….. बना वोट पाने का माल ऽऽ,
कांग्रेस भी चाहे पाना इसको करुणा के साथ ऽऽ ॥
मेरे ख्याल से तो दोनो एक जैसे ही थे, अमानुष!
बहुत लोग कहते हैं कि हमारा देश तरक्की पर है। कुछ लोग इसको यथार्थ के रूप में कहते हैं और कुछ इसको व्यंग्य के तौर पर। जो लोग व्यंग्य के तौर पर कहते हैं उनमें से कुछ का इशारा कदाचित् इसी ओर होता है। साठ साल पहले हमने लड़-झगड़कर अंग्रेज़ों से देश को आज़ाद करवा लिया, परन्तु क्या हम सही मायने में आज़ाद हुए? यदि समाज और उस पर राज करते कीड़ों को देखो तो एहसास होता है कि आज़ादी अंग्रेज़ों से तो मिल गई परन्तु उनकी जगह देशी तानाशाह आ गए, आज़ाद तो हम हुए नहीं, सिर्फ़ गुलामी की रस्सी, नाक की नकेल में बंधी, एक के हाथ से निकल दूसरे के हाथ में चली गई, और अभी भी भारत में हैं अंधेर राज।
यह अंधेर नहीं है तो और क्या है? चंडीगढ़ निवासी शान्तनु गोयल तथा उसके परिवार को उसके भाई के ससुराल वालों ने बेदर्दी से पुलिस के सामने पीट डाला, सिर फ़ोड़ दिए, हाथ तोड़ दिए, घर में तोड़ फ़ोड़ की, और तो और, उनकी बीमार माताजी को भी नहीं बक्शा, उनकी धर्मपत्नी के साथ बदसलूकी की हद लाँघते हुए उनके भी कपड़े फाड़ डाले!!! और यह सब किसलिए? यह सब इसलिए क्योंकि शान्तनु के भाई की पत्नी कलह कर अपने मायके जाकर बस गई थी और उसके मायके वाले शान्तनु के भाई से यह सब कलह और मामला समाप्त करने के लिए 30 लाख रूपए माँग रहे थे जिसमें (आजकल जगह-२ चल रही सेल के सदके) उन्होंने छूट देते हुए 50 प्रतिशत माफ़ कर दिए और बाद में अपनी माँग को रिवाईज़ करते हुए 15 लाख की माँग की जिससे एक पैसा कम लेने को वो लोग तैयार नहीं। जब शान्तनु के भाई ने रकम देने में अपनी असमर्थता जताई और उसके घर वालों ने मामले को बातचीत से सुलझाने की कोशिश की तो शान्तनु की भावज के घरवाले अपने रिश्तेदारों की गुंडा फ़ौज लेकर शान्तनु के चंडीगढ़ स्थित फ़्लैट पर आ धमके और जबरन घर में घुसते हुए उन्होंने सभी घरवालों की क्लॉस ले डाली। किसी के सिर पर टेलीफोन इतनी ज़ोर से मारा कि टेलीफोन के टुकड़े हो गए तो किसी का सिर काँच की टेबल पर दे मारा और जब सब टूट गया तो दीवारें तो फ़िर भी खड़ी थी, तो वहीं सिर दे मारे!!!
लेकिन अभी बस कहाँ हुई थी। कलह कर घर लौटी कन्या के पिताजी ने गुंडागर्दी की कमान स्वयं संभालते हुए शान्तनु की बीमार माताजी को रोटी बेलने वाले बेलन से पीट दिया, तत्पश्चात उनके घर की औरतों में भी बैंडिट क्वीन की आत्मा का प्रवेश हुआ और उन्होंने बीमार माताजी की फ़्राईंग पैन और सैन्डलों से पूजा की!! शान्तनु के घर वाले पुलिस को फोन नहीं कर पाए क्योंकि गुंडो ने पहले से ही उनके घर के टेलीफोन की तार काट दी थी। लेकिन यदि नहीं भी काटते तो कोई फ़र्क नहीं पड़ता। पड़ोसियों के बुलाने पर पुलिस आखिरकार आई अवश्य, लेकिन उन्होंने ने भी अपने-२ मुँह फ़ेर लिए। प्रत्यक्षदर्शियों के बहुत ज़ोर डालने पर पुलिस ने ड्रामा बन्द करवाया, पुलिस स्टेशन भी ले गए सबको, लेकिन कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं की। शान्तनु और उनके घरवालों के ज़ख्मों को मामूली बता छोड़ दिया गया और गुंडों को डॉक्टरी उपचार मुहैया करवाया गया(बिना किसी चोट के मरहम-पट्टी??)। डीएसपी तक शिकायत जाने पर पुलिस ने रिपोर्ट तो दर्ज कर ली लेकिन बड़ी तादाद में प्रत्यक्षदर्शियों के उपस्थित होने और उनके बयान के बावजूद आज पाँच दिन बाद तक भी कोई कार्यवाही नहीं की गई है, कोई गिरफ़्तारी नहीं हुई है। उधर दूसरी ओर गुंडों की धमकियाँ ज़ारी हैं जो अगली बार और गंभीर परिणामों की सूचक हैं।
एक रिपोर्ट में मैंने पढ़ा था कि भ्रष्टाचार के मामले में भारत विश्व में 71वें स्थान पर है। यदि वाकई ऐसा है तो कोई भी सोचकर ही काँप जाएगा कि विश्व का सबसे भ्रष्ट देश दक्षिण अफ़्रीका कैसा होगा और वहाँ की पुलिस कैसी होगी!!!
इसको पढ़ रहे और मीडिया(अख़बार, टीवी चैनल, रेडियो, आदि) से जुड़े हर व्यक्ति से अपील है कि इस खबर और चंडीगढ़ पुलिस वालों की गुंडों से मिलीभगत को अपने-२ प्रसार माध्यमों द्वारा सरेआम नग्न कर शान्तनु की सहायता करें। यहाँ कई ज़िन्दगियों का प्रश्न हैं जिनके जीवन को कभी भी यातना के अंधेरे निगल सकते हैं।
अन्य सभी से भी अपील है कि यदि कोई निजी तौर पर या प्रशासन आदि में अपने किसी संपर्क सूत्र द्वारा कुछ कर सकता है तो अवश्य करे।
तो फ़िर एक नया विवाद खड़ा हो गया है, लगता है कि हमारे यहाँ के राजनीतिक दलों को फ़ालतू के नए-नए विवाद खड़े करने के सिवाय कोई और काम नहीं है, वे बेकार के विवाद खड़े करते रहते हैं ताकि लोग वहीं उलझे रहें और आवश्यक मुद्दों(जैसे कि सरकार कैसे देश का बेड़ागर्क करने में लगी हुई है) की ओर ध्यान दे ही न पाएँ।
अब नया विवाद खड़ा हुआ है, सीपीएम सांसद वृंदा कारत ने प्रसिद्ध योग गुरू स्वामी रामदेव पर आरोप लगाया है कि उनकी हरिद्वार स्थित आयुर्वेदिक फ़ार्मेसी में बनने वाली दवाओं में पशु और मानव हड्डियों के चूर्ण आदि का प्रयोग होता है। जिन नमूनों को उन्होने सरकारी प्रयोगशालाओं को सौंपा है उनमे पशु और मानव हड्डियों के चूर्ण मिले भी हैं। परन्तु इस बात का क्या प्रमाण है कि उन नमूनों के साथ कोई छेड़खानी नहीं की गई? लगता है कि सरकार भी इसी तरह सोच रही है और उन्होने निर्णय लिया है कि वे अब स्वामी रामदेव के दवाखाने से ही नमूने लेकर जाँच करेंगे!!
जो लोग सोच रहे हो, उन्हे मैं स्पष्ट कर देना चाहूँगा कि मैं यहाँ किसी के पक्ष में नहीं हूँ, स्वामी रामदेव का न तो मैं कोई कार्यक्रम देखता हूँ न ही मैं उनका भक्त इत्यादि कुछ हूँ। और सीपीएम से भी मुझे कोई लगाव नहीं है। परन्तु बात यह है कि कल के हिन्दुस्तान टाईम्स में छपे समाचार अनुसार वृंदा कारत ने यह बयान दिया कि स्वामी रामदेव ने पशुओं आदि की हड्डियाँ इत्यादि प्रयोग करके हज़ारों लोगों का विश्वास तोड़ा है और कई शाकाहारियों के हृदयों को ठेस पहुँचाई है!!
इस पर मैं यही कहना चाहूँगा कि ऐसा शुद्ध शाकाहारी कौन है जिसने शाकाहार के अलावा कोई और आहार जीवन में लिया ही न हो? जहाँ तक मैं जानता हूँ, ऐसा मुमकिन ही नहीं है, क्योंकि दूध, घी इत्यादि का प्रयोग सभी करते हैं और ये शाकाहार तो नहीं हैं क्योंकि जहाँ तक मुझे ज्ञात है, दूध अभी भी गाय, भैंस और बकरी का ही प्रयोग होता है और पहाड़ी इलाकों में याक का भी दूध इस्तेमाल में लाया जाता है, और से सभी जीव शाक तो नहीं है, पशु हैं, तो इनका उत्पाद शाकाहारी कैसे हो सकता है? घी, पनीर, मक्खन इत्यादि दूध से ही बनते हैं, तो यकीनन वे भी शाकाहार तो नहीं कहलाए जा सकते!! और तो और, दही तभी जमता है जब बैक्टीरिया नामक जीवाणु गर्म दूध के साथ क्रिया करते हैं, तो ज़ाहिर सी बात है कि दही में बैक्टीरिया होता है जो कि निश्चय ही शाक तो नहीं है, और वह जीवित भी होता है!! साथ ही, अभी हाल ही में ऐसा समाचारों में आया था कि महाराष्ट्र में एक घी बनाने के कारखाने पर छापा पड़ा था जहाँ पर घी पशु चर्बी से बनाया जाता था और देश भर में बेचा जाता था जिसे लोग बिना किसी परेशानी के खाते और पचाते थे। यदि अभी भी बस नहीं तो वृंदा जी को यह जानना चाहिए कि वातावरण में कई प्रकार के जीवित जीवाणु और कीटाणु हैं जो कि हर पल हमारे श्वास के साथ हमारे शरीर के अंदर-बाहर होते रहते हैं और हमारे अंदर भी कई तरह के जीवाणु स्थायी रूप से रहते हैं जो कि हमारा भोजन पचाते हैं। तो शाकाहार को यहाँ मुद्दा बनाकर श्रीमती वृंदा अपनी रोटियाँ सेकने का प्रयत्न न ही करें तो बेहतर होगा।
जब अल्कोहल मिली ख़ाँसी-जुकाम की दवाईयाँ लेकर लोगों को तकलीफ़ नहीं है तो अब क्यों खुजली हो रही है? यदि स्वामी रामदेव की दवाओं से लोगों को लाभ हुआ है तो क्यों इस बात की परवाह की जाए कि उनमें हड्डियों का चूर्ण है या नहीं? यदि कोई बीमार है तो शाकाहार उसे ठीक करेगा या दवाई?
मैं यह नहीं कहता कि हड्डियों आदि का होना ठीक है या नहीं, यदि यह कानून के खिलाफ़ है तो फ़िर इसके ऊपर कार्यवाही होनी चाहिए, लेकिन असल मुद्दे को घुमा फ़िरा के कोई और रंग चढ़ा देना, यह तो हमारे राजनीतिज्ञों की पहचान है जो कि बहुत ही गिरी हुई हरकत है!!
आठ महीने पुराने राष्ट्रपति शासन की समाप्ती के साथ ही बिहार में हुआ लालू राज का अन्त और नीतिश के आ गए मजे!! 15 साल बाद बिहार में पहली बार ऐसी सरकार बनी है जो कि लालू के नेतृत्व में नहीं है। गौरतलब है कि लालू को जब पुलिस हिरासत में लेकर जेल भेजा गया था तो वो अपनी जगह अपनी धर्मपत्नी श्रीमती राबड़ी देवी को बिहार की मुख़्यमन्त्री बना गए थे, जैसे कि मुख़्यमन्त्री पद न हुआ घर की ख़ेती हो गई!! पर अब वो दिन बीत गए रे भैया, सुख के दिन आयो रे(बिहारियों के लिए)!!
आज नीतिश कुमार ने पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में 13 अन्य पार्टी सदस्यों के साथ बिहार के तेईस्वें(23) मुख़्यमन्त्री के रूप में शपथ ली। बिहार में भाजपा के अध्यक्ष, श्री सुशील कुमार मोदी, उप-मुख़्यमन्त्री के रूप में कार्यभार सम्भालेंगे। इस ऐतिहासिक मौके पर(आख़िर 15 साल बाद कोई नई सरकार आई है) कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे जिनमें पूर्व-प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, मध्यप्रदेश मुख़्यमन्त्री बाबूलाल गौर, उड़ीसा मुख़्यमन्त्री नवीन पटनायक, झारखंड मुख़्यमन्त्री अर्जुन मुन्डा आदि प्रमुख थे।
तो अब विचार करने वाली बात यह है कि इस तख़्तापलट से क्या बिहार का कुछ भला होगा? जहाँ अन्य राज्य प्रगति करते जा रहे हैं वहीं लालू राज के चलते अब तक बिहार एक पिछड़ा राज्य बना रहा जो कि अब भी 18वीं शताब्दी में जी रहा है। व्यापारियों का दुकान चलाना मुश्किल था, लालू के घर में कुछ उत्सव हो तो मेहमानों की आवभगत के लिए दुकानें लूट ली जाती थी, शोरूमों से नई गाड़ियाँ उठा ली जाती थी, फ़र्नीचर ईत्यादी भी दुकानों से ज़बरन बिना मोल दिए उठा लिया जाता था, जैसा कि लालू की बेटी की शादी के अवसर पर हुआ था। कहने का अर्थ है कि अब तक बिहार में अंधेर नगरी, चौपट राजा वाला हिसाब था। क्या अब नई सरकार आने से कुछ सुधार की आशा की जा सकती है? या फ़िर एक गया दूसरा आया वाली बात होने वाली है?