मुम्बई का हमला एक ड्रामा था न कि आतंकवादी हमला …..
….. और भारत के प्रत्येक अल्पसंख्यक समुदाय को अपनी आज़ादी के लिए हथियार उठा लेने चाहिए!! ( ठीक बॉलीवुड फिल्मी इश्टाईल )
क्यों, क्या आप इस बात से इत्तेफ़ाक रखते हैं? रख भी सकते हैं, भारत में किसी विचार से इत्तेफ़ाक रखने पर पाबंदी नहीं है (कुछ तरह के इत्तेफ़ाकों को अंजाम देने पर अवश्य है)!!
पर अरुणधती राय (Arundhati Roy) तो इस बात से पूरे का पूरा इत्तेफ़ाक रखती है। इत्तेफ़ाक की क्या बात है, वह तो इस बात को बढ़ चढ़कर कहने फिरने वाली महिला है। माफ़ कीजिए यदि बुकर पुरस्कार विजेता अरुणधती राय के लिए सम्मान न ऊबर रहा हो, जिन लोगों का मैं सम्मान नहीं करता उनके लिए सम्मानजनक संबोधन निकालना ज़रा कठिन कार्य हो जाता है और ऐसे कठिन कार्य को करने के मूड में मैं फिलहाल नहीं हूँ!! यदि आप इन मोहतरमा के बारे में नहीं जानते हैं तो थोड़ा जानिए। इन मोहतरमा को तुक्के से इनके एक उपन्यास, द गॉड ऑफ़ स्माल थिंग्स (The God of Small Things), के लिए बुकर पुरस्कार मिला सन् 1997 में। उसके बाद से आज तक ग्यारह वर्षों में कोई अन्य तोप न चला पाने के कारण इन्होंने चर्चा में रहने का एक कारगर तरीका अपनाया है, खामखा के विवादों को खड़ा करना और भड़काना, (नेताओं द्वारा) जाँची परखी हिन्दू-मुस्लिम की गंदी राजनीति के गटर के बदबूदार पानी को हर जगह फैलाना।
अभी परसों ही इन मोहतरमा का ब्रिटिश समाचारपत्र गार्जियन (Guardian) की वेबसाइट पर एक लेख छपा। लेख को उपन्यास बनाने में इन मदाम ने कोई कसर न छोड़ी। पूरा झेलाऊ लेख पढ़ने के बाद भी मुझे बात कुछ समझ नहीं आई कि बन्दी आखिर कहना क्या चाह रही है और यह कौन सी दुनिया में रहती है??!! अपनी फैन्टसी (fantasies) और कॉन्सपिरेसी थ्योरीज़ (conspiracy theories) को मदाम वास्तविक जीवन के जाल में बुना हुआ समझ रही हैं, किसी और ही पैरेलल (parallel) पर जी रही हैं या किसी सॉयकायटरिस्ट (psychiatrist) की तलबगार हैं??!! मदाम का कहना है कि मुम्बई के हमले के बाद खामखा ही पाकिस्तान की ओर ऊँगली उठाई जा रही है, तथा मदाम के अनुसार लश्कर-ए-तैय्यबा के संस्थापक हाफ़िज़ सईद की सोच और सन् 1944 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख बने माधव सदाशिव गोलवलकर की सोच में कोई अंतर नहीं है, दोनों व्यक्तियों की सोच एक ही है जो आज भी उनके आतंकवादियों को ब्रेनवाश कर सिखाई जा रही है। उनके अनुसार भारत में आतंकवाद के बीज को गोलवलकर ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ ही बो दिया था और वही आगे चलकर अन्य हिन्दू नेताओं ने सींचा और मुसलमानों का जीना हराम किया। और बहुत ही सहूलियत से अरुणधती राय उस काल को इग्नोर (ignore) कर देती है जो कि दो सौ वर्ष का ब्रिटिश शासन काल था जिसमें किसी भारतीय की औकात नाली के कीड़े से अधिक नहीं थी यदि वह ब्रिटिश हुक्मरानों के तलुवे चाटने वाला कुत्ता नहीं था!! तो अंग्रेज़ों को वे भला बुरा नहीं कहती। या कदाचित् कह डालती हैं क्योंकि कमबख्त अंग्रेज़ों ने ही तो भारत-पाकिस्तान विभाजन किया था!! और आश्चर्य की बात है कि अपना यह कचरा बेचने अरुणधती राय एक ब्रिटिश अखबार के पास ही गई!! और बड़ी ही सहूलियत के साथ अरुणधती राय ब्रिटिश काल के पहले का काल भी भूल जाती हैं जो कि मुसलमान तानाशाहों का शताब्दियों का काल रहा है??
कोई भी समझदार व्यक्ति कह सकता है कि अब सौ से अधिक वर्षों पुरानी बातों का मौजूदा परिपेक्ष में कोई औचित्य नहीं है और मैं इस बात से सहमत भी हूँ लेकिन मैं यही कहना चाहूँगा – इफ़ यू डोन्ट वांट शिट टू बी स्मीयर्ड ऑन युअर फेस देन डोन्ट बी द वन टू डिग इट आऊट (If you don’t want shit to be smeared on your face then don’t be the one to dig it out)!! खैर, तो आज़ादी के बाद के समय से आगे बढ़ते हैं, समय काल 1965 और 1971 के युद्ध तो अरुणधती राय को याद न होंगे क्योंकि वे इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ पाकिस्तान ने भारत पर जबरन थोपे थे। उसके बाद अरुणधती राय 1992 की बाबरी मस्जिद के किस्से को ले आती है और फिर गुजरात के दंगों और उसमे हुए मुसलमानों के कत्ल-ए-आम का ज़िक्र करते हुए हिन्दुओं को फासिस्ट (fascist) कहती है और आगे कहती है कि इसी कारण छोटा सा मुस्लिम समुदाय भारत में सहम के रहता है क्योंकि उसको यहाँ अपना भविष्य नज़र नहीं आता।
लेकिन अभी बस नहीं हुआ है। अरुणधती राय के अनुसार अक्तूबर में दिल्ली के बाटला हाऊस में दिल्ली पुलिस की आतंकवादियों के साथ हुई मुठभेड़ एक ड्रामा थी। यानि कि अरुणधती राय साथ ही यह भी कहना चाह रही है कि उस मुठभेड़ में शहीद हुए दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टर मोहन चन्द शर्मा की हत्या स्वयं उन्हीं के साथियों ने कर दी या फिर इंस्पेक्टर शर्मा पागल थे जिन्होंने स्वयं ही अपने को गोली मार ली क्योंकि मारे गए व्यक्ति तो आतंकवादी न होकर मासूम विद्यार्थी थे और एके47 राईफ़ल वे या तो मौज मजे के लिए लेकर बैठे थे या फिर उनको दिल्ली पुलिस ने ही वहाँ सैट किया!!
और अरुणधती राय के अनुसार कदाचित् मुम्बई का हमला भी एक नौटंकी थी जिसका असली मकसद पाकिस्तान को खामखा लपेटना और एटीएस मुम्बई के चीफ़ हेमंत करकरे को मारना था ताकि वे मालेगाँव वाले मामले में गिरफ़्तार प्रज्ञा सिंह को दोषी न साबित कर पाए!! वाह-२, अरुणधती राय का दिमाग कैसे वास्तविक जीवन में फैन्टसी और कॉन्सपिरेसी थ्योरीज़ को बुनता है!! अरुणधती राय के अनुसार इस तरह सरकारी अफ़सरों का कत्ल करवाना और मुम्बई आदि जैसी नौटंकियाँ स्टेज करना दुनिया भर में सरकारों और रसूख वाले लोगों के लिए आम बात है!! बोले तो वास्तविक जीवन न हुआ कोई थ्रिलर उपन्यास हो गया!!
आम बात है कि अरुणधती राय का कश्मीर मसले पर कहना है कि कश्मीरियों को भारत से आज़ादी चाहिए, भारत को कश्मीर आज़ाद कर देना चाहिए!! अरुणधती राय को अमरनाथ यात्रा और जम्मू में वैष्णों देवी की यात्रा पर जाने वाले हिन्दुओं से भी खासी दिक्कत लगती है कि इतने लोग क्यों जाते हैं। गोया अब अरुणधती राय से पूछना पड़ेगा कि कितने हिन्दुओं को अपने ही देश में अपने धार्मिक स्थलों पर जाना चाहिए और कितनों को नहीं!! भई आखिरकार अरुणधती राय पाकिस्तान और कश्मीर को अलग करने का प्रयास कर रहे देशद्रोहियों का स्वयं घोषित भोंपू हैं, जब भी बजेगी उनके लिए ही बजेगी!! कोई ज़रा इनसे पूछे कि कश्मीर कोई आज़ाद मुल्क था जिसको भारत ने जबरन कब्ज़ाया हुआ है?? एक पल को मान भी लिया जाए कि ऐसा है तो अरुणधती राय पाकिस्तान से उसके द्वारा कब्ज़ाया कश्मीर का हिस्सा तो नहीं माँगती नज़र आई कभी!! और उस हिस्से का क्या जो चीन के कब्ज़े में है, जिसे पाकिस्तान ने माल-ए-मुफ़्त दिल-ए-बेरहम समझते हुए चीन को तोहफ़े में दे दिया था??
अरुणधती राय से पूछा जाना चाहिए कि कश्मीर आज़ाद हो गया तो उसके बाद वह भारत के किस हिस्से को आज़ाद कराने के लिए मुहीम छेड़ेगी??
अरुणधती राय का गुजरात में कत्ल हुए मुसलमानों के लिए दिल दुखता है और वह कश्मीर के लिए आज़ादी चाहती है। इस आला दिमाग औरत से कोई पूछे कि इसने क्या कभी कश्मीरी हिन्दुओं, खासतौर से कश्मीरी पंडितों के बारे में सुना है?? वे कश्मीरी हिन्दू जो कि हज़ारों वर्षों से कश्मीर की वादियों में रहते आए हैं, उस समय से जब इस्लाम का कोई वजूद ही नहीं था!! हिन्दुओं को फासिस्ट (fascist) कहने वाली अरुणधती राय को क्या कश्मीरी हिन्दुओं का आतंकवादियों द्वारा कत्ल-ए-आम और घरों से बेघर तथा निर्वासित हुए कश्मीरी हिन्दू नज़र नहीं आते? सन् 1989 से चार लाख से अधिक कश्मीरी हिन्दू निर्वासित हुए और अपने ही देश में रिफ्यूजी बने!! क्या इस औरत को इस सबके बारे में नहीं पता? यदि नहीं पता तो लानत है, खामखा इतनी आलिम फाजिल बनती है और ऊँचे बोल बोलती है। और यदि पता है तो फिर कुछ कहने का क्या लाभ, क्या इसी से दोगलापन साबित नहीं हो जाता?? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 64 वर्ष पूर्व प्रमुख बने गोलवलकर को हिटलर की भांति फासिस्ट बताने वाली कश्मीरी हिन्दुओं के साथ हुए बर्ताव को क्या कहेगी??
अरुणधती राय के अनुसार गुजरात दंगो आदि के बाद से मुस्लिम समुदाय का हिन्दुओं से सहम जाना और डरना और आतंकवादी वार्दातें करना उचित है लेकिन कश्मीर में हुए कत्ल-ए-आम और आतंकवादी वार्दातों के कारण मुस्लिम समुदाय को शक की निगाह से देखना और आतंकवादी समझना सर्वथा अनुचित है!!
अब मैं यह मत नहीं रखता हूँ कि गुजरात में मुसलमानों के खिलाफ़ जो हुआ वह अच्छा हुआ लेकिन मैं यह भी नहीं समझता कि जो कश्मीर में हुआ वह अच्छा हुआ। दामन किसी का पाक साफ़ नहीं है तो फिर दोष यहाँ एक का क्यों गिनाया जा रहा है?? क्या आतंकवादी किसी को पूछ के मारते हैं कि मरने वाला हिन्दू है कि मुसलमान? क्या मुम्बई में मुसलमान नहीं मरे या हिन्दू नहीं मरे? क्या नैशनल सिक्योरिटी गार्ड्स (NSG) के कमांडो किसी धर्म समुदाय के लोगों को बचाने के लिए मुम्बई गए थे? कदाचित् मेजर संदीप उन्नीकृष्णन को उनका धर्म पूछ के मारा गया था!!
मैं यह भी नहीं कह रहा कि पूरा मुस्लिम समुदाय आतंकवादी है और उनको शक की निगाह से देखना चाहिए लेकिन मैं यह भी कह रहा हूँ कि हर हिन्दू कातिल नहीं है। मैं यहाँ सिर्फ़ अरुणधती राय के कथनों का अर्थ निकालने का प्रयास कर रहा हूँ!!
अरुणधती राय के गार्जियन (Guardian) पर लिखे इस कचरे नुमा लेख में सबसे मज़ेदार बात लेख के अंत में आई। हुआ यूँ कि बाटला हाऊस में हुई मुठभेड़ के बाद के समय में अरुणधती राय के पुलिस को निर्दोषों का एनकाऊन्टर करने के लिए कोसने के वाकये पर टाईम्स नाओ (Times Now) न्यूज़ चैनल के अरनब गोस्वामी ने एक बार ऑन एयर कह दिया – “अरुणधती राय और प्रशान्त भूषण, मैं आशा करता हूँ कि तुम यह टेलीकास्ट देख रहे हो। हमें लगता है कि तुम घृणित हो।” (Arundhati Roy and Prashant Bhushan, I hope you are watching this. We think you are disgusting.)!! यह बात कदाचित् अरुणधती राय दिल पर ले गई और इसलिए गार्जियन (Guardian) में छपे अपने लेख के अंत में अपनी खीज निकालते हुए अरुणधती राय ने लिखा कि टाईम्स नाओ टेलीविज़न ने अब कदाचित् लोगों को सरेआम बेइज़्ज़त करना शुरु कर दिया है और एक टीवी एंकर के लिए मौजूदा एलेक्ट्रिक माहौल में ऐसा करना किसी भड़काऊ काम और धमकी से कम नहीं है और किसी अन्य स्थिति में ऐसा करने पर किसी भी पत्रकार की नौकरी चली जाती। लो कर लो बात, खुद मदाम अरुणधती राय तो फासिस्ट आदि जैसे फैन्सी शब्द लोगों के नाम के साथ सरेआम जोड़ती फिरती हैं लेकिन कोई उनको घृणित कह देता है तो मदाम को मिर्ची लग गई कि ऐसा कैसे हो गया क्योंकि लोगों को ऑन रिकॉर्ड भला बुरा कहना और बेइज़्ज़त करना तो मदाम अरुणधती राय का एक्सक्लूसिव अधिकार है!!
अब ऐसे में तो हम मदाम अरुणधती राय को यही कहेंगे – व्हाट गोज़ अराऊंड कम्स अराऊंड (What goes around comes around)!!
एक बात अरुणधती राय के लेख में यह भी देखी कि यह महिला समाज के ऊँचे तबके से अपनी घृणा को छुपाती नहीं है और लेख में भी छुपाई नहीं। और दिलचस्प बात यह है कि बुकर पुरस्कार मिलने और ख्याति पाने से पूर्व यही अरुणधती राय अपनी रोज़ी रोटी के लिए कई तरह के काम करती थी जिसमें से एक दिल्ली के पाँच सितारा होटलों में उसी (घृणित) रईस तबके को ऐरोबिक्स सिखाना था!!
इंटरनेट के कितने लाभ हैं, किसी का भी आगा पीछा हाल पता करना कितना आसान है!!
वैसे एक बड़े आश्चर्य की बात यह भी है कि भारतीयों के खिलाफ़ इतना ज़हर उगलने वाली यह महिला रहती भारत में ही है और ऑफिशियली भारतीय नागरिक है। और यह एक लानती बात है कि राष्ट्रद्रोही हरकतों के बावजूद इस महिला को अभी तक राष्ट्रद्रोह के जुर्म में गिरफ़्तार नहीं किया गया है!! कुछ लोगों ने मुम्बई कांड के बाद इसकी बकवास पढ़/सुन के इसको गिरफ़्तार कर सज़ा दिलाने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को संबोधित एक प्रार्थना पत्र लिखा है जिस पर अब तक तीन सौ से अधिक लोगों ने दस्तखत किए हैं।
मैं तो बस इतना ही कहना चाहूँगा कि अरुणधती राय के विकृत विचार जान मन कसैला हो गया। जयचन्दों की तो देश में कमी है ही नहीं, ऐसे राष्ट्रद्रोही और समाजद्रोही लोग भी हमारे बीच हैं और न केवल बीच हैं वरन् अपनी रोटियाँ सेंकने के लिए लगातार ज़हर उगल रहे हैं और समाज में दरार डाल रहे हैं!! मेरे विचार में तो इस महिला की भारतीय नागरिकता रद्द कर बिना किसी साजो सामान के एक नाव में अकेले हिन्द महासागर में अंतर्राष्ट्रीय पानी में छोड़ देना चाहिए ताकि यह इसके अनुसार घृणित भारत की नागरिक भी न रहे और कहीं भी जाने के लिए पूर्णतया स्वतंत्र। बिना पासपोर्ट और कागज़ात के कहीं और आश्रय मिले या न मिले कदाचित् चहेते पाकिस्तान में तो आश्रय मिल ही जाएगा।



36 Comments
Ratan Singh
यह औरत मानसिक तौर पर बीमार लगती है ! मुझे तो लगता है ये विदेशी शक्तियों की एजेंट के सिवा कुछ नही है मै पहले भी कई जगह टिप्पणियों में लिख चुका हूँ कि लोगों का हमें सामाजिक बहिष्कार कर देना चाहिय खास कर मीडिया को इनके बयान कभी जारी नही करने चाहिय | गुमनामी का अँधेरा ही इन लोगों कि सजा है |
prabhat tandon
और इसके बदले मे अ. राय का बैंक बैंलस कहाँ तक पहुँच गया होगा इसका अन्दाजा सहज ही लगाया जा सकता है ! मानवधिकार के नाम पर विदेशों से खैरात लेने वालों की अपने देश मे कमी नही है और इसके लिये वह अपने देश को क्या वह खुद किसी के पहलू मे भी सो जायें तो इसमे अचरज क्या है । धन्यवाद अमित एक विचारौत्तेजक लेख के लिये !
सुरेश चंद्र गुप्ता
और आपने इतना समय और संशाधन व्यर्थ कर दिए इस औरत पर एक लेख लिखने में. ऐसे लोगों के अस्तित्व को नकार देना ही सार्थक है.
Sanjeev Sharma
ये सब तथाकथित मानवाधिकारवादी हमेशा ऐसे ही बयान देकर सुर्खियों में आना चाहते हैं। इनके घटिया विचारों को लोग छापने को भी तैयार रहते हैं यह अफसोस की बात है।
संजय बेंगाणी
लोग पैसे के लिए कुछ भी करते है, तो ये भी वही कर रही है. देश समाज क्या होते है?
लेखक होने से भले ही अंग्रेजी का हो बुद्धीवान होगा यह सोचना ही गलत है. इन्हे अपने जीवन काल में भले ही कुछ लाभ मिल जाये मरने के बाद केवल घृणा ही पाते है.
एक बेकार व्यक्तित्त्व पर बहुत लम्बा लिख दिया
सुरेश चिपलूनकर
ये अंग्रेजी बुद्धिजीवी असल में “आतंकवादियों की ‘बी’ टीम” हैं, रही बात राष्ट्रद्रोह का मामला लगाकर गिरफ़्तार करने की, तो भाई साहब गिलानी तो सरकारी मेहमान बनकर दिल्ली के सारे सुख भोगते हैं, जबकि वे खुल्लमखुल्ला कश्मीर की आजादी की माँग करते हैं, ये उलटबाँसियाँ सिर्फ़ और सिर्फ़ भारत जैसे गाँ…(धी)वादी देश में ही सम्भव हैं…
umeshawa
बात बहुत साफ है । अरुन्धती राय, प्रणवा राय, राजद्वीप सरदेहाई, ट्वीस्टा सेतलवाड आदि सभी बिलायती कुत्ते है। वेटीकन के दलाल । वह सभी मुसलमानो के मित्र नही है, फिर भी उनके पक्ष मे इसलिए बोलते है की वह चाहते है की हिन्दु एवम मुसलमानो मे ज्यादा से ज्यादा घृणा बढे। हमे उनकी दोधारी तलवार से सावधान रहना चाहिए।
RAJIV MAHESHWARI
एक बेकार व्यक्तित्त्व पर बहुत लम्बा लिख दिया ………………….
सही कहा संजय भाई………..
rajeshamakaiu
समाधान की बाते की जानी चाहिए । इस अति पर खतरा है तो उस अति पर भी। और मध्य मे भी खतरा है। अब कोई न कोई तो मापदण्ड बनाना ही होगा। आर्यावर्त की भुमि और यहा के निवासियो से प्रेम ही वह मापदण्ड हो सकता है।
अतुल शर्मा
पढ़ कर दुख हुआ। ऐसे चरित्रों की कमी नहीं है देश में, उनमें से कई तो ब्लॉग जगत में मिल जाएँगे उनका जहर उगलते हुए।
Cyril Gupta
That’s right.
Arundhati Roy is disgusting.
She’s a disgusting nasty piece of turd!
Ugh!
ravi
ये तो अरूंधती जैसे लोगों का केल्कुलेटेड मूव है. यदि वे इस तरह से कंट्रोवर्सी नहीं लिखतीं तो क्या गार्जियन में छपता और क्या आप उसकी यहाँ धज्जियाँ उड़ाते?
घोर, हद दर्जे की गंदी व्यावसायिकता है.
ज्ञानदत्त पाण्डेय
मेरे पास The God of Small Things है पिछले कई साल से। उसके मैने तीन चार पन्ने ही पढ़े हैं। किसी को चाहिये तो मैं फोकट में दे सकता हूं – पर कुरियर का पैसा नहीं लगाऊंगा!
amit
संजय भाई, व्यक्तित्व बेशक घटिया है लेकिन लेख बेकार में नहीं लिखा। अरुणधती राय एक घृणित व्यक्तित्व की स्वामिनी है और उसमें तथा किसी आतंकवादी में कोई अंतर नहीं है यह सत्य बाहर आना ही चाहिए, लोगों को पता चलना चाहिए। अपने कुतर्कों को फैलाती है तो उसके कुतर्कों को काटा जाना भी आवश्यक है, यदि अनदेखा अनसुना किया जाता रहा तो कभी तो उसका असर लोगों पर पड़ेगा ही। शीत को कितना ही हम अनदेखा कर लें लेकिन कुछ समय बाद ठंड लगने ही लगती है, उसका एक ही इलाज है और वह है गर्मी पैदा करना!
अरुणधती राय को ही भिजवा दीजिए बैरंग किसी ऐसे संदेश के साथ – “गंद कितना भी बाहर फैल जाए, आखिरकार जाता वापस नाली में ही है”!!
ज्ञान जी, आपने तो किताब खरीद ली, मैंने तो दुकान में ही दो-तीन पन्ने पलटने के बाद रख दी थी!!
satyendra
sasti lokpriyata ke liye aise bakwas lekh likhe jate hain, jisse roji roti chalti rahe.
Amit
टुच्ची मानसिकता वाली औरत है ये तो. तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लोगों की जमात|
केवल एक ही उपाय है ऐसे लोगों का……… भारत की नागरिकता रद्द करके देश निकला दे दिया जाए|
अमित
Moonie
hhmm I also went through her article and I do NOT think she meant what you wrote as the gist. Your interpretation is quite skewed and flawed. She has indeed presented the article in quite a different way and maybe I also do NOT completely agree with her but one thing is for sure, you post does NOT reflect what she has to say.
Moonie
” As the carnage in Mumbai raged on, day after horrible day, our 24-hour news channels informed us that we were watching “India’s 9/11″. Like actors in a Bollywood rip-off of an old Hollywood film, we’re expected to play our parts and say our lines, even though we know it’s all been said and done before.”
Yeh likha hai Arundati na apane lekh mein par aapne unke satire ko unka kehna bol diya?? Yeh kahaan ka nyaay hai? Where is YOUR conscience Amit? Aap to koyi patrakaar nahi ke aap ko isse rozi roti kamaani hai?? Baki logon ne aap ka ‘interpretation; hi padh kar comments kar diye!!! Sochati hoon in logon ne woh lekh padha bhi kya???
Moonie
Kamse kam unke lekh ke pehali kuch pankatiya to bilkul sahi hai! The news channels were showing it like a movie along side comments/interviews from people which sensationalized the whole thing so much!!!!!!! Hotel se bach ke nikalte huye logon ko bhi nahi choda! Try to interview the Chef who came out from Oberoi with his baby .. a lot of it was quite disgusting!
Moonie
Shayad aapne socha aisa sensational heading dene se aapke blog ke readers ki sankhaya kafi badh jaayegi!
Moonie
Interestingly you seem to have NOT read ” If that’s not enough to complicate our picture of secular democracy, we should place on record that there are plenty of Muslim organisations within India preaching their own narrow bigotry.”
Also her points on Kashmir =
“Tragically, this regression into intellectual infancy comes at a time when people in India were beginning to see that in the business of terrorism, victims and perpetrators sometimes exchange roles. It’s an understanding that the people of Kashmir, given their dreadful experiences of the last 20 years, have honed to an exquisite art. On the mainland we’re still learning. (If Kashmir won’t willingly integrate into India, it’s beginning to look as though India will integrate/disintegrate into Kashmir.)”
I think you are irked because she is very anti-right in her article ?????
amit
किसी को मैंने अरुणधती राय का लेख पढ़ने से मना नहीं किया, जिसको पढ़ना है पढ़ सकता है, मैंने तो बकायदा लेख का लिंक भी दिया है अपनी पोस्ट के शुरुआत में ही!!
और रही अरुणधती राय के लेख की शुरुआती पंक्तियों की बात तो एक बार ज़रा यहाँ नज़र डालिए।
लेख की शुरुआती पंक्तियों के कारण ही पूरे लेख को उचित नहीं ठहराया जा सकता और न ही शुरुआती पंक्तियाँ पूरे लेख के भाव को प्रक्षेपित करती हैं।
और उसके बढ़ जाने से क्या होगा?? यदि आप देखेंगी तो पाएँगी कि मैंने अपने ब्लॉग पर कोई विज्ञापन नहीं लगा रखे (मेरे किसी भी ब्लॉग पर नहीं हैं) कि रीडरशिप और क्लिक बढ़ाना मेरा उद्देश्य हो। ब्लॉग होस्ट करने आदि का खर्चा मैं अपनी जेब से भरता हूँ जिसका मुझे कोई रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेन्ट नहीं मिलता क्योंकि मैं किसी रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेन्ट का इच्छुक नहीं हूँ। जानने वाले जानते हैं कि मुझे बहुत आश्चर्य होता है जब कोई मुझसे कहता है कि उसने फलां चीज़ मेरे ब्लॉग पर पढ़ी, आज भी होता है। अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनने का कोई इरादा नहीं है फिर भी आप इसे और इसे अवश्य पढ़ें।
अपनी ओर से कोई सफ़ाई देने की कोई आवश्यकता महसूस नहीं करता, लेकिन बुरा अवश्य लगा कि आपने एक घटिया तोहमत मुझ पर लगाई!!
बहरहाल आप कुछ भी समझने के लिए स्वतंत्र हैं, आप कुछ भी धारणा अपने मन में बिठाएँ मुझे क्या आपत्ति हो सकती है। जैसा कि किसी ने कहा था – इट्स ए फ्री कंट्री (its a free country)।
Moonie
tohmat to sahi hi hai; jo aapane likha hai woh Arundati roy ke lekh ka saar bilkul nahi hai! Haan jhooth bolene ki koyi manahi bhi nahi hai apane desh mein !! Its indeed a FREE country !!
amit
बिलकुल! तो जैसे आप अपनी धारणा बनाने के लिए स्वतंत्र हैं, जैसे अरुणधती राय अपनी बात कहने के लिए स्वतंत्र है वैसे ही मैं समझता हूँ कि इसी देश का नागरिक होने के कारण मुझे भी अपनी धारणा बनाने की स्वतंत्रता है। आपने लेख को अपनी तरह इंटरप्रेट किया और मैंने अपनी तरह। जिस तरह कोई आवश्यक नहीं कि मेरा इंटरप्रेटेशन ठीक है तो उसी तरह कोई आवश्यक नहीं कि आपका इंटरप्रेटेशन ठीक है। बस फर्क इतना है कि मैं आपको न ही भला बुरा कह रहा हूँ और न ही आप पर कोई तोहमत लगा रहा हूँ।
Moonie
Freedom of expression is indeed a right which comes with responsibility that you are NOT doing Defamation or incitement to an offence! Are you doing that??
amit
अरुणधती राय के बारे में आपका क्या ख्याल है जो लोगों के लिए फासिस्ट जैसे फैन्सी शब्द प्रयोग करती है? वो कदाचित् ठीक है, क्यों?
और आपका अपने बारे में क्या ख्याल है? आप तो सीधे ही मुझे झूठा और सस्ती लोकप्रियता पाने वाला कह उठीं, जो कि आपको बताना चाहूँगा कि डीफेमेशन ही कहलाया जाता है!
pk
arundhati rai is nt so much intellectual as we think ab her
her article is below standard
if u have good english and know words like godhra ,kashmir, narendra modi, gujrat.u can write a good secular(?) esaay which can give u some money
and she done that only
let her earn some money yar !!
in her article she ddnt wrote ab any new stategy to combat terrorism , anny new idea ab national security,
pk
प्रवीण त्रिवेदी-प्राइमरी का मास्टर
ये तो अरूंधती जैसे लोगों का केल्कुलेटेड मूव है. यदि वे इस तरह से कंट्रोवर्सी नहीं लिखतीं तो क्या गार्जियन में छपता और क्या आप उसकी यहाँ धज्जियाँ उड़ाते?
घोर, हद दर्जे की गंदी व्यावसायिकता है.@ ravi ratlami
sahmat!!!!!!
राजीव रंजन प्रसाद
अरंधुति राय विक्षिप्त हैं। उनपर सहानुभूति रखिये।
Moonie
Amit saab, shaayad aapne bhi lekh hi nahi padha!! Arundhati ne kisi ko “fascist” nahi kahaan; haan ‘fascism’ shabd zaroor istemaal kiya hai @ ” By 1998 the BJP was in power at the centre. The US war on terror put the wind in their sails. It allowed them to do exactly as they pleased, even to commit genocide and then present their fascism as a legitimate form of chaotic democracy.”
I do NOT agree with all what she has written but surely your lies cannot become trues because of her wrongs!! do galat ek theek nahi banate! Arundhati ne jo mann mein aaya chhaap diya aur aapne usne jo nahi bhi kahaan woh aur jo kaha sab tor marod kar kuch aur hi blog kar diya !!!!!!!!
I agree @ Pradeep Trivedi .. same applies to many news channels who were making hay while the sun shone so to speak!
Moonie
And when I see a lie I say its a lie ! Jab aap ne jhooth likha hai to maine to sach hi kahaa !
we could dispute this in court of law and truth will come out! Yeah some times it needs “supreme court” to throw light on the “interpretation” of art and artist and I guess writers too!
amit
आपकी समझने की शक्ति को तो मैं कुछ कहना ही नहीं चाहता। आपके अनुसार किसी को कह दो कि फलां व्यक्ति चोरी करता है लेकिन चोर नहीं है, क्यों? इसी तर्ज़ पर कोई फसिस्सम फैला सकता है लेकिन वो फासिस्ट नहीं होगा, क्यों? वाह!! मैं नहीं समझता कि कुछ कहने के लिए बच जाता है!!
और रही बात झूठ की, तो आप अपने दिल को कितना ही बहलाती रहें, कोई फर्क नहीं पड़ता। मैंने जो लिखा है वह अरुणधती राय की बातों और विचारों का खंडन ही किया है, आपको उसे झूठ समझना हैं तो समझती रहिए, मेरी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला।
mkatyayan
अरुंधतीराय कौन है?एक सीरियन क्रिश्चियन माँ और बंगाली पिता की संतान।माँ नें पति को छोड़ा,मुकदमें बाजी की धन बटोरा और अलग।माँ के काफी गुण/गुर अरुंधती में भी हैं।कुलमिला कर काफी इंट्रस्टिंग करेक्टर है।कम्युनिस्ट कही जानें वाली अरुंधती कुछ भी हो सकती है किन्तु देश प्रेमी नहीं हो सकती।उपेक्षा ही एकमात्र इलाज है।
आशीष
अमित,
किस पर अपनी उर्जा व्यर्थ कर रहे हो ? अरुंधती राय पर ?
भाई मेरे मानसिक रुप से विक्षिप्त लोगो के प्रलाप पर धयान नही दिया जाता|
amit
कात्यायन जी, कोई भी व्यक्ति अपने कर्मों और अपनी सोच/मानसिकता से होता है न कि अपने माँ-बाप या खानदान के असर से। अरुणधती राय की माँ ने जो भी किया वह उनका व्यक्तिगत मामला था, उससे किसी और का कोई लेना देना नहीं है। तलाक़ आदि लेने के कारण किसी व्यक्ति के चरित्र को देशद्रोही नहीं करार दिया जा सकता। व्यक्ति अपने व्यक्तिगत जीवन में क्या करता है इससे किसी का कोई लेना देना नहीं होना चाहिए।
आशीष भाई, चाहे वह विक्षिप्त सही लेकिन एक ऐसा भोंपू है जिसकी बात हज़ारों लाखों लोगों के कान में पड़ती है। गलत बात को भी यदि बार-२ किसी को सुनाया जाए तो वह बात उस व्यक्ति के लिए सही हो जाती है। इसलिए ऐसे लोगों को प्रलाप करने से रोका जाना चाहिए। कोई व्यक्ति एकांत में या एकाध लोगों के सामने बदअमनी फैलाए तो बात को अनदेखा/अनसुना किया जा सकता है लेकिन इतने बड़े स्तर पर कोई बदअमनी फैलाए तो ऐसे में अनदेखा और अनसुना करना समाज और राष्ट्र के लिए बहुत घातक हो सकता है।