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देवताओं के ए खामोश नगर …..


June 11th, 2008 | 3 Comments

ऐसे ही पिछले वर्ष छुट्टियों पर दिल्ली से बाहर की गई घुम्मकड़ी के दौरान ली गई तस्वीरें देख रहा था कि फरवरी में ली गई खजुराहो की तस्वीरें दिखाई दीं। एकाएक ही मन जैसे उन पूर्व-मध्यकालीन मंदिरों की उड़ान पर चला गया; उस समय हरिप्रसाद चौरसिया जी की बांसुरी के मधुर संगीत की स्वर लहरियाँ कानों से टकरा मानों जन्नत का सा एहसास करा रहीं थी। जब वहाँ पिछले वर्ष गया था तो पश्चिमी मंदिरों के समूह को देखने हम सुबह सवेरे गए थे, उस समय वहाँ अधिक पर्यटक नहीं थे, मंदिर के अंदर बैठने पर मानों ऐसा प्रतीत हो रहा था कि सदियाँ बीत गई हों वहाँ बैठे-२ और पता ही नहीं चला, इतनी शांति थी हर ओर कि मन के सभी शोर जैसे उससे डर कर भाग गए थे!!

जब वह सुन्दर और शीतल तंद्रा भंग हुई तो सोचा कि कुछ अलग किया जाए, एकठो स्लाईडशो टाइप अपन भी बना लें तो उस समय खजुराहो में ली गई तस्वीरों में से सबसे बेहतरीन तस्वीरों को जोड़ यह बना डाला। :) स्पीकर अथवा हेडफोन को भी चालू कर यह वीडियो देखें, पार्श्व संगीत बढ़िया है। :tup:

Get the Flash Player to see the wordTube Media Player.

प्रतिबिंब पर जब खजुराहो की एक तस्वीर पोस्ट की थी तो नीरज दादा से साथ में लगाने के लिए यह पंक्तियाँ ली थीं:

ए चंदेलों के जमाने के शहर खजुराहो
देवताओं के ए खामोश नगर खजुराहो
ए तिलिस्मात न जामये खजुराहो
पर तवे रौनके इकबाल कमर खजुराहो

तेरा हर नक्श है पत्थर पै जवानी का उभार
तुझमें महफज है अय्यामें गुजिशता की बहार
सनअते संग तराशी के ऐ मशहूर दयार
मंदिरों से तेरी तारीख का कायम है मयार

यह किसकी रचना है यह तो नीरज दादा को भी नहीं पता लेकिन सुन्दर रचना है यह तो मुझ जैसा (इन मामलों में)गंवार भी कह सकता है! :tup:


ये मौसम….. ये नज़ारे…..


October 25th, 2007 | 16 Comments

कई बार प्रयास रहता है कि हर सप्ताहांत कम से कम एक बार दिल्ली या उसके आसपास कहीं सुबह जाया जाए घूमने, फोटोग्राफ़ी करने और उस जगह को जानने के लिए। दिल्ली में और आसपास बहुत सी ऐतिहासिक जगह हैं जो कि मशहूर नहीं हैं और जिनके बारे में कम लोग जानते हैं, ऐसी जगहों पर जाना और इनके बारे में जानना काफ़ी ज्ञानवर्धक रहता है। अन्य भी कई जगह हैं जैसे कि कोई पक्षी विहार या वाइल्ड लाइफ़ सैंक्चुअरी (wild life sactuary) आदि जहाँ जाया जा सकता है और वन्य जीवों पर भी ज्ञान पाया जा सकता है, साथ ही अच्छे फोटो भी मिल जाते हैं।

तो ऐसे ही बीते शनिवार सुबह सवेरे मैं और संतोष पहुँच गए ओखला पक्षी विहार जहाँ कई तरह के पक्षी मैंने पहली बार अपनी आँखों से सजीव देखे।


Black winged Stilt




एक तोता



रंग बिरंगे फूल




a Hoopoe



यमुना के किनारे पर बंधी एक नाव


अन्य चुनिन्दा तस्वीरें मेरे फोटोब्लॉग पर देखें।


गुलाबी शहर


October 23rd, 2007 | 15 Comments

तकरीबन चार दिन से घर में ही था, मन बेचैन था तो पिछले से पिछले बृहसपति-वार की शाम को मन हुआ कि कहीं लम्बी ड्राईव पर चला जाए। आशीष को फोन कर पूछा कि क्या एक लम्बी ड्राईव पर साथ चलना चाहेगा तो उसने कहा कि उस दिन जाने की जगह अगले दिन(शुक्रवार) को शाम को जल्दी निकल लेते हैं जयपुर की तरफ़ और वहाँ चोखी ढाणी में खाना खा के वापस आ जाएँगे देर रात तक। आईडिया मुझे जंचा तो मैंने हाँ कर दी और फिर योगेश को फोन लगाया। चलने को योगेश भी तैयार लेकिन उसने सुझाव दिया कि रात को वापस न आकर रात वहीं बिताते हैं और अगले दिन एकाध किला वगैरह देख वापस आते हैं। अपने को ये बात बेहतर लगी, इसलिए आशीष को फाईनल प्रोग्राम बता दिया और उसने भी सहमति जता दी। अगले दिन यानि कि शुक्रवार को दोपहर में मैं और योगेश मेरी मोटरसाइकिल पर लद के गुड़गाँव पहुँचे और वहाँ से आशीष की गाड़ी में हम तीनों लद के जयपुर की ओर रवाना हो गए। पिछले ही दिन गाड़ी में लगाए सोनी(sony) के नए सीडी प्लेयर(CD Player) और जेबीएल(JBL) के स्पीकरों से मस्त संगीत बज रहा था और गति से हम जयपुर की ओर चल पड़े।

शाम घिर आई, अंधेरा हो गया, मैंने घड़ी में समय देखा तो कोई खास नहीं हुआ था, मैंने सोचा कि कुछ जल्दी ही अंधेरा हो गया, लगता है वाकई सर्दियाँ आ गई हैं और दिन छोटे हो गए हैं। लेकिन फिर आशीष ने कहा कि अब तो चश्मा उतार दूँ, तो तब एहसास हुआ कि आँखों पर धूप का चश्मा चढ़ा हुआ था और इस कारण मुझे लगा कि अंधेरा हो गया है, वैसे असल में अंधेरा होने में समय था!! ;) बहरहाल, मैंने धूप का चश्मा उतार अपना रेगुलर वाला लगा लिया और इधर असली में अंधेरा हुआ उधर पीछे की सीट पर आराम फ़रमा रहे योगेश बाबू को बीयर (beer) की तलब लग आई और वे बोले कि बीयर लेनी है। रास्ते में जो भी छोटा कस्बा आदि पड़ता, और कुछ हो या ना हो लेकिन उनको अंग्रेज़ी का ठेका अवश्य दिख जाता!! ;) काफ़ी देर तक तो हमने उनको कंट्रोल करवाए रखा लेकिन आखिर कब तक करवाते, आखिरकार एक पेट्रोल पंप पर हल्का होने की गरज़ से गाड़ी रोकी और योगेश बाबू काम निपटा बीयर की बोतलें भी ले आए अपने लिए!! ;)

तकरीबन साढ़े पाँच घंटे में हमने जयपुर में प्रवेश किया, लेकिन यातायात की बड़ी समस्या थी, बहुत से मार्ग इसलिए बंद थे क्योंकि कोई रैली निकल रही थी, पहले हम रेलवे स्टेशन का रास्ता पूछ भटकते रहे, जिस सरकारी होटल में हमने रात गुजारनी थी वह रेलवे स्टेशन के पास ही है यह जानकारी राजस्थान टूरिज़म की वेबसाईट मोबाइल पर खोल हासिल की थी!! पर जब हमको आधा घंटा हो गया छोटी गलियों से निकलते और इधर-उधर भटकते तो हमने निश्चय किया कि पहले चोखीढाणी चलते हैं वापसी पर रात हो जाएगी और तब तक सड़कें खाली हो जाएँगी, तो हमने एक-दो ट्रैफ़िक पुलिस वालों से रास्ता पूछा और चोखीढाणी पहुँच गए। पिछली बार चोखीढाणी मैं पिछले वर्ष जुलाई में आया था। एक वर्ष के अरसे में चोखीढाणी में काफ़ी बदलाव आए ऐसा महसूस हुआ,काफ़ी कुछ नया सा लगा।


एक लालटेन




कुछ दुकान


वैसे इस एक वर्ष के अरसे में मुझमें भी कुछ सुधार हुए हैं, पिछली बार जब वहाँ एक स्टॉल पर तीर-कमान से निशाने लगाए थे तो एकाध ही निशाने वाले गोल बोर्ड पर लगा था बाकी तो दाँए-बाँए निकल गए थे!! ;) इस बार लगता है कि तरकश वाले संजय भाई का आशीर्वाद साथ था, एक ही तीर बस निशाने से पहले गिर गया बाकी चारों बोर्ड पर लगे और उनमें से तीन सम्मानजनक थे। :D


तीरांदाज़ी अभ्यास


योगेश बाबू ने भी अपना हाथ तीरांदाज़ी पर आज़माया और वह मुझसे अधिक सफ़ल रहे!! वहीं लगी दुकानों में से एक में सुंदर रंगी गई तस्वीरें भी दिखी।


एक सुंदर हस्त रंगित चित्र


भोजन के स्तर में भी काफ़ी अंतर आ गया था, पिछले वर्ष किए गए भोजन को यदि मैं अति लज़ीज़ की संज्ञा दूँगा तो इस बार के भोजन को साधारण की श्रेणी में ही रखूँगा। हम सभी को काफ़ी भूख लगी थी लेकिन फिर भी भोजन में वो बात नहीं आई जिसकी अपेक्षा थी, यहाँ तक कि अंत में परोसे गए मालपुए भी उतने बढ़िया नहीं थे!! खैर, हम लोग भोजन उपरांत थोड़ा और घूमे और उसके बाद वापस जयपुर की ओर चल दिए। सड़के हर तरह की भीड़ से रिक्त हो चुकीं थी और हम आराम से सदर थाने के निकट स्थित होटल स्वागतम पहुँच गए।

अगले दिन थोड़ा जल्दी निकलने का प्रोग्राम था क्योंकि योगेश को शाम पाँच बजे तक घर पहुँचना था, लेकिन आशीष बिस्तर पर पड़ा सोता रहा और हम लोग होटल से लेट निकले। खैर, सबसे पहले हम लोग पहुँचे बस अड्डे के निकट स्थित मशहूर रावत कचौड़ी वाले के जहाँ कुछ हल्का फुल्का नाश्ता किया गया। तत्पश्चात हम लोग निकल चले किलों की ओर, समय कम था इसलिए तय किया गया कि एक ही किला देखेंगे और नाहरगढ़ किले के रास्ते पर निकल चले(पिछली बार जयगढ़ और आम्बेर के किले देखे थे, नाहरगढ़ छूट गया था)। इस बार एक बदलाव यह देखा कि पिछली बार सूखी भूमि पर स्थित जल-महल के चारों ओर इस बार काफ़ी जल था!! ;) खैर, हम लोगों के साथ पंगा हो गया और हम नाहरगढ़ की जगह जयगढ़ पहुँच गए। अब पहुँच गए तो पहुँच गए, शराफ़त से तीन प्रवेश टिकट लिए और तीन कैमरों के, लेकिन टिकट खिड़की में मौजूद साहब का या तो गणित कमज़ोर था या वो कुछ अधिक ही स्याने थे, हर किसी से फालतू पैसे ले रहे थे। मैंने और योगेश ने गेट के अंदर जाते ही पैसों का हिसाब लगाया तो पाया कि उन साहब ने हमसे चालीस रूपए अधिक वसूल लिए थे, तो इसलिए मैं वापस गया और उनसे वो चालीस रूपए वापस ले आया। लेकिन बाकी लोगों में कुछ तो विचार करते दिखे कि टिकट वाले बाबू ने पैसे अधिक लिए लेकिन वापस लेने कोई नहीं गया(हमारे सामने तो कोई नहीं गया, बाद में गया तो पता नहीं)!! ;)



अरावली की पहाड़ियों का सुंदर नज़ारा


जयगढ़ किले में जब हम लोग घूम रहे थे तो एक मौसी जी भी अपने दो छोटे भाँजों और बहन के साथ हमारे पीछे ही थीं। ये मौसी जी फिल्म शोले जैसी नहीं थीं, ये तो जवान भी थीं और सुंदर भी और अविवाहित भी!! ;) बहरहाल, मौसी जी की कुछ ज्ञान भरी बातें हम लोगों के कान में भी पड़ रही थीं, जैसे कि वे अपने भाँजों और बहन को बता रहीं थी कि जयगढ़ किला कोई तीन-चार सौ वर्ष पहले बना था(थोड़ी कन्फ्यूज़िया गई थीं मौसी जी क्योंकि जयगढ़ किला तकरीबन हज़ार वर्ष पहले बना था और उसके नीचे स्थित आम्बेर किला लगभग तीन सौ वर्ष पूर्व बना था)। मौसी जी अपनी बहन जी को फोटोग्राफ़ी भी सिखा रहीं थी, भरी धूप में छोटी फ्लैश वाले छोटे डिजिटल कैमरे से फोटो खींचती अपनी बहन को सलाह दे रही थीं कि फ्लैश का प्रयोग करें!! ;)

बहरहाल हम लोग मौसी जी और उनके ग्रुप को पीछे छोड़ आगे निकल लिए। हम लोगों के पास समय का अभाव था इसलिए जल्दी ही सब निपटा वापसी की राह पकड़नी थी।


Watchtower



तो सारा मामला निपटा हम गुड़गाँव की राह पकड़ लिए, देर तो हो ही गई थी, तकरीबन सवा छह बजे गुड़गाँव पहुँचे और फिर मोटरसाइकिल पर सवार हो सात बजे तक योगेश को घर पहुँचाया!!


पाँच इंद्रियों का बाग़ – भाग २


October 16th, 2007 | 7 Comments

पिछले भाग से जारी…..

खिलेगा एक दिन यह फूल

तैयार गमले
( इस फोटो को कंप्यूटर पर सेपिआ [sepia] किया गया है )

एक नन्हीं तितली


( इस फोटो को कंप्यूटर पर श्वेत-श्याम [black & white] किया गया है, मूल फोटो यहाँ है )

एक फूल का मैक्रो

इस बाग़ में लिए गए सभी फोटो यहाँ हैं


पाँच इंद्रियों का बाग़ – भाग १


October 15th, 2007 | 6 Comments

बीते दिनों में एक रविवार सुबह संतोष के साथ कुतुब मीनार के पास स्थित पाँच इंद्रियों के बाग़ यानि कि गॉर्डन ऑफ़ फाईव सेन्सेस (garden of five senses) जाना हुआ और वहाँ रंग-बिरंगे फूलों और तितलियों के साथ ही देखने को मिले अमूर्त कला (abstract art) के बढ़िया नमूने।

एक फूल के मध्य का मैक्रो

एक नन्ही तितली

एक टूटा झूला
( इस फोटो को कंप्यूटर पर सेपिआ [sepia] किया गया है, मूल फोटो यहाँ है )

एक ततैया
( इस फोटो को कंप्यूटर पर श्वेत-श्याम किया गया है, मूल फोटो यहाँ है )

एम्फीथियेटर
( बढ़िया सैटिंग में बना हुआ एक एम्फीथियेटर [amphitheater] )

अगले भाग में जारी…..


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