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पर्वतों में नव वर्ष – भाग ३


February 1st, 2007 | 6 Comments

पिछले भाग से आगे …..

अगले दिन सुबह जल्दी उठ सभी तैयार हुए, नाश्ता कर वापसी की राह पकड़ने को सभी आतुर थे। लेकिन जल्दी निकलना कदाचित्‌ किस्मत में नहीं था, रिसॉर्ट वाले से पंगा हो गया। दिल्ली से जब बुकिंग करवाई थी तो उसने कमरों का किराया 1000 रूपये प्रति दिन के हिसाब से बताया था और बिल में उसने उनके 1800 और 2800 रूपये लगा दिए थे यह कहकर कि 1000 वाले कमरे उपलब्ध नहीं थे। कहने का अर्थ यह कि हमें उसके अनुसार महंगे कमरे में ठहरा दिया और हमें बताना भी उचित नहीं समझा कि जो कमरे हमें दिए जा रहे हैं वे महंगे हैं!! बिल की जाँच करने से पता चला कि साहब ने खाने-पीने के बिल इत्यादि जोड़ने में भी घपला किया हुआ था, 1000 रूपये खामखा के अधिक लगा रखे थे। तो बस बिल को लेकर तकरीबन एक घंटा बहस हुई और फ़िर हम अपने मन मुताबिक पैसे देकर वहाँ से चल दिए। लान्सडौन जाने वाले ध्यान रखें, इस अनुभव के आधार पर मैं रिट्रीट आनंद नामक जंगल रिसॉर्ट में रहने की किसी को सलाह नहीं दूँगा, वहाँ अन्य होटल आदि भी हैं, गढ़वाल मण्डल वालों का यात्री निवास भी है जहाँ ठहरा जा सकता है।

तो अब आखिरकार हम लोगों ने वापसी की राह पकड़ी। पहाड़ी से नीचे उतरते हुए कई मनमोहक नज़ारे देखने को मिल रहे थे।


( पहाड़ी ढलान पर बसा एक कस्बा )



( दूर नज़र आती बर्फ़ से ढकी पहाड़ियाँ )



पहाड़ी से नीचे उतर कर कोटद्वार से थोड़ा आगे कण्वाश्रम भी देखना था। किंवदन्तियों के अनुसार सदियों पहले यह कण्व ऋषि का आश्रम होता था जहाँ एक बार राजर्षि विश्वामित्र गहन तपस्या में लीन थे और जहाँ स्वर्ग की अप्सरा मेनका ने उनको अपने पर मोहित कर उनकी तपस्या भंग की थी और उन दोनों के संगम से शकुन्तला का जन्म हुआ था। कहते हैं कि राजर्षि विश्वामित्र ने शकुन्तला को कण्व ऋषि को सौंप दिया जिन्होंने उसका पालन पोषण किया और जिसके साथ हस्तिनापुर नरेश दुष्यंत का विवाह हुआ। यहीं इसी आश्रम में शकुन्तला और दुष्यंत के पुत्र और भावी सम्राट भरत का जन्म हुआ जिनके नाम पर इस देश का नाम पड़ा।

कोटद्वार पहुँच आगे का रास्ता पूछ हम लोग कण्वाश्रम पहुँचे। पहुँचने का मार्ग थोड़ा टूटा कुछ फूटा था, आश्रम के आसपास छोटा सा गांव/कस्बा है जो कि ग्रामीण भारत की झलक दिखलाता है(जैसे वो हिमेशवा झलक दिखलाने को बार बार कहता रहता है)!!


( ग्रामीण भारत )


लेकिन कण्वाश्रम पहुँच इस बात को साक्षात देखा कि भारत के इतिहास की यह धरोहर ठीक उसी तरह सूनी पड़ी है जैसे किसी विधवा की माँग।


( कण्वाश्रम )


और यह अकेली ऐतिहासिक धरोहर नहीं है जिसका ऐसा हाल है। वहाँ मात्र एक व्यक्ति का निवास है जो कि पुजारी हैं और वहाँ रह योग साधना करते हैं। उनसे पता चला कि वहाँ कोई इक्का-दुक्का व्यक्ति ही कभी कभार आता है अन्यथा वहाँ पर्यटक आदि नहीं आते। अब यह बात जानकर कोई खास आश्चर्य नहीं हुआ, ऐसा अपेक्षित सा ही लगा क्योंकि कम लोगों को इस जगह की जानकारी है और वैसे भी यहाँ उसी का आना बनेगा जो कि लान्सडौन जाएगा, अन्यथा सिर्फ़ इस जगह कोई नहीं आएगा। वहाँ थोड़ा समय बिता हम वापस अपनी गाड़ी की ओर चल पड़े। कण्वाश्रम के आसपास हल्का-फुल्का जंगल सा है और उसमें थोड़ा आगे जाकर एक झरना है जो कि सहस्त्रधारा के नाम से जाना जाता है। किंवदंतियों के अनुसार शकुन्तला के समयकाल में इस झरने से पानी की जगह दूध बहा करता था!! ;)

बहरहाल, हम वापस कोटद्वार की ओर चल पड़े। निश्चय किया गया कि दोपहर का भोजन ले लिया जाए क्योंकि फ़िर काफी समय तक कोई ढंग की खाने-पीने की जगह नहीं मिलेगी। कोटद्वार में ही एक अच्छा सा रेस्तरां मिल गया जो कि साथियों को पसंद आया और उसमें डट कर पेट पूजा की गई। इसके बाद ड्राईवर को बोल दिया गया “चक्‌ दे फट्टे” और गाड़ी सरपट दिल्ली की ओर उड़ चली। ;) लेकिन मार पड़े अव्यवस्थित यातायात के बहाव को, पहले नजीबाबाद और फ़िर बिजनौर में फ़ंस गए जिस कारण कुछ घंटे खराब हो गए। मेरठ पहुँचते पहुँचते अंधेरा हो चला था। अब मेरठ से गुज़र रहे थे तो सोचा कि यहाँ कि प्रसिद्ध गजक और रेवड़ी ले ली जाए, तो निधि से पूछा कि कहाँ बढ़िया गजक मिलेगी। मेरठ की होने के कारण निधि को सब पता था और वह हमें सही दुकान पर ले गई जहाँ की गजक वाकई स्वादिष्ट थी। तो जहाँ हम में कुछ ने गजक खरीदी, वहीं बाकी के लोगों को हम पर खीज हो रही थी कि खामखा इतना समय लगा रहे हैं!! ;) तो फटाफट खरीददारी निबटा हम वापस गाड़ी में आ गए और अपने गंतव्य की ओर चल पड़े, दिल्ली अब दूर नहीं थी। ;) कुछ ही घंटों में हम दिल्ली में थे, एक-एक कर सबको उनके घर छोड़ते हुए मैं वापस अपने घर पहुँचा।

पिछले वर्ष मई में लान्सडौन जाने का कार्यक्रम बन रहा था जो कि बाद में स्थगित करना पड़ा था और बाद में हम लोग ऋषिकेश चले गए थे, लेकिन आखिरकार लान्सडौन भी हो आए, इस बात से मन अति प्रसन्न था। सर्दियों में हिल-स्टेशन का पहला अनुभव यादगार रहा लेकिन दोबारा ऐसा करने से पहले 31 दिसंबर की रात और उस समय की ठंड और जिस जगह हम लोगों ने वह रात गुज़ारी, इन सब बातों को कम से कम एक बार अवश्य ध्यान में लाऊँगा!! ;)


पर्वतों में नव वर्ष – भाग २


January 5th, 2007 | No Comments

पिछले भाग से आगे …..

सुबह सवेरे मोबाईल में अलार्म बजते ही निद्रा खुल गई, ऐसा लगा कि जैसे अभी कुछ मिनट पहले ही तो सोए थे(4 घंटे पहले सोए थे)। नींद खुलने के बाद ठण्ड लगने लगी थी, रात को चढ़ाई गर्मी का असर समाप्त हो गया था, उस की वजह से रात निकल गई थी यही बहुत था वर्ना बहुत बुरा हाल हो सकता था। बाहर आकर हमने सुहावनी सुबह के दर्शन किए, सूर्य पर्वतों के पीछे से उदय हो रहा था और राहत की बात यह थी कि हल्की हल्की धूप दिखाई दे रही थी, कोहरा आदि कुछ भी नहीं था। हम सभी उठ कर लड़कियों के कमरे की ओर चल पड़े और जाकर देखा कि अभी तो वे भी नहीं उठे थे। बहरहाल क्योंकि हम लोगों का जल्दी निकलने का कार्यक्रम था इसलिए सभी फ़टाफ़ट तैयार होने लगे, रिसॉर्ट का एक कर्मचारी थोड़ी थोड़ी देर में हमको गर्म पानी लाकर दे रहा था और एक-एक कर सभी तैयार होते जा रहे थे। शीघ्र ही तैयार हो हम अपने रास्ते निकल लिए, मन्ज़िल थी कुछ दूरी पर स्थित ताड़केश्वर महादेव मंदिर जो कि भारत के सबसे पुराने सिद्धपीठों में से एक है।

रास्ता पूछते-पूछते हम आगे जा रहे थे, लान्सडौन से तकरीबन 8 किलोमीटर आगे निकल आने के बाद एक जगह पूछा तो पता चला कि अभी लगभग 20-22 किलोमीटर और जाना था। इधर पहाड़ी रास्ते के तीव्र घुमावों और तीखे मोड़ों के कारण संजुक्ता तथा एकाध की तबीयत खराब सी होने लगी, तो सबने यही निर्णय लिया कि वापस लौट लिया जाए, कहीं 20 किलोमीटर के आगे के सफ़र और लगभग 30 किलोमीटर के वापसी के सफ़र में इनकी तबीयत और खराब न हो जाए। वापस लान्सडौन पहुँच हम लोग टिप-इन-टॉप की ओर चल दिए जो कि लान्सडौन की मशहूर जगहों में से एक है क्योंकि यहाँ से नज़ारा बहुत अच्छा नज़र आता है। टिप-इन-टॉप पहुँच सभी लोग अपने अपने कैमरे निकाल व्यस्त हो गए(तस्वीरें लेनें में)।


( टिप-इन-टॉप से नज़ारा )


वहीं पास में लान्सडौन का सबसे पुराना गिरजा, सेंट मेरी चर्च, है जिसमें अब एक छोटा सा संग्रहालय भी बना दिया गया है।


( सेंट मेरी चर्च )


दोपहर हो आई थी तो हमने भोजन करने की सोची क्योंकि सुबह भी कुछ खाए बिना ही निकले थे। तो भोजन करने हम पहुँच गए लान्सडौन के मुख्य बाज़ार में स्थित मयूर होटल में जहाँ के परांठों की तारीफ़ मोन्टू पिछले दिन से किए जा रहा था। भोजन की प्रतीक्षा करते-करते एक-एक मिनट मानो सदियों की तरह बीत रहा था, तो कई सदियों की प्रतीक्षा के बाद खाद्य सामग्री हमारी टेबल पर आई और सभी लोग स्वादिष्ट खाने का आनंद लेने लगे। अब खाना वाकई स्वादिष्ट था कि नहीं यह तो कह नहीं सकते क्योंकि उस समय हम सभी क्षुधा से अति व्याकुल थे और वो कहते हैं न कि

भूख में किवाड़ भी पापड़ लगते हैं

भूख में चने भी मेवा लगते है

बस तो इन्हीं कहावतों को चरितार्थ भी कर सकता है वहाँ का खाना, इसलिए कोई इस को दिल पर न ले कि वहाँ का खाना बहुत अच्छा था!! ;) बहरहाल, पेट भर चुकने के बाद हमने पास ही में मौजूद कृत्रिम रूप से तैयार किए गए भुल्ला-ताल जा नौका विहार करने का निर्णय लिया।

कुछ ही देर में हम लोग भुल्ला-ताल पहुँच गए और दो-दो के जोड़ों में नौकाओं में सवार हो गए। संजुक्ता और शोभना की मौज हो गई क्योंकि उनको हितेश और वरुण के रूप में दो नौका चालक मिल गए, इसलिए वे लोग 4 लोगों वाली नौका में आगे की सीटों पर बैठ गए ताकि बेचारे दोनों लड़के उनको नौका विहार करा सकें!! ;) बाकी मोन्टू और निधि एक नौका में थे तथा मैं और एन्सी एक नौका में विहार कर रहे थे। ताल में कुछेक बतखें भी थीं, रंगीन और श्वेत रंग की। तो मैंने और एन्सी ने उनके पास जाकर उनकी तस्वीरें लेने की सोची, पूरे ताल का चक्कर लगा एक जगह उनको घेर ही लिया!! :)




तैरते हुए इन बतख़ों के दो वीडियो भी उतारे जो कि यहाँ उपलब्ध हैं।

जब नौका विहार कर चुके तो ताल से बाहर आकर वहाँ रखी कुर्सियों पर बैठ धूप का आनंद लेने लगे क्योंकि हितेश और शोभना का मन नौका विहार से भरा नहीं था और वहाँ मौजूद एकलौती हंस के आकार वाली नौका में उनको विहार करना था। थोड़ी देर बाद जब वे लोग भी आ गए तो हमने आगे बढ़ने की सोची। तभी नज़र पास ही रखे पिंजरे में मौजूद अंगूरा खरगोशों पर गई। हमारे पिंजरे के पास पहुँचते ही वे सभी हमारे पास तुरंत इस उम्मीद में आए कि उनको खाने को कुछ मिलेगा, लेकिन अंत में बेचारों के हाथ निराशा ही आई क्योंकि हमारे पास खाने को कुछ नहीं था, लेकिन उनकी तस्वीरें लेना नहीं भूले। :)


( अंगूरा खरगोश )


तत्पश्चात हम सभी पास ही में मौजूद संतोषी माता के मंदिर पहुँचे। मंदिर की सीढ़ियाँ ऊँची और बहुत सारी थी, एन्सी और संजुक्ता ने जाने से मना कर दिया, तो हम सब बाकी लोग ऊपर चल पड़े, मंदिर तक पहुँचते पहुँचे सांस फूल गई!!! मंदिर की कोई खासी महिमा नहीं, जैसे अन्य मंदिर होते हैं वैसा ही है, कोई पुजारी भी आस पास नहीं था, लेकिन ऊँचाई पर होने के कारण वहाँ से नीचे का नज़ारा बहुत अच्छा था।

शाम हो आई थी, इसलिए मंदिर से नीचे उतर हम वापस रिसॉर्ट की ओर चल दिए। अब तक रिसॉर्ट लगभग खाली हो ही गया था, इसलिए हमको लड़कियों के कमरे के बराबर में ही दो बढ़िया कमरे मिल गए। सभी के सभी एक कमरे में बिस्तर पर लद गए और चाय-पानी तथा नाश्ते का हुक्म दनदना दिया गया। इधर उधर की बातें होती रही, टीका टिप्पणियाँ भी चलती रही। सभी से कहा गया कि वे एक दूसरे के बारे में अपनी अपनी राय व्यक्त करें पिछले दो दिनों के अनुभव पर। इस तरह राय व्यक्त की गईं और उन पर चर्चा हुई, समय तेज़ी से बीता। रात्रि हो आई और रिसॉर्ट के कर्मचारी ने आकर बताया कि उस रोज़ उनकी रसोई रात्रि 9 बजे बंद हो जाएगी क्योंकि वे लोग पिछली रात के जागे हुए हैं(बेकार की बात है, नववर्ष की रात्रि वे लोग 12-1 बजे सो गए थे)। खैर, हमने कोई बहस नहीं करी और उसको कह दिया कि हम लोगों के लिए भोजन अंत में लाए, यानि कि 9 बजे के आसपास।

साढ़े आठ बजे के आसपास नए मिले दो कमरों के पास की खाली जगह पर आग का प्रबंध किया गया और खाना भी वहीं लगवा दिया गया। सभी ने निश्चय किया था कि उस रात कोई मदिरापान नहीं करेगा, पिछली रात का ड्रामा काफ़ी था, अन्यथा स्टॉक तो अपने पास पर्याप्त से कुछ अधिक ही था। ;) पिछली रात की तरह इस बार खाना ठण्डा नहीं करते हुए सभी ने गर्मा-गर्म खाया और पूरा आनंद उठाया। खाना खा चुकने के बाद आग को घेरे सभी बैठे बतिया रहे थे कि बात वहाँ जंगल में कभी कभार विचरने वाले चीतों पर चली गई। रिसॉर्ट के कर्मचारी से पूछा तो उसने बताया कि अब चीते आदि नहीं आते क्योंकि इंसानों की आवाजाही उस इलाके में बढ़ गई है। हितेश बाबू अपने बांधवगढ़ के अनुभव के बारे में बता रहे थे कि जंगल में कुछ दूर एक टॉर्च की रोशनी दिखाई दी जो कि तीव्र गती से हिलती-डुलती हमारी ओर बढ़ रही थी। अब न जाने शेर-चीते की बातों का डर था या कुछ और, सभी लड़कियाँ डर कर हमारे कमरे में जा घुसी। उनको यह समझाया कि कोई शेर-चीता टॉर्च लेकर हमारे पास नहीं आएगा तो उन्होंने कहा कि हो सकता है कि टॉर्च वाले व्यक्ति के पीछे पड़ा हो अन्यथा वह इतनी तेज़ी से भागत हुआ क्यों आ रहा था। तभी बाहर से आ किसी ने बताया कि वह व्यक्ति स्थानीय था और कदाचित्‌ तेज़ी से इसलिए आ रहा था क्योंकि ठण्ड बढ़ रही थी और वह जल्द ही अपने घर पहुँचने का इच्छुक था। परन्तु उस वाकये के बाद लड़कियाँ आग के पास बैठने की इच्छुक नहीं लगी, इसलिए सभी कमरों में आ गए।

थोड़ी देर बाद सभी इस बात पर सहमत हो सोने चले गए कि अगले दिन सुबह जल्दी उठ वापसी की राह पकड़ी जाए क्योंकि हमने वापसी के रास्ते में कर्ण्वाश्रम भी देखना था।

अगले भाग में जारी …..


पर्वतों में नव वर्ष – भाग १


January 4th, 2007 | 7 Comments

चार महीने से ऊपर हो गए थे पिछली यात्रा को, तब से कहीं घूमने फ़िरने नहीं गया था। तो इसलिए मन मचल रहा था, पैरों में खुजली हो रही थी कि कहीं घूम-फ़िर आया जाए। मोन्टू ने कहा कि नए साल का स्वागत कहीं बाहर करेंगे तो ऐसा ही करने की सोची। परन्तु यह इतना आसान कहाँ था, लोगबाग़ महीनों पहले कार्यक्रम बना और बुकिंग आदि करा के बैठे होते हैं, इसलिए हमने किसी लोकप्रिय जगह जाने का तो ख्याल ही छोड़ दिया। कम लोकप्रिय जगहों पर यात्रीनिवासों और होटलों में पता किया गया, लेकिन हर जगह निराशा ही मिली, गढ़वाल मण्डल वालों ने तो हाथ खड़े कर दिए, बोले कि उनके किसी भी यात्रीनिवास में जगह उपलब्ध नहीं है। बड़ी मुश्किल से लान्सडौन के जंगल रिसॉर्ट रिट्रीट आनंद में जगह का जुगाड़ हो पाया। :) हम पाँच लोगों का प्रोग्राम था जाने का लेकिन यात्रा की तिथि निकत आते आते हम आठ हो गए, दो-तीन को तो मना करना पड़ा क्योंकि रहने के लिए ज़्यादा जुगाड़ नहीं था इसलिए समस्या हो जाती।

तो 31 दिसंबर की सुबह अपन निकल पड़े, सभी यार दोस्तों को ले मोन्टू के घर पहुँचे। लेकिन समस्या यह थी कि एन्सी की ट्रेन लेट हो गई थी, वह अपने गृहनगर से वापस आ रही थी और दिल्ली में कोहरे के कारण ट्रेन लेट थी। उसने कहा भी कि हम लोग उसकी प्रतीक्षा न करें और निकल लें, लेकिन हमने प्रतीक्षा करने की ठान ली, जो होगा देखा जाएगा। आखिरकार सुबह 9 बजे(करीब 3 घंटे लेट) उसकी ट्रेन स्टेशन पर लगी और वह अपने घर निकल पड़ी जहाँ से उसने अपना सामान लेना था। थोड़ी देर बाद हम लोग उसके घर पहुँच गए और उसे ले अपने सफ़र पर निकल पड़े।

गाज़ियाबाद, मोदीनगर, मेरठ, बिजनौर तथा नजीबाबाद होते हुए हम कोटद्वार पहुँचे। यहाँ से लगभग 40 किलोमीटर का पहाड़ी रास्ता तय कर हमें लान्सडौन पहुँचना था। अगले दिन ईद थी, इसलिए मार्ग में हमें काफ़ी ट्रैफ़िक और भीड़-भाड़ मिली जिस कारण हम और लेट हो गए, नतीजन जब हम लान्सडौन के रास्ते पर थे तभी सूर्यास्त हो रहा था। अब उसे कैसे छोड़ सकते थे, इसलिए गाड़ी रूकवाई गई ताकि सभी उसे(सूर्यास्त को) अपने अपने कैमरों में बन्द कर सकें।


( 2006 का अंतिम सूर्यास्त )


चित्र आदि ले हम लोग पुनः चल पड़े, लान्सडौन पहुँचते पहुँचते अंधेरा हो चुका था और हमें रिट्रीट आनंद ढूँढने में बहुत दिक्कत आ रही थी, जिससे पूछो वही नया मार्ग बता देता था। आखिरकार कुछ देर भटकने के बाद हम जंगल रिसॉर्ट में पहुँच ही गए, वहाँ का मालिक बेसब्री से हमारा इंतज़ार कर रहा था, उसे लग रहा था कि हम आएँगे ही नहीं। ;) यह रिसॉर्ट(कहने भर को ही है, वास्तव में नहीं है) जंगल में ईंट-पत्थर की कुटियाएँ डाल बनाया गया है, यानि कि पूरा का पूरा जंगल में रहने का मज़ा। लेकिन समस्या यह थी कि हमें एक ही कमरा मिला और एक टिन-लकड़ी की कुटिया। तो भद्र पुरुष होने के कारण हमने कमरा लड़कियों को दे दिया और स्वयं टिन-लकड़ी की कुटिया में रात्रि गुजारने का निर्णय लिया। भूख बहुत लगी थी सभी को इसलिए नाश्ता मंगवाया गया और आग का प्रबंध करने को कहा गया। थोड़ी देर में आग का प्रबन्ध हो गया और उसके पास ही कुर्सियाँ रख दी गई तो हम सब आग को घेर बैठ गए और सर्दी में गर्मी का आनंद लेने लगे।


फ़िर विह्स्की, रम, वोदका तथा वाईन खुली और अंताक्षरी का दौर चलने लगा। अत्यधिक ठण्ड होने के कारण मैंने भी रम के 5-6 पैग और वोदका के 1-2 पैग चढ़ा लिए, लेकिन आश्चर्य कि नशा बिलकुल नहीं हुआ, परन्तु जिस मकसद के तहत जीवन में पहली बार चढ़ाई वह पूरा हुआ, शरीर में अंदर काफ़ी गर्मी आ गई। ;) अंताक्षरी के बाद नाच गाना भी हुआ।


( नाचना, गाना, मौज मनाना )



( नाचना, गाना, मौज मनाना )



नया साल आरंभ होते ही रिसॉर्ट में ठहरे एक यात्री समूह ने आतिशबाज़ियाँ की, हम सभी मित्रों ने आपस में गले मिल एक दूसरे को बधाईयाँ और शुभकामनाएँ दीं। हमारा खाना कब का लग चुका था, आखिरकार वह भी खा लिया गया, बर्फ़ सा ठण्डा हो गया था लेकिन स्वादिष्ट था। एन्सी और संजुक्ता का मदिरापान कुछ अधिक हो गया था इसलिए मैं और मोन्टू उन दोनों को उनके कमरे तक छोड़ आए ताकि वे सो जाएँ। वापस आ हम बाकियों के साथ आग तापते बतियाते रहे और तकरीबन आधे घंटे बाद सभी ने सोने जाने का निर्णय लिया, सुबह जल्दी उठ ताड़केश्वर महादेव मंदिर जाना था जो कि कुछ दूर था और भारत के सबसे पुराने सिद्धपीठों में से एक है। तो लड़कियों को उनके कमरे में छोड़ और शुभरात्रि कह हम लोग टिन-लकड़ की कुटिया की ओर चल दिए। कुछ देरे मेरे और हितेश के बीच स्टिफ़न हॉकिंग और ब्रह्माण्ड आदि के बारे में चर्चा हुई, तत्पश्चात हम लोग अपने अपने बिस्तरों में घुस गए।

अगले भाग में जारी …..