
योरोपियन यूनियन को खर्च आदि के लिए जो सदस्य देशों से पैसा मिलता है लगता है वह उनको पूरा नहीं पड़ता, इसलिए इधर-उधर भी हाथ पाँव मारते रहते हैं!! योरोपियन यूनियन वालों का पसंदीदा बैंक माइक्रोसॉफ़्ट (Microsoft) है। माइक्रोसॉफ़्ट और बैंक? जी हाँ, योरोपियन यूनियन के लिए तो माइक्रोसॉफ़्ट बैंक ही है जिससे वे आए दिन करोड़ों अरबों डॉलर वसूलते रहते हैं। माइक्रोसॉफ़्ट के संस्थापक और पूर्व चेयरमैन बिल गेट्स (Bill Gates) की उदारता तो जग ज़ाहिर है, वे दुनिया के सबसे बड़े दानवीरों में से एक हैं, महाभारत काल के महाबली कर्ण से प्रभावित लगते हैं।
उनकी यही दानवीरता माइक्रोसॉफ़्ट की आत्मा में भी बसी नज़र आती है और इसलिए माइक्रोसॉफ़्ट भी योरोपियन यूनियन जैसों को डॉलर बाँटती रहती है।
और यह कैसे होता है? ज़्यादा कुछ नहीं करना पड़ता, योरोपियन कमीशन को बस थोड़ी नौटंकी स्टेज करनी होती है। अब योरोपियन यूनियन और उसमें मौजूद देशों में उनका कानून लागू होता है, उनकी ज्यूरिस्डिक्शन (Jurisdiction = अधिकार क्षेत्र) है। किसी योरोपियन कंपनी द्वारा माइक्रोसॉफ़्ट पर एकदम फालतू किस्म का मुकदमा ठोका जाता है और अपेक्षित रूप से माइक्रोसॉफ़्ट उसे हार जाती है और योरोपियन कमीशन जुर्माने के तौर पर करोड़ों डॉलर वसूल लेती है।
तीन-चार वर्ष पूर्व रियल प्लेयर (Real Player) बनाने वाली योरोपियन कंपनी रियल नेटवर्क्स (Real Networks) ने योरोपियन कमीशन के सामने गुहार लगाई थी कि माइक्रोसॉफ़्ट विन्डोज़ (Windows) के साथ मीडिया प्लेयर सॉफ़्टवेयर देता है जिस कारण उसका थकेला रियल प्लेयर कोई नहीं खरीदता!! और जैसा कि अपेक्षित था, अदालत ने क्रांतिकारी फैसला सुनाया कि विंडोज़ इस्तेमाल करने वालों को यह विकल्प मिलना चाहिए कि वे कौन से सॉफ़्टवेयर में गाने सुनना और फिल्म देखना चाहते हैं, उन पर कोई सॉफ़्टवेयर थोपा नहीं जाना चाहिए। और साथ ही अदालत ने कोई 75-76 करोड़ डॉलर की जुर्माने के रूप में माइक्रोसॉफ़्ट से उगाही कर ली थी!! अब पहली बात तो मैं अपना मत व्यक्त करता हूँ – रियल प्लेयर ऐसा थकेला सॉफ़्टवेयर होता था (अब है कि नहीं पता नहीं) कि यदि मुझे फोकट में भी मिलता तो मैं उसको प्रयोग न करता, उसको पैसे देकर खरीदने का तो सवाल ही नहीं उठता!! दूसरी बात यह कि इस क्रांतिकारी फैसले से उस उपभोग्ता को कितना लाभ पहुँचा जिसके नाम पर यह चौथ वसूली हुई थी?? उपभोग्ता तो वहीं का वहीं रह गया, उसे इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। क्यों? क्योंकि माइक्रोसॉफ़्ट ने तो अदालती फैसले के बाद विन्डोज़ का बिना मीडिया प्लेयर का संस्करण उपलब्ध कराना शुरु कर दिया था लेकिन वह उपभोग्ता थोड़े ही चुनता था, उसका चुनाव कंप्यूटर निर्माता कंपनियों के हाथ में था, जिस कंपनी को रियल नेटवर्क्स पैसा खिला दे वह बिना मीडिया प्लेयर वाली विन्डोज़ में रियल प्लेयर का ट्रायल वर्ज़न डाल उपभोग्ता को खिसका देता।
और आज भी कुछ अलग नहीं होता है, यदि आप ब्रांडिड कंप्यूटर अथवा लैपटॉप खरीदें जैसे कि डैल (Dell), सोनी वायो (Sony Vaio), एचपी (HP) आदि तो उसमें पहले से बहुत से ट्रायल वर्ज़न इंस्टॉल हुए आते हैं उन सभी सॉफ़्टवेयरों के जिनके निर्माता इन कंप्यूटर निर्माताओं को रोकड़ा देते हैं। और यह तब है जब आप पैसे देकर कंप्यूटर खरीद रहे हो न कि फोकट में ले रहे हो और उसके बावजूद ये फालतू कचरा आपको थमाया जाता है।
अब इस वाले मामले में माइक्रोसॉफ़्ट से तो चौथ वसूल ली गई माइक्रोसॉफ़्ट का एकाधिकार यानि कि मोनोपली (monopoly) रोकने के लिए लेकिन बाकी एकाधिकार वाले मामलों में योरोपियन कमीशन खामोश क्यों रहा/है?!! उदाहरण के लिए आईपॉड (iPod) निर्माता सेब को देखते हैं। आज की तारीख में एमपी3 (MP3) प्लेयरों के मामले में आईपॉड (iPod) से अधिक हिस्सा बाज़ार में और किसी के पास नहीं है, कुछ सर्वेक्षण आंकड़ों की मानें तो साठ प्रतिशत से अधिक हिस्सा आईपॉड (iPod) के नाम दर्ज है। और यहाँ पर सेब के ऊपर मुकदमा निम्न कारणों के लिए बन सकता है:
सेब के साथ ऐसा मसला क्यों है? क्योंकि वह शुरू से ही मोनोपोलिस्ट (Monopolist) स्वभाव की कंपनी है, वे लोग नहीं चाहते कि कोई एक बार उनके जाल में फंसे तो वह फिर बाहर निकल सके!! और योरोपियन कमीशन इस बारे में कुछ करता क्यों नहीं? अजी जब माइक्रोसॉफ़्ट जैसी दुधारू गाय हो तो फिर सूखी मरियल गायों की ओर देखने की भी क्या आवश्यकता। हाँ यदि वाकई में नीयत नेक होती जैसी दर्शायी जाती है तो फिर ये किसी को न छोड़ते, चाहे माइक्रोसॉफ़्ट हो या सेब!!
और लगता है अब योरोपियन कमीशन को फिर से रोकड़े की आवश्यकता पड़ गई है, वैसे भी आजकल पश्चिमी अर्थव्यवस्था की अधिक वाट लगी हुई है। कुछ समय पहले ऑपरा ब्राऊज़र बनाने वाली योरोपियन कंपनी के सदके फिर से योरोपियन अदालत में माइक्रोसॉफ़्ट पर मुकदमा ठोका गया है, इस बार तकलीफ़ यह है कि माइक्रोसॉफ़्ट विन्डोज़ के साथ इंटरनेट एक्सप्लोरर (Internet Explorer) ब्राऊज़र काहे देता है, इससे वह अपने प्रतियोगियों की वाट लगा रहा है!! लो कल्लो बात, अब विन्डोज़ के साथ यदि ब्राऊज़र नहीं आएगा तो लोग दूसरा ब्राऊज़र क्या योरोपियन कमीशन के दफ़्तर में जाकर उतारेंगे?!!
यह सब भी जनता जनार्दन की भलाई के नाम पर हो रहा है लेकिन मुझे लगता है कि यहाँ भी मामले ने वैसी ही करवट बैठना है जैसे वो रियल प्लेयर वाले मामले में बैठा था। अंत-पंत फैसला कंप्यूटर निर्माताओं के हाथ में जाना है और जो कोई उनको अधिक पैसे खिला देगा उसी का ब्राऊज़र वे लोग कंप्यूटरों में डाल लोगों को खिसका देंगे!! जय हो!!
और अभी कुछ समय पहले पढ़ने में आया था कि गूगल भी इस मामले में योरोपियन कमीशन और ऑपरा (Opera) के साथ है, भई आखिर क्यों न होगा, अब गूगल भी तो क्रोम (Chrome) नामक ब्राऊज़र का निर्माता है!! और यह वही गूगल है जो थोड़े समय पहले तक मोज़िला (Mozilla) वालों को पैसे देता था ताकि वे फायरफॉक्स (Firefox) ब्राऊज़र में डिफ़ॉल्ट सर्च इंजन के रूप में गूगल को रखें और इसके लिए गूगल ने उनके लिए अलग से एक खास पन्ना भी अपनी वेबसाइट पर बना रखा था!!
लेकिन इस मामले में चकित किया ऑपरा (Opera) ने। ऑपरा का ब्राऊज़र एक अच्छा ब्राऊज़र है, मैं इसका प्रयोग कंप्यूटर पर भी करता हूँ और अपने विन्डोज़ मोबाइल में भी। और इसलिए ऑपरा से ऐसी ओछी हरकत की आशा नहीं थी।
क्या वे लोग सोच रहे हैं कि इस तरह विन्डोज़ से इंटरनेट एक्सप्लोरर (Internet Explorer) हटवा के वे लोग वेब ब्राऊज़र बाज़ार का अधिक हिस्सा प्राप्त कर लेंगे? उन्होंने मोज़िला (Mozilla) के फायरफॉक्स (Firefox) ब्राऊज़र को देख के भी सीख न ली!! दस वर्ष बाद आज ऑपरा ब्राऊज़र का बाज़ार में जितना हिस्सा है उससे पच्चीस-तीस गुणा अधिक फायरफॉक्स (Firefox) ने पिछले चार-पाँच वर्षों में बिना ऐसी किसी हरकत के हासिल किया है!!
अब इस मामले में भी अन्य खेमे माइक्रोसॉफ़्ट जैसे मिल जाएँगे, जैसे कि हर बड़े लिनेक्स संस्करण के साथ फायरफॉक्स ब्राऊज़र आता है, सेब अपने मैक के साथ अपना थकेला सफ़ारी (Safari) ब्राऊज़र देता है। लेकिन मामला वही दुधारू गाय और मरियल गाय का है, योरोपियन कमीशन को लिनेक्स के खेमे से धेला नहीं मिलने वाला और जब माइक्रोसॉफ़्ट जैसी दुधारू गाय है तो सेब की ओर क्या देखना!!
लानत है!!
पिछले कुछ समय में याहू सुर्खियों में रहा, कारण उसका खस्तेहाल होना, फिर माइक्रोसॉफ़्ट का उसको खरीदने का प्रस्ताव रखना और उसको याहू द्वारा ठुकरा दिया जाना था। माइक्रोसॉफ़्ट की ओर से होस्टाइल टेकओवर (hostile takeover) की अपेक्षा भी की जा रही थी लेकिन माइक्रोसॉफ़्ट ने ऐसी कोई कोशिश न करी और याहू द्वारा खरीद के प्रस्ताव को ठुकरा दिए जाने के बाद आराम से बैठ गई। लोगों ने सोचा कि मामला समाप्त हो गया, अब याहू वाले या तो वापस डॉलर छापना शुरु करेंगे या किसी और के हाथ बिकेंगे।
लेकिन मुझे यकीन नहीं आ रहा था, दमदार किरदारों वाला मामला ऐसे कैसे ठंडे-२ निपट सकता है। जल्द ही शंका सच साबित हुई, यानि कि फिल्म अभी बाकी है!!

इंटरवल के बाद फिल्म में पदार्पण होता है एक अरबपति अमेरिकी फाईनेन्सर और कॉर्पोरेट रेडर (corporate raider) का और फिल्म पुनः चालू हो जाती है। नाम? आईकॉन, कार्ल आईकॉन (Carl Icahn) और इन बहत्तर वर्षीय अमेरिकी अरबपति का नाम दुनिया के पचास सबसे रईस लोगों में शुमार होता है और इनको कंपनियों के मैनेजमेन्ट का तख्ता पलटने में महारत हासिल है। ऐसा ये कैसे करते हैं? टार्गेट कंपनी के कई सारे शेयर खरीद उस कंपनी में वोटिंग अधिकार हासिल कर और उनका प्रयोग कर तथा अन्य शेयरहोल्डरों को अपनी ओर मिलाकर ये कंपनी के मैनेजमेन्ट को निकास द्वार दिखा देते हैं।
अब कुछ ऐसा ही ये याहू के साथ भी करने का इरादा रखते हैं। जहाँ इस वर्ष अप्रैल तक इनके पास याहू का एक भी शेयर नहीं था वहीं आज की तारीख़ में ये याहू के चार प्रतिशत शेयरों पर काबिज़ हैं जो कि काफ़ी अच्छी खासी संख्या है। इनका मानना है कि याहू की मौजूदा मैनेजमेन्ट नाकारा है, कंपनी की दुर्दशा की तो ज़िम्मेदार है ही बल्कि माइक्रोसॉफ़्ट की इतनी अच्छी पेशकश ठुकरा कर मैनेजमेन्ट ने एक निहायत ही अहमकाना हरकत की है और इसका उपाय यही है कि जैरी यैंग एण्ड पार्टी को क्लीन बोल्ड कर दिया जाए। इसलिए उसी इरादे के मद्देनज़र कार्ल साहब की याहू मैनेजमेन्ट से खुल्लम-खुल्ला छिड़ गई है, पत्रों का खुले रुप से आदान-प्रदान हो रहा है, एक क्या कह रहा है इसमें दूसरे की कतई रुचि नहीं है। कार्ल साहब का मकसद शेयरहोल्डरों को अपने प्रभाव में लाना है ताकि वे मौजूदा मैनेजमेन्ट के नीचे से कुर्सियाँ खींच सकें और उन पर अपने बन्दे बिठा सकें जो कि कदाचित् आगे माइक्रोसॉफ़्ट से याहू की डील कर सकें। उधर जैरी यैंग एण्ड पार्टी का मकसद अपनी कुर्सियाँ बचाए रखना है ताकि कार्ल बाबू की मंशा पूर्ण न हो सके। काफ़ी प्रबल संभावना है कि इस उठा-पटक के नतीजे अगस्त में होने वाली याहू के शेयरहोल्डरों की मीटिंग में सामने आ जाएँगे कि इस मुठभेड़ में कौन विजयी रहा – कार्ल आईकॉन या जैरी यैंग एण्ड पार्टी।
साथ ही मुझे पूरा विश्वास है कि माइक्रोसॉफ़्ट ने बेशक याहू से अपनी रुचि हट गई दिखाई है लेकिन ध्यान उनका भी इधर बराबर होगा कि कार्ल आईकॉन और जैरी यैंग एण्ड पार्टी की इस रस्सा-कशी में कौन बाज़ी ले जाता है क्योंकि यदि कार्ल बाबू जीतते हैं तो याहू को पाने के दरवाज़े माइक्रोसॉफ़्ट के लिए खुल जाएँगे।
अपने को भी इस बिल्लियों की लड़ाई में मज़ा आ रहा है, आगे-२ देखिए होता है क्या, क्योंकि फिल्म अभी बाकी है!!
आजकल हाल ये है कि कोई भी किसी भी चीज़ का गुरु बन जाता है, चाहे विषय के बारे में धेला नहीं पता हो लेकिन गुरु बन जाते हैं, जैसे मार्केटिंग गुरु, एडवरटाइज़िंग गुरु, मैनेजमेन्ट गुरु, टेक्नॉलोजी गुरु! अब इन्हीं को लीजिए, कुछ दिन पहले एक बड़े अख़बार में एक गैजेट गुरु (Gadget Guru) को पढ़ा, जनाब कैमरों पर क्या कमाल का ज्ञान रखते हैं और क्या कमाल की सलाह दे रहे थे, अपन तो भई क्लीन बोल्ड हो गए!!
ये गैजेट वाले गुरुजी सलाह दे रहे थे कि कैनन पॉवरशॉट जी9 (Canon Powershot G9) एक टॉप ऑफ़ द रेन्ज कैमरा है, इसमें 12 मेगापिक्सल हैं, वाह जी वाह!! साथ में इसकी महान फीचर बताते हैं कि इसमें मासिव (massive) यानि कि महाकाय 6x का ऑप्टिकल ज़ूम (optical zoom) है!! वाह जी वाह, ऐसी सलाहों पर तो हम जैसे निहाल हो जाएँ!!
यदि ये साहब सामने होते तो इनको बताता कि जनाब 10x के ऑप्टिकल ज़ूम वाले कैमरे आते ज़माना हो गया और अब तो 20x ऑप्टिकल ज़ूम वाले कैमरे भी आ गए हैं। तो किसी कैमरे के 6x ऑप्टिकल ज़ूम को महाकाय बताना और 12 मेगापिक्सल के कारण उसको टॉप ऑफ़ द लाइन कहना कहीं से भी समझदार आदमी की पहचान नहीं है खासतौर से तब जब वह व्यक्ति गुरु हो!! और तो छोड़िए, जब आगे पढ़ा तो तय कर लिया कि अच्छा ही है ये साहब सामने नहीं थे, ऐसे गुरुओं से मिलना मेरी खुद की तौहीन है। क्यों? इन साहब ने आगे लिखा कि यह कैनन पॉवरशॉट जी9 एक डीएसएलआर (DSLR) है!!
क्या मज़ाक हो रहा है? नहीं जी, अज्ञानी जनता को सरासर मूर्ख बनाया जा रहा है!!!
वैसे तो लगता नहीं कि इन साहब को इंटरनेट का ज्ञान होगा(यहीं कहीं इधर-उधर से थोड़ा बहुत ज्ञान हासिल कर गुरु बन गए दिखते हैं) लेकिन फिर भी यदि वे इस ब्लॉग को पढ़ रहे हों तो उनको बताना चाहूँगा कि जनाब अभी तक कैनन वालों ने पॉवरशॉट सीरीज़ में कोई डीएसएलआर नहीं निकाला है, यह उनकी प्वाइंट एण्ड शूट (Point and Shoot) कैमरों की रेन्ज है, डीएसएलआर उनके अभी तक ईओएस (EOS) सीरीज़ में ही आ रहे हैं!! अब आगे तो क्या कहें, इन गुरु जी ने निकोन (Nikon) के टंटपुँजिये से 3x ऑप्टिकल ज़ूम वाले (फीचर्स में)हल्के कैमरे भी टॉप ऑफ़ द लाइन में रखे हुए थे कदाचित् इसलिए कि उनका दाम पंद्रह हज़ार रुपए से अधिक था। खैर अपने को क्या, इन्हें ही मुबारक इनकी गुरुगिरी!!
लेकिन लगता है कि उस दिन मेरा महान लोगों से अप्रत्यक्ष (indirectly) रुप में रुबरु होने का ही दिन था। पिछली रात को स्टॉर न्यूज़ पर बारह बजे तीन देवियाँ देखना भूल गया था, मुझे पूरा विश्वास है कि टैरो नहीं तो चन्द्र राशिफल अन्यथा अंक ज्योतिष में तो अवश्य ही मेरे बारे में ऐसा कुछ बताया होगा कि मेरा महान लोगों से रुबरु होने का दिन है।
पहले से पता होता तो हो सकता है कुछ जुगाड़ लगा मैं ऐसी अनहोनी होने से रोक देता!
हाँ तो अभी दिन पूरा बीता नहीं था कि एक और महान आत्मा से अप्रत्यक्ष रुप में रुबरु हुआ। ये भारत की एक प्रसिद्ध टेक्नॉलोजी पत्रिका में डॉक्टर साहब हैं जो पाठकों के तकनीकी मर्ज़ का उपचार करते हैं। एक पाठक ने इनसे प्रश्न किया(जो उन्होंने छापा वही बता रहा हूँ):
डॉक्टर साहब….. डॉक्टर साहब….. लिनक्स में माउस के द्वारा ही किसी भी फाइल को कॉपी कर चिपका देने की सुविधा होती है, कीबोर्ड द्वारा Ctrl + C और Ctrl + V का झंझट ही नहीं होता। क्या माइक्रोसॉफ़्ट विन्डोज़ में भी ऐसी कोई सुविधा हो सकती है?
उत्तर में डॉक्टर साहब का कहना था कि यह सुविधा विन्डोज़ में पाने के लिए पाठक को टीएक्समाउस (TxMouse) नामक सॉफ़्टवेयर लगाना होगा। लगता है इन तथाकथित डॉक्टर साहब को यह नहीं पता कि लिनक्स में ग्राफिकल यूज़र इंटरफेस (Graphical User Interface) आने से काफी पहले से विन्डोज़ में माउस द्वारा किसी भी फाइल अथवा फोल्डर को कॉपी और पेस्ट करने की सुविधा मौजूद है!! सिर्फ़ फाइल अथवा फोल्डर को चुन के राइट-क्लिक करना होता है और कॉपी आदि के विकल्प हाज़िर हो जाते हैं, कीबोर्ड की आवश्यकता ही नहीं है इस कार्य के लिए। और यदि एक खिड़की से दूसरी खिड़की में कॉपी-पेस्ट करना हो तो फाइल/फोल्डर को चुन के माउस का दाहिना बटन दबाए हुए उसको दूसरी खिड़की में घसीट देने से फाइल/फोल्डर कॉपी हो जाता है!! आईला, ये तो फिल्म कोई मिल गया में रितिक रोशन को भी पता होता है, पर उसे यह तब पता चलता है जब जादू उसके दिमाग को विकसित करता है!! इन डॉक्टर साहब को भी लगता है वही मर्ज़ है पर जादू तो वापस गया, कोई नहीं, रितिक रोशन से जादू को बुलाने वाला कंप्यूटर लेकर बुला सकते हैं, रितिक भईया मना थोड़े ही करेंगे!!
और डॉक्टर साहब के साथ-२ मुझे लगता है कि इस सॉफ़्टवेयर को बनाने वाले जनाब को भी जादू से दिमाग का इलाज कराने की ज़रूरत है क्योंकि सॉफ़्टवेयर की वेबसाइट पर वे भी ऐसी ही अंट-शंट बातें कर रहे हैं कि विन्डोज़ में कॉपी-पेस्ट करने के लिए पहले माउस से माल को सेलेक्ट करना होता है फिर एडिट मेनू में जाना होता है और फिर कॉपी के विकल्प पर क्लिक करना होता है!! इन साहब को भी राइट-क्लिक मेनू का नहीं पता!!
यदि माइक्रोसॉफ़्ट वालों को यह पता चले तो वे लोग या तो हंस-हंस के पागल हो जाएँगे या अपना सिर पीट लेंगे!! अब इससे ख्याल आ रहा है कि अपने एक मित्र को, जो कि माइक्रोसॉफ़्ट में कार्यरत है, यह पोस्ट दिखा ही दूँगा, उसको भी हंसने के लिए एक बहाना मिल जाएगा दिन में, ही ही ही!!
ऐसे गुरुओं और डॉक्टरों से बचकर रहने में ही भलाई है। लगता है कि यदि यही हाल रहा तो मैं टेक्नॉलोजी पत्रिकाएँ कुछ टेक्नॉलोजी पर पढ़ने की जगह मूर्खता भरे चुटकुले पढ़ने के लिए ले रहा होऊँगा और जल्द ही वह लेना भी बंद कर दूँगा, 125 रुपए में बेवकूफ़ नहीं हूँ कि चुटकुले की पत्रिका खरीदूँ, पंद्रह रुपए में अच्छी खासी पॉकेट बुक मिल जाती है चुटकुलों की!!
कुछ समय पहले मैंने अडोबी की हवा यानि कि अडोबी एयर (Adobe AIR) के बारे में लिखा था और ट्विट्टर के लिए जुगाड़ बताए थे तथा गूगल एनालिटिक्स का भी जुगाड़ बताया था। अडोबी एयर भी वेब सेवाओं (Web Services) को डेस्कटॉप पर लाने का ही जुगाड़ है लेकिन इसकी एक खामी यह है कि इसमें सीधे-२ किसी भी मौजूदा वेब-सेवा को डेस्कटॉप सॉफ़्टवेयर की तरह नहीं प्रयोग कर सकते, उस वेब सेवा के लिए अडोबी एयर का सॉफ़्टवेयर होना आवश्यक है। लेकिन यदि हमें कोई वेब सेवा खासी प्रिय है और वह अधिक लोकप्रिय नहीं तो क्या उसके लिए कोई जुगाड़ न होगा?
जुगाड़ बिलकुल है लेकिन मोज़िला वालों के पास, उनके सॉफ़्टवेयर प्रिज़्म (Prism) के रूप में। भूतकाल में वेबरन्नर (Webrunner) के नाम से जाना जाने वाला यह सॉफ़्टवेयर आपकी किसी भी पसंददीदा वेब सेवा को डेस्कटॉप सॉफ़्टवेयर में बदल सकता है। उदाहरण के लिए निम्न स्क्रीनशॉट में ब्लॉगलाइन्स (Bloglines) फीड रीडर को देखें।
यह एक वेब सेवा है लेकिन यहाँ इसको डेस्कटॉप सॉफ़्टवेयर की भांति एक शॉर्टकट आइकन (shortcut icon) पर क्लिक कर इसकी अपनी खिड़की में इसको चलाया है और यह संभव हुआ मोज़िला प्रिज़्म से।
मोज़िला के ब्राउज़र इंजन पर आधारित(वही जिस पर फायरफॉक्स आधारित है) यह एक सॉफ़्टवेयर है जिसमें ब्राउज़र की भांति एड्रैस बार, पिछले-अगले पन्ने पर जाने के बटन, मेनू आदि नहीं हैं। इसमें आप किसी भी वेबसाइट को सॉफ़्टवेयर की भांति लगा सकते हैं और यह उसका आइकन (icon) आपके डेस्कटॉप पर डाल देगा। उस आइकन पर क्लिक करने पर एक खिड़की खुलेगी जिसमें वह वेब पता लोड हो जाएगा जो आपने उस आइकन को लगाते समय प्रिज़्म में डाला था। यदि प्रिज़्म को खोला जाए तो निम्न स्क्रीनशॉट जैसा दिखता है जिसमें वह आपकी पसंदीदा वेबसाइट का पता माँगता है जिसे आप वेबएप्प (Web App) की भांति प्रयोग करना चाहते हैं।
जैसा कि ऊपर के स्क्रीनशॉट में दिख रहा है, आप वेबसाइट का पता डालिए, उसके लिए नाम डालिए। यदि आप लोकेशन/एड्रैस बार (Location/Address Bar) भी चाहते हैं इस खिड़की में तो उस विकल्प को चुन लीजिए, साथ ही अन्य कोई विकल्प जो आप चाहते हों। उसके बाद नीचे के हिस्से में आप चुन सकते हैं कि आप इस वेब-सेवा का आइकन कहाँ लगाना चाहते हैं जहाँ क्लिक कर आप इसे चालू करेंगे। एक बढ़िया बात यह है कि प्रिज़्म कोई सॉफ़्टवेयर नहीं इंस्टॉल करता वरन् सिर्फ़ एक आइकन लगाता है जिसे मिटा आप उस वेब-एप्प को अपने कंप्यूटर से हटा सकते हैं। न कोई जगह घेरने का झंझट और न ही रजिस्ट्री का लफड़ा!!
प्रिज़्म का असली लाभ यह है कि यह आपकी पसंदीदा वेब-सेवा को ब्राउज़र से मुक्त कर देता है, यानि कि यदि किसी कारणवश आपका ब्राउज़र क्रैश अथवा बंद हो जाता है तो आपकी कुछ आवश्यक सेवाएँ जैसे कि फीड रीडर, ईमेल आदि नहीं बंद होंगी। लेकिन प्रिज़्म को प्रयोग करने का फायदा उन्हीं वेब सेवाओं के साथ है जिनको आप अलग-२ टैब में नहीं खोलते और जो एक ही टैब में चलती रहती हैं जैसे जीमेल, आदि।
मैं किन सेवाओं में इसको प्रयोग करता हूँ? एक तो आपने पहले स्क्रीनशॉट में ऊपर देख ही ली, ब्लॉगलाइन्स, जिसका मौजूदा वर्ज़न तो फ्रेम में होता है इसलिए नए टैब में कुछ खोलने की आवश्यकता ही नहीं और एक टैब में ही काम हो जाता है। इसका नया वर्ज़न, जो अभी बीटा में है, फ्रेम से मुक्त हो गया है और उसमें एजैक्स (AJAX) आदि के प्रयोग से उसको एक डेस्कटॉप सॉफ़्टवेयर का रुप दे दिया गया है और मैं यही प्रयोग करता हूँ, प्रिज़्म के साथ जोड़ी जबरदस्त बन जाती है।
दो अन्य प्रिज़्म की खिड़कियाँ जो हमेशा मेरे कंप्यूटर पर खुली रहती हैं वे हैं याहू ईमेल और जीमेल। याहू ईमेल का नया वर्ज़न भी एक डेस्कटॉप सॉफ़्टवेयर का ही रुप है जो कि माइक्रोसॉफ़्ट आउटलुक (Microsoft Outlook) से प्रेरणा लिए हुए लगता है। इसमें ईमेल को इसी के इंटरफेस में नए टैब में खोलने की सुविधा है इसलिए यह भी प्रिज़्म के साथ मिल एक बढ़िया जोड़ी बनाता है।
इसी तरह जीमेल में भी कोई नया टैब तो खुलता नहीं, सब एक ही टैब में रहता है इसलिए इसको भी ब्राउज़र से मुक्ति दे प्रिज़्म के साथ इसकी जोड़ी बना दी।
अब आप सोच रहे होंगे कि यहाँ तक तो मामला ठीक है लेकिन पहले ब्राउज़र की एक खिड़की में ही टैब खोल ये सेवाएँ रहती थी और टास्कबार (taskbar) साफ़-सुथरी रहती थी जबकि यहाँ तो मैं कई सारी खिड़कियाँ खोलने का उपाय बता रहा हूँ, प्रत्येक वेब सेवा के लिए एक, और कहाँ लोगों ने तंग आकर टैब्बड ब्राउज़िंग (tabbed browsing) की ओर कदम बढ़ाया था। तो जनाब उसका भी इलाज है लेकिन वह मुझे माइक्रोसॉफ़्ट विन्डोज़ के लिए ही पता है(बाकियों के लिए आपको पता हो तो अवश्य बताना)। और वह उपाय है ट्रे इट (TrayIt) नामक मुफ्त सॉफ़्टवेयर। इस फोकटी जुगाड़ को आप अपने कंप्यूटर पर स्थापित कर चालू कर लें तो यह आपकी विन्डोज़ टॉस्कबार की सिस्टम ट्रे (system tray) में बैठ जाएगा। इसके बाद आपको किसी भी खिड़की के मिनिमाइज़ (minimize) बटन पर राइट क्लिक कर उसको सिस्टम ट्रे में मिनिमाइज़ करने का विकल्प हासिल हो जाएगा। तो इसकी सहायता से मोज़िला प्रिज़्म की सभी खिड़कियों को सिस्टम ट्रे में बिठा लीजिए और सिस्टम ट्रे में प्रत्येक का आइकन लग जाएगा जिसे क्लिक कर आप पुनः उस एप्प की खिड़की को खोल सकेंगे। सिस्टम ट्रे में एप्प के आइकन पर राइट क्लिक कर आप Place in System Tray नामक विकल्प चुनेंगे तो उस एप्प की खिड़की अपने आप ही सीधे सिस्टम ट्रे में मिनिमाइज़ होगी। इससे आपकी एक से अधिक खिड़की खुली होने की समस्या का भी निदान हो जाएगा और एक समय में केवल उतनी ही खिड़कियाँ खुलेंगी जितनी आपको चाहिए।
तो देर कैसी, अपने ऑपरेटिंग सिस्टम के लिए मोज़िला प्रिज़्म यहाँ से डाउनलोड करें। यदि आप माइक्रोसॉफ़्ट विन्डोज़ (Microsoft Windows) प्रयोग कर रहे हैं तो तत्पश्चात ट्रे इट सॉफ़्टवेयर डाउनलोड कर उसे स्थापित करें। कुछ प्रसिद्ध वेब सेवाओं के वेब-एप्प बंडल बने बनाए उपलब्ध हैं जिनको आप यहाँ डाउनलोड कर सकते हैं। इन वेब-एप्प बंडलों को डाउनलोड करिए और प्रिज़्म को स्थापित करने के बाद इन बंडलों को क्लिक कर चलाईये। इन बंडलों का लाभ यह है कि जिस सेवा के ये बंडल हैं उसके आइकन भी इन्हीं में हैं तो शॉर्टकट आइकन और सिस्टम ट्रे में आइकन उसी सेवा का दिखेगा और पहचानने में आसानी होगी कि कि कौन सा आइकन किस वेब सेवा का है। वास्तव में ये वेब एप्प बंडल सिर्फ़ एक ज़िप फाइल ही हैं जिनमें आइकन और प्रिज़्म का शॉर्टकट बंद है इसलिए इनको इंस्टॉल करने का झंझट नहीं और इन्हें हटाने के लिए इनको मिटाना ही काफ़ी है।
आपको यह जुगाड़ कैसा लगा अवश्य बताएँ। और यदि आप यह जुगाड़ पहले से प्रयोग कर रहे हैं तो हम सभी के साथ अपना अनुभव अवश्य बाँटें।
सुरक्षा एजेन्सियों की सहायता के लिए माइक्रोसॉफ़्ट ने अपने एनक्रिप्शन सॉफ़्टवेयर बिटलॉकर के एनक्रिप्शन को बाईपास करने के लिए COFEE नामक सॉफ़्टवेयर बनाया है जो वह सुरक्षा एजेन्सियों को फोकट में दे रहा है। http://is.gd/atP
इस सब का कारण यह बताया जा रहा है कि इस सॉफ़्टवेयर की सहायता से सुरक्षा एजेन्सियाँ उन अपराधियों को दबोच सकेंगी जो अपनी गतिविधियों संबन्धित जानकारी अपने साथियों को एनक्रिप्ट करके भेजते हैं। पर सोचने वाली बात यह है कि क्या अपराधियों के पास माइक्रोसॉफ़्ट के बिटलॉकर के अतिरिक्त कोई अन्य उपाय नहीं है क्या? बहुतेरे एनक्रिप्शन के जुगाड़ इंटरनेट पर उपलब्ध हैं, काहे कोई अपराधी अब बिटलॉकर को प्रयोग करेगा? और एनक्रिप्शन का जुगाड़ बनाना कोई बहुत मुश्किल भी तो नहीं है, पैसा फेंको और बहुत से फ्रीलांस सॉफ़्टवेयर इंजीनियर मिल जाएँगे ऐसा जुगाड़ बनाने के लिए!!