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कॉमिक्स से उपन्यास तक…..


February 12th, 2009 | 8 Comments

उपन्यास….. इनको पढ़ना पहली बार तब हुआ जब मैं चौथी या पाँचवीं कक्षा में था। उस समय जिस स्कूल में था वहाँ तो पुस्तकालय के नाम पर एक दड़बा टाइप कमरा था जहाँ कम से कम हम लोगों का प्रवेश वर्जित था। उन दिनों मैं कॉमिक्स पढ़ा करता था। छुट्टियों में नानी जी के घर आया हुआ था तब की बात है, एक दिन मौसी अपने कॉलेज के पुस्तकालय से प्रेमचन्द के दो उपन्यास – गोदान और गबन – लाईं अपने पढ़ने के लिए। एक तो वे पहले से ही पढ़ना आरंभ कर चुकीं थीं तो कौतुहलवश दूसरे को मैंने पढ़ना आरंभ किया, कौन सा पहले पढ़ा यह ध्यान नहीं लेकिन अंत-पंत दोनों पढ़े। उसके बाद सेवासदन और मानसरोवर भी पढ़े, माँ और मौसी हैरानी से देखते थे कि कैसे पढ़ पा रहा हूँ ऐसे गंभीर उपन्यास लेकिन मुझे समझ में यह नहीं आता कि वे इनको इतना हाई-फाई क्यों मानते थे, एक कहानी ही थी और कुछेक चीज़ों को छोड़ सब समझ आ ही रहा था मुझे, मैं तो मात्र एक कहानी के रूप में ही उनको पढ़ रहा था। प्रेमचन्द के चार उपन्यास पढ़ डाले लेकिन लेखन स्टाईल मुझे पसंद नहीं आया, कहानियाँ रोचक न लगीं!!

छठी कक्षा में स्कूल बदला, अब बड़े और औकात वाले स्कूल में दाखिला दिलाया गया था, वहाँ पुस्तकालय बड़ा था, ढेर सारी किताबें थीं, इतनी किताबें मैंने कभी एक जगह नहीं देखीं थी!! पता चला कि सप्ताह में एक पीरियड में हम लोग पुस्तकालय में जाया करेंगे, एक सप्ताह हिन्दी के पीरियड में और एक सप्ताह अंग्रेज़ी के पीरियड में। हिन्दी वाले पीरियड में हिन्दी की कोई भी पुस्तक ले सकते हैं और अंग्रेज़ी वाले पीरियड में अंग्रेज़ी की एक पुस्तक, एक बार में एक ही किताब ले जाने दी जाएगी!! अब स्कूल की किताबों के अतिरिक्त मेरा पाला सिर्फ़ कॉमिक्स से ही पड़ा था या फिर उन कुछ गिनी चुनी टॉलस्टॉय (Tolstoy) आदि की कहानी की किताबों से जो पिताजी ने लाकर दीं थी। इसलिए शुरुआत में थोड़ी असमंजस की स्थिति थी कि क्या लिया जाए, कौन सी किताब लें। साथियों से सुझाव माँगे गए, एक मित्र जी.आई.जो (G.I.Joe) की किताब ले रहा था तो उसने मुझे भी वैसी ही एक किताब थमा दी और बता दिया कि कैसे उसको पढ़ा जाता है। दरअसल वह पुस्तकें एक खेल भी होती थीं, हर पन्ना आदि पढ़ने के बाद निश्चय करना होता था कि पात्र आगे क्या करेंगे और उसके अनुसार पन्ने के अंत में दिए विकल्पों में से एक को चुन निर्धारित पन्ने पर जाना होता था आगे की कहानी के लिए, यदि पाठक सही निर्णय लेता है स्थिति के अनुसार तो वह मिशन के अंत में विजयी होगा अन्यथा हार जाएगा। शुरु में इनको पढ़ने में बहुत मज़ा आता था।

इधर हिन्दी की कक्षा में अध्यापिका ने प्रेमचन्द का ज़िक्र पता नहीं किस बात पर छेड़ा कि वह आधुनिक काल के एक महान उपन्यासकार थे तो मैंने कहा कि मैंने पिछले वर्ष उनके चार उपन्यास पढ़े थे जो कि बिलकुल बोर थे। अध्यापिका के लिए हम सभी नए विद्यार्थी थे इसलिए वह किसी को अधिक न जान पाईं थी, तो उन्होंने सोचा कि मैं खामखा की फेंक रहा हूँ और डपट के मुझे बिठा दिया गया!! इधर कुछ समय बाद एक अन्य सहपाठी ने कहा कि बच्चों की किताबें पढ़नी बंद करूँ और उसने जी.आई.जो (G.I.Joe) की जगह मेरे हाथ में हार्डी ब्वॉयस (Hardy Boys) का एक उपन्यास थमा दिया, तो तब मैंने हार्डी ब्वॉयस के उपन्यास पढ़ने आरंभ किए!! ये किरदार मुझे भा गए, कहानियाँ इनकी रोचक लगने लगीं!!

हार्डी ब्वॉयस के उपन्यासों का रोग तीन वर्ष रहा – कक्षा सात, आठ और नौ तक!! इस दौरान हाल यह था कि अंग्रेज़ी की या हिन्दी की कक्षा में मैं पीछे बैठ जाता और टेबल के नीचे रखकर भी उपन्यास पढ़ता, घर वापसी जाते समय बस में पढ़ता, घर में तो खैर पढ़ता ही था। मज़े की बात यह रही कि कभी कक्षा में उपन्यास पढ़ते हुए पकड़ा नहीं गया!! ;) स्कूल के पुस्तकालय में मौजूद जब सभी हार्डी ब्वॉयस के उपन्यास पढ़ डाले तो उनको बाज़ार से खरीदना आरंभ किया। आठवीं कक्षा में था तब घर बदल लिया गया था और रिहाइश के लिए मौजूदा इलाके में पधार चुके थे, इधर के बड़े बाज़ार में एक खटिया पर एक मद्रासी व्यक्ति किताबें लगाता था, विदेशी उपन्यासों की देशी नकल भी और पुराने उपन्यास भी। तो इसी से रेट सैट किया गया, बीस रूपए में वह हार्डी ब्वॉयस का एक पुराना सेकन्ड हैन्ड उपन्यास देता और दस रूपए में वापस ले लेता, चाहे जितने मर्ज़ी समय बाद वापस करो। तो जो उपन्यास मुझे खासा पसंद आता उसको मैं रख लेता बाकी सभी पढ़-पढ़कर निकालता रहता।

कॉमिक्स वाले किस्से के अंत में मैंने ज़िक्र किया था कि जिससे उस समय कॉमिक्स लाता था उससे हुए मतभेद को लेकर कॉमिक्स पढ़ने का सिलसिला रूक गया था। तो जिस समय मैंने उन मद्रासी बाबू से हार्डी ब्वॉयस के उपन्यास लेने आरंभ किए थे उस समय इस लड़के से परिचय नहीं हुआ था, लेकिन कुछ समय बाद इसकी दुकान का भी पता चला जो कि उसी बाज़ार में अंदर को थी। अब चूंकि यह लड़का ज़रा स्याना था तो इसलिए यह हार्डी ब्वॉयस के उपन्यास पचास रूपए में देता था, तो मैंने उसके रेट को मान लिया लेकिन सैटिंग यह की गई कि चालीस रूपए में उपन्यास वापस लेना होगा जिसको उसने मान लिया। वह सोच रहा था कि मेरे को मूर्ख बना रहा है लेकिन असलियत जान लेता तो अपने बाल नोच लेता। क्यों? वह इसलिए कि मैं बाहर बैठे मद्रासी बाबू से बीस रूपए में हार्डी ब्वॉयस का उपन्यास लेता, उसको आराम से पढ़ता और फिर उसी उपन्यास को मद्रासी बाबू को वापस देने की जगह उस लड़के को चालीस रूपए में दे आता, जिसके बदले कभी उससे रोकड़ा लिया जाता तो कभी कोई दूसरा हार्डी ब्वॉयस का उपन्यास!! अब इसी को तो कहते हैं – आम के आम गुठलियों के दाम!! :D

खैर, नौवीं कक्षा में आने पर स्तर थोड़ा और बढ़ गया था – इस समय अगाथा क्रिस्टी (Agatha Christie) के उपन्यास, खासकर हर्क्यूल पॉयराट (Hercule Poirot) वाले उपन्यास, पढ़ने आरंभ कर दिए। नौवीं कक्षा में आने का एक लाभ यह मिला था कि पुस्तकालय जाने की सप्ताह की बंदिश समाप्त हो गई थी, कभी भी पुस्तकालय जा सकते थे और दो किताबें ला सकते थे, किसी मित्र का कार्ड खाली हुआ तो उस पर भी ले आने की छूट थी। तो नियम से मैं रोज़ाना एक या दो उपन्यास ले जाता और अगले दिन उनको लौटा के दूसरे लेता। और इधर घरवाले परेशान रहते कि लड़का हर समय उपन्यासों में लगा रहता है, स्कूल में जब था तब तो डपट दिया जाता लेकिन कॉलेज में आने के बाद डाँट पड़नी कम हो गई, पढ़ाई हो जाती और इम्तिहान में नंबर आ जाते, तो कैसे उपन्यास पढ़ने से रोका जाए!! लेकिन कॉलेज में आते-२ उपन्यासों का सिलसिला धीरे-२ कम होता गया, कॉलेज पास कर निकला तो सीधे ही नौकरी लगी और उस समय तो सुबह जल्दी जाना और रात देर से आना, पढ़ने का समय ही नहीं मिलता था। कुछ समय बाद दूसरी कंपनी में नौकरी बदली तो समय निकलने लगा और धीरे-२ कर थोड़ा बहुत उपन्यास पठन पुनः आरंभ हुआ।

अब आज भी समय मिलता है तो सप्ताह आदि लगकर उपन्यास समाप्त कर दिया जाता है, लेकिन पढ़ने की जो गति स्कूल के दिनों में थी वह आज नहीं रही है। स्कूली दिनों में रोज़ाना एक या दो उपन्यास निपटा दिए जाते थे, ग्यारवीं कक्षा तक आते-२ पुस्तकालय के सभी उपन्यास पढ़ डाले थे, लेकिन आज सप्ताह दस दिन में उपन्यास समाप्त होता है तो बड़ी बात लगती है!! खैर, उस समय अन्य कोई खास काम नहीं होता था, आजकल ब्लॉगिंग जैसे कीड़े भी पाल रखे हैं तो उनको भी थोड़ा समय चाहिए!!