पिछले भाग से आगे …..
समीर जी ने पूछा कि नए स्लीपिंग बैग में ठंड झेल पाए कि नहीं, तो उसके संबन्ध में भी एक रोचक वाक्या हुआ। अब हुआ यूँ कि अपन नए स्लीपिंग बैग का कुछ अधिक ही भाव खा गए, और शुक्रवार की रात को केवल एक पतली सी टी-शर्ट और ट्रैक पैन्ट पहने ही घुस गए उसमें। थोड़ी देर बाद शरीर के ऊपरी भाग में ठंड सी लगने लगी, क्योंकि ऊपर से स्लीपिंग बैग खुला था!! जैकेट आदि पहन इसलिए नहीं सोया था कि सोचा स्लीपिंग बैग ही काफ़ी रहेगा!!
तो गलती में कुछ सुधार करते हुए जैकेट को ओढ़ लिया और उसके बाद ठंड नहीं लगी!!
शनिवार की रात जो ऊपर तुन्गनाथ पर बिताई, तब तक समझ आ गई थी, इसलिए जैकेट और जुराब पहन के सोया था, बहुत गर्म सा रहा और अच्छी नींद आई, रविवार सुबह जल्दी ही उठ गया(बाकी सब मेरे से पहले उठ चुके थे) और अपने को बहुत तरोताज़ा महसूस किया।
चोपता में शुक्रवार की रात को एक अजब वाक्या हुआ था। हम तकरीबन दस बजे अपने-२ तंबुओ में अपने स्लीपिंग बैग बिछा सो गए थे। ग्यारह-बारह के आसपास रमित अचानक उठ गया, पूछने पर बोला कि बाहर तंबू के पास कोई घूम रहा है। ध्यान से सुनने पर कदमों की आहट सुनाई दी, टॉर्च आदि जला के ऊँची आवाज़ में पूछा भी गया कि कौन है लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला और आवाज़ आनी बन्द हो गई। हम सो गए, थोड़ी देर बाद पुनः आवाज़ आने लगी और रमित फिर जाग गया और साथ ही मैं भी। बाहर झांक के भी देख लिया लेकिन कोई दिखाई नहीं दिया, बड़ी टॉर्च की रोशनी भी किसी काम की नहीं थी, घुप्प अंधेरा था। अंदर आकर पुनः सो गए, मन में अजीब से ख्याल आ रहे थे कि कोई वाकई में तो नहीं है, यदि है तो अगर कोई चोर हुआ तो तम्बू को चाकू आदि से काट सामान लेकर चलता बनेगा!! किसी तरह सुबह हुई, साढ़े चार के करीब रोशनी हुई और रमित चिल्ला पड़ा कि किस पागल ने टॉर्च जलाई है, उसको सोने दिया जाए!!
बहरहाल, सुबह उठ हम लोगों को पता चला कि रात कोई नहीं था, हवा वेग से चल रही थी और तम्बू से तकराने के कारण आवाज़ हो रही थी!!
इस बार तुन्गनाथ की चढ़ाई में मेरा उतना बुरा हाल नहीं हुआ जितना पिछली बार हुआ था। इस बार स्निग्धा साथ नहीं थी कि हौसला दे साथ चले, इस बार अपने आप करना था और किया। पिछली बार के मुकाबले इस बार चढ़ने में एक घंटा कम लिया, उतना कठिन नहीं लगा जितना पिछली बार लगा था(क्योंकि इस बार शर्मा जी और वनराज भाटिया साहब को सुनते हुए चढ़ाई की)। उतरते समय भी पिछली बार के मुकाबले एक घंटा कम लिया, आधा रास्ता सुबोश्री से बात करते हुए कटा और आधा रास्ता शर्मा जी को सुनते और खूबसूरत नज़ारों को निहारते हुए।
मई 2007 के दूसरे सप्ताहांत पर पुनः तुन्गनाथ जाने का कार्यक्रम बना। पिछली बार का हादसा याद था, लेकिन जोश बरकरार था और मन में नई उमंग थी। इस बार की अपनी यात्रा भी अलग होनी थी, इस बार तम्बू वगैरह लेकर चल रहे थे, पैक्ड रेडी-टू-ईट(ready-to-eat) खाना साथ था जो कि तुरन्त बनने वाली किस्म का था। तुन्गनाथ पर पिछली बार की ठंड का अनुभव होने के कारण मैंने यात्रा पर निकलने से पहले ला-फूमा का नया स्लीपिंग बैग खरीदा जो कि 5 डिग्री सेल्सियस से 0 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान आराम से झेल लेता है; पहली रात तम्बू चोपता में लगाना था और समुद्र स्तर से लगभग साढ़े बारह हज़ार फीट की ऊँचाई पर रात को तापमान कम होने की पूरी आशा थी, मई में भी, क्योंकि इतनी उँचाई पर सारा साल ही ठंड रहती है। एक और खास बात यह थी कि यह व्हर्लविन्ड(whirlwind) यात्रा होनी थी क्योंकि यदि इसको आराम से करना हो तो चार दिन लगते हैं और हमे इसको तीन दिन में निपटाना था।
इस बार दिल्ली से गाड़ी ले जाने की जगह हम हरिद्वार तक ट्रेन से गए और वहाँ से आगे जाने के लिए टाटा सूमो ली। केवल योगेश और मेरी ही यह तुन्गनाथ की दूसरी यात्रा थी, बाकी के पाँचों साथी पहली बार जा रहे थे।
चूँकि इस यात्रा के फोटो मैंने पिछली बार लिए थे, इसलिए लेने के लिए इस बार कुछ खास नहीं था।
अगले भाग में जारी …..
पिछली बार जहाँ गाड़ी रोकी थी, उसके बाद एक अनपेक्षित विराम आ गया था, लेकिन वहाँ से आगे बढ़ते हुए प्रस्तुत हैं यादगार चित्रों की अगली कड़ी।
यादगार चित्रों की कड़ी पुनः आरम्भ होगी जब कुछ और यादगार चित्र लिए जाएँगे।
गतांक से आगे …..
चोपटा से निकल हम उखीमठ की राह पकड़ी और उसके बाद रास्ता पूछ सियालसौर की ओर बढ़ चले। रास्ते भर सुन्दर पहाड़ी नज़ारे देखते हुए चल रहे थे, ऐसा लग रहा था कि मानो जन्नत में घूम रहे हैं। पर अब जन्नत बहुत ज़्यादा हो गई थी। कुछ देर को तो मैं गृहासक्त महसूस करने लगा, पहाड़ी नज़ारे कुछ अधिक ही हो गए थे, यात्रा का हमारा तीसरा दिन था, अभी घर पहुँचने में कम से कम एक पूरा दिन और दो रातें बाकी थी। पिछले एक-दो महीनों में कुछ अधिक ही पहाड़ देखे थे, इतने अभी तक के अपने जीवन में कुल मिलाकर ना देखे थे। हमारा पहले तो ऋषिकेश में भी रूकने का विचार था परन्तु फिर सभी ने निर्णय लिया कि बस सियालसौर में ही एक दिन रूकेंगे और उसके सीधे दिल्ली।
सियालसौर से अभी हम कुछ ही दूरी पर थे कि देखा रास्ते में ट्रैफ़िक जाम लगा हुआ है। पता चला कि कुछ भूस्खलन के कारण मिट्टी और कुछ पत्थर एक टैम्पो के बोनट पर गिर गए और अब वह टैम्पो रास्ता रोके हुए था। जगह एक ही वाहन के निकलने की होने के कारण रास्ता रूका हुआ था और दोनों ओर वाहनों की कतार बड़ी होती जा रही थी। वैसे उस टैम्पो को रास्ते से हटाने का कार्य किया जा रहा था, लेकिन आवश्यकता से अधिक सामान से लदा होने के कारण उसको सरकाना आसान नहीं था। तो हम लोग गाड़ी से बाहर निकल आए और देखा कि बाजू में ही बहुत सही सा नज़ारा है। वाह री किस्मत, रोका भी तो कैसी सही जगह पर!!
आखिरकार लगभग डेढ़ घंटे बाद टैम्पो सड़क किनारे लगा और रास्ता खुला और हम पुनः सियालसौर की ओर बढ़ चले। कुछ देर बाद हमें सियालसौर के गढ़वाल मण्डल यात्री निवास का बोर्ड लगा दिखाई दिया और गाड़ी नीचे जाते रास्ते पर ले ली जो कि यात्री निवास का प्रवेश द्वार था। यात्री निवास कहने को तो एकदम बियाबन में बना हुआ था, आसपास कोई आबादी नहीं, लेकिन बना बहुत सुन्दर जगह में था, एकदम मन्दाकिनी नदी के घाट पर। पर हमें पता नहीं था कि इस मनमोहक जगह पर हमारे साथ एक हादसा होने वाला था जिसने हमें हिला के रख देना है।
यात्री निवास में लकड़ी के कॉटेज बने हुए थे जो कि सभी डबल बेडरूम थे। हमने दो कॉटेज ले लिए, एक लड़कियों के लिए और एक हम लड़कों के लिए। अपने अपने कॉटेज में अपना सामान पटक हम लोग सुस्ताने लगे, तो कोई नहाने धोने चला गया। यात्री निवास वाले को खाना बनाने के लिए बोल दिया था, थोड़ी देर में वह बुलाने आ गया तो जाकर डाईनिंग हॉल में बैठ हमने दोपहर का भोजन किया। उसके बाद मैंने उन लोगों से पूछा कि क्या हम सीढ़ियाँ नीचे उतर मन्दाकिनी के किनारे जा सकते हैं तो उत्तर हाँ में मिला। सभी का मन था कि नदी किनारे जाकर पानी में पैर आदि डाल बैठ तरोताज़ा हुआ जाए। सबसे आगे काकन और बाकी सभी, सीढ़ियाँ नीचे उतर नदी किनारे पहुँचे। वहाँ किनारे पर उभरे पत्थरों पर बैठ पानी में पैर डाल हम लोग बैठ हँसी ठिठोली करने लगे, एक दूसरे पर पानी डालने लगे।
पानी को देख काकन का मन भी मचल गया, वह तुरंत अपने कपड़े बदलने गई ताकि पानी में वो भी मौज ले सके। वापस आकर यकायक उसे तैरने की सूझी। मैंने सावधान करते हुए कहा कि तरणताल में तैरने और बहती नदी में तैरने में बहुत अंतर है और वैसे भी मन्दाकिनी तेज़ बहाव पर है इसलिए वो ऐसी कोई कोशिश ना करे। बात उसे ठीक लगी और वह भी पत्थर पर स्निग्धा के पास आकर बैठ गई। मोन्टू और मैं दूसरे पत्थर पर बैठे थे। अगली बार जब मेरा ध्यान गया तो देखा कि काकन ने थोड़ा आगे जाकर पानी में तैरना आरम्भ कर दिया था और अब वह नदी के मध्य की ओर बही जा रही थी। उसने पीछे मुड़कर देखा तो मैंने हाथ हिला उससे पूछा कि वह ठीक है कि नहीं, लेकिन कोई उत्तर नहीं आया और वह आगे बहने लगी। मैं समझ गया कि अब वो तैर नहीं रही बल्कि नदी के तेज़ बहाव में बही जा रही है और शीघ्र ही डूब जाएगी। स्निग्धा तुरंत ऊपर यात्री निवास वालों को बुलाने भागी, मैं और मोन्टू काकन को पुकार रहे थे क्योंकि अब वह दिखाई नहीं दे रही थी।
तुरत फ़ुरत हम भी ऊपर पहुँचे जहाँ अब यात्री निवास वाले आ चुके थे और उधर देख रहे थे जिधर काकन आखिरी बार दिखाई दी थी। यात्री निवास के एक कर्मचारी के साथ स्निग्धा तुरंत गाड़ी में आगे की ओर देखने गई, पुलिस को मैनेजर द्वारा सूचना दे दी गई। स्निग्धा वापस आ गई, उसे कोई सफ़लता नहीं मिली, लगभग एक घंटा होने को आया था लेकिन पुलिस अभी तक नहीं आई थी। हम सभी तुरंत गाड़ी में बैठ पुलिस थाने की ओर बढ़ चले जो कि तकरीबन 7 किलोमीटर दूर था। अभी हम अगले कस्बे चन्द्रपुरी के गढ़वाल मण्डल के यात्री निवास के करीब पहुँचे कि हमने पुलिस की जीप वहाँ खड़ी देखी। पता चला कि वे हमारी ओर ही आ रहे थे, तो उनके साथ हम लोग वापस अपने वाले यात्री निवास पर आ गए।
यात्री निवास पर पहुँच पुलिस ने वह जगह देखी जिधर काकन डूबी थी, हम सब लोगों का बयान लिया, पूरा विवरण लिया कि कब कैसे क्या हुआ। उन्होंने तुरंत कह दिया कि बचने की कोई उम्मीद ना लगाई जाए, पानी के इस बहाव में तो वहाँ के गाँव में मौजूद गोताखोर आदि भी नदी में नहीं जाते। यह सुन मोन्टू और स्निग्धा सकते में आ गए, मैंने अपने ऊपर फ़ौलादी नियंत्रण रखा हुआ था, क्योंकि मुझे पहले से पता था कि पुलिस ने यही कहना है, पानी का बहाव देख कोई मूर्ख भी कह सकता है कि इसमें जाना सीधे सीधे यम को पुकारना है। अपनी पूछताछ आदि कर पुलिस वापस चली गई, यात्री निवास में जो अन्य लोग ठहरे हुए थे, उनके लिए मानों यह एक तमाशा था, हर कोई बार बार अलग अलग पूछ रहा था कि क्या हुआ कैसे हुआ। मुझे तो उन पर गुस्सा आ रहा था, मन कर रहा था कि पूछने वालों के मुँह तोड़ दूँ, क्या वहाँ तमाशा हो रहा था, क्या उन्हें पता नहीं था, यह पूछ कि कैसे हुआ, पूरी जानकारी तफ़सील से लेकर उन्हें क्या करना था, कुछ कर तो वे सकते नहीं थे किसी के लिए, ना हमारे लिए ना काकन के लिए। हम लोगों ने अपने अपने गीले कपड़े बदले और गाड़ी में बैठ आगे के कस्बे में पहुँचे ताकि काकन के घर पर सूचित कर दें, क्यों कि सियालसौर में हम में से किसी का मोबाईल काम नहीं कर रहा था, यहाँ तक कि बीएसएनएल का तगड़ा नेटवर्क भी गायब था।
चन्द्रपुरी पहुँच काकन के घर का फ़ोन मिलाया परन्तु किसी ने फ़ोन नहीं उठाया। कदाचित् कोई घर पर नहीं था और काकन के घरवालों में से किसी के मोबाईल का नंबर हमारे पास नहीं था। दिल्ली में एक दो दोस्तों को जो कि काकन को जानते थे उनको फ़ोन किया ताकि उसके घर पर वे सूचित कर सकें। उसके बाद हम लोग वापस यात्री निवास लौट आए। थानेदार ने हमें अगले दिन सुबह साढ़े आठ बजे थाने में बुलाया था। खाना आदि खा हम लोग एक बार पुनः चन्द्रपुरी पहुँचे। इस बार काकन के घर पर उसका छोटा भाई मिल गया। रात्रि के नौ बजे थे और अभी तक उन लोगों को किसी ने नहीं बताया था, हो सकता है वह अभी अभी घर पहुँचा था। कम से कम शब्दों में आधा अधूरा उसे समझाया और तुरंत सियालसौर पहुँचने के लिए बोला, पहुँचने का मार्ग आदि भी समझा दिया और हम वापस यात्री निवास पर आ गए। मन में शंका थी, आशा थी, शोक भी था, पर स्निग्धा और मोन्टू यह मानने को तैयार नहीं थे कि काकन अब नहीं रही। स्निग्धा अकेले रहने से डर रही थी, इसलिए शोकग्रस्त हमने वह रात एक ही कमरे में आँखों में काटी। मन में निश्चय किया सभी ने कि हम तब तक यहाँ से हिलने वाले नहीं जब तक काकन या उसका शव नहीं मिल जाता। उसके घरवालों के आने तक तो वैसे भी रूकना हमारा फ़र्ज़ था।
अगले दिन सुबह ठीक साढ़े आठ बजे हम पुलिस स्टेशन पहुँच गए। वहाँ दारोगा ने हमें बताया कि खोजकों की टोली रूद्रप्रयाग से अपने कार्य पर निकल चुकी है, शायद हवाई खोज भी की जाए। काकन के पिताजी नामी डॉक्टर हैं जिनकी कई मंत्रियों आदि से पहचान है और उन्होंने ही पहचान निकाल यह मुमकिन करवाया था कि एक खोजी दल रूद्रप्रयाग से किनारे किनारे आगे बढ़ता काकन को ढूँढता ऊपर आ रहा था। दारोगा ने हमें कुछ आगे एक जगह के बारे में बताते हुए कहा कि हम लोगों को वहाँ भी देख आना चाहिए क्योंकि वहाँ पानी थोड़ा ठहर जाता है। परन्तु समस्या यह थी कि रात को तेज़ बारिश होने के कारण नदी में पानी का स्तर और बहाव की गति अधिक हो गई थी। खैर फ़िर भी हम लोगों ने अपनी भाग-दौड़ ज़ारी रखी, दारोगा की बताई जगह पर भी देख आए, उससे आगे भी देख आए लेकिन नतीजा सिफ़र ही रहा।
दोपहर लगभग तीन बजे तक काकन के माता-पिता और भाई रूद्रप्रयाग ज़िले के एसपी के साथ यात्री निवास पर पहुँचे। पीछे पीछे थाने के दारोगा की जीप भी आ गई। हमने उन्हें सभी कुछ शुरू से लेकर आखिर तक बताया, कब कैसे क्या हुआ। काकन की माताजी से रहा ना गया और उनके सब्र का बाँध टूट गया। दारोगा से भी उनकी बात हुई, हमें बुलाकर फ़िर पूछा गया कि हमें नीचे जाने को किसने बोला था। अब मुझे यह याद नहीं था कि यह किसने बोला था और यात्री निवास की रसोई का प्रत्येक कर्मचारी, जो पिछले दिन उस समय उपस्थित जब हमने खाना खाया था, साफ़ मुकर गया कि उनमें से किसी ने नहीं कहा था। बात समझ में आ रही थी मेरी, जो कोई कह देता कि उसने कहा था, थानेदार ने उसकी ऐसी कि तैसी कर देनी थी। सबकी आँखों में भय की छलक थी कि मैं किसी का नाम ना ले दूँ, पर जब मुझे स्वयं यह नहीं याद था कि किसके मुँह से वे शब्द निकले थे तो मैं कैसे किसी का नाम ले सकता था।
सभी कुछ पूछने आदि के बाद थानेदार ने कहा कि शव मिलने में 2-3 दिन से 15 दिन तक लग सकते हैं और ऐसा भी हो सकता है कि वह मिले ही नहीं। काकन के परिवार-वाले रूद्रप्रयाग में रूके हुए थे जो कि वहाँ से 22 किलोमीटर आगे था और अगले रोज़ सुबह उनका भी वापस दिल्ली लौटने का विचार था, तो हमने तय किया कि हमें भी वापस चल देना चाहिए, रूकने का कोई लाभ ही नहीं था, जब परिवार वाले नहीं रूक रहे तो हम रूक कर क्या करते। चलने से पहले काकन की माताजी स्निग्धा को और आम रूप में हम सभी को कड़े शब्द कहना ना भूलीं, जैसे काकन की मृत्यु के ज़िम्मेदार हमीं लोग थे!! कहा तो उन्होंने बंगाली में जो कि स्निग्धा और मोन्टू को समझ आ रही थी परन्तु भाषा का ज्ञान ना होने के बावजूद बोलने के लहज़े से मैं समझ गया कि उनका अभिप्राय क्या है। लेकिन हम उनकी मानसिक हालत समझ रहे थे, इसलिए कुछ कह नहीं सकते थे, केवल मुँह लटकाए सुनते रहे।
उन लोगों के जाने के बाद हमने अपना अपना सामान बाँधा और यात्रि निवास का भुगतान कर वापसी के रास्ते लगे। काकन का सामान उसके घरवाले ले जा चुके थे। अब हमारा मकसद था कि जितना जल्द हो सके, वापस दिल्ली पहुँच जाएँ। हम में से किसी ने नहीं सोचा था कि कभी हमारे साथ ऐसा हादसा भी पेश आ सकता था। लेकिन अधिकतर जीवन में वहीं होता है जो मनुष्य सोचता नहीं है। हम चार लोग गए थे और अब केवल तीन ही लौट रहे थे। कहाँ तो हम चारों वापस आकर पिज़्ज़ा पार्टी करने की सोच रहे थे और कहाँ अब ये हाल था कि कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था।
अपनी sense of adventure, ज़रूरत से अधिक आत्मविश्वास और प्रकृति को कम आंकने के कारण काकन ने अपना जीवन गंवाया और अपने घरवालों और मित्रगण के शोक-संताप का कारण बनी। यदि उसने हमारी बात मान ली होती और अपने तैराकी के शौक को मन्दाकिनी की बजाय किसी तरणताल में पूरा किया होता तो …..।
उसका शव दस दिन बाद ऋषिकेश में सेना वालों को मिला और 24 अगस्त को उसके परिवार जनों ने हरिद्वार में उसका दाह-संस्कार कर दिया। ये पोस्ट काकन को मेरी अंतिम श्रद्धांजिली है।
गतांक से आगे …..
चोपटा की ओर जाते समय मार्ग में एक से बढ़कर एक नज़ारे देखने को मिले। सुबह का समय था, कहीं कहीं हल्की धूप पड़ रही थी और सुहावना मौसम था। मन ही नहीं कर रहा था कि कहीं जाएँ, बस एकटक बैठे प्रकृति की सुन्दरता को निहारते रहें।
आखिरकार हम चोपटा पहुँच ही गए। सुबह के लगभग साढ़े नौ बजे थे और आस पास ऊपर देखने पर केवल धुंध एवं कोहरे के बादल ही दिखाई दे रहे थे। सामने के ढाबे पर हमको पिछली रात मिले अंकल एवं उनका परिवार बैठा दिखाई दिया, तो उनसे बचने के लिए साथी लोग दूसरी दुकान पर चाय के लिए चले गए। चाय आदि के बाद सभी चलने के लिए तैयार थे। ऊपर ठण्ड का मुकाबला करने के लिए हमने चॉकलेट आदि ली, मैंने ऊपर चढ़ने में सहायता के लिए एक डंडी ली और हम लोग अपनी 4 किलोमीटर की पैदल चढ़ाई पर निकल चले।
मैं केवल अपना स्लीपिंग बैग और कुछ दवाईयाँ लेकर ही चढ़ रहा था। स्लीपिंग बैग में ही एक जोड़ी गर्म कपड़े लपेट रखे थे। दूसरे साथी थोड़ा बहुत सामान लेकर चढ़ रहे थे। लड़कियों ने अपना मेकअप का सामान भी रख लिया था।
परन्तु थोड़ी दूर जाते ही हाल बुरे हो गए। खड़ी चढ़ाई थी, रास्ता पूरा का पूरा पथरीला था, जिसे आदत ना हो उसके लिए चढ़ना वाकई कठिन कार्य था। ऊपर से मेरा स्लीपिंग बैग बार बार कंधे से फ़िसल रहा था। मोन्टू ने अपने बैग के साथ मेरा स्लीपिंग बैग पकड़ने का प्रस्ताव रखा और मैंने कृतज्ञतापूर्वक उसे स्वीकार कर लिया। लेकिन पसीने और एक दिन की बढ़ी शेव गर्दन पर चुभ रही थी जिस कारण गर्दन लाल हो गई थी तथा जलन हो रही थी। तो इसलिए टेलकम पाऊडर का एक छोटा डिब्बा जेब में रखा और थोड़ी थोड़ी देर बाद उसे लगाते हुए चल रहा था। जैसे जैसे ऊपर जाता जा रहा था, ऐसा लगता जा रहा था कि किसी भी समय हिम्मत जवाब दे देगी। इसलिए थोड़ी थोड़ी देर बाद रूक रूक कर एक टॉफ़ी मुँह में डालता और पानी का घूँट लेता तो जान में जान आती। एक किलोमीटर बाद चाय आदि का एक पड़ाव दिखा जहाँ पहुँचकर मोन्टू और स्निग्धा नें मैगी खाई तथा दूध की बनी बर्फ़ी ली जो कि वाकई स्वादिष्ट थी।
चाय आदि पी सभी पुनः चल पड़े, अपन भी कुछ अनमने ढंग से चल पड़े। अब अपने आप पर गुस्सा आ रहा था कि क्यों तंदुरूस्त नहीं हैं कि सभी की तरह चढ़ाई कर सकें!! लेकिन फ़िर अपने को समझाया कि यह पहाड़ी चढ़ाई है जिसका अभ्यास नहीं है, इसी कारण चलने में दिक्कत है नहीं तो यदि समतल जगह होती, जैसे दिल्ली की सड़के आदि तो चलने में कोई दिक्कत नहीं थी। पर फ़िर अंतर्मन ने कहा कि बाकी लोग भी तो मेरी तरह अभ्यस्त नहीं है, फ़िर वे कैसे चले जा रहे हैं?? अब इसका उत्तर क्या देता!! काकन अपना आईपॉड कान में लगा सबसे आगे चली जा रही थी, मोन्टू उसके पीछे था और स्निग्धा मेरे साथ मेरा हौसला बढ़ाते हुए चल रही थी।
हौसले की डोर मज़बूती से पकड़े हम दूसरे चाय के पड़ाव पर पहुँचे। यहाँ बैठ चैन की साँस ली। चाय वाले से पता चला कि हम लगभग ढाई किलोमीटर आ गए हैं, यानि कि लगभग डेढ़ किलोमीटर की चढ़ाई और बाकी थी। पुनः हौसला बटोर हम चल पड़े अपनी मन्ज़िल की ओर। आखिरकार तकरीबन 5 घंटे बाद हम ऊपर तुन्गनाथ पहुँच गए। वहाँ पहली जो सराय दिखी उसी में चले गए। सराय के मालिक अंकल गढ़वाल राईफ़ल से सेवानिवृत्त फ़ौजी थे जिन्होंने 1962-1971 के दौरान चीन और पाकिस्तान से हुई लड़ाईयों में भाग लिया था। सभी साथी लोग थके मांदे थे, तुरंत कुर्सियों पर पसर गए और गर्म चाय का आनंद लेने लगे। उसके बाद मंदिर हो कर आने का निर्णय लिया, फ़ौजी अंकल ने चार पूजा की थालियाँ हम लोगों के लिए सजा दी थी। तो हम सामने मौजूद मंदिर की ओर हो लिए। यह मंदिर भी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में था।
एक पुजारी ने हमारी पूजा करवाई। पुजारी ने ही बताया कि तुन्गनाथ भी पांडवों द्वारा लगभग 5500 वर्ष पहले बनाया गया था। विश्वास या अविश्वास का कोई प्रश्न नहीं था, जिसको मानना है वो माने, जिसको नहीं मानना वो नहीं माने। हमें बिना ठोस तथ्यों के यकीन नहीं तो हम नहीं मानते। पूजा अर्चना के बाद पुजारी ने कहा कि सांय काल साढ़े सात बजे आरती होती है और यदि हम आ सकें तो आना चाहिए। अपने को तो ठण्ड लग रही थी, वापस सराय में आकर गर्म कपड़े पहने, लेकिन ध्यान आया कि अपनी जैकेट तो नीचे गाड़ी में ही भूल आया था!!
खैर, अपना स्लीपिंग बैग खोल उसमें घुस गए और रजाई ओढ़ ली तो थोड़ा चैन पड़ा। तभी गर्मा-गर्म पकौड़े बन कर आ गए और उनका भोग लगाया गया। लेकिन सारी गड़बड़ यहीं हो गई। जिस तेल में पकौड़े बने थे, वह रास नहीं आया और तबियत खराब सी लगी। सिर पर कंबल लपेट अपन तो स्लीपिंग बैग में सो गए, बाकी लोग आरती में भी हो आए और सांय काल सूर्यास्त का अदभुद नज़ारा भी देखा, लेकिन अपन बाहर नहीं आए। परन्तु हमारे लिए कुछ सुन्दर तस्वीरें ले ली गई ताकि हम देख सकें कि हमने कैसा नज़ारा “लाईव” नहीं देखा। आप भी देखिए:
लेकिन रात्रि होते होते तबियत और खराब लग रही थी। उल्टी आने को हो रही थी, इसलिए खाना भी नहीं खाया। थोड़ी देर बाद सोचा की कर करा के मामला निबटा ही लिया जाए। उल्टी करने से अंदर का कचरा बाहर निकल गया तो राहत मिली। वापस कमरे में आकर मैंने और मोन्टू ने ऑक्सीजन की कमी से निबटने के लिए दवाई खाई, चैन पड़ा तो फ़िर नींद की शरण में पहुँचे। सभी का सुबह 4 बजे उठने का पिरोगराम था, ताकि एक किलोमीटर का और रास्ता तय कर चन्द्रशिला की चोटी पर जा नंदा देवी के पीछे से होने वाले सूर्योदय को देखा जा सके। अपनी तो नींद तीन बजे ही खुल गई और रजाई में लिपटे बेचैनी से बैठे रहे। लेकिन कुदरत महरबान तो इंसान कीकड़ी पहलवान, सुबह सवेरे तेज़ बरसात होने लगी, सभी के अरमानों पर बारिश का पानी पड़ गया। अब तो टेन्शन थी कि बारिश रूके तो नीचे की यात्रा आरम्भ की जाए। दिन निकलने पर सभी ने मैगी का नाश्ता किया, मैंने भी किया। उसके बाद बरसात रूकी तो फ़ौजी अंकल को विदा कह हम वापस नीचे की ओर बढ़ चले। बरसात के कारण सारे रास्ते में फ़िसलन थी, इसलिए सावधानी से उतरा जा रहा था। लेकिन उतरने की रफ़्तार चढ़ने की रफ़्तार से अधिक थी। तकरीबन ढाई घंटे में हम लोग वापस चोपटा पहुँच गए थे। मिशन तुन्गनाथ पूरा होने पर सभी प्रसन्न थे।
मैं स्निग्धा का आभारी हूँ कि चढ़ते और उतरते समय वह मेरा हौसला बढ़ाती मेरे साथ चल रही थी और मोन्टू का आभारी हूँ कि चढ़ते समय उसने मेरा स्लीपिंग बैग ले मेरा बोझ कम किया।
चोपटा में अधिक समय ना लगाते हुए सभी ने अपना अपना सामान गाड़ी में लादा और गाड़ी में सवार हो वापसी की राह पकड़ी। अब हमारा अगला पड़ाव मन्दाकिनी नदी के तट पर सियालसौर में मौजूद गढ़वाल मण्डल का यात्री निवास था, जो कि उखीमठ से तकरीबन 20 किलोमीटर आगे था।
अगलें अंक में ज़ारी …..