लानती बात है कि पिछला भाग नवंबर 2008 में लिखा था और अब पाँच महीने बाद जाकर यह तीसरी कड़ी लिखने का होश आया है!! खैर देर आए दुरूस्त आए!!
….. पिछले भाग से आगे
रविवार 22 जून को सुबह सवेरे अलॉर्म बजते ही आँख खुल गई, तकरीबन नौ-दस घंटे की नींद ली थी और अपने को बहुत तरोताज़ा महसूस किया, दुर्लभ क्षण लगा क्योंकि आलस्य की मौजूदगी का एहसास नहीं हुआ।
सुबह का नाश्ता हॉस्टल की ओर से फोकटी होता था, बुफ़े (Buffet) टाइप। ब्रेड, कॉर्न फ्लेक्स, दूध, कॉफ़ी इत्यादि रसोई में टेबल पर रखा होता था, जितना मर्ज़ी खाओ पियो और मौज करो। तो नाश्ते के साथ-२ इमेल इत्यादि जाँच ली और बैकअप के लिए फोटो कैमरे के कार्ड से पेन ड्राइव में स्थानांतरित कर ली। हॉस्टल में एक और लाभ यह था कि यदि तीन दिन या अधिक की बुकिंग है तो कपड़ों की धुलाई मुफ़्त थी। लेकिन एक पंगा अभी भी था और वह यह कि पिछले रोज़ बेल्ट नहीं मिली थी और वह अति आवश्यक थी। तो इसलिए सबसे पहले बेल्ट ढूँढ के उसको लेने की सोची।
ट्रॉम पकड़ न्युगाती पॉल्याउद्वार (Nyugati pályaudvar) यानि पश्चिमी रेलवे स्टेशन पहुँचा और उसके बगल में मौजूद बुडापेस्ट के सबसे बड़े मॉल वेस्टेन्ड सिटी सेन्टर (Westend City Center) में दाखिल हुआ। मॉल काफ़ी बड़ा था लेकिन गुड़गाँव नोएडा आदि के मॉलों के सामने टिक सके ऐसा न लगा! मॉल में घुसते ही कुछ दुकानें छोड़ मर्दाना कपड़ों आदि की एक दुकान दिख गई और वहाँ चमड़े की एक साधारण लुक्स वाली (डिज़ाइनर नहीं) बेल्ट भी मिल गई। जर्मन ब्रांड थी, दाम पड़ा कोई आठ हज़ार चार सौ फोरिन्ट (तकरीबन चौबीस सौ रूपए), मजबूरी थी और मामला अर्जेन्ट था इसलिए कुछ कर नहीं सकते थे और अपना उल्लू कटा के उसको ले लिया गया।
अब कम के कम एक टेन्शन समाप्त हुई थी, इसलिए इधर-उधर घूमने फिरने पर ध्यान दिया गया। मॉल में एक चक्कर लगा के बाहर आ गया और मेट्रो के भूमिगत स्टेशन की ओर बढ़ गया और वहाँ से एम2 मेट्रो पकड़ के दीआक टर्मिनल (Deák Ferenc tér) पहुँचा। एक बात जो नोटिस की वह यह थी कि मॉल में प्राय: हर चीज़ महँगी थी। मॉल में आधे लीटर पानी की बोतल छह सौ फोरिन्ट (तकरीबन एक सौ सत्तर रूपए) में मिल रही थी जबकि दीआक टर्मिनल से बाहर आकर बाजू की एक फलों की दुकान से मैंने उसी ब्रांड की दो लीटर की पानी की बोतल ढाई सौ फोरिन्ट (तकरीबन सत्तर रूपए) में खरीदी। यहीं दीआक टर्मिनल के सामने ही एक गिरजाघर है जहाँ से अगले दिन शाम का वॉकिंग टूर चालू होना था, तो इस तरफ़ आने का मुख्य मकसद तो जगह देखना था।
तत्पश्चात एक दिशा निर्धारित की और उस ओर चल पड़ा। जिस ओर से आ रहा था उस दिशा में संत स्टीफ़न का गिरजाघर था जो कि अगले दिन के शाम के टूर में देखा जाना था और जिस दिशा में मैं जा रहा था उस तरफ़ एक अन्य गिरजाघर था जो कि टूर के दौरान नहीं देखा जाना था इसलिए बेहतर था कि उसको पहले देख लिया जाए।
ईसाई धर्म प्रभुत्व वाले देशों में प्रायः उनके इतिहास, संस्कृति, कला आदि के लंबे सफ़र के बारे में जानने का बढ़िया ज़रिया गिरजाघर ही होते हैं। भारत में तो मंदिरों मस्जिदों के अतिरिक्त किले महल आदि भी इतिहास के लंबे सफ़र के दौरान हुए विभिन्न बदलावों की कहानी बयान करते हैं लेकिन योरोप के देशों में प्रायः किले महल उतना अधिक बयान नहीं करते जितना वहाँ के गिरजागर करते हैं क्योंकि जितने कलात्मक कार्य गिरजाघरों में होते थे उतने कहीं अन्य नहीं होते थे।
यह गिरजाघर छोटा था और इसमें मरम्मत का कार्य चल रहा था, इसलिए इसको अंदर से देखना न हो पाया, बस बाहर से ही फोटू लेकर अपन वापस दीआक चौक की ओर बढ़ चले। चलते-२ एक और बात यह देखी कि मुख्य सड़क से हट मकानों के बीच से जाने वाली गलियाँ और सड़कें छोटी थीं लेकिन उन पर खड़ी की गई गाड़ियाँ तमीज़ के साथ एक सीधी कतार में किनारे पर थीं, अपने यहाँ की तरह बेतरतीब आड़ी तिरछी नहीं थीं।
दीआक चौक पार कर संत स्टीफ़न के गिरजाघर की ओर बढ़ चला तो सड़क पार करते ही एक कम्यूनिस्ट काल की ग्रे रंग की इमारत नज़र आई जिसके बारे में अगले दिन शाम की टूर गाईड ने बताया कि वह पहले बस टर्मिनल हुआ करती थी। उस इमारत के भूमितल वाला भाग खुला और खाली था, कदाचित पार्किंग आदि करने के लिए। वहाँ कुछ आवारा किस्म के दिखने वाले लड़के अपनी-२ साईकिलों के साथ बैठे थे और कूल लगने का पूरा प्रयत्न करते हुए सुट्टे मार रहे थे!! इमारत के बाजू में एक हरा भरा एक छोटा सा पार्क था जहाँ रविवार होने के कारण अच्छी खासी चहल पहल थी, एक तरण ताल था जिसके किनारे पर बैठे लोग पानी में पैर डाल आराम से बैठे आपस में बतिया रहे थे। पार्क की सतह के नीचे एक ओपन एयर रेस्तरां भी था जिसकी कुर्सियों पर बैठे लोगों में बीयर आदि के दौर चल रहे थे।
थोड़ी देर वहाँ एक पेड़ की छाँव में मौजूद बेन्च पर बैठ आराम किया और उसके बाद दीआक चौक के बाजू से जाती एक अन्य सड़क पर बढ़ चला जो कि फैशन स्ट्रीट के नाम से जानी जाती है। अब क्या कहें, किन्हीं आला लोगों को लगा होगा कि लंदन की बांड स्ट्रीट (Bond Street) और पैरिस की रूआ दु फाऊबर्ग सेंट ऑनउहरे (Rue du Faubourg Saint-Honoré) के मुकाबले की जगह बुडापेस्ट में भी होनी चाहिए जहाँ बड़े-२ और एक से बढ़कर एक महँगे फैशन हाऊसों की दुकानें हों फैशनेबल और महँगे लिबास आदि बेचने के लिए।
फैशन की इसी चाहत के चलते नवंबर 2007 में निर्माण आरंभ हुआ फैशन स्ट्रीट (Fashion Street) का जो कि मार्च 2008 के आसपास निपटा होगा, वैसे मुझे नहीं लगा कि निर्माण/मरम्मत पूर्णतया समाप्त हो गया था, क्योंकि कुछेक जगह काम चलता दिखाई दिया। जितनी दुकानें थीं वे भी कम न थीं, एक से बढ़कर एक हाईफाई लिबास और अन्य सामान जैसे कि बीस हज़ार पाँच सौ फोरिन्ट (तकरीबन पाँच हज़ार आठ सौ) की एक टी-शर्ट या एक लाख पाँच हज़ार फोरिन्ट (तकरीबन तीस हज़ार रूपए) का एक बैग!! अपन तो बस ऐसी दुकानों और उनके ऐसे सामान को देख कर अचरज ही कर सकते थे और चकाचौंध हो सकते थे, फोटू नहीं लिए कि कहीं कोई उसके लिए थाम न ले!!
टहल टहलाकर शाम को वापस हॉस्टल पहुँचा। मेरी डॉर्मिटरी में से एक बंदा चला गया था और उसकी जगह एक वियतनामी व्यक्ति आकर ठहरा था। उससे बातचीत हुई तो पता चला कि वह अपने दफ़्तर के कार्य से जर्मनी में था और छुट्टियाँ मनाने बुडापेस्ट आया था। उसका नाम न्यूयेन थान हा (Nguyên Thanh Hà) था। मेरे बंक बेड (bunk bed) के नीचे वाले बंक और बाजू वाले बंक पर दो स्विस कन्याएँ थीं जिनसे बातचीत के दौरान पता चला कि वे स्विट्ज़रलैन्ड के फ्रेन्च भाषी इलाके से थीं, उनकी अंग्रेज़ी अधिक अच्छी नहीं थी और वे पूर्वी योरोप के भ्रमण पर निकली थीं।
डॉर्मिटरी के तीसरे और अंतिम बंक बेड पर नीचे न्यूज़ीलैन्ड (New Zealand) की एक कन्या थी जो कि पूर्वी योरोप के भ्रमण पर थी और उसके ऊपर वाले बंक पर शनिवार को एक अन्य कन्या थी लेकिन रविवार को वह चली गई थी और उसकी जगह एक जर्मन अंकल आ गए थे जो कि पचपन वर्ष की उम्र से अधिक थे तथा जर्मनी के म्यूनिक (Munich) शहर से बुडापेस्ट तक के तकरीबन एक हज़ार किलोमीटर के सड़क के रास्ते पर साइकिल चला के आए थे!! मैं अचरज भर गया, वाकई मन में जो बात ठान ली जाए और इरादों में दम हो तो कोई कार्य कठिन नहीं!!
रात्रि हो आई तो मैंने और वियतनामी सहयात्री ने भोजन कर आने की सोची, सप्ताहांत के कारण हॉस्टल के आसपास अधिकतर रेस्तरां आदि बंद थे, हॉस्टल के मैनेजर क्रिस ने जिस लोकल रेस्तरां के बारे में बताया था जहाँ हंगरियन खाना मिल जाएगा वह रेस्तरां काफ़ी भटकने के बाद भी हम को नहीं मिला तो हम दोनों ने सोचा कि यह अगले दिन आदि देख लेंगे और फिलहाल काम चलाने के लिए वेस्टेन्ड सिटी सेन्टर पहुँचे और वहाँ हंगरियन जंक फूड खाया गया। जो चीज़ ली थी उसका नाम तो ध्यान नहीं, माग्यार भाषा में कुछ अजीब सा नाम था जो तुरंत ही दिमाग से उतर गया था, बस इतना याद है कि बावर्ची के सुझाव पर उसको लिया गया था और वह फ्रेन्च फ्राई और चिकन का कुछ मिला जुला रूप था जिसके ऊपर सलाद आदि की ड्रेसिंग थी और साथ में एक बड़े गिलास में कोका कोला दी गई थी!! वह जो भी था स्वाद में बुरा नहीं था लेकिन बिना मसाले का सिर्फ़ नमक डला खाना था। उस समय भूख अधिक लग रही थी इसलिए स्वाद पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया।
खाने के बाद हम लोग मॉल की उस भूमिगत मंज़िल पर थोड़ा बहुत टहले, और उसके बाद टहलते हुए वापस हॉस्टल आ गए। अगले दिन सोमवार सुबह हम दोनों ने बुडा के किले जाने का निश्चय किया, वहाँ हाऊस ऑफ़ हंगरियन वाइन्स (House of Hungarian Wines) भी था और चूंकि मेरे पास बुडापेस्ट कार्ड था तो इसलिए फोकट में वाइन चख सकने की सुविधा थी और वाइन की खरीद पर पंद्रह प्रतिशत की छूट।
साथ ही यह अलग बात पता थी कि बुडा किला देखने में काफ़ी अच्छा था, मथायस चर्च (Matthias Church) भी वहीं था और मछुआरे का बुर्ज (Fisherman’s Bastion) भी वहाँ था।
क्रमशः
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हॉस्टल वालों की ओर से भेजे गए व्यक्ति की फिएट पुन्टो (Fiat Punto) में सवार हो अपन हॉस्टल की ओर बढ़े चले जा रहे थे। सड़कें काफ़ी चौड़ी और सपाट थी, दिल्ली के सड़क से सजे गड्ढे नहीं नज़र आए, आधे घंटे की उस सवारी में मैं प्रतीक्षा करता रहा कि अब झटका लगेगा, अब कोई गड्ढा आएगा, लेकिन सड़क निकलती जा रही थी और मुझे टेन्शन होते जा रही थी कि क्या वाकई गाड़ी सड़क पर चल रही है!! मन में आशंका हुई कि कहीं इस गाड़ी में बड़े बोस साहब का सस्पेन्शन (suspension) सिस्टम तो नहीं लगा जो गाड़ी में बैठे लोगों को गड्ढे का एहसास ही न होने देता हो, मन में आया कि ड्राईवर से पूछ लूँ लेकिन फिर यह सोच के रह गया कि अभी तो वह एक रिसर्च प्रोजेक्ट ही है इसलिए प्रोडक्शन में न आया होगा। कौतूहल था ही इसलिए खिड़की से बाहर भी सब देख रहा था, जगह-२ बड़े-२ विज्ञापन वाले होर्डिंग दिखाई दे जाते, कोई मोबाइल फोन बेचने का होता तो कोई गाड़ी का, एक समानता जो उन सब में देखी वह यह कि सभी विज्ञापन माग्यार (Magyar) भाषा में थे, अंग्रेज़ी में कोई न दिखा। और तो और, सड़क चौराहों आदि पर लगे निर्देश आदि भी सभी माग्यार भाषा में थे!! कुछ लोग इसको निज भाषा प्रेम कहेंगे जो कि गलत नहीं है लेकिन यह साथ ही साथ पर्यटन के लिए बुरा है, पर्यटकों से माग्यार भाषा की समझ की अपेक्षा करना निरी मूर्खता से अधिक नहीं। इस लिहाज़ से दिल्ली बहुत अच्छी है जहाँ पर्यटक भटक न जाएँ इसका पूरा ख्याल रखा हुआ है और सड़कों आदि पर दिशा निर्देश वगैरह हिन्दी के साथ-२ अंग्रेज़ी में भी हैं!!
बहरहाल, आधे घंटे में हम लोग ऐबॉरिजनल हॉस्टल (Aboriginal Hostel) पहुँच गए जो कि पेस्ट में रॉकोज़ी गली (Rackozi Utca) के ट्रॉम स्टॉप के पास ही स्थित है। हॉस्टल में उस दिन मैनेजर की ड्यूटी क्रिस (Chris) की थी जिसको मैंने अपना ऑनलाईन किए गए आरक्षण की रसीद दिखाई और वह मुझे मेरी डॉर्मिटरी (Dormitory) में ले गया। आगे बढ़ने से पहले हवाई अड्डे से हॉस्टल लाने वाले ड्राईवर को सौ फोरिन्ट (लगभग तेतीस रूपए) की बक्शीश देकर विदा किया। बुडापेस्ट का यह रिवाज़ है कि वहाँ सेवा आदि देने वाला हर व्यक्ति बक्शीश की अपेक्षा करता है, न देने को अभद्र समझा जाता है!! यह हॉस्टल एक अपार्टमेन्ट बिल्डिंग में स्थित है जो कि बहुत ही शांत थी, मानो ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे पूरी इमारत में कोई रहता ही न हो!! इस हॉस्टल में मिलने वाली एक खासियत यह थी कि इंटरनेट प्रयोग मुफ़्त था जो कि काफ़ी अच्छी बात थी (काहे यह आगे बताते हैं), वाई-फाई (WiFi) भी था कि यदि कोई अपना लैपटॉप लाया हो तो प्रयोग कर ले और हॉस्टल के दो कंप्यूटर मौजूद ही थे। मैं अपनी लोनली प्लैनेट (Lonely Planet) की बुडापेस्ट गाइडबुक और योरोप ऑन अ शूस्ट्रिंग (Europe on a Shoestring) खोल के बैठ गया ताकि दिमाग में सूचि बना ली जाए कि उस दिन क्या करना है। मार्ग आदि जाँचने के लिए बुडापेस्ट हवाई अड्डे पर हंगरिअन पर्यटन के काउंटर (जहाँ से बुडापेस्ट कार्ड लिया) से लिए गए बड़े नक्शे को देखने की सोची लेकिन तभी पता चला कि वो दो फोकटी नक्शे और बुडापेस्ट पर छपी पुस्तिकाएँ तो गाड़ी में ही रह गए और वो बंदा तो जा चुका था कब का!! तो जाकर क्रिस से बात की, उसने मुझे यात्रियों के लिए रखे हुए फोकटी नक्शों में से एक दे दिया, उस पर देखने योग्य स्थान भी बता दिए और उन तक कैसे पहुँचा जाए यह भी बताया। और भी अन्य आम जानकारी मैंने क्रिस से हासिल की जैसे कि ट्रॉम, मेट्रो और बस में टिकट कैसे लगती है, कौन से रंग वाली ट्रॉम और मेट्रो कहाँ जाती है इत्यादि।
बुडापेस्ट में ट्रॉम, मेट्रो और बसों का ज़रा अलग सिस्टम है। दो ट्रॉम लाइन हैं, तीन लाइन मेट्रो की हैं (दिल्ली में भी अभी तीन लाइन हैं मेट्रो की) और बसें तो खैर आम हैं। इन सब में एक ही टिकट चलती है और टिकट अलग-२ मूल्य की नहीं वरन् एक ही मूल्य की है। यदि एक टिकट ली जाए तो वह ढाई सौ फोरिन्ट (लगभग सत्तर रूपए) की मिलती है, इसलिए दस टिकट की बुकलेट लेना बेहतर होता है क्योंकि वह तेइस सौ फोरिन्ट (लगभग छह सौ सत्तावन रूपए) की मिलती है यानि कि दो सौ फोरिन्ट की बचत होती है। टिकट आप या तो मेट्रो स्टेशन पर मौजूद टिकट काउंटर से खरीद सकते हैं या फिर ट्रॉम स्टॉप और मेट्रो स्टेशन आदि पर लगी स्वचालित मशीनों में फोरिन्ट के सिक्के डाल के खरीद सकते हैं। लेकिन मशीनों से एक-एक करके ही टिकट ले सकते हैं, दस टिकट की बुकलेट तो टिकट काउंटर से ही मिलती है। यदि आप बुडापेस्ट में सप्ताह भर हैं और यदि आपका बस, ट्रॉम अथवा मेट्रो में बीस या उससे अधिक बार जाना होगा तो सप्ताह भर के लिए पॉस बनवा लेना बेहतर होता है। सप्ताह का पॉस तकरीबन चार हज़ार फोरिन्ट (लगभग ग्यारह सौ सत्तर रूपए) का बनता है और उससे सप्ताह भर किसी भी बस, ट्रॉम और मेट्रो में असीमित यात्रा की जा सकती है। इसी तरह मासिक पॉस भी बनता है लेकिन उसके लिए फोटो दरकार होता है। ट्रॉम अथवा बस में कंडक्टर नहीं होता जो टिकट देखेगा, इनमें द्वार के पास ही एक मशीनी डब्बा लगा होता है जिसमें टिकट घुसा के स्टैम्प लगवाई जाती है। मेट्रो में प्लेटफॉर्म पर जाने से पहले द्वार पर ऐसे डब्बे लगे होते हैं जिनमें टिकट घुसा स्टैम्प करो और टिकट वापस खींच आगे बढ़ जाओ। इन तीनों में ही सादे लिबास में खूफ़िया पुलिस की भांति टिकट चैक करने वाले घूमते रहते हैं जो कहीं भी कभी भी किसी से भी टिकट माँग सकते हैं और यदि उस समय आपके पास उस समय की स्टैम्प लगी टिकट अथवा पॉस न हुआ तो तगड़ा जुर्माना लगा दिया जाता है!! अब क्योंकि मैंने 48 घंटे का बुडापेस्ट कार्ड बनवाया था तो उस कार्ड पर एक सहूलियत यह थी कि मैं मेट्रो, ट्रॉम और बस में असीमित यात्रा कर सकता था इसलिए पहले दो दिन की तो अपने को दिक्कत ही नहीं थी।
तीन-चार घंटे बाद मैंने तफ़रीह के लिए बाहर निकलने की सोची, अपने बैग में कैमरा, नक्शे आदि डाले और निकल पड़ा। हॉस्टल की इमारत से बाहर आकर आसपास का इलाका देखा तो जाना कि पूरा इलाका ही बहुत शांत है, कोई हल्ला-गुल्ला नहीं बिलकुल भी, एकदम सुनसान सा माहौल। सभी इमारतें स्लेटी और ग्रे रंग की पुरानी सी प्रतीत होती, बिलकुल ऐसी लग रही थीं जैसे द्वितीय विश्वयुद्ध के समय पर बनी किसी डॉक्यूमेन्टरी (Documentary) फिल्म से निकल आई हों जबकि वे सभी इमारतें कम्यूनिस्ट काल का प्रतीक हैं जिस दौरान एक से ढर्रे पर इमारतें बनती और सभी को गहरे स्लेटी या ग्रे रंग में रंग दिया जाता।
अब चूँकि मैं दस दिनों के लिए परदेस में था और ऑफिस के मोबाइल कनेक्शन पर इंटरनेशनल रोमिंग पर था इसलिए माँ जब मन चाहा तब फोन कर बात नहीं कर सकती थीं, इसलिए घर से निकलने से पहले हुक्म हुआ था कि मैं प्रतिदिन एक बार फोन करके अपने कुशलक्षेम की जानकारी दूँ!! माँ आखिर माँ होती है, इसलिए कभी-२ इतने लाड़ और फिक्र से खीज भी हो जाती है और कभी बहुत ही सुकून मिलता है।
बहरहाल, अब हुक्म हुआ था तो बजाना ही था, मोबाइल से फोन करना बेवकूफ़ी होती, और सिक्का डाल पब्लिक फोन से बात करना भी। इसलिए एक अंतर्राष्ट्रीय फोन कार्ड लेना था, इस बारे में हॉस्टल में क्रिस से पूछा था तो उसने ईज़ीकार्ड (easycard) लेने का सुझाव दिया था क्योंकि उसका कॉलरेट सस्ता था। हॉस्टल से बाहर निकल कुछ दूरी पर मौजूद दुकान में पता किया तो उसके पास चार-पाँच तरह के कार्ड थे लेकिन इज़ीकार्ड न था और अन्य किसी के रेट मुझे जंचे नहीं। तो मैंने सोचा कि आगे कहीं अन्यत्र देखेंगे और मैं राकोज़ी ट्रॉम स्टॉप की ओर बढ़ गया और वहाँ से मैं बुडा शहर की ओर जाने वाली ट्रॉम में सवार हो गया।
बुडापेस्ट दरअसल दो शहरों को मिला के बना है, ठीक उसी तरह जिस तरह भारत की राजधानी दिल्ली सात शहरों को मिलाकर बनी। लेकिन दिल्ली के सात शहर अब लुप्त हो चुके हैं और अब सिर्फ़ उपनगर रह गए हैं, जबकि बुडापेस्ट में आज भी उसके दोनों शहरों की अपनी पहचान कायम है। बुडापेस्ट शहर बुडा और पेस्ट शहरों को मिला के बनता है और इसके बीच में से बहती है डैन्यूब नदी। डैन्यूब (Danube) नदी जर्मनी में ब्लैक फॉरेस्ट (Black Forest) से आरंभ होती है और दस देशों से होती हुई और 2850 किलोमीटर का सफ़र करती हुई ब्लैक सी (Black Sea) में विलीन हो जाती है। यही नदी बुडापेस्ट को दो भागों में बाँटती है, पूर्व में पेस्ट (Pest) तथा पश्चिम में बुडा (Buda) शहर। बुडा और पेस्ट को जोड़ने के लिए डैन्यूब पर नौ पुल हैं जिसमें कुछ ट्रेनों के लिए हैं और कुछ गाड़ियों के लिए।
तकरीबन पच्चीस मिनट लगे और वातानुकूलित ट्रॉम ने बुडा के आखिरी स्टॉप पर पहुँचा दिया। बुडा शहर पेस्ट से अलग ही लग रहा था, वहाँ चहल-पहल दिखाई दी। थोड़ा आगे बढ़ा तो एक साइबर कैफ़े का बोर्ड लगा दिखाई दिया तो मैं उसमें प्रवेश कर गया। वहाँ मौजूद महिला से फोन कार्ड के बारे में पता किया तो उसने मुझे उपलब्ध सभी कार्ड के पर्चे दे दिए जिन पर उन सभी के कॉल रेट छपे थे। उसने मुझसे पूछा कि मुझे कहाँ फोन करना है तो मैंने बताया कि मुझे भारत फोन करना है तो उसने एक कार्ड छाँट के निकाल दिया जिसका रेट कम था। मैंने एक हज़ार फोरिन्ट की कीमत का वह कार्ड खरीद लिया, उस पर भारत फोन करने का कॉल रेट बावन फोरिन्ट (लगभग पंद्रह रूपए) प्रति मिनट था। कॉर्ड लेकर मैं बाहर निकला और ट्रॉम स्टॉप पर लगे पब्लिक टेलीफोनों में से एक पर पहुँच घर फोन मिलाया। स्थानीय समयानुसार शाम के तकरीबन साढ़े चार बजे थे और दिल्ली में उस समय रात के लगभग नौ बज रहे थे, फोन पर मेरे सकुशल पहुँच जाने की बात सुन माँ ने चैन की साँस ली और फिर डाँटा कि फोन करने में इतनी देर क्यों लगाई!! लो कर लो बात, फिर पूरा प्रकरण विस्तार से समझाया जिसमें खामखा के तेरह मिनट खप गए, कार्ड में भारत फोन करने के लिए लगभग छह मिनट और बाकी थे इसलिए बात समाप्त कर फोन बंद किया।
अभी मैंने कहा कि यह एक बढ़िया बात थी कि हॉस्टल में मुफ़्त इंटरनेट उपलब्ध था। अब यह बढ़िया बात इसलिए थी कि बुडापेस्ट में साइबर कैफ़े भी महंगे हैं, इंटरनेट प्रयोग करने का औसत रेट तीन सौ फोरिन्ट प्रति घंटा था। अधिकतर जगहों पर तो मैंने तीन सौ से साढ़े चार सौ प्रति घंटे का रेट ही देखा, एक-दो जगह ही डेढ़ सौ फोरिन्ट प्रति घंटे का रेट दिखाई दिया।
आगे पैदल ही टहलने का इरादा था तो डैन्यूब पर बने मार्गरेट पुल की ओर जाती सड़क पर निकल लिया। थोड़ा आगे जाकर हाथियों के पूर्वज प्रागैतिहासिक (pre-historic) जीव मैमथ (Mammoth) की एक मूर्ती नज़र आई, पता चला कि उसके पीछे की इमारत शॉपिंग मॉल (Shopping Mall) मामूत प्रथम (Mammut I) है। मामूत (Mammut) अंग्रेज़ी के मैमथ के लिए माग्यार भाषा का शब्द है। उसी इमारत के बगल में एक उससे काफ़ी बड़ी इमारत दिखाई दी जो कि पता चला मामूत द्वितीय (Mammut II) है जो कि बुडा का सबसे बड़ा शॉपिंग मॉल है। दिखने में तो कोई खास बड़ी लग नहीं रही थी ये इमारत भी, इससे बड़े-२ शॉपिंग मॉल तो अपने यहाँ गुड़गाँव और नोएडा में हैं और ये लोग खामखा मैमथ का नाम बदनाम कर रहे हैं छोटी-मोटी चीज़ों के साथ जोड़ कर!! लेकिन सोचा कि अब जैसी भी है, अंदर से भी देख ही आते हैं, तो अपन अंदर हो लिए।
अंदर से भी मॉल कुछ खास नहीं था, बल्कि अंदर से तो मुझे और भी छोटा लगा वह। मैं कोई दुकान देख रहा था जहाँ सस्ती सी एक बेल्ट मिल जाए, अपनी बेल्ट मैं सामान में रखना भूल गया था और बिना बेल्ट पंगा हो जाता। लेकिन कोई दुकान काम की न दिखी, एक दुकान पर बेल्ट दिखी भी लेकिन वे सब डिज़ाइनर बेल्ट थीं जिन पर पता नहीं कैसी-२ कारीगरी की हुई थी, अपने को तो साधारण सी बेल्ट चाहिए थी। कुछ समय मॉल में टहल अपन वापस ट्रॉम स्टॉप पर आ गए और वापसी की ट्रॉम में सवार हुए। वापसी में ब्लाहा टर्मिनल (Blaha ter.) पर उतरा जो कि राकोज़ी वाले ट्रॉम स्टॉप से पहले वाला स्टॉप है और जो कि एक मेट्रो स्टेशन भी है। एक बात जो मैं पेस्ट में हर जगह देख रहा था वह यह कि लगभग सभी दुकानें आदि बंद थीं। यह तो बाद में पता चला कि सप्ताहांत पर दुकानें और रेस्तरां बंद होते हैं। सभी रेस्तरां बंद नहीं होते लेकिन मैंने कई बंद देखे। सड़क किनारे छोटे कैफ़े और अंतर्राष्ट्रीय रेस्तरां जैसे कि मैकडॉनल्ड, बर्गर किंग, सब वे, पिज़्ज़ा हट आदि खुले थे।
शाम के साढ़े छह बज रहे थे और भूख लग रही थी तो मैंने रात्रि भोजन कर लेने की सोची, हॉस्टल जाकर वापसी आने में आलस्य आता। बर्गर किंग (Burger King) का काफ़ी नाम सुना था, यह अमेरिकी रेस्तरां चेन है मैकडॉनल्ड की भांति जिसमें प्रसिद्ध अमेरिकी चीज़ बर्गर (American Cheese Burger) मिलता है (जिसमें बीफ़ की टिक्की लगी होती है)। तो ब्लाहा टर्मिनल के पास ही एक बर्गर किंग दिखा और अपन वहीं चले गए। अन्य चीज़ों की भांति खाना भी महंगा ही है बुडापेस्ट में। एक बर्गर, फ्रेन्च फ्राइज़ और कोक वाले कॉम्बो (Combo) के कोई तेरह सौ फोरिन्ट अदा किए (लगभग तीन सौ सत्तर रूपए) और सोचा कि अपना भारत बढ़िया है जहाँ ऐसा मांसाहारी कॉम्बो एक सौ तीस रूपए में आ जाता है!! बर्गर बहुत ही बेस्वाद और बद्मज़ा था। अब ऐसा नहीं है कि मैंने बीफ़ पहली बार खाया हो इसलिए पसंद नहीं आया, बीफ़ पहले भी खाया है और बद्मज़ा नहीं लगा लेकिन बर्गर किंग का बर्गर वाहियात था!!
बहरहाल खा पी कर अपन टहलते हुए वापस हॉस्टल पहुँचे। इमारत कें अंदर जाने के लिए द्वार पर लगे कीपैड (Keypad) पर पॉसवर्ड डालना पड़ता है, सही पॉसवर्ड पर ही द्वार खुलता है। पॉसवर्ड मुझे क्रिस ने पहले ही दे दिया था इसलिए कोई समस्या ही नहीं थी। हॉस्टल में जाकर देखा तो क्रिस के साथ एक और बंदा बतिया रहा था, परिचय हुआ तो पता चला उसका नाम फिल (Phil) है और वह भी क्रिस की तरह हॉस्टल में ही ड्यूटी देता है लेकिन उस दिन उसकी छुट्टी थी। मैं भी उनके साथ बतियाने लगा तो बातों में पता चला कि क्रिस एक ब्रिटिश नागरिक है और फिल पुर्तगाल का रहने वाला है।
कुछ देर क्रिस और फिल से बतियाने के बाद मैं अपनी डॉर्मिटरी में आ अपने बिस्तर पर पसर गया और अपने साथ लाई गई जे.आर.आर.टोल्किन (J.R.R.Tolkien) की द हॉब्बिट (The Hobbit) पढ़ने लगा जो कि लॉर्ड ऑफ़ द रिंग्स (Lord of the Rings) की कथा से पहले की कथा है। पढ़ते-२ समय बीता, नींद सी आने लगी तो किताब रख दी। बिस्तर के बगल में मौजूद खिड़की पर नज़र डाली तो पाया कि अंधेरा होने लगा था, घड़ी देखी तो जाना कि स्थानीय समय के अनुसार रात के साढ़े नौ बज रहे थे, यानि कि गर्मियों में रात नौ बजे तक सूर्यास्त नहीं होता!!
पिछले दो वर्षों में घर से दूर कई यात्राओं पर गया लेकिन कभी होमसिकनेस (Homesickness) महसूस नहीं हुई, कदाचित् इसलिए कि हर बार भारत में ही यात्रा की अपने लोगों के बीच और मित्रों के साथ। जबकि इस बार अकेला था और एक अंजान जगह पर अंजान माहौल और अंजान लोगों के बीच जिनको न मैं समझता था और न जो मुझे समझते थे!! कदाचित् इसलिए ही घर की दूरी खल रही थी। नींद आ रही थी तो मैंने सो जाना बेहतर समझा यह सोच कि अगले रोज़ नया दिन निकलेगा!!
अगले भाग में जारी …..
शुक्रवार 20 जून की रात्रि बारह चालीस का विमान था और मंज़िल थी पूर्वी योरोपीय देश हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट। चार दिन की ग्लोबल वॉयसिस की सम्मिट थी, पाँच दिन का मेरा घूमने फिरने का कार्यक्रम, कुल मिलाकर दस दिन की बुडापेस्ट यात्रा। समय से काफी पहले मैं हवाई अड्डे पर पहुँच गया और सीधे एयर फ्रांस (Air France) के काऊँटर पर अपना टिकट दिखा के अपना सामान उनके हवाले किया और सीट के लिए अपनी पसंद बता के दिल्ली से पेरिस (Paris) और पेरिस से बुडापेस्ट (Budapest) के विमानों के बोर्डिन्ग पॉस (boarding pass) लिए। उसके बाद मुद्रा बदलवानी थी, हंगरी (Hungary) की मुद्रा नहीं थी इसलिए भारतीय रुपयों को यूरो (Euro) में बदलवाया। चूंकि मैं समय से काफी पहले आ गया था इसलिए इंतज़ार भी करना था, तो सोचा कि इमिग्रेशन (immigration) तथा सिक्योरिटी क्लियरेंस कर लिया जाए। अपना केबिन लगेज (luggage) उठा अपन भी लग गए इमिग्रेशन की लंबी कतार में। तकरीबन 40 मिनट खड़े रहने और आधी पंक्ति आगे आ जाने के बाद देखा कि मैंने इमिग्रेशन का फॉर्म तो भरा ही नहीं, फोन कर इस बारे में आशीष से पूछा (यह मेरी पहली विदेश यात्रा थी इसलिए उससे सलाह ली थी हर चीज़ की) तो उसने कहा कि मुझे भी भरना होगा। मन में कैसी भावना आई यह शब्दों में बयान करना कठिन है, इतनी देर कतार में खड़े रहने के बाद जगह छोड़नी होगी तथा पुनः कतार में लगना होगा!!
परन्तु अन्य कोई रास्ता भी न था, कतार छोड़ वापस आया और फॉर्म लेकर भरा। इस बीच कतार जल्दी ही आगे खिसक गई थी, यदि फॉर्म पहले भरा होता तो अब तक अपना नंबर भी आ गया होता।
बहरहाल, फॉर्म भर मैं वापस कतार में लगा, कतार बहुत धीरे-२ खिसक रही थी। खैर किसी तरह अपना नंबर आया, इमिग्रेशन का फॉर्म दिया और उसके बाद सुरक्षा जाँच के लिए आगे बढ़ गया। सुरक्षा जाँच भी आराम से निपट गई जल्दी ही, तो उसके बाद जिस द्वार पर मेरे वाले विमान को लगना था उसके सामने की सीटों में से एक पर विराजमान हुए, तकरीबन चालीस मिनट बाकी थे तो मोबाइल पर इंटरनेट चला ब्लॉग पढ़ समय व्यतीत किया। आखिरकार द्वार खुले और एक लोहे की सुरंग में से होते हुए अपन विमान तक पहुँचे जहाँ एयर फ्रांस की एक सुन्दर एयरहोस्टेस (Air Hostess) ने स्वागत किया।
विमान में अंदर पहुँच अपनी सीट देखी कौन सी है और उस पर पसर गए! अंदर से विमान ठीक किसी बढ़िया ट्रेन की कुर्सी कार माफ़िक लगा, लोग बाग़ भी ऐसे ही थे, लगभग सभी भारतीय थे और आइल (aisle) सीटों पर बैठे अन्य यात्रियों पर अपना सामान मारते हुए चल रहे थे, मेरी भी आइल सीट थी!!
ग्यारह घंटे की दिल्ली से पेरिस की उड़ान थी, कब शुरु होगी और कब खत्म होगी। नियत समय से भी समय ऊपर हो गया था और मैं सोच रहा था कि कब विमान खिसकेगा। बस इतना सोचना था कि विमान थोड़ा सा खिसका, बोर्डिंग बंद हो गई थी, लेकिन गेट से हट के विमान पुनः खड़ा हो गया। यह तो बढ़िया बात थी कि मेरे बाजू में एक ही सीट थी, यदि बीच वाले भाग में मिल जाती जहाँ 4-5 सीटें एक साथ थी तो गड़बड़ हो जाती। मैंने अपने बगल वाली सीट की खिड़की से बाहर देखा तो सामने ही ऑस्ट्रिअन एयर (Austrian Air) का विमान दिखा जिसकी बोर्डिंग चल रही थी, कदाचित् वियना (Vienna) जाने वाला विमान था, पहले मेरा इरादा भी उसी में जाने का था लेकिन अंत-पंत एयर फ्रांस की टिकट ली। ऑस्ट्रिअन एयर के विमान के पीछे एक स्विस एयर (Swiss Air) का विमान दिखा और उसके पीछे एक एयर इंडिया (Air India) के विमान की पूँछ दिखी। अपने आगे वाली सीट के पीछे लगी जेब में से विमान का ब्रोशर (brochure) और सुरक्षा निर्देश निकाल पढ़े तो जाना कि अपना एयर फ्रांस का विमान एयरबस (Airbus) 340-300 है। खिड़की से चेहरा मोड़ वापस अपने केबिन में नज़र डाली तो एक और सुन्दर एयर होस्टेस बाजू से निकल गई!!
मेरे बगल में बैठे भारतीय युवक से बातें हुई तो पता चला कि वह गुड़गाँव का रहने वाला है और बार्सीलोना (Barcelona) जा रहा है जहाँ के विश्वविद्यालय में वह कंप्यूटर ऑर्कीटेक्चर (Computer Architecture) में डॉक्टरेट कर रहा है। सुनकर अपन प्रभावित हुए और उससे इधर-उधर की बातें हुई, वह भी यह जान प्रसन्न हुआ कि अपन सॉफ़्टवेयर इंजीनियर हैं। बात चली तो उससे जानना हुआ कि जिस विश्वविद्यालय से वह डॉक्टरेट कर रहा है उसका कंप्यूटर विभाग दुनिया के शीर्ष कंप्यूटर शिक्षा विभागों में से एक है, यह बात मुझे पता नहीं थी इसलिए ज्ञानवर्धन हुआ।
आखिरकार विमान हिला और हवाई पट्टी की ओर जाने लगा। कुछ दूरी पर केएलएम (KLM) के एक विमान को भी हिलते देखा, कदाचित् वह भी उड़ान भरने वाला था। मैंने अपना मोबाइल फोन बंद करने से पहले ऑफिस द्वारा दिया गया अंतर्राष्ट्रीय सिम कार्ड मोबाइल में डाला और अपने वाला निकाल के अलग रख लिया। हवाई पट्टी पर पहुँच विमान पुनः रुक गया, कदाचित् सिग्नल नहीं मिला था उड़ान के लिए, जेट इंजन चालू हो चुके थे और बहुत शोर हो रहा था तथा साथ ही जेट इंजनों का कंपन भी महसूस हो रहा था। कुछ मिनट बाद सिग्नल मिला, विमान चल पड़ा, गति पल प्रति पल तेज़ होती गई, एक हल्का सा झटका लगा और धरती काफ़ी नीचे छूट गई; मेरी पहली विमान यात्रा आरंभ हुई!!
उड़ान के कुछ ही मिनट बाद ड्रिंक्स सर्व हुई, मैंने थोड़ा सा सादा सोडा लिया जिसको ये लोग स्पार्कलिंग वॉटर (sparkling water) कहते हैं। उसके बाद रात्रि भोजन परोसा गया, मैंने मायूस न होने के लिए भारतीय खाने की जगह फ्रेन्च खाना लिया और मेरे बगल में बैठे बार्सीलोना जाने वाले सहयात्री ने भारतीय खाना लिया। मेरा अंदाज़ा सही निकला, फ्रेन्च खाना ठीक ठाक था लेकिन बगल वाले सहयात्री को अपने खाने से बहुत मायूसी हुई!!
शायद दिन भर के ऑफिस के काम की थकान थी या विमान का असर था, नींद आने लगी तो सीट पर थोड़ा और पसर गया, एक एयर होस्टेस द्वारा कुछ समय पहले दिए गए पैकेट में से इयर फोन (ear phone) निकाले और अपनी टीवी स्क्रीन पर उपलब्ध संगीत में से शांत वाद्य (instrumental) संगीत चुन मैं आँख बंद कर सो गया। मधुर संगीत कान में बज रहा था, विमान वालों द्वारा उपलब्ध कराया गया चादर जैसा कंबल गर्म था, आराम से नींद आ गई। पता नहीं कब आँख खुली, कानों में से इयर फोन निकाल सामने मौजूद सीट की जेब में डाल दिए और स्क्रीन पर नक्शा खोला यह देखने के लिए कि कहाँ तक पहुँचे। नक्शे पर देख जाना कि विमान समुद्र की सतह से लगभग चालीस हज़ार फीट की ऊँचाई पर तुर्की के आसपास कहीं उड़ रहा था, अभी आधा रास्ता ही हुआ है यह देख पुनः सो गया।
जब उठा तो दिन का उजाला खिड़की से अंदर आ रहा था, और मैं अपने को बहुत तरोताज़ा महसूस कर रहा था। लगभग आधे घंटे बाद सुबह का नाश्ता परोसा गया। उसके बाद पेरिस आने में अधिक समय नहीं लगा और शीघ्र ही विमान फ्रांस (France) की राजधानी पेरिस (Paris) के चार्ल्स डी गॉल (Charles de Gaulle) हवाई अड्डे पर उतर गया। विमान टर्मिनल में सीधे नहीं लगा था इसलिए यात्रियों को विमान से टर्मिनल तक ले जाने के लिए तीन बस आईं थी। पेरिस की सुबह बहुत ही सुहावनी लग रही थी, आकाश एकदम स्वच्छ और नीला था, ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मानो रात को बरसात हुई हो। बस में सवार हो निश्चित टर्मिनल पर पहुँचा जहाँ से मुझे बुडापेस्ट के लिए विमान लेना था, लेकिन कौन से द्वार पर विमान लगेगा यह तो वहाँ मौजूद जानकारी देने वाली स्क्रीनों को देख के ही जाना जा सकता था। एक…दो…तीन…चार…. हद हो गई, एक के बाद एक चार स्क्रीन दिखी और सब बंद!!
आखिरकार एक स्क्रीन दिखी जो चालू थी और उस पर अपने विमान का द्वार नंबर देखा लेकिन वह द्वार ढूँढने में पुनः दिक्कत हुई!! वाहियात बात यह कि हवाई अड्डे के काउंटरों पर मौजूद कर्मचारियों की अंग्रेज़ी बहुत दुखी थी, आधे से अधिक शब्द वो फ्रेन्च के बोल देते और मैं मूर्खों की तरह उनका मुँह ताकता रह जाता!! सबका यही हाल था और मैं मन ही मन अंग्रेज़ों और फ्रेन्च की सदियों पुरानी दुश्मनी को गालियाँ दे रहा था।
एक व्यक्ति जिसकी अंग्रेज़ी ठीक मिली वह थी ब्रिटिश एयरवेज़ (British Airways) के काउंटर पर बैठी एक ब्रिटिश महिला, लेकिन उन्होंने अफ़सोस जताते हुए कहा कि उनको नहीं पता वह द्वार कहाँ है जो मैं खोज रहा हूँ!!
खैर, अपन भटकते-२ किसी तरह पहुँच गए द्वार पर, वहाँ दो महिला कर्मचारी मौजूद थीं और शुक्र की बात कि उनको अंग्रेज़ी आती थी!! बकौल उनके विमान की बोर्डिंग में एक घंटा था तो मैं पास ही एक बेन्च पर बैठ गया और यात्रा संस्मरण लिखने के लिए मोबाइल पर नोट्स लिखने लगा। आधे से अधिक यह सफ़रनामा इसी तरह लिखे नोट्स पर आधारित है। अभी कुछ ही मिनट बीते थे कि लट्ठमार पंजाबी सुनाई दी, सिर उठाकर देखा तो उसको बोलने वाली एक बुज़ुर्ग सिख महिला अपने पतिदेव के साथ दिखीं। उस समय मानों वह पंजाबी के शब्द कानों में शहद की भांति पड़े, गिटपिट फ्रेन्च और अंग्रेज़ी से अलग अपने देश की भाषा जो अपने को समझ भी आती है!!
सुरक्षा जाँच के लिए द्वार खुला तो अपन भी पहुँच गए, जूते आदि उतार सब जाँच करवाई, बस कपड़े नहीं उतरवाए यही गनीमत थी!! उसके बाद थोड़ी और प्रतीक्षा और बोर्डिंग के लिए द्वार खुल गए। द्वार पर दिल्ली में एयर फ्रांस द्वारा जारी किया गया बोर्डिन्ग पॉस फाड़ दिया गया और उसकी जगह नया बोर्डिन्ग पॉस दिया गया, क्योंकि विमान मालेव हंगरिअन एयरलाइन्स (Malév Hungarian Airlines) का था जिसकी एक पार्टनर एयर फ्रांस है। इस बार सुरंग में नहीं जाना हुआ, सीढ़ियाँ उतर नीचे पहुँचे और विमान तक पैदल मार्च। विमान एक छोटा और खटारा बोइंग (Boeing) था, समझ आ रहा था कि जब फ्रेन्च अपनी एयरबस को अमेरिकी बोइंग से बेहतर बताते हैं तो कोई कारण है ऐसा बताने का!!
सीट इस बार भी मेरी विमान के पंख के ऊपर आइल वाली थी, लेकिन इस बार मेरे बगल में लगभग तीस बरस की एक सुन्दर महिला बैठी थी जो कि बुडापेस्ट होते हुए इस्तानबुल (Istanbul) जा रही थी, बेचारी थकी सी लग रही थी और विमान में बैठते ही सो गई। इस वाले विमान का पॉयलट बहुत ही वाहियात था, विमान चालक कम और काऊब्वॉय (cowboy) अधिक प्रतीत हो रहा था और बहुत ही वाहियात तरीके से उड़ा रहा था, लेकिन तकरीबन पौने दो घंटे बाद बुडापेस्ट में उसकी लैन्डिंग एकदम मक्खन जैसी थी, विश्वास नहीं आया कि सारे रास्ते यह घटिया तरीके से उड़ाते हुए आया और इतनी शानदार लैन्डिंग करी!!
तो आखिरकार बुडापेस्ट अपन पहुँच गए, टर्मिनल में जाकर अपने सामान की प्रतीक्षा करने लगा। मन ही मन सोच रहा था कि यदि सामान गुम हो गया तो बहुत बड़ा लफ़ड़ा हो जाएगा!! जी हाँ यहाँ भी सामान गुम हो जाता है, जर्मन विमान सेवा लुफ़्थान्सा (Lufthansa) को इस कार्य में महारत हासिल है ऐसा मैंने बहुत लोगों से सुना है। लेकिन मेरा सूटकेस गुम नहीं हुआ यह देख मुझे चैन मिला। सामान लेकर मैं बाहर की ओर आया तो अपने ड्राइवर को कहीं नहीं पाया जिसको होटल वालों ने भेजा हो, बंदा लेट था, तो इतने में मैंने 48 घंटे का एक बुडापेस्ट कार्ड ले लिया जिसका भुगतान यूरो में किया क्योंकि मुद्रा नहीं बदलवाई थी, वहाँ मौजूद एकलौते मुद्रा बदलने वाले ओटीपी बैंक (OTP Bank) का भाव अच्छा नहीं लग रहा था, लेकिन यूरो से फोरिन्ट में पर्यटन काउंटर वाले ने कराया और बाकी की रक़म मुझे फोरिन्ट में वापस करी। उसी हंगरिअन पर्यटन के काउंटर से फोकट में मिल रहे दो बड़े नक्शे और बुडापेस्ट पर छपी पुस्तिकाएँ ली। इतने में ही उसी समय आकर खड़ा हुआ एक बंदा दिखा जिसके हाथ में मेरे नाम का बड़ा सा कागज़ था, जाकर उससे बात की और फिर बाहर खड़ी उसकी गाड़ी में सामान लाद अपन निकल पड़े बुडापेस्ट शहर की ओर, अपना ठिकाना पेस्ट वाला भाग था!!
अगले भाग में जारी …..
हुम्म, ग्लोबल वॉयसिस की सालाना सम्मिट इस साल बुडापेस्ट में हुई। ग्लोबल वॉयसिस पर एक लेखक होने की हैसियत के कारण न्यौता अपने को भी था इसलिए आनन फानन पॉसपोर्ट बनवा के अपन भी पहुँच गए।
बाकी का किस्सा बाद में बताया जाएगा, फिलहाल तो रील को फास्ट फॉरवर्ड कर सम्मिट का हाल बाँचते हैं।
तो ग्लोबल वॉयसिस की सम्मिट इस साल पूर्वी योरोपीय देश हंगरी (Hungary) की राजधानी बुडापेस्ट (Budapest) में थी। सम्मिट के लिए पेस्ट (Pest) में स्थित होटल नोवोटेल सेन्ट्रम (Novotel Centrum) में दो कॉन्फ्रेन्स हॉल बुक करवाए गए थे। रहने का बन्दोबस्त दो होटलों में था, कुछ के लिए कमरे नोवोटेल में ही मिल गए और बाकियों को दो ट्राम स्टॉप दूर ईज़ी होटल (Easy Hotel) में ठेल दिया गया। मेरा कमरा भी ईज़ी होटल में ही था। शुक्रवार 27 जून को सुबह साढ़े नौ बजे(स्थानीय समय) पर सम्मिट का शुभारंभ होना था पर मैं 10 मिनट लेट हो गया। गर्मी में पसीना बहाते नोवोटेल में पहली मंज़िल पर स्थित कॉन्फ्रेन्स हॉल के बाहर पहुँचा तो देखा काफ़ी भीड़ सी थी, रजिस्ट्रेशन डेस्क पर मैनेजिंग एडिटर साहिबा, सोलाना “सोलानासॉरस” लारसन, कमान संभाले हुए थी। उनसे परिचय हुआ, अपने नाम का तैयार रखा बिल्ला और ग्लोबल वॉयसिस की टीशर्ट ली तथा दोनो दिन के प्रोग्राम की सूचि की एक प्रति संभाली और कॉन्फ्रेन्स हॉल की ओर बढ़ गया।
कॉन्फ्रेन्स हॉल? सम्मिट के लिए दो अगल-बगल वाले कॉन्फ्रेन्स हॉल लिए गए थे और उनके बीच के पार्टीशन को हटा दिया गया था तो वह एक बड़ा हॉल बन गया था। दुनिया भर से तकरीबन दो सौ लोग आए हुए थे और वह जुड़वा हॉल पूरा खचाखच भरा हुआ था। लोग कुर्सियों पर तो बैठे ही थे, नीचे कालीन पर भी दोनो ओर की दीवारों के सहारे बहुत से बैठे हुए थे और पीछे दरवाज़ों के आजू-बाजू भी बहुत से खड़े और बैठे थे, और मामला शुरु हुए अभी सिर्फ़ दस ही मिनट हुए थे, ओपनिंग स्पीच होकर चुकी थी बस!! खाली कुर्सी नज़र न आई तो मैं भी द्वार के पास खड़ा ही हो गया, लैपटॉप लेकर नहीं गया था मैं इसलिए नोट्स आदि लेने का काम ही नहीं था, सोचा अगर कुछ नोट्स लेने होंगे तो मोबाइल पर लिए जाएँगे(जो कि लिए भी), तो अपना कैमरा निकाल मैं फोटू क्लिकियाने में लग गया।
ग्लोबल वॉयसिस के फाउंडिंग डॉयरेक्टर (Founding Director) ईथन (Ethan) अपनी बात कह कर निपटे थे और अब ग्लोबल वॉयसिस एडवोकेसी (Global Voices Advocacy) के डॉयरेक्टर सामी (Sami) टुनीशिया (Tunisia) में मौजूद सरकार की इंटरनेट पर थोपी गई सेन्सरशिप के बारे में बता रहे थे और कुछ झलकें पिछले दो दिन में हुई ग्लोबल वॉयसिस एडवोकेसी की सम्मिट से भी दिखाई और कुछ वीडियो दिखाए जो कि नागरिक पत्रकारिता के बेहतरीन नमूनों में से थे, एक वीडियो में मोरोक्को (Morocco) के कुछ पुलिस वालों को बस ड्राइवरों से पैसे निकलवाते दिखाया गया था। टुनीशिया, मोरोक्को, मिस्र (Egypt) आदि देशों में बहुत से लोग ऐसे वीडियो चोरी-छुपे उतारते हैं जो कि भ्रष्टाचार और सरकारी मुलाज़िमों के अत्याचारों को दिखाते हैं, और उन सभी वीडियो को यूट्यूब आदि पर अपलोड कर देते हैं। इनके कारण कई सरकारी मुलाज़िम इन देशों में बर्खास्त हो चुके हैं।
सम्मिट का पहला सत्र विश्व की भिन्न सरकारों द्वारा लगाई गई सेन्सरशिप पर था जिसके पैनल पर बेलारस (Belarus) के एक्टिविस्ट आन्द्रे अबोज़ाउ, ग्लोबल वॉयसिस जापान से क्रिस साल्ज़बर्ग, मिस्र के प्रसिद्ध ब्लॉगर अला अब्द अल-फ़तह, ग्लोबल वॉयसिस के एक संस्थापक ईथन ज़करमैन (Ethan Zuckerman) और पाकिस्तान के एक प्रसिद्ध ब्लॉगर डॉ. आवाब अलवी थे। इस सत्र में चर्चा हुई इंटरनेट सेन्सरशिप पर और कैसे अभिव्यक्ति की आज़ादी को कई मुल्क़ों में दबाया जाता है और उसके हिमायतियों को सरकारें कैसे कुचलने का प्रयास करती हैं। पैनल पर मौजूद सभी साहबान ने अपने-२ इलाकों और मुल्क़ों के उदाहरण दे अपने-२ अनुभव बयान करे।
पाकिस्तान से तशरीफ़ लाए डॉ. आवाब ने बताया कि कैसे जब पाकिस्तान में ब्लॉगस्पॉट पर बैन लगा था तो उन लोगों ने उसके लिए प्रॉक्सी वेबसाइट बनाई, जिसे बाद में भारत में ब्लॉगस्पॉट के बैन लगने पर भारतीय ब्लॉगरों और पाठकों ने भी प्रयोग किया था। साथ ही उन्होंने ऐसे समय में मोबाइल के लघु संदेश द्वारा ब्लॉगिंग के लिए किए गए जुगाड़ों की दास्तान और अनुभव, तथा सीखे गए सबक सबके साथ बाँटे। इसी दौरान सामी ने एक ऐक्सेस डिनाइड मैप (Access Denied Map) भी दिखाया जिसमें उन्होंने गूगल मैप्स पर उन देशों को अंकित किया हुआ था जहाँ इंटरनेट पर कम या अधिक सेन्सरशिप रही है या है जिसका एक स्क्रीनशॉट निम्न है।

दुख की बात है कि भारत भी इस सूचि में शामिल है।
इसके बाद दूसरा सत्र आरंभ हुआ जिसका विषय था सिटिज़न मीडिया और ऑनलाईन फ्री स्पीच (Citizen Media and Online Free Speech) और इसके पैनल पर भी बहु राष्ट्रीय शख़्सियतें थी। यह चर्चा सत्र भी पिछले सत्र से जुड़ा हुआ सा ही था क्योंकि सेन्सरशिप का मुद्दा यहाँ भी उठा और गुमनाम ब्लॉगिंग तथा अपने नाम से ब्लॉगिंग करने के अच्छे एवं बुरे पहलुओं पर भिन्न-२ लोगों के अनुभव सामने आए ऐसे इलाकों से जहाँ सरकारों की लगभग तानाशाही ही है।
सिंगापुर से आए प्रसिद्ध ब्लॉगर औ वाए पांग (Au Wai Pang) ने सिंगापुर के हालात बताए जहाँ मामला थोड़ा सा भिन्न है। वहाँ सरकार ने जबरन सेन्सरशिप नहीं थोपी है वरन् चाशनी में लपेट के लोगों को दी है और सामाजिक तथा आर्थिक विकास को पाने के लिए लोगों ने उसे स्वीकार किया है। इसका लाभ सरकार ने अपनी विरोधी पार्टी को कुचल के पाया और पिछले बीस साल से एक ही पार्टी की सरकार सत्ता में है। वहाँ सरकार अथवा प्रशासन नहीं वरन् स्वयं लोग अपने को सेन्सर करते हैं, कुछ सुविधाओं को पाने के लिए उन्होंने स्वयं ही अपनी आज़ादी का एक हिस्सा कुर्बान कर दिया।
इसके बाद दोपहर का भोजन हुआ तो उस दौरान कई लोगों से मिलना हुआ जिनसे अभी तक ईमेल द्वारा ही पहचान थी। सबसे पहले तो ग्लोबल वॉयसिस की दक्षिण एशिया की एडिटर नेहा को ढूँढा, वहाँ नेहा के अतिरिक्त किसी को नहीं जानता था, हालांकि ग्लोबल वॉयसिस की मैनेजिंग डॉयरेक्टर जॉर्जिया पॉप्पलवेल (Georgia Popplewell) से पिछले रोज़ दोपहर में मुलाकात हो गई थी जब दोपहर में नेहा को होटल से लेने आया था और सोलाना से सुबह रजिस्ट्रेशन डेस्क पर मुलाकात हुई थी। नेहा के पास ही डेब्बी (Deborah Ann Dilley) बैठी दिखाई दीं जो कि ग्लोबल वॉयसिस पर तुर्क ब्लॉगजगत को कवर करती हैं और ग्लोबल वॉयसिस के बोर्ड ऑफ़ डॉयरेक्टर्स में हम लेखकों की प्रतिनिधि भी हैं।
उसके बाद रेज़वानुल इस्लाम (Rezwanul Islam) से मुलाकात हुई। रेज़वान बांग्लादेशी हैं, ग्लोबल वॉयसिस पर बांग्ला ब्लॉग्स के बारे में लिखते हैं, ग्लोबल वॉयसिस की बांग्ला वेबसाइट के एडिटर हैं, ग्लोबल वॉयसिस के राइज़िंग वॉयसिस प्रोजेक्ट में फीचर एडिटर हैं, आजकल जर्मनी में पत्नी सहित डेरा डाले हुए हैं और लंदन स्थित एसोसिएशन ऑफ़ चार्टर्ड सर्टिफाइड अकाउंटेन्ट्स (Association of Chartered Certified Accountants) की अपनी सर्टिफिकेशन की पढ़ाई भी कर रहे हैं। अगले दो दिन सबसे अधिक बातें रेज़वान के साथ ही हुई।
लंच के बाद के सत्र का विषय था लिविंग विद सेन्सरशिप (Living with Censorship) और उसके बाद का सत्र तकनीकी ज्ञान पर था जिसमें सेन्सरशिप के बावजूद कैसे मुक्त रहा जाए इसके जुगाड़ों पर चर्चा थी और एकाध सही से जुगाड़ भी पता चले(इसके बारे में शीघ्र ही अन्य लेख में)। इसके बाद जलपान अवकाश के दौरान कुछ अन्य लोगों से भी मिलना हुआ। इसी दौरान अपर्णा रे (Aparna Ray) से मुलाकात हुई जो कि कोलकाता से आई थीं तथा मेरे और नेहा के अतिरिक्त वहाँ सिर्फ़ वही एक भारतीय थीं। अपर्णा ग्लोबल वॉयसिस पर बांग्ला ब्लॉग्स के बारे में लिखती हैं।
जलपान अवकाश के बाद के सत्र का विषय था “एनजीओ एण्ड ऑन द ग्राउंड एक्टिविस्ट्स – डिफेन्डिंग द वॉयसिस” (NGO’s and on-the ground activists: Defending the Voices) जिसमे चर्चा इस विषय पर रही कि कैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए कार्यरत गैर सरकारी संस्थाएँ लोकल स्वयंसेवियों की सहायता ले सेन्सरशिप के खिलाफ़ लड़ सकती हैं। यह सत्र कुछ बोरियत भरा लग रहा था। ऐसा नहीं है कि बोलने वाले बेमज़ा थे लेकिन न जाने क्यों मैं मानसिक थकान सी महसूस कर रहा था, सुबह से शाम सात घंटे हो गए थे। मैं सोच ही रहा था कि हॉल से बाहर निकल एक कड़क काली कॉफी ली जाए दिमाग पर छा रही धुंध को दूर करने के लिए परन्तु उसकी आवश्यकता ही नहीं रही क्योंकि तभी एक हास्यप्रद वाक्या हुआ।
हुआ यूँ कि इस सत्र में पैनल पर रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (Reporters Without Borders) संस्था की एक प्रतिनिधि पेरिस से आई हुई थी और अपनी संस्था के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा था कि उनकी संस्था बीस वर्ष पुरानी है और अकेले पेरिस में ही उनके यहाँ बीस लोग कार्यरत हैं तथा पूरे विश्व में सौ संवाददाता हैं। लेकिन तभी एक बात पर एक ईरानी ब्लॉगर ने अपना किस्सा बताते हुए बयान किया कि ईरान में लगाई जाने वाली सेन्सरशिप पर जब उन्होंने लिखा तो उन पर अमेरिकी राजधानी वाशिंगटन स्थित एक थिंकटैंक में कार्यरत एक अन्य ईरानी ने उन पर बीस लाख डॉलर का मुकदमा ठोक दिया। उन ईरानी ब्लॉगर साहब ने सीमाविहीन पत्रकारों की इन मोहतरमा से प्रश्न किया कि इस बात पर क्यों नहीं मामला उठाया गया, क्या सिर्फ़ इसलिए क्योंकि इस मामले में एक ईरानी ही दूसरे ईरानी को खामखा अदालत में घसीट रहा था न कि कोई अमेरिकी आदि। इस बात पर उन मोहतरमा से पहले तो कुछ कहते न बना, वे सोचती रहीं कि क्या कहा जाए, बोलने का प्रयास करतीं लेकिन ज़ुबान साथ न देती और आखिरकार वे बोलीं कि उनकी संस्था बहुत बड़ी नहीं है और उनके पास सिर्फ़ 6 जर्नलिस्ट, बोले तो पत्रकार, हैं और उनके पास सारी खबरें नहीं पहुँचती हैं और कदाचित् इसी कारण ये मामला अभी तक उनकी जानकारी में नहीं था!!
मेरे आगे वाली कुर्सी पर सम्मिट में भाग लेने वाली सबसे कम उम्र की दर्शक अपने पिता के साथ बैठी थी। तीन या चार वर्ष की यह बच्ची(और कदाचित् भावी ब्लॉगर) अपनी मम्मी को सामने मंच पर बोलते देखने के लिए आतुर थी और कभी अपनी रंगो की पुस्तक में रंग भर तो कभी बेसब्री से उचक कर खड़े हो किसी तरह समय व्यतीत कर रही थी। दिन के आखिरी सत्र में उसकी मम्मी, स्टेफानी हैनके (Stephanie Hankey), पैनल पर थीं और जैसे ही अपनी प्रेज़ेन्टेशन देने वे मंच पर आईं यह बच्ची खुशी से उठ खड़ी हुई।
उसको पूरे समय किसी से मतलब नहीं था, वह सिर्फ़ अपनी मम्मी की प्रतीक्षा कर रही थी, बचपन कितना मासूम होता है।
बाजू में बैठे उसके पिता की स्वीकृति लेकर उसकी फोटो ली और उनको फोटो कहाँ मिलेगी उसका पता लिखकर दे दिया ताकि वे भी फोटो की एक प्रति अपने पास रख लें।
आखिरकार पहले दिन का कार्यक्रम समाप्त हुआ, लगभग सभी ने चैन की सांस ली, मैंने भी ली!!
इसके बाद बाहर निकले, आखिरकार एक प्याली काली कॉफी ले ही ली सुस्ती भगाने और तरोताज़ा होने के लिए। रेज़वान के साथ-२ ब्राज़ील से आए ग्लोबल वॉयसिस के एक अन्य लेखक से बातचीत हुई, वे काफ़ी समय बुर्कीनाफासो (Burkinafaso) में रहे हैं। इधर उधर कितने ही लोगों से बात हुई और फिर जब तकरीबन सवा सात बजे रात्रि भोजन के लिए नीचे जा रहे थे तो कराची से तशरीफ़ लाए डॉ. आवाब अलवी और साथ आई उनकी बेग़म तथा साहबज़ादे से परिचय हुआ और थोड़ी देर उन्हीं के पास खड़े हो नेहा और मैंने उनके साथ गप्पें मारी। बुडापेस्ट में दस दिन रहा और हिन्दी में बात करना बहुत ही कम हुआ। नेहा और अपर्णा से ही हिन्दी में बात होती थी, इसलिए उन कुछ मिनटों की हिन्दी में होती बातचीत में बड़ा सुकून मिलता था। यह भी एक कारण था कि डॉ. आवाब से बात कर और अच्छा लगा क्योंकि वहाँ मौजूद लोगों में नेहा और अपर्णा के अतिरिक्त एक वे ही थे जिनसे हिन्दी में बात हो सकती थी, इसलिए उनसे हिन्दी में ही बात करी!!
कुल मिलाकर सम्मिट का पहला दिन बहुत ही शानदार रहा, अपेक्षा से कुछ अधिक ही रहा और कई लोगों से मिलना हुआ, रोचक बातें हुई और शाम होते-२ दिमाग का दही हो गया।
फिर भी, अगले दिन की प्रतीक्षा थी और उससे कोई कम अपेक्षा नहीं थी।
अगले भाग में जारी…..
हर वर्ष ग्लोबल वॉयसिस एक समिट (Summit) यानि कि कॉन्फरेन्स का आयोजन करता है जिसमें ग्लोबल वॉयसिस परिवार के सदस्यजन ब्लॉगरों, तकनीकज्ञों, पत्रकारों आदि के एक बड़े समूह से मिलते हैं और आपस में नागरिक मीडिया (Citizen Media) और उसकी उन्नति तथा गतिविधियों आदि पर, खासतौर से उत्तरी अमेरिका और पश्चिमी योरोप के अतिरिक्त अन्य देशों से संबन्धित, आपस में एक दूसरे से ज्ञान बाँटते हैं और चर्चा करते हैं। इंटरनेट के ज़रिए काम करने वाले ग्लोबल वॉयसिस के सदस्यों के लिए यह एक मौका होता है साल में एक बार अन्य सदस्यों से मिलने का और ग्लोबल वॉयसिस की भविष्य की गतिविधियों पर चर्चा के लिए इस दौरान दो दिन की एक बैठक होती है जो कि सिर्फ़ ग्लोबल वॉयसिस के सदस्यों के लिए होती है। पिछली ग्लोबल वॉयसिस की समिट दिसंबर 2006 में नई दिल्ली में हुई थी।
इस वर्ष ग्लोबल वॉयसिस सिटिज़न मीडिया समिट (Global Voices Citizen Media Summit) 27 तथा 28 जून 2008 को पूर्वी योरोपीय देश हंगरी की खूबसूरत राजधानी बुडापेस्ट में हो रही है।
दो दिन की इस बार की समिट में नागरिक मीडिया (Citizen Media) और उसके निर्माताओं की समाज और आम जीवन में वास्तविक और संभावित भूमिकाओं खास फोकस होगा। समिट की पूरी प्रोग्राम सूचि यहाँ उपलब्ध है। यदि आप इस समिट में भाग लेना चाहते हैं तो आपको यहाँ रजिस्टर करना होगा। समिट के स्थान आदि की अधिक जानकारी यहाँ प्राप्त करें।
मैं समिट में भाग लेने के लिए बुडापेस्ट जा रहा हूँ और आप…..?