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कॉमिक्स से उपन्यास तक…..


February 12th, 2009 | 8 Comments

उपन्यास….. इनको पढ़ना पहली बार तब हुआ जब मैं चौथी या पाँचवीं कक्षा में था। उस समय जिस स्कूल में था वहाँ तो पुस्तकालय के नाम पर एक दड़बा टाइप कमरा था जहाँ कम से कम हम लोगों का प्रवेश वर्जित था। उन दिनों मैं कॉमिक्स पढ़ा करता था। छुट्टियों में नानी जी के घर आया हुआ था तब की बात है, एक दिन मौसी अपने कॉलेज के पुस्तकालय से प्रेमचन्द के दो उपन्यास – गोदान और गबन – लाईं अपने पढ़ने के लिए। एक तो वे पहले से ही पढ़ना आरंभ कर चुकीं थीं तो कौतुहलवश दूसरे को मैंने पढ़ना आरंभ किया, कौन सा पहले पढ़ा यह ध्यान नहीं लेकिन अंत-पंत दोनों पढ़े। उसके बाद सेवासदन और मानसरोवर भी पढ़े, माँ और मौसी हैरानी से देखते थे कि कैसे पढ़ पा रहा हूँ ऐसे गंभीर उपन्यास लेकिन मुझे समझ में यह नहीं आता कि वे इनको इतना हाई-फाई क्यों मानते थे, एक कहानी ही थी और कुछेक चीज़ों को छोड़ सब समझ आ ही रहा था मुझे, मैं तो मात्र एक कहानी के रूप में ही उनको पढ़ रहा था। प्रेमचन्द के चार उपन्यास पढ़ डाले लेकिन लेखन स्टाईल मुझे पसंद नहीं आया, कहानियाँ रोचक न लगीं!!

छठी कक्षा में स्कूल बदला, अब बड़े और औकात वाले स्कूल में दाखिला दिलाया गया था, वहाँ पुस्तकालय बड़ा था, ढेर सारी किताबें थीं, इतनी किताबें मैंने कभी एक जगह नहीं देखीं थी!! पता चला कि सप्ताह में एक पीरियड में हम लोग पुस्तकालय में जाया करेंगे, एक सप्ताह हिन्दी के पीरियड में और एक सप्ताह अंग्रेज़ी के पीरियड में। हिन्दी वाले पीरियड में हिन्दी की कोई भी पुस्तक ले सकते हैं और अंग्रेज़ी वाले पीरियड में अंग्रेज़ी की एक पुस्तक, एक बार में एक ही किताब ले जाने दी जाएगी!! अब स्कूल की किताबों के अतिरिक्त मेरा पाला सिर्फ़ कॉमिक्स से ही पड़ा था या फिर उन कुछ गिनी चुनी टॉलस्टॉय (Tolstoy) आदि की कहानी की किताबों से जो पिताजी ने लाकर दीं थी। इसलिए शुरुआत में थोड़ी असमंजस की स्थिति थी कि क्या लिया जाए, कौन सी किताब लें। साथियों से सुझाव माँगे गए, एक मित्र जी.आई.जो (G.I.Joe) की किताब ले रहा था तो उसने मुझे भी वैसी ही एक किताब थमा दी और बता दिया कि कैसे उसको पढ़ा जाता है। दरअसल वह पुस्तकें एक खेल भी होती थीं, हर पन्ना आदि पढ़ने के बाद निश्चय करना होता था कि पात्र आगे क्या करेंगे और उसके अनुसार पन्ने के अंत में दिए विकल्पों में से एक को चुन निर्धारित पन्ने पर जाना होता था आगे की कहानी के लिए, यदि पाठक सही निर्णय लेता है स्थिति के अनुसार तो वह मिशन के अंत में विजयी होगा अन्यथा हार जाएगा। शुरु में इनको पढ़ने में बहुत मज़ा आता था।

इधर हिन्दी की कक्षा में अध्यापिका ने प्रेमचन्द का ज़िक्र पता नहीं किस बात पर छेड़ा कि वह आधुनिक काल के एक महान उपन्यासकार थे तो मैंने कहा कि मैंने पिछले वर्ष उनके चार उपन्यास पढ़े थे जो कि बिलकुल बोर थे। अध्यापिका के लिए हम सभी नए विद्यार्थी थे इसलिए वह किसी को अधिक न जान पाईं थी, तो उन्होंने सोचा कि मैं खामखा की फेंक रहा हूँ और डपट के मुझे बिठा दिया गया!! इधर कुछ समय बाद एक अन्य सहपाठी ने कहा कि बच्चों की किताबें पढ़नी बंद करूँ और उसने जी.आई.जो (G.I.Joe) की जगह मेरे हाथ में हार्डी ब्वॉयस (Hardy Boys) का एक उपन्यास थमा दिया, तो तब मैंने हार्डी ब्वॉयस के उपन्यास पढ़ने आरंभ किए!! ये किरदार मुझे भा गए, कहानियाँ इनकी रोचक लगने लगीं!!

हार्डी ब्वॉयस के उपन्यासों का रोग तीन वर्ष रहा – कक्षा सात, आठ और नौ तक!! इस दौरान हाल यह था कि अंग्रेज़ी की या हिन्दी की कक्षा में मैं पीछे बैठ जाता और टेबल के नीचे रखकर भी उपन्यास पढ़ता, घर वापसी जाते समय बस में पढ़ता, घर में तो खैर पढ़ता ही था। मज़े की बात यह रही कि कभी कक्षा में उपन्यास पढ़ते हुए पकड़ा नहीं गया!! ;) स्कूल के पुस्तकालय में मौजूद जब सभी हार्डी ब्वॉयस के उपन्यास पढ़ डाले तो उनको बाज़ार से खरीदना आरंभ किया। आठवीं कक्षा में था तब घर बदल लिया गया था और रिहाइश के लिए मौजूदा इलाके में पधार चुके थे, इधर के बड़े बाज़ार में एक खटिया पर एक मद्रासी व्यक्ति किताबें लगाता था, विदेशी उपन्यासों की देशी नकल भी और पुराने उपन्यास भी। तो इसी से रेट सैट किया गया, बीस रूपए में वह हार्डी ब्वॉयस का एक पुराना सेकन्ड हैन्ड उपन्यास देता और दस रूपए में वापस ले लेता, चाहे जितने मर्ज़ी समय बाद वापस करो। तो जो उपन्यास मुझे खासा पसंद आता उसको मैं रख लेता बाकी सभी पढ़-पढ़कर निकालता रहता।

कॉमिक्स वाले किस्से के अंत में मैंने ज़िक्र किया था कि जिससे उस समय कॉमिक्स लाता था उससे हुए मतभेद को लेकर कॉमिक्स पढ़ने का सिलसिला रूक गया था। तो जिस समय मैंने उन मद्रासी बाबू से हार्डी ब्वॉयस के उपन्यास लेने आरंभ किए थे उस समय इस लड़के से परिचय नहीं हुआ था, लेकिन कुछ समय बाद इसकी दुकान का भी पता चला जो कि उसी बाज़ार में अंदर को थी। अब चूंकि यह लड़का ज़रा स्याना था तो इसलिए यह हार्डी ब्वॉयस के उपन्यास पचास रूपए में देता था, तो मैंने उसके रेट को मान लिया लेकिन सैटिंग यह की गई कि चालीस रूपए में उपन्यास वापस लेना होगा जिसको उसने मान लिया। वह सोच रहा था कि मेरे को मूर्ख बना रहा है लेकिन असलियत जान लेता तो अपने बाल नोच लेता। क्यों? वह इसलिए कि मैं बाहर बैठे मद्रासी बाबू से बीस रूपए में हार्डी ब्वॉयस का उपन्यास लेता, उसको आराम से पढ़ता और फिर उसी उपन्यास को मद्रासी बाबू को वापस देने की जगह उस लड़के को चालीस रूपए में दे आता, जिसके बदले कभी उससे रोकड़ा लिया जाता तो कभी कोई दूसरा हार्डी ब्वॉयस का उपन्यास!! अब इसी को तो कहते हैं – आम के आम गुठलियों के दाम!! :D

खैर, नौवीं कक्षा में आने पर स्तर थोड़ा और बढ़ गया था – इस समय अगाथा क्रिस्टी (Agatha Christie) के उपन्यास, खासकर हर्क्यूल पॉयराट (Hercule Poirot) वाले उपन्यास, पढ़ने आरंभ कर दिए। नौवीं कक्षा में आने का एक लाभ यह मिला था कि पुस्तकालय जाने की सप्ताह की बंदिश समाप्त हो गई थी, कभी भी पुस्तकालय जा सकते थे और दो किताबें ला सकते थे, किसी मित्र का कार्ड खाली हुआ तो उस पर भी ले आने की छूट थी। तो नियम से मैं रोज़ाना एक या दो उपन्यास ले जाता और अगले दिन उनको लौटा के दूसरे लेता। और इधर घरवाले परेशान रहते कि लड़का हर समय उपन्यासों में लगा रहता है, स्कूल में जब था तब तो डपट दिया जाता लेकिन कॉलेज में आने के बाद डाँट पड़नी कम हो गई, पढ़ाई हो जाती और इम्तिहान में नंबर आ जाते, तो कैसे उपन्यास पढ़ने से रोका जाए!! लेकिन कॉलेज में आते-२ उपन्यासों का सिलसिला धीरे-२ कम होता गया, कॉलेज पास कर निकला तो सीधे ही नौकरी लगी और उस समय तो सुबह जल्दी जाना और रात देर से आना, पढ़ने का समय ही नहीं मिलता था। कुछ समय बाद दूसरी कंपनी में नौकरी बदली तो समय निकलने लगा और धीरे-२ कर थोड़ा बहुत उपन्यास पठन पुनः आरंभ हुआ।

अब आज भी समय मिलता है तो सप्ताह आदि लगकर उपन्यास समाप्त कर दिया जाता है, लेकिन पढ़ने की जो गति स्कूल के दिनों में थी वह आज नहीं रही है। स्कूली दिनों में रोज़ाना एक या दो उपन्यास निपटा दिए जाते थे, ग्यारवीं कक्षा तक आते-२ पुस्तकालय के सभी उपन्यास पढ़ डाले थे, लेकिन आज सप्ताह दस दिन में उपन्यास समाप्त होता है तो बड़ी बात लगती है!! खैर, उस समय अन्य कोई खास काम नहीं होता था, आजकल ब्लॉगिंग जैसे कीड़े भी पाल रखे हैं तो उनको भी थोड़ा समय चाहिए!!


ऑयरन मैन


May 14th, 2008 | 7 Comments

ऑयरन मैन (Iron Man) कॉमिक्स का एक काल्पनिक पात्र है जो कि सुपर हीरो है। मारवल कॉमिक्स(वही कॉमिक्स जिसमें स्पाइडरमैन की कॉमिक्स भी प्रकाशित होती हैं) का यह पात्र वर्षों से बच्चों को मोहित करता आ रहा है, इस पर कार्टून सीरियल भी बने। इस तरह के काल्पनिक कॉमिक्स के पात्रों पर बनी हॉलीवुड की फिल्में मुझे खासी पसंद हैं, स्पाइडरमैन भी पसंद आई, बैटमैन भी पसंद आई, और अब हाल ही में यह ऑयरन मैन भी रिलीज़ हुई।

एक शुक्रवार आशीष से पूछा कि चलेगा क्या देखने तो उत्तर मिला कि वो अपनी एक मित्र से भी पूछ लेगा और टिकट खुद ही बुक करवा लेगा, मुझे क्या आपत्ति हो सकती थी तो मैंने कह दिया ठीक है। अगले दिन शनिवार को मैं एक साहब से मिलने क्नॉट प्लेस गया और हम वहाँ केएफ़सी (KFC) में बैठे भोजन के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे कि आशीष बाबू का फुनवा आया और बाबू साहब फरमाए कि तीन टिकट मैं बुक कराऊँ क्योंकि उनके सदाबहार गुड़गाँव में बिजली नहीं है(हैवल्स के पंखे नहीं लगा रखे होंगे)!! एक बार तो मैं झल्ला गया कि मैं घर से बाहर हूँ, पास में लैपटॉप भी नहीं है इंटरनेट कनेक्शन के साथ, कैसे टिकट कराई जाए!! :mad: फिर ध्यान आया कि कुछ समय पहले मैंने बुकमाईशो.कॉम का मोबाइल सॉफ़्टवेयर अपने फोन में डाला था, इंटरनेट कनेक्शन तो मोबाइल में है ही, तो बस तुरंत मोबाइल निकाला और टिकट बुक करा दी। :evil: (इस मोबाइल सॉफ़्टवेयर के बारे में जल्द ही पोस्ट ठेली जाएगी यहाँ पढ़ें) गनीमत थी कि हमारे हिसाब से माकूल समय के शो के लिए सिनेमा में पीछे की कतार में लगभग बीच की तीन सीटें खाली थी जो कि मैंने तुरंत बुक कर दी वर्ना हाउस फुल तो लगभग हो ही गया था!! ;) :cool:

सैम रैमी द्वारा निर्देषित स्पाइडरमैन (Spiderman) तथा क्रिस्टोफ़र नोलन द्वारा निर्देषित बैटमैन बिगिन्स (Batman Begins) की ही भांति यह फिल्म भी लगता है निर्देषक जॉन फावेरियू द्वारा एक सीरीज़ की शुरुआत है और इस फिल्म में ऑयरन मैन के बनने की कहानी है।

फिल्म में दर्शाया है कि कैसे हथियार और उनकी टेक्नॉलोजी को विकसित करने वाली कंपनी का बेहतरीन दिमाग वाला एक ऐय्याश अरबपति मालिक ऐय्याशी भरी ज़िंदगी जी रहा होता है जब उसे अफ़ग़ानिस्तान जाकर अमेरिकी सेना को एक नई मिसाइल दिखानी होती है और वहीं उस पर आतंकवादियों द्वारा हमला होता है जिसमें उसी की कंपनी के हथियार प्रयोग किए जाते हैं और वह इस कदर ज़ख्मी हो जाता है कि उसके बचने की संभावना ही नहीं होती लेकिन आतंकवादियों को वह ज़िंदा चाहिए होता है ताकि वे उससे वह मिसाइल बनवा सकें इसलिए उनकी गिरफ़्त में मौजूद एक डॉक्टर उसे जुगाड़ लगा के बचा लेता है, उसके दिल के पास एक इलैक्ट्रोमैग्नेट लगा दी जाती है जिससे बम फटने से उसके खून में मिल गए लोहे के महीन टुकड़े उसके दिल को न भेद सकें। लेकिन अपना हीरो मिसाइल बनाने की जगह कुछ और बना डालता है, एक ऐसा लौह कवच जो उसकी आतंकवादियों की गिरफ़्त से निकलमें में सहायता करेगा।

निकल भागने की कोशिश में वह लौह कवच तो नष्ट हो जाता है लेकिन कहानी के हीरो टोनी स्टॉर्क (Tony Stark) को एक दिशा मिल जाती है और उसके दिमाग में इंजीनियर का कीड़ा कुलबुला उठता है। वापस अमेरिका पहुँच वो इसी काम में लग जाता है। अंत में ऑयरन मैन का जो लाल-सुनहरा कवच बन के तैयार होता है वह बहुत ही मोहक लगता है। फिल्म में अभिनेता रॉबर्ट डाऊनी जूनियर (Robert Downey Jr.) ने अच्छा अभिनय किया है, अन्य सुपर हीरो फिल्मों की तरह एकदम संजीदा किरदार नहीं निभाया है वरन्‌ मज़ाक करने वाला एक खुशमिजाज़ टाइप बंदे का अभिनय किया है। लोकेशन भी इस फिल्म में अभी तक की आई सुपर हीरो फिल्मों से थोड़ा हटकर रही हैं, इसमें न्यू यार्क स्टाइल आसमान छूती इमारतें और उनके बीच गुण्डों से कबड्डी खेलता सुपर हीरो नहीं दिखाया गया है। :D ग्वेनेथ पॉल्ट्रो (Gwyneth Paltrow) ने टोनी स्टॉर्क की असिस्टेन्ट पैप्पर पॉट्स (Pepper Potts) का किरदार किया है और एक बार फिर ग्वेन के अभिनय ने निराश ही किया है। वैसे इस फिल्म में ग्वेन को अभिनय के लिए अधिक स्कोप नहीं मिला है तो इसलिए इस बार के खराब अभिनय को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है।

एक चीज़ जो मुझे हॉलीवुड की फिल्मों में अच्छी लगती है वह यह कि वे लोग फिल्म में बढ़िया तकनीक का प्रयोग करते हैं, स्पेशल इफेक्ट्स और साऊंड उच्च क्वालिटी की होती हैं और इस मामले में इस फिल्म ने भी निराश नहीं किया है। :) ज़हीन लोगों को इस फिल्म की कहानी में कदाचित्‌ दम न लगे लेकिन सुपर हीरो वाली फिल्में फिर वैसे भी उनके लेवल की नहीं होती हैं। फिल्म के दो मुख्य किरदारों, रॉबर्ट डाऊनी जूनियर और जेफ़ ब्रिजिस (Jeff Bridges) (जो कि विलेन बने हैं), ने अपने पात्रों के साथ नाइंसाफ़ी बिलकुल नहीं की है और दमदार अभिनय किया है। तीसरे मुख्य किरदार ग्वेनेथ पॉल्ट्रो का अभिनय नज़रअंदाज़ किया जा सकता है। एक और किरदार है लेफ्टिनेन्ट कर्नल जिम रोड्स का जिसे टेरेन्स हॉवर्ड (Terrence Howard) ने निभाया है जो कि कहानी में टोनी स्टॉर्क के अज़ीज़ मित्र का किरदार है, इस किरदार में भी काफी दम है जो कि आगे की फिल्मों में दिखाई देगा यदि फिल्में अभी तक की ऑयरन मैन कॉमिक्स की कहानी पर ही चलती हैं तो, फिलहाल इस फिल्म में टेरेन्स को भी अधिक पंख फैलाने का मौका नहीं मिला तो उनके बारे में कुछ कहना जायज़ न होगा।

 
कुल मिलाकर एक बढ़िया फिल्म है, जिन लोगों को सुपर हीरो वाली और कॉमिक्स किरदारों की फिल्में पसंद हैं उनको अवश्य देखनी चाहिए, ऑयरन मैन के चाहने वालों ने तो अब तक खैर देख ही ली होगी। :) :tup:


कॉमिक्स कॉमिक्स और कॉमिक्स


March 10th, 2008 | 24 Comments

परसों बताए रहे कि अपनी कॉमिक्स की लत की शुरुआत कैसे हुई।

पर हालात उस समय इतने भी बुरे नहीं हुए थे, शुरुआती दौर था, संक्रमण धीरे-२ बढ़ रहा था। अब मन में होता कि जेब खर्च बचाओ, होली-दीवाली पर जो पैसे मिलते उनको भी बचाओ और फिर सस्ते में पुरानी कॉमिक्स लाओ। डॉयमण्ड के चाचा चौधरी, बिल्लू, पिंकी और राजन इकबाल को जल्द ही विदा कह आगे बढ़े, तुलसी कॉमिक्स से उन दिनों तीन किरदार आते थे रेगुलर – जम्बू, तौसी और अंगारा।

जम्बू
मानव बुद्धि से युक्त रोबॉट – जम्बू

तुलसी कॉमिक्स उपन्यासकार वेद प्रकाश शर्मा का प्रकाशन थी शायद और यह जम्बू किरदार भी जिसमें दिमाग मनुष्य का लगा था और जो बाकी रोबॉट था और सुपर-हीरो था, सबकी वाट लगा सकता था। इसको कुछ समय तक पढ़ा लेकिन मज़ा न आया तो इसे भी पढ़ना छोड़ दिया। अन्य किरदार था तुलसी का – तौसी – जो कि पाताल लोक में नागलोक का राजा और इच्छाधारी सर्प था। इसकी कॉमिक्स में मज़ा आता था, बाद में इसके बेटे का किरदार भी आया लेकिन पता नहीं क्यों इसकी अधिक कॉमिक्स नहीं आई। तुलसी का तीसरा और अंतिम किरदार जो मैंने पढ़ा वह था अंगारा जिसे कि किसी वैज्ञानिक ने अलग-२ जानवरों के तत्वों से बनाया था, चमड़ी जिसकी गैंडे की थी जिस पर गोलियाँ बेअसर थीं, शक्ति हाथी की थी, फुर्ती चीते की थी और आँखें गिद्ध की थी। यानि कि जेनेटिक्स का कुछ फ्यूचरिस्टिक सा कमाल था, सोचने में बेशक वाहियात लगे लेकिन इसकी कॉमिक्स पढ़ने में खूब मज़ा आता था!! :) इसी समय में परिचय हुआ मनोज कॉमिक्स के किरदार राम-रहीम की जोड़ी से जो कि मनोज कॉमिक्स में इकलौता किरदार था जो मुझे पसंद आया।

खैर, अब इनसे आगे बढ़ अपन आए राज कॉमिक्स पर। राज कॉमिक्स में मुख्य किरदार थे बांकेलाल, भोकाल, नागराज और सुपर कमांडो ध्रुव; बाकी के किरदार इन्होंने बाद में समय के साथ जोड़े। सीधे-२ समझ आता था कि नागराज की प्रेरणा स्पाईडरमैन से मिली और सुपर कमांडो ध्रुव का प्रेरणा स्रोत बैटमैन रहा।

राज कॉमिक्स के किरदार
राज कॉमिक्स के किरदार



एक अन्य किरदार जो याद आ रहा है जिसको राज कॉमिक्स में बाद में बंद कर दिया गया वह था अश्वराज, अश्वलोक का सम्राट इच्छाधारी अश्व। इसकी कॉमिक्स शुरु में अच्छी आती थी लेकिन स्टोरीलाइन बाद में कुछ ज़्यादा ही वाहियात हो गई जिसके कारण कदाचित्‌ इसकी कॉमिक्स आनी बंद हो गई। खैर तो अपन राज कॉमिक्स में बांकेलाल, भोकाल, नागराज और सुपर कमांडो ध्रुव की कॉमिक्स पढ़ने लगे। मोहल्ले के अन्य रसिया लड़कों से कॉमिक्स अदल-बदल के भी पढ़ते। उस रेहड़ी वाले से पता नहीं कितनी ही कॉमिक्स लाकर पढ़ी, जो कुछ ज़्यादा ही पसंद आती वह अपने पास रख लेता अपने कलेक्शन में और बाकी वापस चली जाती उसके पास। जल्द ही उसकी सारी पुरानी कॉमिक्स का कोटा समाप्त हो गया, यानि कि मैंने पढ़ डाला; तो अब एक ही मार्ग बचा दिखाई दिया, नई कॉमिक्स खरीदने का!! पापा जिस किताब वाले से अपनी पत्रिकाएँ लाते उसके पास नई कॉमिक्स के सैट तो आते लेकिन जल्दी नहीं आते थे!! फिर दूसरी गली में कुछ लड़कों से दोस्ती हुई, उनमें एक मेरी ही तरह कॉमिक्स का रसिया था तो उसने बताया कि यदि कॉमिक्स का नया सैट रिलीज़ होते ही चाहिए तो रेलवे स्टेशन के अंदर प्लैटफॉर्मों पर मौजूद बुक-स्टॉलों पर जाया करूं क्योंकि उनके पास माल जल्दी आता है।

अब मेरे घर से नई दिल्ली रेलवे स्टेशन कोई एक-डेढ़ किलोमीटर था सिर्फ़, परन्तु जाने में हिचक थी। एक दिन उस लड़के के साथ शाम को लगभग तीन-चार बजे मैं निकल लिया, पैदल ही हम लोग स्टेशन उस ओर से पहुँचे जहाँ डाक आदि और कारगों वगैरह जमा होता था आगे ट्रेनों में चढ़ने के लिए। जिस द्वार से यात्री बाहर आते थे उस द्वार से हम चुपके से अंदर खिसक गए क्योंकि उस समय वहाँ टिकट चैक करने वाला नहीं खड़ा था। अंदर पहुँच पहले ही प्लैटफॉर्म पर एक बड़ा सा बुक स्टॉल था जिसके पास कई सारी कॉमिक्स थीं, नया सैट भी उसके पास आ गया था जो कि अपने मोहल्ले के किताब वाले के पास नहीं आया था, तो उससे नई कॉमिक्स ले ली गई। उसके बाद तो मैं अकेला ही चला जाता और कॉमिक्स ले आता था। :)

यह सब तो ठीक परन्तु नई कॉमिक्स महंगी आती थीं, आठ रुपए की पतली वाली और सोलह रुपए की मोटी वाली आती थी, और जेबखर्च था कि महंगाई के साथ बढ़ा नहीं था, तो इसलिए जुगाड़ भी करने पड़ते थे। शाम के समय किसी दूसरी ओर के प्लैटफॉर्म पर जाता जहाँ अधिक भीड़ न होती और बुक स्टॉल पर तो दुकानदार के अतिरिक्त कोई होता ही नहीं। वहाँ कॉमिक्स के बंडल में कॉमिक्स छांटने के बहाने द्रुत गति से कॉमिक्स पूरी ही पढ़ डालता, उस समय तक तो माशा-अल्लाह पढ़ने की स्पीड इतनी हो गई थी कि जितनी देर में दुकानदार को शक होता उससे पहले ही अपन कॉमिक्स पढ़ डालते और फिर एकाध कॉमिक्स छांट के उलट-पलट के देखता और वापस आ जाता। जब खरीदता तब भी यही जुगाड़ लगाया जाता, एक कॉमिक्स खरीदी तो उसके साथ एक वहीं पढ़ भी ली जाती। अब दुकानदार इतना बेवकूफ़ तो था नहीं, ताड़ ही गया जल्दी ही, लेकिन चूंकि मैं कॉमिक्स खरीदता भी था तो उसको कोई आपत्ति नहीं थी यदि वहीं खड़े-२ एकाध पढ़ भी लेता हूँ तो(वो समझता था कि मैं सिर्फ़ थोड़ी सी पढ़ के देख रहा हूँ कि कॉमिक्स अच्छी है कि नहीं)!! ;) :D कॉमिक्स की कीमत कम करने का भी जुगाड़ निकाल लाया, दूसरे मोहल्ले में एक किताब वाले को सैट किया, उसको नई नकोर कॉमिक्स मैं पढ़ के कॉमिक्स के तीन चौथाई मूल्य पर बेच देता था, थोड़ा महंगा सौदा पड़ता लेकिन फिर भी सही था, कम से कम पूरी कीमत तो अपनी जेब से न जाती थी, तो फालतू कॉमिक्स जो खास पसंद न आती वो उसको बेच देता था।

स्कूल की छुट्टी होने पर नानी जी के घर जाता तो वहाँ भी कॉमिक्स चाहिए थी, तो वहाँ भी एक कॉमिक्स का जुगाड़ देखा, एक अंकल शाम को दुकान खोलते थे और उनके पास पुरानी कॉमिक्स किताबों आदि का खूब ढेर था तो उनसे किराए पर कॉमिक्स लाकर खूब पढ़ी!! जब उन्होंने दुकान बढ़ा दी तो एक अन्य दुकान ढूँढी कॉमिक्स के लिए ताकि जब भी नानी जी के घर जाऊँ तो कॉमिक्स की कमी न खले। ;)

जब मैं सातवीं या आठवीं कक्षा में था तब उस समय मेरे पास मोहल्ले में कॉमिक्स का सबसे बड़ा कलेक्शन था, तकरीबन डेढ़ हज़ार नई-पुरानी कॉमिक्स जिनको मैंने लगभग चार सालों में इकट्ठा किया था!! :) लेकिन फिर कुछ कॉमिक्स चूहे कुतर गए, घर बदला तो कई सारी फट गई। नानी जी के घर के पास घर लिया तो इधर जिससे कॉमिक्स किराए पर लाता था उसको कई सारी कॉमिक्स बेच दी, मन बहुत दुखी हुआ था उस समय लेकिन रखने की जगह नहीं थी और फटवाने से अच्छा था कि उनको ऐसे व्यक्ति को दे दिया जाए जो कम से कम थोड़ी तो उनकी कद्र करेगा। कुछेक कॉमिक्स आज भी घर में कहीं किसी कोने में एक बोरे में दबी पड़ी होंगी क्योंकि सभी तो मैंने ठिकाने नहीं लगाई थीं। :)

मेरा कॉमिक्स पढ़ने का सिलसिला 2003-2004 में बंद हुआ। उस समय मैं जिससे कॉमिक्स किराए पर लाता था वह लड़का(लगभग मेरी ही उम्र का था) कुछ ज़्यादा ही स्याना बनता था अपने को(जबकि उसको मैंने कई बार शेन्डी लगाई थी, कैसे यह फिर कभी) और किराए के औने-पौने दाम अपनी मर्ज़ी से लगाने लगा था, इसी गड़बड़ पर आखिर एक दिन उससे मेरी बहस हो गई और मैंने उसके पास जाना ही बंद कर दिया। अभी हाल ही में एक अन्य स्टॉल पर एक अंकल जी से पत्रिकाएँ आदि लेता हूँ तो उन्होंने कॉमिक्स रखनी शुरु की तो पढ़ने का सिलसिला फिर चल निकला है, जब वे कॉमिक्स लाते हैं तो अपन भी पढ़ लेते हैं!! :)


दिन तो वो भी थे


March 8th, 2008 | 3 Comments

चिट्ठाकार गूगल समूह में कॉमिक्स की बात क्या चली कि सभी को अपने दिन याद आ गए। इससे पहले तकरीबन दो साल पहले प्रतीक बाबू ने अपने अड्डे पर पोस्ट ठेल के सबको दिन याद दिलाए थे। पर इस बार तो यह शायद मियादी बुखार की तरह फैले, जीतू भाई और रवि जी अपने-२ अड्डों पर पोस्ट ठेल चुके हैं, एक मैंने भी यहाँ यह ठेल दी है, आगे पता नहीं कौन-२ चपेट में आता है। ;)

हाँ तो अब जीतू भाई तथा रवि जी तो ठहरे बुजुर्ग लोग, बाबा आदम के ज़माने की बातें बता रहे हैं इंद्रजाल कॉमिक्स आदि की(अपने टैम में तो न इंद्र शेष रहे न ही उनका जाल) तो मेरे जैसे छोकरों को भी पढ़ मज़ा आ गया कि अपने टैम में ये लोग कैसे-२ कांड(रवि जी तो शरीफ़ इंसान हैं, सिर्फ़ जीतू भाई) किए रहे!! ;) खैर, अपन भी इनके बाद के समय के हैं तो कम तो किसी हालत में न थे। :evil:

फौलादी सिंह
वैज्ञानिक शक्तियों से लैस – फौलादी सिंह

तो हुआ यूँ कि मेरे को कॉमिक्स का पहली बार पता चला जब मैं तीसरी कक्षा में पढ़ता था; तब तक मैं बहुत सीधा-साधा था और बुरी लतों(जैसे कॉमिक्स पढ़ना) का कोई अनुभव न होने के कारण उल्टी-सीधी हरकतों से बचा हुआ था। एक दिन कॉमिक्स का पता चला(अब याद नहीं कैसे) कि ये अख़बार में आती हैं तो अख़बार में उनको देखता, पढ़ने में तो कोई इतनी रुचि नहीं थी तो सिर्फ़ चित्र देख समझता था कि क्या है। फिर पता चला कि घर के पास वाले एक दुकानदार का लड़का अपनी कॉमिक्स किराए पर देता है, तो जाकर पचास पैसे प्रति कॉमिक की किराए दर पर एक-दो कॉमिक्स घर लाया, किस किरदार की थी यह पता नहीं बस पन्ने उलटने लगा। माँ ने कहा भी कि ये क्या लाया हूँ और बिना पढ़े क्यों पन्ने पलट रहा हूँ तो डाँट से बचने के लिए कह दिया कि सब समझ आ रहा है। एक बार लाकर दोबारा मन न हुआ कॉमिक्स लाने का; आखिर रोज़ का एक रुपया जेबखर्च मिलता था सिर्फ़ और उसमें ऐसे कॉमिक्स पढ़ डाली तो कैसे चलता, टॉफी कहाँ से आती फिर, क्योंकि तीसरी कक्षा में आते ही जेबखर्च मिलना शुरु हुआ था और माँ ने बाज़ार में टॉफियाँ आदि दिलाना लगभग बंद कर दिया था(पहले ही यह कह कम दिलाती थीं कि दांत खराब हो जाएँगे)। पापा के साथ अलग बात थी, उनके साथ कभी बाज़ार निकल लेता था(बहुत मेहनत का और कष्टकारी काम था, छुट्टी वाले दिन सुबह-२ सात बजे उठ के जाना पड़ता था क्योंकि वे उसी समय जाते थे) तो फिर चॉकलेट से कम में तो टलता ही न था!! :D खैर, एक दिन चाचा चौधरी की एक कॉमिक्स मोहल्ले के किसी लड़के से पढ़ने को मिल गई, मोटी डाइजेस्ट थी, तो उसे पढ़ा। पढ़कर मज़ा आया तो बचाए हुए जेबखर्च में से पैसे खर्च कर किराए पर चाचा चौधरी, पिंकी, बिल्लू की कॉमिक्स पढ़ने लगा, पर उस दुकानदार के लड़के के पास अधिक कॉमिक्स नहीं थी और जल्द ही वह अपने लिए बेकार हो गया, आजू-बाजू कोई अन्य कॉमिक्स न बेचता था न ही किराए पर देता था।

कुछ दिन बाद दुविधा का समाधान तब हुआ जब मैं और मोहल्ले का एक लड़का थोड़ी दूर दूसरे मोहल्ले में घूम रहे थे और एक रेहड़ी पर दुकान लगाए व्यक्ति को देखा जो कि हर तरह का सामान बेच रहा था – कंघी, शीशे, रुमाल, चेन, पर्स आदि। उसके पास कॉमिक्स दिखी तो उससे बात की, उसने किराए पर देने से साफ़ मना कर दिया, पुरानी कॉमिक्स उसके पास थीं जिनको वो सस्ते में देने को तैयार था। मरते क्या न करते, उससे एकाध कॉमिक्स खरीद ली। उसने आश्वासन दिया कि जब हम इनको पढ़ लें तो उसको ये कॉमिक्स वापस कर सकते हैं, दो रुपए प्रति कॉमिक्स वह काट के वापस ले लेगा और बदले में दूसरी कॉमिक्स दे देगा, यह सुन हमने राहत की सांस ली।

अगले कुछ महीनों में डॉयमण्ड कॉमिक्स के किरदार चाचा चौधरी, पिंकी, बिल्लू, ताऊजी, राजन इकबाल और फौलादी सिंह पढ़े। फौलादी सिंह कुछ सुपरमैन टाइप किरदार था जिसकी साइंस फिक्शन कॉमिक्स होती थी जिनमें विलेन हमेशा कोई न कोई परग्रही ऐलियन होता था। इसका जोड़ीदार होता था लम्बू नाम का किरदार जो कि साइज़ में इतना छोटा था कि एक हथेली पर खड़ा हो जाए पर जिसके शरीर का घनत्व इतना था कि पूछो ही मत!! :) इनको वैज्ञानिक शक्तियाँ देने वाले और इनके सहायक थे एक प्रोफेसर साहब और ये लोग एक टापू पर अपना मुख्यालय बनाए हुए थे।

ताऊजी
जादुई चमत्कारों वाले – ताऊजी

ऐसे ही एक अन्य किरदार जो पसंद था उनका नाम था ताऊजी। इनकी कॉमिक्स में थोड़ा जादू-टोना होता था, ताऊजी भी तंतर-मंतर के जानकार थे और पास में था एक जादुई डंडा जो अच्छे अच्छों को डंडा दे सकता था। ताऊजी के साइडकिक का नाम याद नहीं आ रहा पर उसकी दाढ़ी खूब लंबी हो सकती थी, जादुई थी और कटती नहीं थी किसी चीज़ से। सोचो यदि इस दाढ़ी के बालों का प्रयोग पतंग उड़ाने के लिए किया जाता तो होती किसी की मजाल कि पतंग काट हमें “आई वो काटा” कह जाता!! ;)

खैर, तो अपन उस रेहड़ी वाले से कॉमिक्स लाते रहे, लेकिन दो रुपए प्रति कॉमिक्स देना बहुत भारी लगता था तो उसका जुगाड़ यह निकाला गया कि साथ के अन्य लड़कों को कॉमिक्स पढ़ाई जाती और उनसे हर कॉमिक्स के लिए एक अठन्नी ली जाती, इससे हमारे दो रुपए वसूल हो जाते क्योंकि तीन-चार लड़कों को तो पढ़ा ही देते थे। लेकिन ये पढ़ाने का सिलसिला ज़्यादा न चला तो उसके बाद पैसे अपनी जेब से ही दिए, इसलिए जेबखर्च में पैसे बचाने की आदत डाली। घर में यदि माँ से कॉमिक्स के पैसे माँगता तो डर था कि पापा से न कह दें और यदि पापा को कह दिया तो पापा ने सीधा कान के नीचे एक ज़ोरदार बजाना था और बोलना था

कमबख्त, पढ़ाई लिखाई होती नहीं और कॉमिक्स में लगा रहता है

और फिर कहीं हफ़्ते भर के लिए घर से निकलना बंद न हो जाए, बस यही सोच सिहरन दौड़ जाती बदन में और इसलिए न माँ से पैसे माँगे और पापा से तो कहने का मतलब ही नहीं था। अब ऐसा भी नहीं था कि पापा से पिटाई ही होती थी, पापा का मामला ज़रा एक्सट्रीम केस वाला था, गलत बात(उनकी नज़र में) पर जहाँ पिटाई तुरंत होती थी(गालियाँ बोनस में) वहीं मूड में होते थे तो फरमाईश भी जल्दी पूरी होती थी, यानि कुछ-२ कह लो भोले भंडारी शिव की तरह – नाराज़ हुए तो तांडव और खुश हुए तो मुँह माँगा वरदान, इसलिए पापा से मैं कुछ उनका मूड देखकर ही बोलता था, फरमाईश पूरी हो या न हो लेकिन पिटाई करवाने का मैं खास तमन्नाई नहीं होता था। ;) तो ऐसे ही एक बार की बात है, छुट्टी का दिन था और शाम को पापा बाज़ार जा रहे थे तो मैं भी उनके साथ हो लिया, वे अपने किताब-मैगज़ीन वाले के पास पहुँचे अपनी महीने की पत्रिकाएँ और उपन्यास लेने तो मेरी नज़र जम्बू की (नई)कॉमिक्स पर पड़ी तो बस वहीं ज़िद पकड़ ली कि कॉमिक्स दिलवाई जाए। अब पापा मूड में थे(तभी तो मैं उनके साथ बाज़ार आया था) इसलिए थोड़ी ज़िद में पसीज गए और उस शाम मैं घर वापस बहुत खुशी-२ आया कि नई कॉमिक्स मिल गई और मेरी जमापूंजी में भी कोई कमी नहीं आई, माँ ने कॉमिक्स देखी तो उनकी भृकुटी चढ़ी और पापा से जवाब तलबी हुई कि काहे कॉमिक्स दिलाई तो पापा ने भी कंधे उचका दिए जैसे बोलना चाह रहे हों कि क्या करता ये तो वहाँ पसर गया था और लिए बिना टल नहीं रहा था!! ;)

अरे, बतियाते-२ इतना समय हो गया पता ही नहीं चला!! चलिए इस बारे में अगले भाग में आगे बतियाएँगे, प्रतीक्षा कीजिए। किस्सा-ए-कॉमिक्स यहाँ जारी है :)