गुलामों की तरह खरीदने-बेचने का कारोबार बहुत पुराने समय से चला आ रहा है और पिछले सौ-दो सौ सालों में इसपर सभ्य दुनिया में प्रतिबंध लगा दिया गया है, परन्तु यह आज भी होता है। अब विचार करने वाली बात यह है कि इन्सानों की खरीद फ़रोख्त पर इस सभ्य समाज के ठेकेदारों को ऐतराज़ क्यों है? पशु पक्षियों के खरीदने बेचने पर तो किसी को कोई आपत्ति नहीं, तो फ़िर इन्सानी बिक्री का विरोध क्यों, ऐसा पक्षपात काहे के लिए?? अब समझने वाले मेरा गला पकड़े उससे पहले मैं यह कह देना चाहूँगा कि मैं इन्सानी खरीद फ़रोख्त का पक्ष नहीं ले रहा हूँ, मैं तो केवल वह लिख रहा हूँ जैसा कि मेरे ज़ेहन में उस समय आया था। तो अन्य जीवों के साथ ऐसा पक्षपात क्यों होता है? यदि कोई व्यक्ति अपनी गाड़ी इत्यादि के नीचे किसी अन्य व्यक्ति को कुचल देता है तो उसे सज़ा हो जाती है क्योंकि वह एक अपराध है, और वहीं यदि कोई कुत्ता या अन्य पशु किसी गाड़ी के नीचे कुचला जाता है तो कोई बात नहीं, क्योंकि वह कोई अपराध नहीं होता, ऐसा क्यों?

ये प्रश्न केवल मेरे ही दिमाग में नहीं उठे हैं, ये न जाने कितने वर्षों से कितने ही लोगों के ज़ेहन में उठे हैं। एक आध काल्पनिक फ़िल्म इत्यादि भी इस पर बनी है जिसमे दर्शाया गया है कि पशु अपनी सभा स्वयं बनाते हैं और मनुष्यों को उनके दुर्व्यवहार के लिए उन्हे दण्ड देते हैं। परन्तु उसमे फ़िर आगे दिखाया गया है कि मनुष्य उसे अपने लिए खतरा मानते हुए मानवता के नाम पर उन्हे नष्ट कर देते हैं और फ़िल्म इस संदेश के साथ समाप्त हो जाती है कि “हमसे जो टकराएगा, मिट्टी में मिल जाएगा”!! क्यों?? यदि हमें जीने का अधिकार है तो क्या पशुओं को नहीं है? मनुष्य भी तो एक तरह का पशु ही है!! अब मैं यहाँ पर स्पष्ट कर देता हूँ कि इसका शाकाहार और मांसाहार से कोई संबन्ध नहीं है, क्यों कि वह प्राकृतिक है, यदि आप किसी अन्य जीव को मारकर खा रहे हैं तो यह प्रकृति का नियम है, वह कोई गलत कार्य नहीं है, परन्तु प्रकृति का नियम यह नहीं कहता कि मनुष्य किसी पशु को कैद कर के रख ले, उससे गुलामी करवाए!! अब यदि आप यह कहें कि पशुओं आदि के साथ होते ऐसे दुर्व्यवहार को रोकने के लिए ही “एनीमल राईट्स” संगठनों आदि की स्थापना हुई है, तो मैं यह कहना चाहूँगा कि अधिकतर ऐसे संगठन मात्र एक दिखावा ही हैं जो कि केवल अपना उल्लू सीधा करना जानते हैं और ज्यादातर ऐसे संगठनों से कोई न कोई रजनीतिक नेता आदि जुड़ा होता है ताकि संगठन के रूप में एक सदकार्य लोगों में उनकी मटमैली छवि पर कुछ दूधिया उजाला डाल सके जिससे उन्हें वोट मिलना सरल हो जाए। :roll: अब उदाहरण के तौर पर पशु अधिकार के लिए लड़ने वाली और गांधी परिवार की छोटी बहू मेनका गांधी को ही लीजिए, जिन्हे इस बात की तो खबर नहीं कि सड़कों पर कितने ही कुत्ते-बिल्ली-गाय इत्यादि छुट्टे घूमते हैं और यातायात में बाधा बनने के साथ साथ स्वयं अपनी व जनता की जान के लिए भी खतरा हैं, परन्तु उन्हें इस बात की अधिक तकलीफ़ है कि आमिर खान की आने वाली फ़िल्म “रंग दे बसंती” में निर्देशक ने बिना पूर्व अनुमति के एक घोड़े से क्यों कुछ करतब दिखवा लिए!! (निठल्ला चिन्तन) :roll: भई उज्जडता की भी कोई हद होती है, यह तो मैं जानता था कि वे बद-ज़ुबान हैं(बिना गाली गलौच के बात करना उनके लिए अस्वभाविक है) लेकिन बद-दिमाग भी हैं यह भी पता चल गया!! अरे भई, घोड़े से करतब ही करवाया है, कोई उसकी जान थोड़े ही ली है, और यदि ऐसी ही आपत्ति है तो फ़िर सभी सर्कसों पर ताला क्यों नहीं लगवा देती? मुम्बई के आस पास और देश भर में जितने भी निजी स्टड फ़ार्म हैं उन्हें काहे नहीं ज़ब्त करवा लेती? पशुओं आदि की बिक्री पर क्यों नहीं प्रतिबंध लगवा देती? :roll:

यदि मान भी लिया जाए कि कुछ पशु अधिकार संस्थाएँ अपना कार्य करती भी हैं तो भी ये कोई क्रांति नहीं ला सकती, क्योंकि ऐसी सच्ची संस्थाएँ बहुत कम हैं। सुधार तभी हो सकता है जब साधारण मनुष्य में चेतना जागे। जन चेतना के बिना तो भारत भी अंग्रेज़ों की गुलामी से आज़ाद नहीं हुआ था!!

…..

एक और विचार जो मेरे मस्तिष्क में कौंधा वह यह था कि जिस तरह होटल के एक कमरे में किसी ने होटल कर्मचारियों के साथ मिलकर जिस तरह कैमरे लगा दिए थे, ऐसा अभी तक हमने केवल जासूसी फ़िल्मों इत्यादि में देखा है, परन्तु क्या यह आपके और मेरे साथ हो सकता है? बिलकुल हो सकता है, और ऐसा करना कोई खास कठिन भी नहीं है। इसके साथ ही मुझे स्मरण हो आया अंग्रेज़ी के मेरे पसंदीदा उपन्यासकार रॉबर्ट लडलम द्वारा कुछ वर्ष पूर्व लिखा गया उपन्यास “द प्रोमेथियस डिसेप्शन” जिसमें एक ताकतवर टेक्नॉलोजी कंपनी का सनकी मालिक आतंकवाद को खत्म करने के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय समझौते का मनसूबा बनाता है जिसके तहत एक उपग्रह अंतरिक्ष में छोड़ा जाता है जोकि पृथ्वी के किसी भी हिस्से की किसी भी सड़क-गली इत्यादि पर नज़र रख सकता है और उसका सजीव प्रसारण उस कंपनी की प्रयोगशाला में करता है जोकि बकायदा दिन के चौबीसों घंटे रिकॉर्ड भी होता है। उस उपग्रह से कोई भी कहीं भी छुप नहीं सकता, वह आपके घरों के अंदर आपको अंतरंग क्षणों में भी देख तथा रिकॉर्ड कर सकता है, बंद द्वारों इत्यादि का उसके लिए कोई महत्व नहीं। उसमें प्रयोग के तौर पर नायक के जीवन की पिछले पंद्रह सालों से रिकॉर्डिंग की जा रही थी, यहाँ तक कि उसकी पत्नी के साथ उसके अंतरंग क्षणों की भी!!

अब बेशक ये काल्पनिक कथा ही सही, परन्तु क्या यह असंभव है? जहाँ तक मैं जानता हूँ आज के विज्ञान के लिए यह काफ़ी हद तक(या पूरी तरह) संभव है और यदि नहीं है तो आने वाले कुछ वर्षों में अवश्य हो जाएगा!! यह सोचकर मन में एक सिहरन सी दौड़ जाती है कि यदि ऐसा हो गया तो क्या होगा? तब आपके जीवन का कोई पल आपका अपना नहीं होगा, सब कुछ सार्वजनिक हो जाएगा, “प्रिवेसी” का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। साथ ही यह विचार भी मन में उठा कि क्या अब हमें यह करना होगा कि कहीं भी होटल में कमरा लें तो पहले उसकी जाँच करें, जेम्स बांड स्टाईल, कि कहीं कोई कैमरा इत्यादि तो नहीं लगा है?

अभी तक ऐसी आशंकाएँ केवल जानी-मानी प्रसिद्ध हस्तियों को ही होती थी, परन्तु समय तेज़ी के साथ बदल रहा है, अब आम आदमी भी इन आशंकाओं से अछूता न रह पाएगा क्योंकि गहराता जा रहा है ….. कलयुग


इंडिब्लॉगीज़ 2005, परिणाम घोषित!!


January 15th, 2006 at 03:08 am | 1 Comment

कुछ आशंकाओं, उलझनों और एक पुर्नमतदान के बाद आखिरकार इंडिब्लॉगीज़ 2005 के परिणाम देबाशीश ने घोषित कर ही दिए, और जैसी कि उम्मीद थी, अमित वर्मा सर्वश्रेष्ठ भारतीय ब्लॉग की बाज़ी मार ले गए!! ;) पाकिस्तान में मज़े कर रहे अमित ने अवश्य बटर चिकन और तंदूरी बकरे के साथ इस जीत को मनाया होगा!! :D यह विचारणीय तथ्य है कि एक वर्ष पूर्व 2004 में अमित ने इसी ब्लॉग के लिए सर्वश्रेष्ठ नए भारतीय ब्लॉग का पुरस्कार जीता था(इंडिब्लॉगीज़ 2004)।

इस बार के इंडिब्लॉगीज़ में सर्वश्रेष्ठ हिन्दी ब्लॉग सम्मान के लिए मैंने भी एक पुरस्कार स्पॉनसर किया था, एक चमचमाता हुआ, भारतीयता की सुगंध लिए, ब्रांड न्यू .IN डोमेन!! तो यह सम्मान इस बार प्राप्त हुआ है शशि सिंह द्वारा प्रकाशित मुम्बई ब्लॉग को। बधाई हो शशि, आपके पुरस्कार आपको शीघ्र ही प्राप्त हो जाएँगे और जैसे ही देबाशीश मुझे आपका ईमेल भेजेंगे, मैं भी आपको विद्युत पत्र(ईमेल) भेजूँगा!! :) मैंने अभी तक मुम्बई ब्लॉग के बारे में थोड़ा बहुत इधर उधर हिन्दी के चिठ्ठों पर पढ़ा तो है लेकिन मुम्बई ब्लॉग को नहीं पढ़ा, अब पढ़ कर देखेंगे, भई आखिर इसे हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ भारतीय ब्लॉग होने का गौरव प्राप्त हुआ है, तो आखिर कुछ तो इसमें बात होगी ही। परन्तु यह स्पष्ट कहूँगा कि मेरी फ़ुरसतिया से थी, पर लोगों ने उसे द्वितीय स्थान से ऊपर नहीं आने दिया!! ;)

मेरे अनुसार सबसे भाग्यशाली रहे सेल्वकुमार जिन्हे अपने ब्लॉग “द साईन्टिफ़िक इंडियन” के लिए सर्वश्रेष्ठ भारतीय विज्ञान ब्लॉग का सम्मान मिला जिसके तहत उनके पुरस्कारों में से एक है माईक्रोसॉफ़्ट इंडिया की ओर से 19000 रूपये का एक स्मार्टफ़ोन!! यह इस वर्ष के इंडिब्लॉगीज़ का सबसे कीमती पुरस्कार है। साथ ही विशेष बधाई डिजिटल इंस्पिरेशन के अमित अग्रवाल को जो कि इसी श्रेणी में द्वितीय रहे और जिनके पुरस्कारों में से एक है माईक्रोसॉफ़्ट इंडिया की ओर से 299 डॉलर का विज़ुअल स्टूडियो 2005 स्टैंडर्ड एडिशन। अमित कंप्यूटर विज्ञान में स्नातक हैं, उम्मीद है यह पुरस्कार उनके लिए लाभदायक होगा!! :)

मैं सभी विजेताओं और इंडिब्लॉगीज़ के इस अध्याय के सफ़लता पूर्वक समापन पर देबाशीश तथा निर्णायक दल के सदस्यों को हार्दिक बधाई देता हूँ।

लगभग सभी विजेता ब्लॉग मेरे लिए नए हैं, तो शायद अब मैं कुछ नए ब्लॉग भी पढ़ने लगूँगा ऐसी आशा है, लेकिन सिर्फ़ अंग्रेज़ी और हिन्दी में लिखे ब्लॉग, कोई और भाषा मुझे अभी नहीं आती!! ;)


प्रवासी या परमेश्वर?


January 9th, 2006 at 07:20 pm | 10 Comments

हैदराबाद में चल रहे चौथे प्रवासी भारतीय दिवस का समापन निकट है, और पधारे हुए प्रवासी भारतीयों का असंतोष साफ़ तौर पर देखा जा सकता है!! और ऐसा हो भी क्यों न, आखिर ये प्रवासी भारतीय हज़ारों डॉलर ख़र्च करके यहाँ हमारे ख़ड़ूस नेताओं का भाषण सुनने तो नहीं आए हैं!! न ही वे यहाँ कोई नाच-गाने के कार्यक्रम देखने आए हैं। जैसा कि एक असंतुष्ट वसुधा सोंधी, एच.आर.एच. होटल समूह की उपाध्यक्ष का कहना है

यहाँ कुछ खास नहीं हो रहा है, हैदराबाद में भारतीय प्रवासी दिवस का आयोजन करना ही नहीं चाहिए था। मेरे अनुसार प्रचालन तंत्र इत्यादि के लिहाज़ से मुम्बई इस आयोजन के लिए बेहतर होता। व्यापार और खरीददार-व्यापारी की भेंटवार्ता की जगह मैं तो लोगों को सिर्फ़ इधर उधर घूमता देख रही हूँ। यह सही है कि खूब काम करना चाहिए और खूब मज़ा करना चाहिए पर यहाँ यदि कुछ पूर्व निर्धारित नियोजन होना चाहिए था। शुक्र है कि मुझे अंतिम दिन को नहीं सहन करना पड़ेगा क्योंकि मैंने चले जाने का निर्णय लिया है। यह बहुत खेदजनक बात है कि लोग पैसे खर्च करके आते हैं और उन्हे ऐसा कुछ नहीं मिलता जिससे लगे कि उनके पैसे की वसूली हुई है!!

तो मैं वसुधा जी से कहना चाहूँगा कि यह कोई व्यापार सम्मेलन नहीं है जहाँ खरीददार-व्यापारी की बैठकें हों और व्यापारियों को कार्यनीतिक संबन्ध बनाने का अवसर मिले। एक अंतर्राष्ट्रीय होटल समूह की उपाध्यक्ष को यह पता होना चाहिए कि ऐसे सामाजिक सम्मेलनों के अनऔपचारिक वातावरण में बड़ी आसानी से दूसरे व्यापारियों से कार्यनीतिक संबन्ध बनाए जा सकते हैं, परन्तु उसके लिए बुद्धि का उपस्थित होना अति आवश्यक है!! ;) यदि वे भारतीय प्रवासी दिवस को एक व्यापार सम्मेलन समझ कर आई थी तो मैं केवल उनकी बुद्धि पर खेद ही प्रकट कर सकता हूँ, उनके असंतोष से मुझे कोई सहानुभूति नहीं है!! :roll:

एक और असंतुष्ट प्रवासी भारतीय, ताईवान के पवन कुमार कौशिक का कहना है

हम प्रवासी हैं और हम ही बोल नहीं सकते!! विदेशी कार्यभार मंत्रालय समझता है कि वे ईश्वर हैं। यदि वे हमसे प्रतिपुष्टि की माँग कर रहे हैं तो यह सातवें आश्चर्य जैसा है। ये मंत्री हमारे नौकर हैं और इन्हे आलोचना सही मायने में लेनी चाहिए!!

तो श्रीमान पवन से मैं यह कहना चाहूँगा कि पहली बात तो यह है कि सात आश्चर्य विश्व में पहले से ही हैं, शायद आप आठवें आश्चर्य की बात कर रहे थे!! ;) दूसरी बात, आप प्रवासी हैं, खुदा नहीं, आपको वीआईपी सेवा मिले, ऐसा क्योंकर हो? यदि आप बोलना चाहते हैं तो बोलिए, जब तक आप अपने विचार अधिकारियों तक नहीं पहुँचाएँगे तो कैसे उन्हें आपके विचारों का ज्ञान होगा, भई आखिर वे साधारण मनुष्य मात्र ही हैं जिनके पास टेलीपैथी जैसी शक्तियाँ नहीं हैं!! तीसरी बात, क्या आप किसी मंत्री के सामने उसके मुख पर यह कह सकते हैं कि वह आपका नौकर है? माना कि आप इस बारे में गलत नहीं हैं, मंत्री आदि सभी जनता के सेवक होते हैं, परन्तु आजकल इन अर्थों का कोई मूल्य नहीं है, यह बात उन्हे पता होनी चाहिए, और यदि नहीं पता तो वे भारतीय होने के हक को जताने के अधिकारी नहीं हैं।

बकवास और नुक्ताचीनी करना बहुत आसान है, परन्तु कार्यवाही करना उतना ही अधिक कठिन है। ये हमारे वे प्रवासी भारतीय हैं जो कि देश छोड़कर विदेश में जाके बस गए और माँग ऐसी करते हैं कि जैसे यहीं रहते हों। क्या कभी इन्होने देश के लिए कुछ किया? ये तो वोट देकर सरकार बनाने में कोई योगदान भी नहीं देते जिसको देने के लिए कोई पैसा नहीं खर्च करना पड़ता। और किस असंतोष की ये बात कर रहे हैं? बॉलीवुड के सितारों द्वारा प्रस्तुत किए गए कार्यक्रमों को तो ये लोग दांत फ़ाड़ कर देख रहे थे, और फ़िर बाहर आकर पत्रकारों के समक्ष उन्ही कार्यक्रमों की निन्दा करते हुए असंतोष प्रकट कर दिया!! ये लोग विदेश में जाकर बस गए, वहाँ अपना काफ़ी बड़ा व्यापार खड़ा किया, पैसा कमाया, और यहाँ आकर सोचते हैं कि जैसे वे भारतीय ईश्वर हो गए जिनके साथ यहाँ वीआईपी बर्ताव किया जाना चाहिए, चाहे विदेश में वे बेशक एक आम नागरिक की तरह रहते हों। आखिर ये लोग आते ही क्यों हैं यहाँ? क्या किसी ने इन्हे मजबूर किया कि वे 25000 डॉलर खर्च करके यहाँ इस प्रवासी भारतीय दिवस में भाग लेने आएँ? हमें इनकी कोई आवश्यकता नहीं है, इन्हे चाहिए कि ये अपनी प्रभुता वाली मानसिकता लेकर कहीं और जाएँ।

मैं यह मानता हूँ कि थोड़ी बहुत गलती आयोजकों की भी है कि प्रवासी भारतीय दिवस को नेताओं के भाषणों और नाच-गाने के कार्यक्रमों से नहीं पाटना चाहिए पर सुधार तभी हो सकता है जब भाग ले रहे प्रवासी भारतीय पत्र्कारों की अपेक्षा आयोजकों को अपने विचार और सुझाव दें। मुझे प्रवासी भारतीयों से कोई चिढ़ नहीं है, परन्तु जो रईस(और बड़े व्यापारी) प्रवासी भारतीय यह समझते हों कि वे तोप हैं और यहाँ उनके साथ ईश्वरीय व्यवहार होना चाहिए, उन पर तो मैं थूकना भी नहीं चाहूँगा, क्योंकि वे तीसरे दर्जे की थकी हुई मानसिकता वाले बीमार हैं जिन्हे भारतीय कहना समस्त भारतीयों का घोर अपमान है!! :roll:


ये दिल माँगे मोर!!


January 9th, 2006 at 03:00 am | 3 Comments

अभी तक जीवन की (छोटी)यात्रा के मेरे जो अनुभव रहे हैं, उनका निचोड़ यह कहता है कि यदि आज के समय में भगवा वस्त्र पहने किसी व्यक्ति को खुद को साधु, संत या सन्यासी बताते हुए देख लो तो उस पर कतई विश्वास न करो क्यों कि आजकल तो भिख़ारी और ढ़ोंगी भी भगवा वस्त्र पहनते हैं। साथ ही मेरे अनुभवानुसार, आयुर्वेदिक चिकित्सा महज एक बकवास है क्यों कि जितने भी आयुर्वेद से चिकित्सा करने वाले हैं, उनमें से निन्यानवें प्रतिशत तो ढ़ोंगी और ठग हैं, और बाकी एक प्रतिशत आपको मिलेंगे नहीं!! मैंने बहुत से आयुर्वेद से चिकित्सा करने वालों के बारे में सुना, बहुत से लोग मिले जो कि शपथ उठा के कहते थे कि उन्हे लाभ हुआ है, पर अंत में जाके यही निकलता था कि वे सब ठग-बदमाश होते थे। इसलिए मेरा इस चिकित्सा पद्धति से विश्वास उठ गया है, और ऐसा ही होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति के साथ भी है। मैं तो केवल यह जानता व मानता हूँ कि एलॉपथी से चिकित्सा कराओ और झट-पट आराम पाओ!! ;)

अब यह स्वामी रामदेव को ही लीजिए, अभी इनका एक विवाद ठंडा नहीं हुआ, कि वे एक नई सनसनी फ़ैलाने को तैयार हैं। मौके(मिलती लोक प्रसिद्धि) का पूरा लाभ उठाते हुए उन्होने कुछ नई बातें कही हैं। पहले तो उन्होने यह घोषणा की कि उनके औषधालय में बनने वाली हर औषधि पर अब उसको बनाने में प्रयोग हुए तत्वों का पूरा ब्यौरा लिखा होगा, जोकि वैसे तो कानूनी रूप से आवश्यक तो नहीं है, परन्तु वे ऐसी पहल करेंगे(और पारदर्शीता लाएँगे)!!

दूसरी बात फ़िर उन्होने उठाई आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति और भारत में उसकी दुर्दशा की। उन्होने कहा कि केन्द्रिय बजट में एलॉपथी चिकित्सा के लिए 97 प्रतिशत और आयुर्वेद तथा अन्य भारतीय चिकित्सा पद्धतियों के लिए मात्र 3 प्रतिशत धनराशी दी जाती है। और उन्होने माँग की कि यह उलट के, आयुर्वेदिक चिकित्सा के लिए 97 प्रतिशत और एलॉपथी के लिए 3 प्रतिशत धनराशी दी जानी चाहिए।

मैं इस बात का शुक्र मनाता हूँ कि स्वामी रामदेव वित्त मंत्री के सलाहकार आदि नहीं हैं वरना देश की जनता, जो कि वैसे भी मर रही है, वह और तेज़ी से मरना शुरु कर देती!! आयुर्वेद एलॉपथी के आने से पहले भी था, पहले भी लोग बुखार में नीम के पत्तों को उबाल के पीते थे, सोने-चाँदी इत्यादि से औषधियाँ बनती थी, परन्तु एलॉपथी का आविष्कार क्यों कर हुआ? सिर्फ़ इसलिए क्योंकि एलॉपथी से रोगी को लाभ जल्दी होता था और सस्ते में होता था। जिस मर्ज़ की दवा में सोने-चाँदी आदि का प्रयोग होता है, उसी मर्ज़ की दवा कुछ रसायनों से बनाई जाती है(जो कि सस्ते होते हैं) और आयुर्वेदिक दवा की अपेक्षा आम आदमी की पहुँच में होती है!! यदि स्वामी जी का वश चले तो वे हम सभी को धोती में लपेट दें और काढ़ा-सत्तू पर जीवन व्यतीत कराएँ!!

मैं यह नहीं जानता कि स्वामी रामदेव कितने सही हैं और कितने गलत, लेकिन मैं इतना जानता हूँ कि अर्थशास्त्र की उन्हे समझ नहीं है और जीवन का सामान्य ज्ञान यह है कि मनुष्य को जिस विषय की जानकारी न हो, उस विषय में उसे अपनी टाँग नहीं अड़ानी चाहिए। इसलिए स्वामी जी को चाहिए कि वे अपना मायाजाल बुनें और एक समझदार ख़िलाड़ी की तरह उन विषयों के बारे में टिप्पणी न करें जो उनकी पहुँच से बाहर हैं!!

और स्वामी रामदेव के जो अनुयायी यह समझ रहे हों कि मैं उनकी निन्दा कर रहा हूँ तो वे यह जान लें कि मैं ऐसा बिलकुल नहीं कर रहा हूँ और यदि वे अपने विचार प्रकट करना चाहें तो शांतिपूर्ण ढ़ंग से सभ्य भाषा में कर सकते हैं, अन्यथा उनकी टिप्पणियाँ मिटा दी जाएँगी और स्वामी जी से उनकी शिकायत कर दी जाएगी क्योंकि स्वामी जी ने अपने समर्थकों से शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करने को कहा है!! ;)