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Posts Tagged ‘गूगल’


फुल्ली लीगल हफ़्ता वसूली …..


April 16th, 2009 | 15 Comments


योरोपियन यूनियन को खर्च आदि के लिए जो सदस्य देशों से पैसा मिलता है लगता है वह उनको पूरा नहीं पड़ता, इसलिए इधर-उधर भी हाथ पाँव मारते रहते हैं!! योरोपियन यूनियन वालों का पसंदीदा बैंक माइक्रोसॉफ़्ट (Microsoft) है। माइक्रोसॉफ़्ट और बैंक? जी हाँ, योरोपियन यूनियन के लिए तो माइक्रोसॉफ़्ट बैंक ही है जिससे वे आए दिन करोड़ों अरबों डॉलर वसूलते रहते हैं। माइक्रोसॉफ़्ट के संस्थापक और पूर्व चेयरमैन बिल गेट्स (Bill Gates) की उदारता तो जग ज़ाहिर है, वे दुनिया के सबसे बड़े दानवीरों में से एक हैं, महाभारत काल के महाबली कर्ण से प्रभावित लगते हैं। :) उनकी यही दानवीरता माइक्रोसॉफ़्ट की आत्मा में भी बसी नज़र आती है और इसलिए माइक्रोसॉफ़्ट भी योरोपियन यूनियन जैसों को डॉलर बाँटती रहती है।

और यह कैसे होता है? ज़्यादा कुछ नहीं करना पड़ता, योरोपियन कमीशन को बस थोड़ी नौटंकी स्टेज करनी होती है। अब योरोपियन यूनियन और उसमें मौजूद देशों में उनका कानून लागू होता है, उनकी ज्यूरिस्डिक्शन (Jurisdiction = अधिकार क्षेत्र) है। किसी योरोपियन कंपनी द्वारा माइक्रोसॉफ़्ट पर एकदम फालतू किस्म का मुकदमा ठोका जाता है और अपेक्षित रूप से माइक्रोसॉफ़्ट उसे हार जाती है और योरोपियन कमीशन जुर्माने के तौर पर करोड़ों डॉलर वसूल लेती है। :roll:

तीन-चार वर्ष पूर्व रियल प्लेयर (Real Player) बनाने वाली योरोपियन कंपनी रियल नेटवर्क्स (Real Networks) ने योरोपियन कमीशन के सामने गुहार लगाई थी कि माइक्रोसॉफ़्ट विन्डोज़ (Windows) के साथ मीडिया प्लेयर सॉफ़्टवेयर देता है जिस कारण उसका थकेला रियल प्लेयर कोई नहीं खरीदता!! और जैसा कि अपेक्षित था, अदालत ने क्रांतिकारी फैसला सुनाया कि विंडोज़ इस्तेमाल करने वालों को यह विकल्प मिलना चाहिए कि वे कौन से सॉफ़्टवेयर में गाने सुनना और फिल्म देखना चाहते हैं, उन पर कोई सॉफ़्टवेयर थोपा नहीं जाना चाहिए। और साथ ही अदालत ने कोई 75-76 करोड़ डॉलर की जुर्माने के रूप में माइक्रोसॉफ़्ट से उगाही कर ली थी!! अब पहली बात तो मैं अपना मत व्यक्त करता हूँ – रियल प्लेयर ऐसा थकेला सॉफ़्टवेयर होता था (अब है कि नहीं पता नहीं) कि यदि मुझे फोकट में भी मिलता तो मैं उसको प्रयोग न करता, उसको पैसे देकर खरीदने का तो सवाल ही नहीं उठता!! दूसरी बात यह कि इस क्रांतिकारी फैसले से उस उपभोग्ता को कितना लाभ पहुँचा जिसके नाम पर यह चौथ वसूली हुई थी?? उपभोग्ता तो वहीं का वहीं रह गया, उसे इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। क्यों? क्योंकि माइक्रोसॉफ़्ट ने तो अदालती फैसले के बाद विन्डोज़ का बिना मीडिया प्लेयर का संस्करण उपलब्ध कराना शुरु कर दिया था लेकिन वह उपभोग्ता थोड़े ही चुनता था, उसका चुनाव कंप्यूटर निर्माता कंपनियों के हाथ में था, जिस कंपनी को रियल नेटवर्क्स पैसा खिला दे वह बिना मीडिया प्लेयर वाली विन्डोज़ में रियल प्लेयर का ट्रायल वर्ज़न डाल उपभोग्ता को खिसका देता। :roll: और आज भी कुछ अलग नहीं होता है, यदि आप ब्रांडिड कंप्यूटर अथवा लैपटॉप खरीदें जैसे कि डैल (Dell), सोनी वायो (Sony Vaio), एचपी (HP) आदि तो उसमें पहले से बहुत से ट्रायल वर्ज़न इंस्टॉल हुए आते हैं उन सभी सॉफ़्टवेयरों के जिनके निर्माता इन कंप्यूटर निर्माताओं को रोकड़ा देते हैं। और यह तब है जब आप पैसे देकर कंप्यूटर खरीद रहे हो न कि फोकट में ले रहे हो और उसके बावजूद ये फालतू कचरा आपको थमाया जाता है। :evil:

अब इस वाले मामले में माइक्रोसॉफ़्ट से तो चौथ वसूल ली गई माइक्रोसॉफ़्ट का एकाधिकार यानि कि मोनोपली (monopoly) रोकने के लिए लेकिन बाकी एकाधिकार वाले मामलों में योरोपियन कमीशन खामोश क्यों रहा/है?!! उदाहरण के लिए आईपॉड (iPod) निर्माता सेब को देखते हैं। आज की तारीख में एमपी3 (MP3) प्लेयरों के मामले में आईपॉड (iPod) से अधिक हिस्सा बाज़ार में और किसी के पास नहीं है, कुछ सर्वेक्षण आंकड़ों की मानें तो साठ प्रतिशत से अधिक हिस्सा आईपॉड (iPod) के नाम दर्ज है। और यहाँ पर सेब के ऊपर मुकदमा निम्न कारणों के लिए बन सकता है:

  1. आईपॉड (iPod) में गाने डालने हों तो उसके लिए सेब के मीडिया प्लेयर सॉफ़्टवेयर आईट्यून्स (iTunes) की आवश्यकता पड़ती है, उसके बिना आईपॉड (iPod) में गाने नहीं डाले जा सकते। एकाध फोकटी सॉफ़्टवेयर बाज़ार में अवश्य हैं जिनके द्वारा आईपॉड (iPod) में बिना आईट्यून्स (iTunes) के गाने डाले जा सकते हैं। लेकिन मुद्दा यह है कि आईट्यून्स (iTunes) की आवश्यकता ही क्यों है, क्यों नहीं गाने बिना किसी अतिरिक्त सॉफ़्टवेयर के सीधे ही डाले जा सकते??!! अन्य एमपी3 (MP3) प्लेयरों में भी तो यह सुविधा है!!
  2. यदि सेब की गाने बेचने की दुकान से गाने खरीदने हैं तो उसके लिए भी आईट्यून्स (iTunes) सॉफ़्टवेयर की आवश्यकता है। क्यों नहीं यह दुकान आप अन्य दुकानों की भांति अपने वेब ब्राऊज़र में खोल सकते, आईट्यून्स (iTunes) में क्यों खुलती है?!!

सेब के साथ ऐसा मसला क्यों है? क्योंकि वह शुरू से ही मोनोपोलिस्ट (Monopolist) स्वभाव की कंपनी है, वे लोग नहीं चाहते कि कोई एक बार उनके जाल में फंसे तो वह फिर बाहर निकल सके!! और योरोपियन कमीशन इस बारे में कुछ करता क्यों नहीं? अजी जब माइक्रोसॉफ़्ट जैसी दुधारू गाय हो तो फिर सूखी मरियल गायों की ओर देखने की भी क्या आवश्यकता। हाँ यदि वाकई में नीयत नेक होती जैसी दर्शायी जाती है तो फिर ये किसी को न छोड़ते, चाहे माइक्रोसॉफ़्ट हो या सेब!! :roll:

और लगता है अब योरोपियन कमीशन को फिर से रोकड़े की आवश्यकता पड़ गई है, वैसे भी आजकल पश्चिमी अर्थव्यवस्था की अधिक वाट लगी हुई है। कुछ समय पहले ऑपरा ब्राऊज़र बनाने वाली योरोपियन कंपनी के सदके फिर से योरोपियन अदालत में माइक्रोसॉफ़्ट पर मुकदमा ठोका गया है, इस बार तकलीफ़ यह है कि माइक्रोसॉफ़्ट विन्डोज़ के साथ इंटरनेट एक्सप्लोरर (Internet Explorer) ब्राऊज़र काहे देता है, इससे वह अपने प्रतियोगियों की वाट लगा रहा है!! लो कल्लो बात, अब विन्डोज़ के साथ यदि ब्राऊज़र नहीं आएगा तो लोग दूसरा ब्राऊज़र क्या योरोपियन कमीशन के दफ़्तर में जाकर उतारेंगे?!! :roll: यह सब भी जनता जनार्दन की भलाई के नाम पर हो रहा है लेकिन मुझे लगता है कि यहाँ भी मामले ने वैसी ही करवट बैठना है जैसे वो रियल प्लेयर वाले मामले में बैठा था। अंत-पंत फैसला कंप्यूटर निर्माताओं के हाथ में जाना है और जो कोई उनको अधिक पैसे खिला देगा उसी का ब्राऊज़र वे लोग कंप्यूटरों में डाल लोगों को खिसका देंगे!! जय हो!!

और अभी कुछ समय पहले पढ़ने में आया था कि गूगल भी इस मामले में योरोपियन कमीशन और ऑपरा (Opera) के साथ है, भई आखिर क्यों न होगा, अब गूगल भी तो क्रोम (Chrome) नामक ब्राऊज़र का निर्माता है!! और यह वही गूगल है जो थोड़े समय पहले तक मोज़िला (Mozilla) वालों को पैसे देता था ताकि वे फायरफॉक्स (Firefox) ब्राऊज़र में डिफ़ॉल्ट सर्च इंजन के रूप में गूगल को रखें और इसके लिए गूगल ने उनके लिए अलग से एक खास पन्ना भी अपनी वेबसाइट पर बना रखा था!!

लेकिन इस मामले में चकित किया ऑपरा (Opera) ने। ऑपरा का ब्राऊज़र एक अच्छा ब्राऊज़र है, मैं इसका प्रयोग कंप्यूटर पर भी करता हूँ और अपने विन्डोज़ मोबाइल में भी। और इसलिए ऑपरा से ऐसी ओछी हरकत की आशा नहीं थी। :tdown: क्या वे लोग सोच रहे हैं कि इस तरह विन्डोज़ से इंटरनेट एक्सप्लोरर (Internet Explorer) हटवा के वे लोग वेब ब्राऊज़र बाज़ार का अधिक हिस्सा प्राप्त कर लेंगे? उन्होंने मोज़िला (Mozilla) के फायरफॉक्स (Firefox) ब्राऊज़र को देख के भी सीख न ली!! दस वर्ष बाद आज ऑपरा ब्राऊज़र का बाज़ार में जितना हिस्सा है उससे पच्चीस-तीस गुणा अधिक फायरफॉक्स (Firefox) ने पिछले चार-पाँच वर्षों में बिना ऐसी किसी हरकत के हासिल किया है!!

अब इस मामले में भी अन्य खेमे माइक्रोसॉफ़्ट जैसे मिल जाएँगे, जैसे कि हर बड़े लिनेक्स संस्करण के साथ फायरफॉक्स ब्राऊज़र आता है, सेब अपने मैक के साथ अपना थकेला सफ़ारी (Safari) ब्राऊज़र देता है। लेकिन मामला वही दुधारू गाय और मरियल गाय का है, योरोपियन कमीशन को लिनेक्स के खेमे से धेला नहीं मिलने वाला और जब माइक्रोसॉफ़्ट जैसी दुधारू गाय है तो सेब की ओर क्या देखना!!

लानत है!! :roll:


January 24th, 2009 | 2 Comments
Posted In: कतरन

फीडबर्नर से गूगल पर अपने सभी ब्लॉगों की फीड को स्थानांतरित कर लिया है। चूँकि फीड फिर भी अपने ही डोमेन पते से बाँटी जाती है इसलिए फीड के पते पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा और पुराने वाले पते धड़ल्ले से काम करेंगे (अभी तो फिलहाल कर ही रहे हैं) तथा जो श्रद्धालु पुराने भक्त हैं (यानि कि फीड को सबस्क्राइब किए हुए हैं) उनको भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा। :tup: यदि फीड को अपने डोमेन से न बाँट कर फीडबर्नर के डोमेन से बाँटा जा रहा होता तो खामखा की सिरदर्दी होती, क्योंकि तब फीड पते बदल जाते। :twisted:

अभी तो सब मामला सही दिखे है, फिर भी यदि किसी को कोई समस्या नज़र आए (मेरे द्वारा संचालित किसी ब्लॉग पर) तो बताने का कष्ट अवश्य करें। :tup:


द नॉट सो कूल


July 31st, 2008 | 5 Comments

एक नया सर्च इंजन मैदान में आया है, बोला जाता है कूल (Cool) और लिखा जाता है Cuil जो कि आईरिश (Irish) से लिया गया शब्द है। यह नया सर्च इंजन दुनिया में सबसे बड़ा सर्च इंडेक्स होने का दावा करता है और यह भी दावा करता है कि इसका डाटाबेस गूगल से लगभग तीन गुणा बड़ा है। इस नए शगूफ़े के पीछे हैं एन्ना पैटरसन (Anna Patterson) जो कि प्रसिद्ध अमेरिकी विश्वविद्यालय स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी (Stanford University) में रिसर्च साइंटिस्ट हुआ करती थीं जब इन्होंने एक ऐसी तकनीक बनाई जिससे कम समय में अधिक वेब पेज क्रॉल (Crawl) किए जा सकते थे और उनकी रैंकिंग की जा सकती थी, और जिस तकनीक को बाद में गूगल ने अपने सर्च इंजन के लिए इनसे खरीद लिया और इनको अपने यहाँ मुलाज़मत दी जहाँ इन्होंने दो वर्ष आर्कीटेक्चर (architecture) और रैंकिंग पर काम किया।

अब ये मोहतरमा अपने पति और कुछ पुराने गूगल मुलाज़िमों के साथ मिलकर एक नई तकनीक की बदौलत यह नया सर्च इंजन लाई हैं जो कि कम कंप्यूटरों प्रयोग करने पर भी ऐसा कमाल दिखाएगा कि गूगल से अधिक दूर तक पहुँच सकेगा, कम से कम कंपनी का तो यही दावा है। और इस बार यह तकनीक बिकाऊ नहीं है(क्या यह हम हर दूसरे से नहीं सुनते?)!!

बहरहाल अपने को इस बात से कोई लेना देना नहीं है कि इनका माल बिकाऊ है कि नहीं है, पर इनका माल बहुत ही घटिया है और किसी को इन पर पहचान हरने और गुमराह करने के लिए मुकदमा ठोकना चाहिए। क्यों? वो हुआ यूँ कि अभी कुछ दिन पहले इसके बारे में जाना, जाकर देखा और सबसे पहले अपने नाम को सर्च किया, जैसा कि अपेक्षित था शुरुआती नतीजों में अपना नाम और ब्लॉग दिख गया परन्तु उसके साथ किसी अजनबी की तस्वीर देख बहुत आश्चर्य हुआ। :sad:

लेकिन अभी आश्चर्य थमा नहीं था, कुछ नीचे सूचि में था मेरा ग्लोबल वॉयसिस की प्रोफाईल का पन्ना और उसके साथ किसी अन्य साहब की तस्वीर लगी हुई थी। मन में आया कि यह क्या बकवास है, ऐसा भी कहीं होता है क्या। तस्वीर दिखा रहे हैं तो दिखाएँ लेकिन मेरी पहचान की वाट काहे लगा रहे हैं, मैं कोई बहुरूपिया थोड़े ही हूँ कि मेरे कई चेहरे होंगे!! :mad:

और देखा तो दूसरे नंबर पर एक और अमित गुप्ता की लिंक्डइन प्रोफाइल वाला पन्ने था और उसके साथ किसी अन्य साहब की तस्वीर जो कि गलत थी। क्यों गलत थी? क्योंकि इन अमित गुप्ता को मैं जानता हूँ, अभी हाल ही में जब ये दिल्ली आए थे तो मिलना भी हुआ था, तो यह तस्वीर तो उनकी बिलकुल भी नहीं है!!

मामला यहाँ तक नहीं था, कल पुनः जाँचा तो इस बार तस्वीरें अगल-बगल हो गई थी, जो तस्वीर पहले कहीं और थी वो अब अपने पन्ने के लिंक के साथ लग गई थी और जो अपने पन्ने के साथ थी वो कहीं और लग गई थी। :mad:


( बड़ा देखने के लिए चित्र को क्लिक करें )


ऐसी फालतू की हरकत कहीं से भी इनका प्रोफेश्नलिस्म (professionalism) नहीं दिखाती। :tdown: सर्च नतीजे इनके हूबहू गूगल जैसे ही दिखते हैं, और जैसा कि रवि जी बता चुके हैं हिन्दी इस पर किसी काम की नहीं, अन्य भाषाओं के होने की भी कोई गारंटी नहीं, जब अंग्रेज़ी का ही मामला ठीक नहीं है तो किसी और भाषा की अपेक्षा करना ही बेकार है। अब यह गूगल किलर कहाँ से है मुझे यह नहीं समझ आता और जो ऐसी बातें करते हैं वे नासमझ ही प्रतीत होते हैं।

पहचान गड़बड़ाने की वाहियात हरकत करके यह कूल तो कहीं से ना दिखे है। और जब खोजने और रैंकिंग का मामला ही गड़बड़ है तो इनके 120 अरब पन्नों के डाटाबेस को कोई सिर में मारेगा क्या? :roll: अभी कहीं पढ़ा था कि गूगल 1000 अरब पन्नों को जाँचता है लेकिन उसमें से सिर्फ़ 40 अरब पन्नों को ही गुणवत्ता के आधार पर रखता है। लोग इस सर्च इंजन के बड़े डाटाबेस का क्या करेंगे, किसी भी सर्च के सौंवे पृष्ठ के आगे कदाचित्‌ ही कोई जाता होगा। और जब रैंकिंग सिस्टम ही गड़बड़ाया हुआ है तो फिर डाटाबेस चाहे तीन गुणा हो या सौ गुणा, क्या फर्क पड़ता है, नतीजे तो झोला छाप ही मिलेंगे ना? :roll:

अब जो लोग यह कहने की सोच रहे हैं “ज़रा टैम तो दो इनको भई, अभी नए-२ हैं सुधार कर लेंगे” तो उनके लिए उत्तर यह है कि बकौल खुद इसी कंपनी के, इनका सर्च इंजन पिछले दो साल से बन रहा है, यानि कि अब तक ऐसे लोचे सुधारने का इनके पास वक्त रहा है। और यह कोई छोटा मुद्दा नहीं है, यह इनको भी पता होगा कि सर्च इंजन बना रहे हैं तो रैंकिंग का मसला निपटाना सबसे अहम है चाहे डाटाबेस थोड़ा छोटा हो ले!! यदि इनको यह नहीं पता था तो इनकी दुकान चार दिन में बढ़ जाएगी। और यदि इनको यह पता था और फिर भी यह नहीं सुधार पाए हैं, जैसा कि दिख रहा है, तो कोई क्यों इनके माल को प्रयोग करेगा! :tdown:


May 17th, 2008 | 6 Comments

ऐसे ही इंटरनेट पर टहलते हुए कहीं लिंक मिला और खबर पढ़ी कि गूगल का स्ट्रीट व्यू (Street View) कब का लाँच हो चुका। अब इस प्रोजेक्ट के बारे में तो काफ़ी पहले से पता था कि गूगल अपनी कैमरा सज्जित गाड़ियाँ शहरों में दौड़ाएगा जो कि सभी गली नुक्कड़ों की तस्वीरें उतारती जाएँगी, लेकिन यह न पता था कि यह प्रोजेक्ट अब ऑनलाईन जनता के दर्शनार्थ उपलब्ध भी है। बहरहाल अभी सिर्फ़ अमेरिकी शहर न्यू यार्क (New York) की ही तस्वीरें उपलब्ध हैं, तो मैंने सोचा कि इसे आज़माया जाए और सीधे ही टाइम्स स्कवेयर खोजा। ;) नक्शा प्रकट हुआ और उसी में नीचे स्ट्रीट व्यू का लिंक दिखा, क्लिक किया तो एकदम बढ़िया डिटेल वाली तस्वीरें दिखाई दीं जिनको माउस के ज़रिए दाएँ-बाएँ उपर-नीचे खींच के उस जगह का नज़ारा भी देखा जा सकता है। साथ ही एक पीले रंग की मार्गदर्शक पट्टी भी आती है जिस पर होते हुए कहीं भी जाया जा सकता है। भई इस तरह तो घर बैठे आप पूरे न्यू यार्क का नज़ारा कर सकते हैं!! ;) :tup: वाकई बढ़िया चीज़ है, जैसे-२ और शहरों की तस्वीरें आती जाएँगी वैसे-२ बिना वहाँ जाए आप वहाँ का नज़ारा कर पाएँगे!!


तेरा क्या होगा रे याहू??


February 2nd, 2008 | 4 Comments

भईये टैम बोत खराब है! हाँ यदि आपने याहू (Yahoo!) के शेयर खरीद रखे हैं या फिर आप याहू के कर्मचारी हैं तो वाकई आपके लिए खराब टैम है। क्यों? अरे भांग खा के कहीं सो रहे थे का भई? याहू अपनी विश्वव्यापी 14300 कर्मचारियों की फौज में से लगभग 1000 कर्मचारियों को सेवा-निवृत्त करने की सोच रिया है ताकि अपने घटते मुनाफ़े में कुछ जोड़ सके। कैसे? अरे इस तरह इतनी बड़ी सेवा-निवृत्ति से याहू के सालाना खर्च में 10 करोड़ अमेरिकी डॉलर तक की कमी आएगी और इस समय तो एक-एक डॉलर उसके लिए कीमती है क्योंकि मुनाफ़ा लगातार नीचे जाने वाली लिफ्ट पर सवार है। (अंग्रेज़ी में खबर यहाँ पढ़ें)

तो अब ऐसी हालत होने पर अनुमान लगाया जा रहा है कि याहू के पास दो ही रास्ते बचते हैं; या तो बिक जाए या फिर अपनी सर्च सुविधा को किनारे लगा गूगल की सर्च का हाथ थामे और उसके ज़रिए विज्ञापनों द्वारा डॉलर कमाए तथा अपनी हाल ही में खरीदी जायदादों को डॉलर बनाने की मशीनों में कन्वर्ट करे। अब पहले रास्ते को अपनाने से याहू के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स की सिरदर्दी तो खत्म हो जाएगी(खरीदने वाली कंपनी को बतौर बोनस में दे देंगे ना) और यदि दूसरे रास्ते को अपनाता है तो काफ़ी मेहनत करनी होगी, बहुत ज़्यादा मेहनत!!

खैर, ऐसे माहौल में अटकलों का बाज़ार पुनः गर्म हो गया है। यह मान के चला जा रहा है कि याहू तो बिकेगा ही बिकेगा, उसके पास और कोई रास्ता नहीं। ऐसे में अनुमान लगाए जा रहे हैं कि कौन आखिरकार बोलेगा या ऽऽऽऽ हू ऽऽऽऽऽ (शम्मी कपूर साहब नहीं, उनका तो टैम निकल गया, जब बोलना था तब बोल लिए, आजकल तो ईश्वर भजन में लगे रहते हैं, टैम जो आ रहा है मीटिंग का)। माइक्रोसॉफ़्ट को सबसे बड़ा दावेदार माना जा रहा है, बल्कि खबर यहाँ तक है कि माइक्रोसॉफ़्ट की ओर से 44.6 अरब अमेरिकी डॉलर में याहू को खरीदने की पेशकश हुई है। (अंग्रेज़ी में खबर यहाँ पढ़ें)

गौरतलब है कि कुछ समय पहले माइक्रोसॉफ़्ट ने याहू को 40 अरब अमेरिकी डॉलर में खरीदने की पेशकश की थी जिस पर याहू के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ने 80 अरब अमेरिकी डॉलर की माँग की थी, यानि कि अन्य शब्दों में बिकने से मना कर दिया था। वैसे कुछ लोग गूगल को भी याहू की खरीद का एक प्रबल दावेदार मान रहे हैं। वैसे भी मुख्य दो खिलाड़ी यही दोनों हैं, तीसरा तो कोई दिखाई नहीं देता जिसकी इतने डॉलर अदा कर खरीदने की औकात हो!! गूगल के हाल भी कोई बहुत ज़्यादा अच्छे नहीं हैं, इसलिए हो सकता है कि वो याहू की खरीद में उस कारण या किसी अन्य कारण रुचि न दिखाए। परन्तु यदि माइक्रोसॉफ़्ट याहू को खरीदने में सफ़ल होता है तो यह माइक्रोसॉफ़्ट के लिए अभी तक का सबसे बड़ा मील का पत्थर साबित हो सकता है क्योंकि माइक्रोसॉफ़्ट की भी इंटरनेट के बाज़ार में बैन्ड बजी हुई है और वह येन-केन-प्रकारेण अरबों डॉलर के इस केक में अपना बड़ा सा हिस्सा पाने की यथा संभव कोशिश में है। तकनीकी के बाज़ार में भी यह अभी तक की सबसे बड़ी बिक्री होगी, इससे पहले अभी तक की सबसे बड़ी बिक्री सन्‌ 2002 में हुई थी जब हेवलेट्ट पैकर्ड ने कंप्यूटर बनाने वाली कंपनी कॉम्पैक को 25 अरब अमेरिकी डॉलर में खरीदा था।

तो अब देखना यह है कि याहू इस संकट से पहले की भांति येन-केन-प्रकारेण बच निकलता है या इस बार वाकई कोई उसकी गिल्ली खरीद लेगा। ;)