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बेक़रार करके हमें यूँ न जाईये …..


February 19th, 2008 | 2 Comments

पिछला जो गाना अपने मोबाइल की रिंग बैक टोन/कॉलर ट्यून के रूप में सैट किया था वो माता जी को पसंद नहीं आया, बोलीं कि क्या रोता सा गाना लगा रखा है कुछ अच्छा सा खुशनुमा गीत लगाऊँ। तो मैं भी सोच में पड़ गया कि गाना तो बढ़िया है परन्तु जंच नहीं रहा, ऐसा एकाध मित्र ने भी कहा। तो अपन पुनः पहुँचे एमटीएनएल की प्लेट्यून्स वेबसाइट पर और लगा पुनः तलाशने किसी ढंग के गाने को। आजकल के जो नए गाने उसमें उपलब्ध हैं वो कुछ खास पसंद न आए तो पुराने गाने सुनने लगा। मन्ना डे, हेमंत कुमार और किशोर कुमार के कई गाने सुनने के बाद आखिरकार एक गाना पसंद आया हेमन्त कुमार का गाया हुआ सन्‌ 1969 में आई फिल्म खामोशी का – तुम पुकार लो

तुम ऽऽऽ पुकार लो, तुम्हारा इंतज़ार है,
तुम ऽऽऽ पुकार लो।
ख़्वाब चुन रही है रात बेक़रार है,
तुम्हारा ऽऽ इंतज़ार है,
तुम ऽऽऽ पुकार लो।

होंठ पे लिए हुए दिल की बात हम,
जागते रहेंगे और कितनी रात हम। – २
मुक़्तसर सी बात है तुम से प्यार है
तुम्हारा ऽऽ इंतज़ार है,
तुम ऽऽऽ पुकार लो।

दिल बहल तो जाएगा इस ख्याल से,
हाल मिल गया तुम्हारा अपने हाल से। – २
रात ये क़रार की बेक़रार है,
तुम्हारा ऽऽ इंतज़ार है।

गुलज़ार साहब का लिखा हुआ यह गीत बहुत सुंदर है। उनके लिखे गए जो गीत मैंने अभी तक सुने हैं उनमें एक बात देखी है, बोल अधिक नहीं होते हैं और गीत छोटा ही होता है, जिस भी फिल्म के लिए लिखते हैं तो अधिक नहीं लिखते हैं लेकिन गीत सारे एक से बढ़कर एक बढ़िया और सुन्दर होते हैं – गोया मतलब यह है कि वे मात्रा से अधिक गुणवत्ता पर ध्यान देते हैं। :) इस गाने का वीडियो आप यहाँ देख सकते हैं

खैर, पंगा यह कि गाना यह भी खुशनुमा नहीं, तो इसलिए तलाशते हुए दूसरे गाने पर निगाह और कान गए, यह था सन्‌ 1962 में आई विश्वजीत और वहीदा रहमान की फिल्म बीस साल बाद के गीत “हमको बेक़रार करके यूँ न जाईये” जो कि पुनः हेमन्त कुमार द्वारा गाया एक खूबसूरत गीत है जिसको शकील बदायुनी ने लिखा था।

बेक़रार करके हमें यूँ न जाईये,
आपको हमारी कसम लौट आईये। – २

देखिए वो काली काली बदलियाँ,
ज़ुल्फ़ की घटा चुरा न लें कहीं,
चोरी चोरी आ के शोख बिजलियाँ,
आपकी अदा चुरा न लें कहीं,
यूँ कदम अकेले न आगे बढ़ाईये,
आपको हमारी कसम लौट आईये।

बेक़रार करके हमें यूँ न जाईये,
आपको हमारी कसम लौट आईये।

देखिए गुलाब की वो डालियाँ,
बढ़के चूम लें न आपके कदम। – २
खोए खोए भंवरें भी हैं बाग़ में,
कोई आपको बना न ले सनम,
बहकी बहकी नज़रों से खुद को बचाईये,
आपको हमारी कसम लौट आईये।

बेक़रार करके हमें यूँ न जाईये,
आपको हमारी कसम लौट आईये।

ज़िंदगी के रास्ते अजीब हैं,
इनमें इस तरह चला न कीजिए,
खैर है इसी में आपकी हुज़ूर,
अपना कोई साथी ढूँढ लीजिए,
सुन के दिल की बात न मुस्कुराईये,
आपको हमारी कसम लौट आईये।

बेक़रार करके हमें यूँ न जाईये,
आपको हमारी कसम लौट आईये। – २

कॉलर ट्यून में इस गाने का सैम्पल सुनने के बाद ये इतना पसंद आया कि यूट्यूब पर इसका वीडियो खोजा और पूरा गाना सुना और देखा। ये गाना अपने को बहुत सही लगा, खुशनुमा का खुशनुमा भी है, तो इसको अब अपनी कॉलर ट्यून के रूप में सैट कर लिया। :D आप इस गाने का वीडियो यहाँ देख सकते हैं


आज पुरानी राहों से …..


February 12th, 2008 | 5 Comments

कल रात यूँ ही एमटीएनएल (MTNL) प्लेट्यून वेबसाइट देख रहा था कि कोई ढंग का गाना वहाँ आ गया हो तो उसको अपनी रिंग बैक टोन (Ring Back Tone) के तौर पर सैट कर लूँ। रिंग बैक टोन वह होती है जो आपको तब सुनाई देती है जब आप किसी फोन नंबर को डायल करते हैं और कॉल मिलाए गए नंबर से कनेक्ट होती है। यह टोन फोन मिलाने वाले को अपने रिसीवर में तब तक सुनाई देती है जब तक दूसरे छोर पर फोन रिसीव नहीं किया जाता। अब मोबाइल ऑपरेटर आदि काफ़ी समय से डिफॉल्ट टोन की जगह गाना आदि सैट करने की सुविधा दे रहे हैं। मुझे कुछ ही समय पहले पता चला था कि मेरे मोबाइल सेवा प्रदाता, एमटीएनएल (MTNL), ने भी यह सेवा चालू कर दी है तो मैंने भी उस समय उपलब्ध सीमित सूचि में पसंद आए ओम शांति ओम के गाने “आँखों में तेरी अजब सी अजब सी अदाएँ हैं” सैट कर लिया था।

हाँ तो अब कल रात मैं देख रहा था कि कोई ढंग के गाने उपलब्ध हुए हैं कि नहीं तो सुनते-२ दो गाने ढंग के दिखे; स्व. किशोर कुमार द्वारा गाया “हम बेवफ़ा हरगिज़ न थे” और स्व. मो.रफ़ी द्वारा गाया “आज पुरानी राहों से कोई मुझे आवाज़ न दे”। गाने तो दोनों ही बढ़िया, किशोर कुमार द्वारा गाया गीत तो मैंने पहले भी कई बार सुना हुआ है लेकिन रफ़ी साहब द्वारा गाए गाने के जब मैंने बोल सुने तो मैं मोहित हो गया। हालांकि एमटीएनएल (MTNL) की वेबसाइट पर इस गाने की टोन सिर्फ़ एक मिनट की थी लेकिन वो गाने के मुखड़े ने ही मोह लिया। उसको तो खैर मैंने अपने मोबाइल के लिए सैट कर लिया कि अब कोई मुझे फोन मिलाएगा तो उसको यह गाना सुनाई दे, और मैं खोजने लगा कि यह पूरा गाना कहीं सुनने को मिल जाए तो आखिरकार यह गाना मिल गया। जब इस गाने को पूरा सुना तो शकील बदायुनी के लिखे इस गीत पर मुँह से अपने आप ही वाह-वाह निकल गया। पूरा गाना इसलिए यहाँ लिख रहा हूँ:

आज पुरानी राहों से कोई मुझे आवाज़ न दे,
दर्द में डूबे गीत न दे, ग़म का सिसकता साज़ न दे। – २

बीते दिनों की याद थी जिनमें, मैं वो तराने भूल चुका,
आज नई मंज़िल है मेरी, कल के ठिकाने भूल चुका,
ना वो दिल ना सनम,
ना वो दीन धरम,
अब दूर हूँ सारे गुनाहों से।

आज पुरानी राहों से कोई मुझे आवाज़ न दे…..

टूट चुके सब प्यार के बंधन, आज कोई ज़ंजीर नहीं,
शीशा-ए-दिल में अरमानों की आज कोई तस्वीर नहीं,
अब शाद हूँ मैं आज़ाद हूँ मैं, कुछ काम नहीं है आहों से।

आज पुरानी राहों से कोई मुझे आवाज़ न दे,
दर्द में डूबे गीत न दे, ग़म का सिसकता साज़ न दे।

जीवन बदला दुनिया बदली,
मन को अनोखा ज्ञान मिला,
आज मुझे अपने ही दिल में एक नया इंसान मिला,
पहुँचा हूँ वहाँ नहीं दूर जहाँ, भगवान भी मेरी निगाहों से।

आज पुरानी राहों से कोई मुझे आवाज़ न दे…..

बहुत खूबसूरत गीत लिखा था और रफ़ी साहब ने गीत की पूरी इज़्ज़त रखते हुए उतनी ही खूबसूरती के साथ इसको गाया था। यह गाना सन्‌ 1968 में आई दिलीप कुमार की फिल्म आदमी का है।

यदि आप यह गीत सुनना चाहते हैं तो इसे आप यहाँ सुन सकते हैं:) इसका वीडियो यूट्यूब पर यहाँ उपलब्ध है परन्तु लगता है कि यह वीडियो बीच में से कटा हुआ है या फिर हो सकता है कि इतना ही गाना फिल्माया गया हो और मूल गीत में से बीच के दो पैरा न फिल्माए गए हों। खैर, अब यह फिल्म सेवन्टीएमएम पर अपनी कतार में लगा दी है, जब आएगी तो देख के ही पता चलेगा कि फिल्म में पूरा गीत है कि नहीं। :)