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क्वानटम ऑफ़ सोलेस


December 2nd, 2008 | 10 Comments

क्वानटम ऑफ़ सोलेस (Quantum of Solace) 6 नवंबर को भारत में रिलीज़ हुई, अमेरिका से पहले यह भारत में रिलीज़ हुई इससे कई लोगों की बाछें खिल गई। ऑफिशियली यह जेम्स बांड की बाईसवीं फिल्म है और पिछली फिल्म कसीनो रोयाल (Casino Royale) का अगला भाग है। तो बुकमाईशो पर मॉर्निंग शो की टिकट बुक करवाई (दिन के शो के मुकाबले पचास रूपए कम लगे) और रिलीज़ के अगले ही दिन यानि कि शनिवार 7 नवंबर को पहुँच गए फिल्म देखने।

कसीनो रोयाल के बारे में मैंने लिखा था कि फिल्म की कहानी ठीक ठाक है, सुन्दर जगहों पर फिल्माया गया है लेकिन नए नवेले बांड बने अभिनेता डेनिएल क्रेग का अभिनय कुछ खास न था। इस नई फिल्म क्वानटम ऑफ़ सोलेस में ठीक इसका विपरीत हुआ लगा। इस फिल्म में लोकेशन फालतू सी थीं क्योंकि उनको कहानी में फिट बैठाना था और कहानी का क्या कहें, मैंने इससे वाहियात कहानी वाली शायद ही कोई बांड फिल्म देखी हो (मैंने लगभग सभी बांड फिल्म देख रखी हैं एक-दो को छोड़ जिनको शीघ्र ही देखा जाएगा)!! सिर्फ़ एक बात जो इस फिल्म में अच्छी लगी वह थी डेनिएल क्रेग का अभिनय जो कि पिछली फिल्म के मुकाबले काफ़ी बेहतर लगा, डेनिएल ने काफ़ी मेहनत की है ऐसा साफ़ दिखाई दिया। अभिनय सधा हुआ था और एक खास बात इस फिल्म की यह लगी कि बांड का किरदार शो ऑफ़ (show off) करने की अपेक्षा काम पूरा करने की सोच लिए दिखा। इससे पहले ऐसा मैंने सिर्फ़ बीसवीं बांड फिल्म डाई अनदर डे (Die Another Day) में देखा था जिसमें बांड के किरदार को मेरे अभी तक के सबसे अधिक पसंदीदा बांड अभिनेता पियर्स ब्रॉसनेन ने निभाया था।

खैर, इस फिल्म पर आएँ तो बहुत ही वाहियात सी कहानी लिए हुए है। एक अमेरिकन कंपनी और उसका मालिक दक्षिण अमेरिकी देश बोलिविया के पानी पर कब्जे के चक्कर में होता है ताकि उस देश को ऊँचे दाम पर पानी बेच सके। इसके लिए वह एक तड़ीपार किए गए फौजी जनरल की मदद करता है ताकि जनरल देश की सत्ता पर काबिज़ हो सके और फिर जनरल से पानी खरीदने के करार पर दस्तखत करने को कहता है। जब जनरल आनाकानी दिखाता है तो विलेन जनरल को धमकाता है कि यदि दस्तखत नहीं किए तो जनरल का सहयोगी खुद जनरल को गोली मार देगा और मजबूरन जनरल दस्तखत कर देता है। मुझे यह समझ नहीं आया कि यदि विलेन इतना ही ताकतवर था तो इस जनरल को सत्ता पर बिठाकर क्या लाभ स्वयं अपना ही कोई बंदा क्यों नहीं बिठा दिया जो विलेन की सभी बातें आराम से मानता?? और बोलिविया जैसे फटीचर देश के पानी पर काबिज़ होकर कौन सी दौलत पाने की फिराक में था जब वह देश और उसकी जनता खुद ही गरीबी का शिकार है?? :roll:

कुल मिलाकर इस फिल्म के बारे में कहने को कुछ नहीं है, मामला एकदम बकवास और पैसे की बर्बादी दिखा। कहानी किसी नौसिखिए फालतू कहानीकार द्वारा लिखी गई जान पड़ी, लोकेशन आदि कहानी के साथ फिट बिठाई हुई थीं। इस फिल्म में भी पिछली फिल्म की ही भांति गैजेट्स आदि नहीं दिखाए गए हैं जिनसे कोई खास फर्क नहीं पड़ता। मुझे याद नहीं इससे पहले किसी बांड फिल्म में बांड गर्ल को कम ग्लैमरस दिखाया गया हो लेकिन इस वाली फिल्म में एक नया यह भी दिखा कि बांड गर्ल बनी यूक्रेनियन सुन्दरी ओल्गा कुरल्येन्को की सुन्दरता को दबा के कम ग्लैमरस दिखाया गया है। :tdown:

मैंने तो इस बात का शुक्र मनाया कि मॉर्निंग शो देखा और पचास रूपए बचा लिए वर्ना 115 की जगह 160 रूपए खर्च होते दिन वाले शो में। कायदे से तो मॉर्निंग शो वाले 115 रूपए भी बर्बाद ही गए इस फिल्म पर!!

रेटिंग की कहें तो मैं इसको पाँच में से सिर्फ़ एक अंक दूँगा और वह भी डेनिएल क्रेग के सुधरे हुए अभिनय के लिए जो कि इस फिल्म में अकेली अच्छी चीज़ दिखी, अन्यथा यह फिल्म पाँच में से शून्य की ही हकदार है!! :tdown:


कस्टर्ड जैसा जुआघर??


November 27th, 2006 | 6 Comments

पहली बात, मैंने कस्टर्ड की बात क्यों कही? अब ऐसा नहीं है कि मुझे हर समय खाने पीने की बात ही सूझती है, लेकिन वो ऐसा है कि “royale” शब्द का अर्थ जानने के लिए मैंने गूगल से पूछा तो उत्तर मिला:

a thin custard cooled and cut into decorative shapes. Used to garnish soups primarily.

अब क्या करें, अपनी तो कोई गलती नहीं है ना इसमे!! ;)

बहरहाल, अब हुआ यूँ कि कल(रविवार) का पिरोगराम बनाया जेम्स बांड (James Bond) की नई फ़िल्म “कसीनो रोयाल”(Casino Royale) देखने का। टिकट पहले दिन ही PVR की वेबसाइट पर बुक करवा ली थी और सीटें भी बीचों बीच अपनी पसंद की चुन ली थीं। तो बस फ़िर क्या था, अपने मित्र को ले पहुँच गए क्नॉट प्लेस के पीवीआर रिवोली पर और काउन्टर पर बुकिंग का नंबर दे अपनी आरक्षित टिकटें हासिल की और सिनेमा में प्रवेश किया। समय से कुछ मिनट पहले पहुँच गए थे इसलिए कोई टेन्शन नहीं थी, हॉल के द्वार अभी खुले नहीं थे। कुछ मिनट प्रतीक्षा के बाद खुले और एक महिला अटेन्डेन्ट ने हमको हमारी सीटें दिखाई। कुछ मिनट और कुछ विज्ञापनों के बाद फ़िल्म भी आरंभ हो गई।

अब फ़िल्म का ट्रेलर देख मुझे लगा था कि शायद फ़िल्म बेकार होगी, लेकिन ऐसा नहीं है। फ़िल्म में बांड परंपरा के विपरीत कोई चमत्कारी उपकरण आदि नहीं दिखाए हैं लेकिन उसके बावजूद फ़िल्म सही लगी। परंपरागत तरीके से, फ़िल्म की शुरुआत एक एक्शन से भरपूर दृश्य से होती है जब अपना नया और हट्टा-कट्टा बांड 40-50 मंज़िल उँची क्रेन और गर्डर आदि से छलांग लगाता है और इस प्रकार फ़िल्म सही चलती रहती है। जैसा कि बांड फ़िल्मों में अक्सर होता है, मध्य तक आते आते फ़िल्म धीमी सी हो जाती है, ऐसा इसलिए भी लगता है क्योंकि आरम्भ लगभग हर बांड फ़िल्म का विस्फ़ोटक तरीके से होता है इसलिए मध्य तक आते आते फ़िल्म धीमी लगने लगती है।

लेकिन इस सब के बावजूद फ़िल्म बढ़िया है, खूबसूरत जगहों पर इसको फ़िल्माया गया है, संगीत आदि भी सही है। फ़िल्म के अंत तक आते आते एक जबरदस्त ताश का खेल होता है एक शाही से जुआघर में जिसमें बांड को हर हाल में जीतना आवश्यक होता है नहीं तो 15 करोड़ डॉलर आतंकवादियों के हाथ चले जाएँगे!! और इस खेल के दौरान बांड लगभग मर जाता है क्योंकि उसे कोई ज़हर दे देता है!! ;)

खैर, फ़िल्म की कथा का तो मैं खुलासा नहीं करूँगा, क्योंकि यदि आपने नहीं देखी तो इसको देख अवश्य लीजिए। यदि आपको बांड की फ़िल्में अच्छी लगती हैं और इससे पहले आपने शॉन कॉनरी(पहला जेम्स बांड) या पियर्स ब्रॉसनैन(पिछला जेम्स बांड) की फ़िल्में देखी हैं तो इस फ़िल्म को देखने से पहले अपने मन में कोई आशाएँ आदि नहीं रखना। नए बांड डेनिएल क्रेग का प्रदर्शन औसत है, आने वाली फ़िल्मों में ही पता चलेगा कि इसमे कितना दम है।

फ़िल्म से बिना कोई आशा रखे उसे देखो तो वो बहुत अच्छी लगेगी। इसलिए कोई आशा नहीं रखी जाए और मौज ली जाए।

वैसे एक रोचक बात यह है कि सोनी पिक्चर की भारतीय साइट पर इस फ़िल्म के भारत में आने की तारीख़ 15 दिसंबर की है, जबकि यहाँ यह फ़िल्म 17 नवंबर को रिलीज हुई जब सारे विश्व में हुई, तो क्या यहाँ के सिनेमा वालों के पास पाईरेटिड कापी है?? ;) साइट का रखरखाव करने वाले ऐसे आलसी और बेकार हैं कि सही जानकारी लिख नहीं सकते और गलत जानकारी को अपनी साइट पर ठीक भी नहीं कर सकते!!