RSS

Posts Tagged ‘मीडिया’


कितने समझदार हैं ये पत्रकार…..


August 25th, 2008 | 13 Comments

अभी तीन-चार दिन पहले की बात है, मैं फ्रस्टियाया हुआ एक क्लाइंट के सॉफ़्टवेयर में आ गए बग को ठीक कर रहा था कि चैट पर जीतू भाई अवतरित हुए और एक लिंक थमा के बोले कि देखो इसे। मैंने सोचा कि कोई बढ़िया चीज़ होगी तो तुरंत देखा, और देख कर हंसी भी आई और तरस भी आया, क्योंकि मामला एक बार फिर पत्रकारों की एक चौथाई जानकारी और तीन चौथाई गप्प का था, पुनः अपनी समझदारी समाज के सर्वज्ञों ने दिखलाई थी, पुनः साबित किया कि उनको धेले की समझ नहीं और ना ही कहीं से उसको लेने की ज़रूरत वे महसूस करते हैं।

अब आप पूछें कि क्या हुआ, काहे मैं पत्रकारों को गलिया रहा हूँ तो मैं बताए देता हूँ क्या हुआ। हुआ यूँ कि जीतू भाई जो लिंक थमाए थे वह था जोश18 वालों की वेबसाइट पर छपी एक खबर का जिसका शीर्षक उन्होंने दिया था – “ज़रा बचके आपके बेडरूम में कोई है”।

खबर यूँ थी कि एक महिला नूतन शर्मा इंटरनेट पर कुछ खोज रही थीं कि उनको अपनी अश्लील तस्वीरें दिखाई दीं और तस्वीरों के बैकग्राउंड से वे उनके ही बेडरूम में ली गई जान पड़ती थीं। अब मोहतरमा ने तो ऐसा कोई काम किया नहीं दिखता था कि वे पेरिस हिल्टन (Paris Hilton) से मुकाबला कर रही हों, इसलिए उन्होंने पुलिस में शिकायत दर्ज़ की। पुलिस वालों ने भी अच्छे से तफ़्तीश की और पूरे कमरे को छान मारा, दीवारों अलमारियों फर्नीचर आदि सबको छान मारा लेकिन उनको कोई स्पाई कैमरा नहीं मिला। और अपने स्तर से ऊँचे स्तर की इस मुसीबत को उन्होंने साइबर अपराध शाखा को सौंप दिया। इसके बाद पुणे के एशियन स्कूल ऑफ़ साइबर लॉ (Asian School of Cyber Law) के अधिकारियों ने नूतन के घर का दौरा किया, छह महीने तक तफ़्तीश चली और आखिरकार निहायत ही काबिल-ए-तारीफ़ दानिशमंदी का परिचय देते हुए मामले को सुलझा दिया गया, घर के भेदी को पकड़ लिया गया। घर का भेदी कोई और नहीं नूतन का वेबकैम (webcam) था। लेकिन अधिकारी असमंजस में थे कि कैमरा तो बिना किसी के चलाए चल नहीं सकता, वह तो नूतन का ज़रखरीद गुलाम था, तो कैसे यह कयामत हुई कि उसने नूतन की अपने बेडरूम में कपड़े बदलते हुए आदि तस्वीर ले ली?

तफ़्तीश का जो नतीजा सामने आया उसके मुताबिक वेबकैमरा गद्दार था, किसी ने उसको हैक कर लिया। अपने रोज के काम निपटा नूतन ने कंप्यूटर को बंद कर दिया और इसके बावजूद उनके कैमरे ने उनकी तस्वीरें ले ली क्योंकि कंप्यूटर में ट्रोजन नाम का एक सॉफ़्टवेयर आ गया था जिसकी मदद से कोई दूर बैठा व्यक्ति उनके कैमरे को नियंत्रित कर रहा था, वह भी तब जब नूतन का कंप्यूटर बंद था।

यह तो हुई खबर, यह खबर किसी भी गैर तकनीकी व्यक्ति को टेन्शन में डाल सकती है, जो कि आईबीएन-7 (IBN-7) के इस पत्रकार का उद्देश्य लगता है। आखिर चूहे को चूहा बताएँगे तो खबर थोड़े ही बिकेगी!! खबर बेचने के लिए चूहे को डायनोसॉर बताना आवश्यक है। क्यों? कैसे? अभी बताते हैं।

इस मामले में वैसे पत्रकार की कोई खास गलती नहीं है लेकिन खबर को बिना अपनी जाँच के या जानकारी के ज़रूरत से अधिक फुला के और मिर्च-मसाला लगा के बताने की गलती अवश्य की गई है। ट्रोजन (Trojan) कोई एक सॉफ़्टवेयर नहीं होता वरन्‌ कंप्यूटर वॉयरसों की एक जाति होती है जिनको ट्रोजन हॉर्स कहते हैं। इनका नाम ट्रॉय (Troy) के ट्रोजन हॉर्स (Trojan Horse) पर पड़ा क्योंकि ये वॉयरस भी ठीक कहानी के घोड़े की भांति जो देखने में होते हैं वह असल में नहीं होते और पर्दे के पीछे चोरी-छिपे बहुत कुछ कर जाते हैं।

दूसरी बात मुझे यह समझ नहीं आती कि यदि कंप्यूटर बंद कर दिया गया है तो बिना बिजली के वेबकैमरा कैसे चालू रह सकता है? क्या कोई जादू है? क्या पत्रकार, पुलिस और नूतन कंप्यूटर को बंद करने का अर्थ जानते हैं? स्क्रीन को टीवी की तरह बंद कर देने को कंप्यूटर बंद करना नहीं कहते, वह तो सिर्फ़ स्क्रीन बंद हुई है, कंप्यूटर तो उसके साथ जुड़ा वह बड़ा सा डिब्बा होता है जो कि टेबल के नीचे छुपा के रखा होता है। स्क्रीन और कंप्यूटर में जो फर्क नहीं कर सकता उसे तो खैर कुछ कह ही नहीं सकते। खामखा का हल्ला मचा रहे हैं कि कंप्यूटर बंद होने के बाद भी वेबकैमरा चालू रहा और तस्वीरें लेता रहा!!

अब पुलिसवालों की भी सुध ली जाए। लोकल पुलिस का क्या कहें, साइबर क्राइम वालों को ही लो। एक स्पेशलाइज़्ड शाखा है लेकिन उनमें इतनी समझ नहीं कि तस्वीरें देख के यह पता लगाएँ कि तस्वीरें किस दिशा से ली गई और फिर उस दिशा में तस्वीर लेने वाले कैमरे को खोजें!! आखिर स्पाई कैमरा एक ही जगह पर होगा ना, अपने आप ही तो इधर-उधर उड़ता नहीं फिरता होगा?? या उसको दूर से संचालित करने वाला व्यक्ति उसको इधर-उधर उड़ा भी रहा था?? :roll: लेकिन नहीं, लगता है कि समझदार लोग आजकल पुलिस में भरती ही नहीं होते, या अपना टाइमपास करने के लिए पुलिस वाले ऐसे छोटे-मोटे मामलों को इतना लंबा खींचते हैं कि उनका अधिक से अधिक टाइमपास हो सके। जो काम पाँच मिनट में ताड़ जाने वाला था उसके लिए पुलिस वालों और साइबर अपराध शाखा के अधिकारियों ने छह महीने बर्बाद कर दिए!!

पत्रकारों को क्या कहें, ऐसे पत्रकार तो अब लानत भेजने के भी योग्य नहीं रहे, लेकिन ऐसे पुलिसवाले साइबर क्राइम (Cyber Crime) जैसी स्पेशलाइज़्ड शाखाओं में हैं तो इस देश का एक नागरिक और समाज का एक हिस्सा होने के नाते मुझे बहुत चिंता होती है। देश की आंतरिक सुरक्षा और अमन चैन बनाए रखने के लिए ज़िम्मेदार पुलिस जब इतनी समझ वाली है तो कोई आश्चर्य नहीं होता कि आंडू-पांडू ऐरे-गैरे आतंकवादी बम धमाके करके टहलते हुए चले जाते हैं और पुलिस चूहे के बिल सूंघती रह जाती है। आतंकवादी टहलते हुए आते हैं, बम फोड़ते हैं और ऐसे टहलते हुए निकल जाते हैं जैसे कंपनी बाग में सैर करने निकले हों। जब ये पाँच मिनट के काम में छह महीने लगा सकते हैं तो बड़े मामलों में तो पता नहीं कितने जन्म लगाएँगे!!! और उस पर फिर ये पुलिस वाले और ये पत्रकार सीना चौड़ा करके डंका पीटते हैं कि कैसे छह महीने की कड़ी तफ़्तीश के बाद इन्होंने अति जटिल गुत्थी को सुलझाया कि चोरी छुपे तस्वीरें किसने लीं!! तौबा!! :roll: संजय भाई नोट करें कि पुलिस ऐसी भी होती है। ;)

एक बार बस में जा रहा था तो दो लोग आपस में बात कर रहे थे। उनमें से एक दूसरे से बोला था – “यह देश राम भरोसे ही चल रहा है”। आज मुझे वाकई लगता है कि वह व्यक्ति कितना ज्ञानी था, वाकई आश्चर्य होता है कि ऐसे समझदारों के रहते देश चल कैसे रहा है। :roll:

 
यदि आप भी पढ़कर मज़ा लेना चाहते हैं तो उस खबर को यहाँ पढ़ें


ब्लॉगर भेंटवार्ता टेलीविजन पर …..


February 7th, 2008 | 5 Comments

पिछले माह, 12 जनवरी 2008, हुई दिल्ली ब्लॉग एण्ड न्यू मीडिया सोसायटी (Delhi Blog and New Media Society aka DBNMS) द्वारा आयोजित प्रथम ब्लॉगर भेंटवार्ता काफ़ी सफ़ल रही। बहुत से साथी ब्लॉगरों और ब्लॉग इच्छुकों और उत्सुकों ने इसमें भाग लेकर इस भेंट को सफ़ल बनाया। अपने हिन्दी ब्लॉगजगत से भी कई बंधुओं ने शिरकत कर मेरी इस सोच को मज़बूत किया कि ब्लॉगर चाहे कैसा हो और चाहे किसी भी भाषा में लिखता हो परन्तु होता वह ब्लॉगर ही है इसलिए हम इस ब्लॉगजगत में क्षेत्र अथवा भाषा के मापदंड पर बंटवारा नहीं करेंगे। :)

मीडिया में भी इस ब्लॉगर भेंटवार्ता को काफ़ी कवरेज मिली और ब्लॉगजगत तथा ब्लॉगरों के बारे में खबर दूर-२ तक पहुँची। इससे अपेक्षित है कि ब्लॉगिंग का मर्ज़ बहुतों को अपनी चपेट में लेगा। :)

भेंटवार्ता से एक दिन पहले अंग्रेज़ी के हिन्दुस्तान टाइम्स की अनुपूरक पत्रिका एचटी सिटी(HT City) के मुख्यपृष्ठ पर भेंटवार्ता संबन्धित यह लेख छपा था। हालांकि इसमें पत्रकार/लेखिका से एक त्रुटि हो गई और अंत में वेबसाइट के पते में वो delhi लगाना भूल गई, असल वेबसाइट www.delhibloggers.in है। एनडीटीवी (NDTV) ने इस पूरी भेंटवार्ता को कवर किया था और पत्रकार गरिमा दत्त ने एनडीटीवी (NDTV) की वेबसाइट पर भेंटवार्ता के अगले दिन यह लेख छापा। सिर्फ़ छापे वाले मीडिया में ही नहीं, टेलीविजन पर भी इसकी कवरेज दिखाई गई।

एनडीटीवी 24×7 (NDTV 24×7) पर दिखाई गई न्यूज़ बाइट

यूट्यूब पर इस वीडियो को यहाँ देखें। वीडियो को FLV रूप में यहाँ डाउनलोड करें

एनडीटीवी मेट्रोनेशन (NDTV Metronation) पर दिखाई गई न्यूज़ बाइट

यूट्यूब पर इस वीडियो को यहाँ देखें। वीडियो को FLV रूप में यहाँ डाउनलोड करें

एनडीटीवी मेट्रोनेशन (NDTV Metronation) पर दिखाई गई विस्तृत कवरेज

यूट्यूब पर इस वीडियो को यहाँ देखें। वीडियो को FLV रूप में यहाँ डाउनलोड करें

मीडिया में इस कवरेज का लाभ सीधे ही दिखा। जहाँ कई लोग हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले दिन छपे लेख के कारण भेंटवार्ता में आए वहीं कुछ लोग बाद में एनडीटीवी (NDTV) पर इसकी कवरेज देख कर समूह से जुड़े और अपने ब्लॉग बनाए। भेंटवार्ता के अगले ही दिन एनडीटीवी (NDTV) पर प्रसारित बर्खा दत्त के We The People कार्यक्रम का मुद्दा भी ब्लॉग ही थे। मतलब साफ़ है, मीडिया भी अब खुले रूप से ब्लॉगों पर ध्यान दे रहा है, और यह अच्छा भी है क्योंकि इससे जल्द ही यह भ्रम(जो कि बहुत लोग पाले हुए हैं) टूटेगा कि ब्लॉग मुख्यधारा मीडिया की जगह ले सकते हैं, दोनों एक दूसरे के सहायक/पूरक हो सकते हैं लेकिन दोनों की अपनी-२ पहचान और स्थान है।


क्या ब्लॉगों पर नियंत्रण होना चाहिए?


January 18th, 2008 | 10 Comments

बर्खा दत्त एनडीटीवी पर हर सप्ताह एक अंग्रेज़ी का टॉक शो (talkshow), वी द पीपल(we the people), प्रस्तुत करती हैं। इस बार 13 जनवरी 2008 को प्रसारित हुए अध्याय में वार्ता का विषय था – क्या ब्लॉगों पर नियंत्रण होना चाहिए? (should the blogs be regulated?)

अब इस बार पैनल पर कुछ ब्लॉगर, एक वकील और एक मनोवैज्ञानिक थे, श्रोताओं में भी कुछ ब्लॉगर आदि बैठे थे। मौजूद ब्लॉगरों में कुछ जाने पहचाने नाम थे जैसे कमला भट्ट, राजेश लालवानी और अपने कस्बे वाले रवीश जी। चर्चा आरंभ हुई एक ब्लॉगर और उनके ब्लॉग पर लिखी उनकी व्यक्तिगत सेक्स संबन्धी पोस्ट से, कि कैसे जब काफ़ी समय तक उनको सेक्स नहीं मिलता तो वो सिगरेट फूंकती रहती हैं, और आगे बढ़ी एक दूसरे ब्लॉगर की ओर जिन्होंने अपने ब्लॉग पर सरेआम व्यक्त किया हुआ है कि वे समलैंगिक हैं और एक बॉयफ्रेन्ड की तलाश में हैं। आधे कार्यक्रम में तो चर्चा इसी बात पर होती रही कि कौन अपने व्यक्तिगत ब्लॉग पर क्या लिख रहा है, दुनिया के सामने उसको पढ़ने के लिए डाल रहा है और इन्हीं एक-दो सेक्स संबन्धी पोस्ट पर बात होती रही। एक बात जो मुझे यह समझ नहीं आई वह यह कि आखिर बर्खा क्या चाह रही थीं, और यह कार्यक्रम के मुद्दे से कैसे संबन्धित है? क्या किसी का ब्लॉग इसलिए नियंत्रण के तहत आना चाहिए कि वह व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत बातें दुनिया के सामने रख रहा है? व्यक्तिगत ब्लॉग जब तक किसी पर उँगली उठा कुछ कह नहीं रहा तो उसमें किसी को तो कोई आपत्ति होनी ही नहीं चाहिए। और यदि है तो फिर वह मुख्यधारा मीडिया पर क्यों नहीं लागू होती?

कई लोगों ने कई विचार व्यक्त किए, एक ने तो यहाँ तक कहा कि ब्लॉग सिर्फ़ समय की बरबादी हैं और किसी का कुछ भला नहीं कर रहे। खैर, इस तरह के अज्ञानी लोग तो नादान हैं इसलिए इनके अज्ञान को क्या कहें सिवाय इसके कि जनाब घर के बाहर भी दुनिया है ज़रा घर से बाहर आकर तो देखो। ;) लेकिन कई लोगों की सोच पर हंसी भी आई कि ऐसे भी लोग होते हैं। एक मोहतरमा ने कहा कि हमारी संस्कृति ऐसी है कि वह नियंत्रण माँगती है और इसलिए हमारी संस्कृति के अनुसार इन ब्लॉगों पर नियंत्रण होना चाहिए। वाह-वाह, क्या बात है!! मेरे पल्ले तो नहीं पड़ा कौन सी संस्कृति की बात हो रही थी, कम से कम भारतीय संस्कृति की तो नहीं हो रही थी।

रवीश जी ने हिन्दी ब्लॉगों की प्रशंसा करते हुए कहा कि बहुत अच्छा ऐसा कार्य हो रहा है जो पहले नहीं हुआ, बहुत से लोग लिख रहे हैं और काफ़ी अच्छा लिख रहे हैं, ब्लॉगों के माध्यम से बहुत से ऐसे साहित्य को सबको उपलब्ध कराया गया है जो अभी तक किसी गुमनाम कोने में पड़ा हुआ था। और सबसे बढ़िया बात तो यह रही कि रवीश जी अंग्रेज़ी के कार्यक्रम में हिन्दी में बोले और आखिरकार उनको संबोधित करते हुए बर्खा दत्त को भी हिन्दी में बोलना पड़ा।

अमां यदि तुमने बैलगाड़ी से उतर हवाई जहाज़ को आज देखा है तो इसका अर्थ यह तो नहीं हो गया कि वह कोई नया शगूफ़ा है!!

सबसे अधिक खीज इस बात को लेकर हो रही थी कि सभी इसको एक नई चीज़ नई चीज़ करके अपने को उत्साहित दिखा रहे थे। अमां यदि तुमने बैलगाड़ी से उतर हवाई जहाज़ को आज देखा है तो इसका अर्थ यह तो नहीं हो गया कि वह कोई नया शगूफ़ा है!! इसी तरह यदि पैनल पर बैठे इन एक-दो लोगों को और भारतीय मीडिया को कल-परसों में ही ब्लॉगों की उपस्थिति का आभास हुआ है तो यह नई चीज़ तो न हो गई, यह तो तब से है जब इनमें से आधे से अधिक लोग ईमेल-चैट भी न जानते थे कि वह क्या होता है; ई ब्लॉगन का सन्‌ 1999 से तो मैं ही देख, पढ़ और लिख रिया हूँ!! ;)

कुल मिलाकर एक निराशाजनक कार्यक्रम रहा जिसका कोई खास अर्थ न बना। बर्खा दत्त के कार्यक्रम की इससे अधिक अपेक्षा थी। साथ ही यह सोच रहा हूँ कि अच्छा ही हुआ कि हमने(दिल्ली ब्लॉग एण्ड न्यू मीडिया सोसायटी के संस्थापकों) ने उसमें जाने से इंकार कर दिया, वर्ना न्योता तो हमको भी आया था। आप इस कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग यहाँ देख सकते हैं। यह वीडियो अंग्रेज़ी में है और तकरीबन पचास मिनट का है।

खैर यह तो इस टीवी कार्यक्रम की बात रही, इस विषय पर आपका क्या कहना है और आपके क्या विचार है? यह चर्चा यहाँ ज़ारी है तो आईये आप भी अपने विचार यहाँ व्यक्त करें


अल-जज़ीरा सबके लिए


July 4th, 2007 | 4 Comments

विख्यात अरबी टीवी चैनल अल-जज़ीरा, जिसने ओसामा बिन लादेन के वीडियो दिखा ख्याति पाई, मध्य-पूर्व के बाहर सभी के टीवी सैटों पर नहीं आता। अब यह दूरी समाप्त हो गई क्योंकि अब इसके वीडियो यूट्यूब पर अंग्रेज़ी में यहाँ उपलब्ध हैं। (हैट टिप – मोहामिद)


समाज के सर्वज्ञ


March 13th, 2007 | 17 Comments

जो कोई भी अख़बार आदि पढ़ता है अथवा टीवी पर समाचार चैनलों को झेलता है उसे कभी न कभी तो इस बात का एहसास होता ही होगा कि समाचार माध्यम पर जो बकवास की जा रही है उसका आगा-पीछा कुछ भी समाचार प्रस्तुत करने वाले को नहीं पता लेकिन फिर भी वह पिले जा रहा है, अपनी नौकरी बजाए जा रहा है, रिजक़ कमाए जा रहा है!! पत्रकार को जिस विषय की वह रिपोर्टिंग कर रहा है बहुतया उसके बारे में कुछ नहीं या बहुत कम ही पता होता है, लेकिन वह दर्शाता ऐसे है कि उससे अधिक उस विषय पर कोई नहीं बकवास कर सकता। ऐसा क्यों होता है? अब मेरी समझ में इसके केवल दो ही कारण आते हैं:

  1. पत्रकार का बॉस किसी जानकार व्यक्ति को नहीं पकड़ना चाहता तथा पत्रकार को भी उस विषय पर कुछ तैयारी करने का समय नहीं देना चाहता।
  2. पत्रकार स्वयं ही अपने को फन्ने खां से कम नहीं समझता जिसे हर विषय की पूर्ण से भी अधिक जानकारी है।

अब इन दोनों में से मूर्खता का कोई भी कारण हो लेकिन नतीजा तो वही होता है, मूर्खता की चाश्नी में लिपटी रपट/लेख जिसे यदि उस विषय का कोई जानकार पढ़/सुन ले तो तुरंत ताड़ जाए कि लिखने वाला निश्चय ही अव्वल दर्जे का मूर्ख रहा होगा।

मेरा ज्ञानक्षेत्र/कार्यक्षेत्र सूचना प्रौद्योगिकी का है, उसमें भी सॉफ़्टवेयर और इंटरनेट से जुड़ा हूँ। अब मैं यह नहीं कहता कि मैं अपनी गली-मोहल्ले में कोई तोपची हूँ लेकिन फिर भी कुछ तो बुद्धि रखता हूँ। जिस समय टीवी बाज़ार में आया था, मुझे नहीं पता कि उस समय भी इन पत्रकारों के हम-पेशा पूर्वजों ने उसके लाभ कम और हानि अधिक गिनाई थीं कि नहीं पर अब जब इंटरनेट लोगों में धीरे-२ अपनी जगह बनाता जा रहा है तो ये लोग इसकी सिर्फ़ खामियाँ ही दिखाने में लगे हैं, और खामियाँ भी ऐसी नहीं जो कि इंटरनेट के आगमन से ही आई है वरन्‌ ऐसी जो वर्षों-शताब्दियों से समाज का अंतरंग भाग रही हैं।

अभी रविवार ही की बात है, हिन्दी ब्लॉगर भेंटवार्ता के लिए मैं क्नॉट प्लेस के एक कैफ़े कॉफ़ी डे में बैठा आने वाले अन्य ब्लॉगर साथियों की प्रतीक्षा कर रहा था तो मेरी दृष्टि एक दिन पुराने यानि कि शनिवार के एक अंग्रेज़ी समाचारपत्र मेट्रो नाओ(Metro Now) पर पड़ी। समय व्यतीत करने की गरज से मैं उसे कॉफ़ी की चुस्कियों के साथ पढ़ने लगा। अख़बार के दूसरे पन्ने पर इंटरनेट संबन्धी एक समाचार और एक लघु लेख था, तो मैं थोड़ा ध्यान से पढ़ने लगा। समाचार दिल्ली के रयान इंटरनेशनल स्कूल की किसी कक्षा नौ की छात्रा के बारे में था जो कि घर से लापता थी अथवा भाग गई थी। अब ख़बर में यह बात विशिष्ट रूप से दर्शाई गई थी कि कन्या इंटरनेट पर किसी सिद्धार्थ नामक लड़के से चैटिंग करती थी और कुछ समय से कदाचित्‌ दोनों का प्रेम प्रसंग चल रहा था, कन्या की सहेलियों के बयान से तो यही समझ आता है कि कम से कम कन्या तो अमुक लड़के की ओर आकर्षित थी। और एक रविवार वह अपने घर से भाग गई, उसके माता-पिता और पुलिस का मानना है कि वह अमुक लड़के के साथ भाग गई है। पुलिस ने उस लड़के के घर को पंजाब में कपूरथला तक ट्रेस किया लेकिन लड़का वहाँ नहीं मिला और उसके माता-पिता भी लड़के की मौजूदा स्थिति से अनभिज्ञ थे। यहाँ तक तो सब चौकस लेकिन फिर पत्रकार का परोक्ष रूप से इस बात पर ज़ोर देना कि यह सब इंटरनेट के कारण हुआ किसी भी मूर्ख को दिखाई दे जाएगा। तो यदि शब्दों के ताने-बाने के बीच पढ़ें तो आप समझ जाएँगे कि पत्रकार इंटरनेट के मामले में अज्ञानी लोगों को यह समझा रहा है कि यदि इंटरनेट न होता या अमुक कन्या को उसका प्रयोग नहीं करने दिया जाता तो कदाचित्‌ वह घर से न भागती(स्कूल से फिर भी भाग सकती थी)। गोया इसका अर्थ तो ठीक वही हुआ कि यदि कन्या किसी से फोन पर बात करती और फिर उसके साथ भाग जाती तो इसमें फोन का दोष होता। स्कूल में पढ़ने वाले किसी विद्यार्थी के साथ भागती तो स्कूल का दोष है, कन्या यदि स्कूल ही नहीं जाती तो वैसा नहीं होता, घर में आने वाले किसी रिश्तेदार के सुपुत्र के साथ भाग जाती तो रिश्तेदारों का होना ही गुनाह होता!!! :roll:

तत्पश्चात मेरी दृष्टि जिस पर गई वह एक लघु लेख की भांति था जिसमें बताया गया था कि इंटरनेट किस प्रकार दुष्ट है और दुष्ट लोगों से भरा पड़ा है(जैसे यहाँ पर वे दुष्ट लोग मंगल ग्रह से आए हैं)। उसमें किसी कॉलसेन्टर में कार्य करने वाली किसी महिला का उदाहरण दिया गया था। अमुक महिला इंटरनेट पर एक पुरूष के झांसे में आ गई जिसने अपने आपको एक गिगोलो(पुरूष वेश्या) बताया और दावा किया कि वह कई अमीर और प्रसिद्ध महिलाओं के साथ सो चुका है। कन्या उससे प्रभावित हो गई, फोन नंबरों की अदला-बदली हुई। उसके बाद उस तथाकथित गिगोलो ने लड़की का पीछा(स्टॉक यानि कि stalk) करना आरम्भ कर दिया और एक दिन उसने अपने कुछ मित्रों के साथ राह चलती उस कन्या का अपनी गाड़ी में अपहरण कर लिया और अपने घर ले जाकर उसके साथ बलात्कार किया।

कोई ज्ञानी व्यक्ति सबसे पहले तो इस वाक्ये से संबन्धित यह प्रश्न करेगा कि वह महिला अपने को एक गिगोलो बताने वाले व्यक्ति के साथ कर क्या रही थी?? निश्चय ही वह महिला कोई समाज सुधारक तो थी नहीं जो कि वेश्या उत्थान कार्यक्रम के तहत उस व्यक्ति से संपर्क बनाए हुए थी। वेश्यावृत्ती भारत में गैरकानूनी है, तो यह तो वही बात हुई कि चोर के घर डाका पड़ गया, तो हल्ला किस बात का है भई?? इंटरनेट का दोष कहाँ है??

दूसरे उदाहरण के तौर पर समीरा(बदला हुआ नाम) नाम की एक महिला के साथ घटी घटना बताई गई थी। समीरा इंटरनेट पर चैटिंग करते हुए एक पुरूष के संपर्क में आई जो कि अपने को दिल्ली पुलिस के किसी एसीपी(असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ़ पुलिस) का भाई बताता था। अब इन दोनों का संबन्ध इतना आगे बढ़ गया कि दोनों के शारीरिक संबन्ध भी बन गए। अब मलाई चाटने के बाद बिल्ली तो निकल ली, मतलब मौज लेने के बाद वह बंदा पतली गली से कट लिया, उस बेचारी समीरा के फोन भी सुनने बंद कर दिए। कुछ समय बाद इस प्रकार के आग्रहों से युक्त उस व्यक्ति के मित्रों के फोन इन मैडम को आने लगे, तंग आकर मैडम ने शहर से ही पलायन कर लिया।

तो इस वाक्ये पर कोई भी समझदार यही पूछेगा कि इसमें इंटरनेट का क्या दोष है? इंटरनेट ने तो समीरा को एक अपरिचित व्यक्ति से अंतरंग संबन्ध बनाने को नहीं कहा था। यदि कोई राह चलता व्यक्ति अपने को डीसीपी(डिप्टी कमिश्नर ऑफ़ पुलिस) अथवा पुलिस कमिश्नर का भाई या बेटा बताता तो क्या समीरा उसके साथ भी ऐसे संबन्ध बना लेती? इंटरनेट क्या कोई विश्वसनीयता की मोहर है कि वहाँ मिलने वाला व्यक्ति पाक़-साफ़ मन का होगा? क्या वहाँ उपस्थित लोग किसी दूसरे ग्रह से आए हैं या सतयुग के प्राणी हैं??

अब कोई इंटरनेट अज्ञानी इन दोनों समाचारों को पढ़ेगा तो यही निष्कर्ष निकालेगा कि इंटरनेट से दूर रहने में ही भलाई है, और यही छवि बहुत से ऐसे जन्तुओं की जमात वाले ये दोनों लेखक/पत्रकार प्रक्षेपित करना चाहते हैं।

एक तो लोगों में इंटरनेट को लेकर वैसे ही जानकारी कम और भ्रांतियाँ अधिक हैं, ऊपर से कलम की ताकत का दुरुपयोग करने वाले ये पत्रकार उसके बारे में और मिथ्या प्रचार कर रहे हैं। अभी पिछले नवंबर की कड़क सर्दी में नीरज भाई ने मुझे अपने टीवी चैनल के एक कार्यक्रम “इंडिया बोले” में इंटरनेट प्रयोगकर्ता के तौर पर बुलाया था जिसका विषय साईबर संबन्ध पर था। उसमें भी लोगों के विचार आदि सुनने को मिले तो यही प्रतीत हुआ कि अधिकतर जनता इसी भ्रांति से ग्रसित है कि इंटरनेट एक दुःस्वप्न है, शैतान का अवतार है, इससे जितना दूर रहा जाए उतना ही बेहतर है। तो ऐसे में यह देखकर और भी खीज होती है जब किसी पत्रकार आदि को इन भ्रांतियों को सशक्त करते देखता हूँ। उस समय मेरे मन में वाकई यह ख़्याल आता है कि पत्रकार वाकई एक ऐसा जन्तु है जो कि हमेशा दयनीय और टुच्ची सनसनी की खोज में रहता है, इसलिए ऐसे पत्रकारों से मैं यही कहना चाहूँगा:

आपके पास कलम की ताकत है, टीवी/रेडियो प्रसारण का बल/पहुँच है, इसलिए इसे केवल रिजक़ कमाने का साधन मत समझिए। रिजक़ पर आपका उतना ही हक़ है जितना किसी और का लेकिन आपको यह भी समझना चाहिए कि आपका रिजक़ कमाने का साधन लाखों-करोड़ों लोगों को प्रभावित करता है और यदि आप इस साधन का उपयोग भ्रांति फैलाने और लोगों को गुमराह करने के लिए करते हैं तो आप समाजद्रोह कर रहे हैं जिसके लिए आप दंड के पात्र हैं और विश्वास कीजिए कि यदि आज नहीं तो कल, आपको किसी न किसी रूप में दंड अवश्य मिलेगा।

इसलिए अभी भी समय है, अपनी रोटियाँ सेंकने के लिए लोगों को गुमराह न करें। चोर, स्मगलर आदि भी अपनी रोटियाँ सेंकने के अधिकारी हैं लेकिन जो मार्ग वे अख़्तियार करते हैं वह गैरकानूनी होता है। आपका मार्ग फिलहाल गैरकानूनी नहीं ठहराया जा सकता परन्तु समाज के विरूद्ध अवश्य है।

लेकिन अपने सीमित अनुभव के कारण यह भी जानता हूँ कि पत्रकार नामक दयनीय जन्तु के कान पर जूँ भी न रेंगेगी और वह अपनी टुच्ची मानसिकता, संकीर्ण दृष्टिकोण के साथ इस हीन कार्य में लगा रहेगा।