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स्वयमेव जयते!!


December 19th, 2005 at 02:00 am | 8 Comments

हाँ, आपने सही पढा, मैंने ‘सत्यमेव जयते’ नहीं बल्कि ‘स्वयमेव जयते’ कहा। और क्या अनुचित कहा? और यह कोई नई बात भी नहीं है, सदियों से हम देखते आ रहे हैं कि हमारे तथाकथित नेता अपने निजी स्वार्थ को जनहित से उपर मानते और निभाते आ रहे हैं। चाहे वे किसी राजनैतिक दल के नेता हों या किसी राज्य-रियासत के राजा महाराजा या नवाब, निजी स्वार्थ सदैव सर्वोपरि रहा है। प्रश्न उठता है ‘क्यों’। क्यों वे लोग भूल जाते (थे)हैं कि नेता या राजा ईश्वर का कोई रूप नहीं होता, वह जनसमुदाय का प्रतिनिधी होता है जिसका पहला कर्तव्य उन लोगों की ओर होता है जिनका वह प्रतिनिधित्व कर रहा होता है। परन्तु यह सब किताबी बातें हैं, उन लोगों के दृष्टिकोण के अनुसार वे विशेषाधिकृत होते हैं जिन्हें अपनी इच्छानुसार कुछ भी करने की स्वतंत्रता प्राप्त होती है। और साथ ही सदैव ही से इन लोगों को यह डर सताता रहा है कि कहीं कोई इनका सिंहासन या कुर्सी न छीन ले क्योंकि इनके अंतरमन में इन्हें इस बात का ज्ञान हमेशा रहा है कि वे गलत हैं। अब चाहे वह औरंगज़ेब हो या बहादुरशाह जफ़र, गांधी हो या नेहरू, लालू यादव हो या आज का कोई और नेता।

कोई व्यक्ति नीचता की कितनी ही हदें पार कर ले, उसके अंतरमन में कहीं न कहीं, किसी न किसी कोने में एक ऐसा दीप अवश्य प्रकाशमान होता है कि उसने जो कि उसके द्वारा किए गए सभी सही और गलत कार्यों का हिसाब रख़ता है और व्यक्ति को उसका निरंतर अहसास दिलाता रहता है। अब यह बात अलग है कि व्यक्ति का चरित्र जितना मटमैला होता है, उस दीप का प्रकाश उस तक उतनी ही कठिनता और विलंब से पहुँचता है, और साथ ही व्यक्ति का अपने पर जितना अधिक नियंत्रण होता है उतना ही वह उस प्रकाश को अपने से दूर रख़ने में सफल रह पाता है।

अब जिस तरह सिक्के के दोनो पहलू एक जैसे नहीं होते, उसी प्रकार ये नेता और उनके कर्म भी समान नहीं होते। कुछ थोड़ा नीचे गिरते हैं, कुछ ज्यादा नीचे गिरते हैं और कुछ तो इतना नीचे गिर जाते हैं कि उनका उठना ही नामुमकिन हो जाता है।

लेकिन…..

हाँ, यह ‘लेकिन’ अत्यधिक महत्वपूर्ण है। किसी की निंदा करना बहुत आसान है, और ऐसा करने से कोई भी नहीं चूकता, मैं भी नहीं। परन्तु सत्य यह है कि मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा है कि वह पहले अपना हित देख़ता है और फ़िर कुछ और। नेता भी साधारण इंसान ही होते हैं, उनमें भी वही खामियाँ होती हैं जो बाकी इंसानों में होती हैं, और कदाचित कुछ अधिक मात्रा में होती हैं क्योंकि उनके पास ख़ोने के लिए अधिक होता है।

तो हम कैसे किसी नेता को किसी गलत कार्य के लिए दोषी ठहरा सकते हैं जब हमने स्वयं उस गलत कार्य के विरोध में या उसे सुधारने के लिए कुछ नहीं करा हो। एक पुरानी कहावत है कि चोर को जो चोरी करता देख़ कर भी चुप रह जाता है, वह भी उस चोरी में बराबर का भागीदार होता है। तो यदि औरंगज़ेब ने कत्लेआम मचा के तख़्त पे कब्ज़ा कर लिया था तो जिन्होने उसका विरोध किए बगैर उसे अपना बादशाह मान लिया, उन्हें उसकी निंदा करने का कोई अधिकार नहीं। गांधी के शहीदेआज़म भगत सिंह को न बचाने पर तथा स्वतंत्रता के समय भारत का बंटवारा होने पर किसी ने उनका विरोध न किया और उन्हें दोषी मानते हुए उसी क्षण दंड नहीं दिया, तो उनको भला बुरा क्यों कहा जाए? शायद आज मैं नत्थूराम गोडसे के दृष्टिकोण को समझ सकता हूँ कि उन्होंने गांधी की हत्या क्यों की। नेहरू का लोगों ने विरोध नहीं किया, उन्हें समझाने का प्रयत्न नहीं किया कि यदि वे कुर्सी का लोभ न करें तो बहुत बड़ा नरसंहार टल सकता है। जिन्नाह को किसी ने अक्ल से काम लेने को नहीं कहा, किसी ने मुस्लिम लीग के बड़े नेताओं को गोली से नहीं उड़ाया कि ऐसा अगर हो जाता तो हिन्दुस्तान में वो आग न लगती जिसने उसे दो में विभाजित कर दिया और आज भी जो सुलग रही है और न जाने कितने वर्षों तक सुलगती रहेगी। 1947 के दंगों के असली दोषी कौन हैं? पाकिस्तान निर्माण के सहायक कौन हैं? किसने इतनी लंबी दुश्मनी मोल ली जिसकी आग कई पीढियों का लहु पीने के उपरांत भी शांत नहीं हुई है? और आज के भ्रष्ट नेताओं और उनके भ्रष्टाचार का जिम्मेदार कौन है?

हम सभी इसके उत्तरदायी हैं क्योंकि हमने अपने स्वार्थों को अधिक महत्व देते हुए अपने कर्तव्यों का पालन नहीं किया। आम धारणा यह होती है कि यदि दूसरा अपने कर्तव्यों का पालन नहीं कर रहा तो हम क्यों करें और अकेला चना क्या भाड़ फ़ोड़ लेगा!! हम इन प्रश्नों के उत्तर जानते हैं पर स्वीकार नहीं कर पाते। जब हम अपने घर की ही गंदगी साफ़ नहीं कर सकते तो बाहर की कैसे करेंगे। और इस सबका एक ही कारण है, हमारा निजी स्वार्थ आड़े आ जाता है।

स्वयमेव जयते…..


हिन्दी? बाप रे..


December 11th, 2005 at 05:03 am | 6 Comments

जीहाँ, यही रवैया है हमारे यहाँ के अधिकतर नवीं कक्षा के छात्रों का जब उन्हें यह निर्णय लेने की स्वतंत्रता दी जाती है कि वे संस्कृत और हिन्दी में से किसी एक का चुनाव कर सकते हैं जिसकी परीक्षा वे दसवीं के बोर्ड में देना चाहते हैं। ज्यादातर छात्र बेहिचक संस्कृत का चुनाव करते हैं, सिर्फ़ इस लिए कि हिन्दी की तुलना में संस्कृत में अधिक अंक आ जाते हैं। क्या वाकई ऐसा है?

सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता, संस्कृत के अंक हिन्दी के अनुपात में ज्यादा आते हैं, पर क्या यह हिन्दी का दोष है? जहाँ तक मेरा मानना है, संस्कृत के मुकाबले हिन्दी अधिक सरल है, इसमें ज्यादा अंक मिलने चाहिए। लेकिन हमारे ख़ड़ूस हिन्दी के परीक्षक अत्यधिक कंजूसी से अंक देते हैं जबकी संस्कृत के परीक्षकों की उदारता तो अद्वितीय है जो की ऐसे उत्तरों को पूरे अंक देते हैं जो कि पुस्तक की हूबहू नकल होते हैं और जिसे परीक्षार्थी ने समझ कर नहीं वरन मात्र रट कर टीप दिया। व्याकरण में तो पूरे अंक मिलते ही हैं पर लेख़न आदि में भी? क्यों हिन्दी परीक्षक इस सरल भाषा को छात्रों के लिए एक दुःस्वप्न बना रहे हैं? हिन्दी की ऐसी दुर्दशा हो गई है कि हमारी मातृभाषा की औकात हमारे ही देश में एक गली के कुत्ते जैसी होती जा रही है। जब स्कूल में ही बच्चे हिन्दी के प्रति उदासीन हो जाएँगे तो बड़े होकर वे क्या करेंगे? क्या व्याजोक्ति है कि जिस भाषा को बच्चे दिन रात निरंतर बोलते हैं उसी को वे पढना नहीं चाहते!!

यदी बात यहाँ तक ही सीमित रहती तो अलग बात थी, पर हालात यह हैं कि देसी अंग्रेज़ों की ऐसी नई खेप तैयार हो रही है जिसे अपने हिन्दुस्तानी माता-पिता से हिन्दी में बात करने में तकलीफ़ होती है। और तो और, ये देसी अंग्रेज़ बाज़ार में अनपढ सब्ज़ी वाले तक से हिन्दी में बात करने में अपना अपमान समझते हैं और उससे अंग्रेज़ी में बात करते हैं!! जी हाँ, ऐसा हो रहा है और वह भी भारत की राजधानी नई दिल्ली में। अंग्रेज़ चले गए पर अपनी नाजायज़ औलादें छोड़ गए। और इन देसी अंग्रेज़ों की पैदावार के लिए जिम्मेदार कौन है? जाहिर है कि इसमें पहला दोष तो आधुनिक माता-पिताओं का है जो कि अपने बच्चों का हमारी संस्कृती से परिचय कराने की अपेक्षा उसका बलात्कार कर रहे हैं। दूसरे क्रमांक पर दोषी हैं तथाकथित अच्छे विद्यालयों में पढाने वाले असमाजिक शिक्षक जो कि विद्यार्थीयों को प्रेरित करते हैं कि वे विद्यालय के बाहर भी, अपने घर, बाज़ार इत्यादी में भी हिन्दी कि अपेक्षा अंग्रेज़ी का प्रयोग करें। उनका उद्देश्य छात्रों की अंग्रेज़ी बोलने की क्षमता को उन्नत करना होता है, जो कि अच्छी बात है पर इसका तात्पर्य क्या यह है कि हिन्दी का प्रयोग बिलकुल बन्द कर दिया जाए? अभ्यास के अभाव में तो बड़े से बड़े महारथी की योग्यता को जंग लग जाता है और हम तो उन कलियों की बात कर रहे है जिन्हे अभी ख़िलना है।

पर इसके अलावा, देसी अंग्रेज़ों की बहुतायत पैदावार स्वयंमेव हुई है, जिसे अंग्रेज़ी में सेल्फ़-डेवलपमेंट कहा जाता है!! ;) अब प्रश्न यह है कि यह पैदावार कैसे हुई और इसका कारण क्या है। तो श्रीमान, इसका करण है अहं। जी हाँ अहं, जो कि कम-ज्यादा हर किसी में होता है। यदि हम किसी को अपने आस पास अंग्रेज़ी में बात करता देख़ लेते हैं तो उसकी अंग्रेज़ी हमारे अहं की अग्नि में घी का कार्य करती है और उसे हमारी अंग्रेज़ी ही शीतलता प्रदान कर पाती है। कहने का तात्पर्य है कि अंग्रेज़ी में बोलना पढे-लिख़े होने के पहचानपत्र का कार्य करती है और सामने वाला प्रभावित भी होता है!!

यदी यह कहा जाए कि अंग्रेज़ी ने हमारी हिन्दी को भ्रष्ट कर दिया है तो अतिश्योक्ती न होगा। यदी मेरा ही उदाहरण लिया जाए तो मैं सिर्फ़ यही कहूँगा कि पहले मैं हिन्दी के किसी शब्द का अंग्रेज़ी में अनुवाद ढूँढता था और आजकल अंग्रेज़ी शब्दों का हिन्दी अनुवाद ढूँढता हूँ। ;)

यदि हालात ऐसे ही रहे तो जल्द ही लोग अंग्रेज़ी की जगह हिन्दी बोलने की कोचिंग ले रहे होंगे!!


रंणबाँकुरों की वापसी!!


November 28th, 2005 at 10:30 pm | No Comments
Posted In: Sports, खेल

टीम इंडिया, भई वाह!! आज तो कमाल ही हो गया, जिस तरह से भारतीय रंणबाँकुरों ने पाँचवें और आख़िरी मुकाबले को जीत कर श्रृंख़ला को बराबर कर भारतीय भूमि पर दक्षिण अफ़्रीका की पहली एक दिवसीय श्रृंख़ला विजय का सपना चूर किया, वह वाकई प्रशंसा के योग्य है। कोलकाता में मिली क़रारी हार के बाद बहुत से लोगों को(यहाँ तक कि मुझे भी) यही आशा थी कि आज के अन्तिम मैच में भी भारतीय टीम कुछ ख़ास न कर पाएगी और दक्षिण अफ़्रीका आख़िरकार श्रृंख़ला ले ही जाएगी। पर टीम इंडिया ने जबरदस्त वापसी करते हुए मुम्बई के वानख़ेड़े स्टेडियम में हज़ारों की तदाद में आए दर्शकों को निराश न किया और मैच 5 विकटों से जीत लिया।

पहले क्षेत्ररक्ष्ण का निर्णय लेते हुए कप्तान द्रविड़ ने दक्षिण अफ़्रीका को पहले बल्लेबाज़ी करने के लिए आमंत्रित किया। चाल कामयाब रही और पठान तथा हरभजन ने दक्षिण अफ़्रीकी बल्लेबाज़ों का जीना हराम कर दिया। उनका भरपूर साथ दिया मुरली कार्थिक, सहवाग और युवराज ने। भज्जी ने सिर्फ़ गेंद से ही नहीं बल्कि अपने क्षेत्ररक्ष्ण से भी कमाल दिखलाया। दक्षिण अफ़्रीका के हाल इतने बुरे थे कि पंद्रहवें ओवर के बाद, लगभग बीस ओवर तक उनसे कोई चौका या छक्का ही न लगा और वे बेचारे पिच पर ही पसीना बहते हुए रन बटोरते रहे। वह तो जैक़ कॉलिस और विकेट कीपर मार्क बाउचर ने 81 रन के योगदान से पारी को संभाल लिया वरना दक्षिण अफ़्रीका ने मुँह के बल गिरना था। आख़िरकार दक्षिण अफ़्रीका ने नोच खसोट कर 6 विकेट ख़ो कर 221 रन बनाए।

भारतीय पारी की शुरुआत गौतम गंभीर और तेंदुलकर ने की। गंभीर को न जाने क्या जल्दी थी कि वह दूसरे ओवर में ही चलते बने। तीसरे क्रमांक पर आए वीरेन्द्र सहवाग ने आते ही अपना रंग दिख़ाया और नजफ़गढ के कसाई ने ऐसे पॉलक एण्ड कंपनी की जमकर ठुकाई की कि देख़ने वाले भी वाह वाह कर उठे। अपने घरेलू मैदान पर ख़ेल रहे तेंदुलकर भी कहाँ पीछे रहने वाले थे, उन्होने भी ख़ूब आतिशबाज़ियाँ की। पर सहवाग की सुलगती पारी का जल्द ही अन्त हुआ और ” द वॉल ” का आगमन हुआ। तेंदुलकर पूरी लय में थे परन्तु एक जबरदस्त कैच ने उनके बढते कदम रोक दिए। तीन विकेट लिकल गए थे और दिल्ली अभी दूर थी, इसलिए युवराज और द्रविड़ ने संभल कर ख़ेलना शुरु किया और युवराज के वापस लौटने तक मामला काफ़ी हद तक अपने हक में आ चुका था। आज ” द वॉल ” सीना ताने ख़ड़ी रही और आख़िर में भारत 5 विकेट से विजयी हुआ, और द्रविड़ को अपने अविजीत 78 रन की वजह से मैन-ऑफ़-द-मैच के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

अब भारतीय रंणबाँकुरे श्रीलंका में टेस्ट श्रृंख़ला के लिए जाएँगे और दक्षिण अफ़्रीका जाएगी आस्ट्रेलिया। उम्मीद है कि भारतीय टीम के प्रर्दशन में कोई कमी न आएगी और श्रीलंका से भी वे विजयी लौटेंगे।


हिन्दी में क्यों?


November 26th, 2005 at 10:00 am | 2 Comments

कुछ लोगों को जिन्हें मैंने इस ब्लाग के बारे में बताया, उनमें से कुछ को तो यह अच्छा लगा, कुछ ने तारीफ़ की तो कुछ ने मुझसे पूछा कि मैंने हिन्दी में लिख़ने का निर्णय क्यों लिया। मेरा उत्तर था कि मैंने हिन्दी भाषा को इसलिए चुना क्योंकि दुर्भाग्यवश मुझे अंग्रेज़ी और हिन्दी के अलावा कोई और भाषा नहीं आती(मैं पहला अवसर मिलते ही इस भूल को सुधारूँगा) और अंग्रेज़ी में तो मैं पहले से ही लिख़ता हूँ। परन्तु इसके आगे विस्तार करते हुए मैंने कहा कि हिन्दी लिख़ने का मेरा अभ्यास लगभग छह वर्षों से छूटा हुआ था और मैं वापस हिन्दी में लिख़ना चाहता था, हालाँकि हिन्दी तो मैं रोज़ ही बोलता-सुनता हूँ किन्तु हिन्दी बोलने में और लिख़ने में बहुत अन्तर है, बोलना बहुत आसान है और लिख़ना उतना ही कठिन है। पर समस्या यह थी कि मुझे हिन्दी टाईपिंग नहीं आती थी, परन्तु देवेंद्र परख़ के हिन्दी-राईटर सॉफ़्टवेयर ने मेरी सारी समस्या ही दूर कर दी।

इस साफ़्टवेयर की सहायता से मैं अंग्रेज़ी के अक्षरों का प्रयोग करके हिन्दी लिख़ सकता हूँ और यह सॉफ़्टवेयर उन अंग्रेज़ी अक्षरों को देवनागरी(यूनिकोड) लिपि में परिर्वतित कर देता है। यूनिकोड में होने के कारण ये हिन्दी के अक्षर विश्वव्यापी हैं क्यों कि इन्हें किसी भी आपरेटिंग सिस्टम पर देख़ा जा सकता है अगर वह यूनिकोड को पहचानता है और आज के लगभग सभी आपरेटिंग सिस्टम यूनिकोड को पहचानते हैं, तो इस लिए न किसी ख़ास फ़ाँट की ज़रूरत है(सिवाय एक यूनिकोड फ़ाँट के) और न किसी उलजलूल पेंतरे की, क्योंकि किसी भी भाषा को ब्राउज़र में दिख़ाना कठिन हो जाता है यदि उसकी लिपि अंग्रेज़ी लिपि से भिन्न है और आपको यह मालूम नहीं कि आपके श्रोता के कंप्यूटर में उस लिपि का फ़ाँट उपस्थित है कि नहीं। मैं इस क्षेत्र में कार्य कर चुका हूँ जहाँ मुझे एसी भाषाओं के श्रोताओं के लिए वेबसाईट बनानी पड़ी जिनकी लिपि अंग्रेज़ी से भिन्न थी, जैसे कि जापानी, कोरियाई और चीनी भाषाएँ, इसलिए मुझे ज्ञात है कि भिन्न लिपि का प्रयोग करना और उसे ब्राउज़र में सही दिख़ाना कितना कठिन है।

इन्ही कुछ कारणों से मैंने हिन्दी में लिख़ने का निर्णय लिया, क्योंकि यह ब्लाग ख़ाली पड़ा था और मुझे इसका कोई प्रयोग नहीं सूझ रहा था, तो मैंने सोचा कि इससे बेहतर प्रयोग और क्या हो सकता है!! :)

तो बस यही हैं इस ब्लाग और हिन्दी में लिख़ने के कुछ कारण और विचार। मैं यह नहीं जानता कि मैं कब तक ऐसा कर पाऊँगा, परन्तु मेरा पूरा प्रयत्न होगा, और आगे देख़ा जाएगा!! ;)


टीम इंडिया, वाह भई वाह – भाग 2!!


November 25th, 2005 at 10:00 pm | No Comments
Posted In: Sports, खेल

टीम इंडिया ने आख़िर वह कर दिख़ाया जिसकी मुझे पूरी उम्मीद थी, वो आख़िरकार दक्षिण अफ़्रीका से हार गई। और हारी भी तो कैसे? 10 विकेट से!! पहले तो स्कोर नहीं बनाया, केवल 188 रन पर सिमट गए और उसके बाद तो कमाल ही हो गया, दक्षिण अफ़्रीका ने बिना एक भी विकेट गंवाए भारतीय रणबाँकुरों का मुँह काला कर दिया!! यानि कि बल्लेबाज़ नाकाम, गेंदबाज़ नाकाम और क्षेत्ररक्षण में तो टीम इंडिया की कोई सानी है ही नहीं!! :roll:

तो अब तक जो जिह्वाएँ स्टार कोच और अँबुजा सीमेंट के मज़बूत जोड़ से बने ” द वॉल ” की मज़बूत कप्तानी पर पुष्प वर्षा करते नहीं थक रहीं थी, क्या अब इस शर्मनाक हार के बाद उन्हीं जिह्वाओं से प्रतिवाद का स्वर निकलेगा? :roll: नहीं, मैं नहीं समझता कि ऐसा होगा, होना भी नहीं चाहिए, पर लोगों में कम से कम इतनी अक्ल तो आनी चाहिए कि कोई एक ही रात में तोप नहीं हो जाता और हमारे विश्व-कप विजेता कप्तान कपिल देव भी यही कहते हैं, कि नए कोच और नए कप्तान की योग्यता को परख़नें में जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए, वे कितने काबिल हैं यह कुछ समय बाद ही पता चल पाएगा। :)

मेरे अनुसार भारतीय ख़िलाड़ियों को अब अपना ध्यान अठ्ठाईस(28) तारीख़ को मुम्बई में होने वाले आख़िरी मुकाबले पर देते हुए कमर कस लेनी चाहिए, श्रृंख़ला तो अब जीत नहीं सकते, कम से कम हारना तो नहीं चाहिए। जहाँ तक मेरा अनुमान है, मुम्बई की पिच बल्लेबाज़ों के पक्ष में होगी, तो इस लिए आवश्यक हो जाता है कि टीम इंडिया जमकर अफ़्रीकी गेंदबाज़ों की पिटाई करे और एक अच्छा स्कोर खड़ा करे जिसका हमारे गेंदबाज़ ठीक से बचाव कर सकें और श्रृंख़ला को बराबर कर दें। जाहिर सी बात है कि मेरे कहने का अर्थ है कि भारतीय रणबाँकुरों को पहले बल्लेबाज़ी करनी चाहिए और जहाँ तक मैं समझता हूँ, दक्षिण अफ़्रीकी कप्तान स्मिथ कोई मूर्ख़ नहीं है, तो आवश्यक है कि द्रविड़ टॉस भी जीतें, लेकिन इस पर उनका कोई ज़ोर नहीं, तो इस लिए अपनी किस्मत पर भरोसा रख़ें और जहाँ ज़ोर चल सकता है(बल्लेबाज़ी, गेंदबाज़ी और क्षेत्ररक्षण) वहाँ ज़ोर चलाएँ।